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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

क्या अच्छा नहीं है अच्छा आदमी होना ?

[Allied Pulishers Pvt Ltd ] 


क्या अच्छा नहीं है अच्छा आदमी होना ?

 

“ कठिनाइयाँ तो घर में उठानी ही पड़ेंगी । आदमी अपने को साध ही लेता है । मकान अभी बदला नहीं है पर छोटे मकान में जाऊँगा । एक सब्जी कम कर दी गयी है, दूध भी, कपड़ा भी थोड़ा हाथ से धोने लगे हैं ,राम जी की मोटर इस्तेमाल करता हूँ । पेट्रोल अपना दूँगा । और भी बातें सम्भल कर करनी पड़ेंगी ।”*  अगर मैं पूछूँ कि यह कथन किस व्यक्ति का हो सकता है, जो भारत का प्रधानमंत्री भी रहा, तो सबसे पहला नाम जो ध्यान में आएगा वह लाल बहादुर शास्त्रीही होगा । ये बातें उन्होंने अपने प्राइवेट सेक्रेट्री रहे भूतपूर्व वरिष्ठ आइएएस स्व. राजेश्वर प्रसाद को एक पत्र में लिखी थीं । राजेश्वर प्रसाद ने साथ वर्षों तक लाल बहादुर शास्त्री के साथ काम किया था । उसी दौरान के अनुभवों पर उनकी किताब है ‘Days with Lal Bahadur Shastri : Glimpses from the last seven years’ । यह पत्र उसी किताब का हिस्सा है । आज किसी मंत्री के मुख से ये बातें अविश्‍वसनीय लगती हैं ।

शास्त्री जी की मृत्यु के बाद, उसी वर्ष उनके परिवार के सदस्यों को पन्‍द्रह अगस्त को लाल किलेनहीं बुलाया गया । शास्त्री जी के नाम पर लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय मेमोरियल ट्रस्ट’, जिसमें भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ही अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते, के बनाने की बात उठी, तो उसे ठंढे बस्ते में डाल दिया गया ।

किताब में लेखक ने एक वाकये की चर्चा की है । जब शास्त्री जी गृह मंत्री थे, उनके ऑफिस का डेस्क कुछ ऐसा था कि उनके पास किसी दूसरी कुर्सी को लगाने की जगह नहीं बचती थी । शास्त्री जी के लिए यह असहज करने वला अनुभव था । अंतत: उन्होंने लेखक के साथ खड़े होकर ही फाइलें क्लियर कीं । ऐसे ही एक बार पिछली रात को शास्त्री जी ने लेखक को काम के लिए देर तक रोक लिया था । अगली सुबह कुछ जरूरी बात करनी थी तो शास्त्री जी सुबह-सुबह लेखक के आवास पर ही पहुँच गए ।

मंत्री, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री हो जाने के बाद भी आदमी अपनी सादगी और शराफत बरकरार रख सकता है, यह तो शास्त्री जी ने सिद्ध कर दिया । लेकिन उनका इतना अच्छा होना उन्हीं की पार्टी या सरकार के लिए किसी काम का रहा ? प्रधानमंत्री बनने के बाद जब यह चर्चा चल रही थी कि प्रधानमंत्री के ऑफिशियल रेसिडेंस के रूप में तीन मूर्ति भवनको बनाए रखा जाए, उन पर आंतरिक भावनात्मक दबाव डालकर तीन मूर्ति भवनको मेमोरियल बनवा दिया गया ।

हम, भारत के लोग, जरूर उन्हें एक महान व्यक्ति, नेता और अपने सफलतम प्रधानमंत्री के रूप में याद करते हैं।

शास्त्री जी के विषय में लेखक के संस्मरण पढ़ते हुए कई बार अपने खोखले अहं पर शर्मिंदा हुआ । कई बार यह खयाल आया कि जब इतने बड़े व्यक्ति का व्यवहार इतना सरल हो सकता है तो लोग जो छोटे-मोटे पद पर भी जाते ही आग बरसाने लगते हैं, उन्हें तो कुछ शरम करनी ही चाहिए ।

***

जाने क्यों याद आ रहा है फिल्म छोटी-सी बातमें अमोल पालेकर का कैरेक्टर अरुणऔर फिल्म कथामें नसीरुद्दीन शाह का कैरेक्टर राजाराम। सादादिल होना, काम के प्रति ईमानदार होना, वफादार होना— क्या इन बातों का कोई अर्थ भी है ? या सिर्फ फिल्मों-कहानियों में ही इनकी जरूरत बची रह गई है । जो व्यक्ति सबके लिए पूरे तन-मन-धन से काम में लगा रहे, उसे कोई गंभीरता से भी न ले ! बस शाबाशी के दो शब्द, कभी-कभार संवेदना के दो बोल, इतने से ही खरीद किया जाता है अच्छा आदमी !

***

किसी भी क्षेत्र के सफल और पीछे छूट गए व्यक्तियों को देखता हूँ । प्रतिभावान् होना, योग्य होना, सज्जन होना – आगे बढ़ने के लिए इन बातों का संभवत: कोई महत्त्व नहीं रह गया है । जो सफल है वही सही है । जो सही है,वह सफल भी हो, जरूरी नहीं । आज शास्त्री जी पर लिखी किताब पढ़ते समय भी ये बातें ध्यान में आ रही थीं । उनके जमाने में तो फिर भी उनकी कद्र की गई । आज के समय में भी क्या यह संभव हो पाता ?

इसी किताब( Days with Lal Bahadur Shastri) को पढ़ते हुए यह भी समझ आया कि लोग आपको याद करते हैं तो इसलिए कि आप आदमी अच्छे हैं, न कि पद और पद्वियों के कारण । कभी एक सीनियर ने समझाया था – “Promotion is all incidental”;  वैसे ही आप आदमी कैसे बचते हैं , काम यही आता है । बाकी चीजें incidental ही होती हैं – क्या पद, क्या पैसा, क्या शानो-शौकत, क्या ऐशो-आराम !

***

             ग़ालिब के कुछ शेर याद आ रहे हैं –

 

बस-कि  दुश्वार है  हर काम का आसाँ होना

आदमी  को  भी  मुयस्स र नहीं  इंसाँ  होना

 

की मिरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा

हाए   उस  ज़ूद-पशेमाँ   का   पशेमाँ   होना

 

ज़ूद-पशेमाँ – अपनी भूल पर बहुत जल्द पशेमाँ होने ((पछ्ताने) वाला

 

***

 

आसाँ नहीं है आदमी अच्छा होना...!

 


गुरुवार, 29 जनवरी 2026

जीवन खेल : उजले मन की उजली कविताएँ


[ जीवन खेल , कवि प्रेम रंजन अनिमेष, प्रभाकर प्रकाशन ] 


जीवन खेल : उजले मन की उजली कविताएँ

 

 

      नब्बे के दशक में कविता की पिच पर उभरे और अब तक डट कर जमे लोकप्रिय एवं शब्दसिद्ध कवि प्रेम रंजन अनिमेष का नया संग्रह है जीवन खेल , खेल के बहाने जीवन की कुछ कवितायें। समर्पण-पृष्ठ के पहले के पृष्ठ पर दी गईं पंक्तियाँ इस प्रकार हैं –

 

                                                 खेल खेल में

 जीवन कितना

 जीवन में भी

 कितना खेल...

 

 

ये पंक्तियाँ किताब के मिजाज का पता देती हैं । प्रेम रंजन अनिमेष के अब तक प्रकाशित हुए काव्य-संग्रहों के आधार पर यदि उनकी कविताओं को एक भले व्यक्ति की भली कविताएँ कहा जाए तो यह सही ही होगा ।  इस संग्रह की कविताएँ भी क्रिकेट के खेल को आधार बना कर जीवन को संबोधित भली कविताएँ कही जा सकती हैं । वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने अपनी पुस्तक एक कवि की नोटबुकमें लिखा है – कुछ कवि होते हैं जो मुग्ध होते हैं । उनकी निगाह हमेशा जीवन के कुछ उजले पक्षों और उजली चीजों की ओर ही उठती है। प्रेम रंजन अनिमेष के इस संग्रह जीवन खेलको पढ़ते हुए भी पाठक को कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है । क्रिकेट के विभिन्न पक्षों को लेकर जीवन से साम्य बैठाती हुई कविताएँ पाठक के मन को एक मुलायमियत से भर देती हैं । आज के परिदृश्य में कविताओं में नर्म और उज्ज्वल कविताओं की संभावना ही कम बन पाती है । ऐसे में जीवन खेलकी कविताओं से गुजरना सुखकर है । राजेश जोशी ने लिखा है --  कभी-कभी तो मुझे यह भी लगता है कि मनुष्य के दुखों और यातनाओं से एक औसत प्रभाव पैदा करने वाली कविता बनाना कुछ हद तक आसान है लेकिन  जीवन और सृष्टि में जो सुन्‍दर है उसे दर्ज करते हुए पूरे मन से उसे, उसके उल्लास और उत्सव को दर्ज कराते हुए एक अच्छी कविता रच पाना ज्यादा मुशकिल काम है । ... ऐसी कविता अपने पाठक से एक हद तक सब्जेक्टिव होने की माँग करती है...शायद ।  प्रेम रंजन अनिमेष का काव्य कर्म इसी ज्यादा मुश्किल कामको आसान बनाने की कवायद है । जीवन खेलकी कविताओं से गुजरते हुए भी पाठक इसी बात की पुष्टि पाता है ।

 

            जैसा कि संग्रह के मुखपृष्ठ पर उल्लेख भी है कि संग्रह की कविताएँ खेल के बहाने जीवन की कुछ कवितायें हैं, कविताओं में कवि का जीवन दर्शन गुँथा हुआ है । संग्रह की तीसरी कविता खेल भावना की ये पंक्तियाँ देखिए –

 

                        बस यह एह्तियात रहे

किसी के हृदय   

किसी की भावना से

न खेला जाये

 

ऐसे खेलने से तो बेहतर

खेलना न आये...

 

इन पंक्तियों से कवि की जीवन-दृष्टि भी हमारे सामने खुलती है । हमलोगों ने कार्बन फुटप्रिंट की बात सुनी है । कवि जीवन में भावनाओं के मामले में भी ऐसी ही धारणा रखता प्रतीत होता है । दूसरों का इतना खयाल कि अपनी भावनाओं का कोई नकारात्मक असर नहीं होने देना चाहता । मानो वह उतने ही हल्के कदमों से चलना चाहता है जैसे किसी ताजा पोछे गए कमरे में घुसते ही कोई संभल कर चले । कविता में गुँथी हुई कवि की जीवन-दृष्टि पाठकों के लिए भी मार्गदर्शन का काम करती है। प्रेमचंद ने अपने निबन्‍ध साहित्य का उद्देश्य में लिखा है – साहित्य की बहुत सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा जीवन की आलोचनाहै । यह जीवन की आलोचनाही तो जीवन-दृष्टि है । आलोचना का गुणधर्म है नीर-क्षीर विवेक । कवि अनिमेष का यह नीर-क्षीर विवेक संग्रह की कविताओं में बार-बार प्रकट होता है । अपने उसी निबन्‍ध में प्रेमचंद लिखते हैं – नीति-शास्त्र और साहित्य-शास्त्र का लक्ष्य एक ही है – केवल उपदेश की विधि में अंतर है जीवन खेलकी कविताओं को पढ़ते हुए यह अहसास पुष्ट होता है ।

 

            इस संग्रह की कविताओं में कवि प्रेम रंजन अनिमेष क्रिकेट को देख रहे हैं, और खेल के साथ-साथ जीवन को भी दार्शनिक की नजर से देख रहे हैं । जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति का आदर्श व्यवहार कैसा होना चाहिए, इस ओर इंगित करती हैं जीवन खेलकी कविताएँ । दृश्यपटलकविता की इन पंक्तियों को देखिए –

 

                                    यह भूला हुआ

                                    कि है हाथ में ढाल

                                    रोकना भी है बचाना

                                    और करना प्रतिकार

                                    जवाबी प्रहार...

 

 

ये पंक्तियाँ क्रिकेट के खेल में उत्पन्न हुई स्थितियों का वर्णन तो हैं ही, जीवन में उपस्थित होने वाले कई ऐसे मौकों के लिए सीख भी हैं जब हम अपनी सामर्थ्य को भूल परिस्थियों के सामने घुटने टेक देते हैं ।  हम यह भूल जाते हैं कि सिर्फ हमलावर होना ही उपाय नहीं, उत्तर नहीं किसी अन्याय या अप्रीतिकर बातों का। अपनी जमीन पर खड़े रहते हुए अपने को बचाए रखना भी है जवाबी प्रहार ।

 

            कवि की दृष्टि पूरे वैश्विक परिदृश्य पर है । कविताओं को सिर्फ क्रिकेट वाली कविताएँ समझ कर पढ़ने से बारीकी से कही गई बातें पकड़ में नहीं भी आ सकती हैं ।  बल्लेबाज के बल्ले से लगकर ऊपर उठी हुई गेंद कैच होने के बजाय ऐसी जगह पर गिरती है जहाँ कोई फील्डर नहीं । इस आशय की कविता जहाँ कोई नहीं  की इन पक्तियों को देखिए –

 

             गिरें कभी

            तो गिरें

 

            कोई जहाँ नहीं

 

            वरना देखते देखते

            इतने तो आत्मघात के

सामान जुटा लिये गये  

कहीं भूल बड़ी न हो जाये

 

कि पृथ्वी ही अपनी

बन जाये

जगह ऐसी

जहाँ कोई नहीं...!

 

इन पंक्तियों का इशारा क्या युद्ध में उलझे हुए देशों की तरफ नहीं ?  इसमें कवि कि सदिच्छा भी शामिल है कि ऐसा कुछ घटित हो भी तो गिरें कोई जहाँ नहीं । कवि अनिमेष की कविताओं में अपने परिवेश या घटनाओं के प्रति आलोचना सधे-संयत शब्दों में ही आती है ।  इस कारण उनकी कविताओं में ताप की कमी महसूस की जा सकती है । ऊपर राजेश जोशी के हवाले से मुग्ध कवियोंकी बात की गई है । उसी क्रम में राजेश जोशी आगे लिखते हैं --  इस तरह के कवियों की कविता में आलोचनात्मक तेवर कम होता है या एक तरह से उससे कतराने की कोशिश इनमें दिख सकती है । उनकी कविता में कहीं-कहीं गुस्सा दिख सकता है। यह गुस्सा वस्तुत: सुन्‍दर को नष्ट किए जाने से उपजी पीड़ा है । हिन्‍दी कविता में इस मुग्ध भाव को कभी ठीक-ठाक व्याख्यायित नहीं किया गया । प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं पर भी ये बातें लागू की जा सकती हैं । यह मामला संभवत: व्यक्ति प्रेम रंजन अनिमेष या इन जैसे अन्य कवियों के सरल-मृदुल स्वभाव या विशेष सहज मनोवृत्ति का है ।

 

            प्रेम रंजन अनिमेष के लेखन की एक शक्ति इसकी प्रवाहपूर्ण और त्रुटिरहित भाषा है । भाषा पर उनका अधिकार उन्हें शब्द-क्रीड़ा करने की स्वतंत्रता और सलाहियत प्रदान करता है । उदाहरण के तौर पर कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं –

 

                        पानी की घूँट

                        अटूट...

 

अथवा

 

                         न्याय यथोचित

                        किंचित कदाचित

 

 अथवा

 

                         आभार

                        हर बार

            हाहाकार, प्रतिकार,अनिवार

 

 

शब्दों के प्रयोग पर उनकी पकड़ कविता को एक ऐसी लयात्मकता प्रदान करती है जिसके कारण कई कविताएँ छंदरहित होने के बावजूद गेय प्रतीत होती हैं । पाठक अगर कविताओं का सस्वर पाठ करेंगे तो कविताओं की इस खूबी को लक्षित कर पाएँगे ।  

 

            किसी अच्छे कवि की कोई अच्छी कविता अपने अंदर जीवन की कई घटनाओं से सादृश्य समेटे रहती है । जीवन खेलकी एक कविता है एक लंबी पारी। जाहिरा तौर पर यह कविता हाल ही में संपन्न हुए महिला क्रिकेट के वर्ल्ड कप से पहले की लिखी हुई कविता है , लेकिन इस कविता को पढ़ते हुए सेमीफाइनल में जेमिमा रॉड्रिग्स द्वारा खेली गई पारी की बार-बार याद आती है ।

 

            प्रेम रंजन अनिमेष का कवि-मन कविता-शृंखलाओं को रचने में रमता है, जिनमें एक ही विषय पर वे अलग-अलग ढंग से विचार करते हुए दिखते हैं । जीवन खेलकी कविताएँ भी अलग-अलग समयों पर क्रिकेट की किसी घटना से प्रभावित होकर लिखी गई हैं । संग्रह की अधिकांश कविताएँ आकार में छोटी हैं । इन कविताओं को प्रगीतात्मक कहा जा सकता है । चूँकि इन कविताओं में अलग-अलग कोणों से क्रिकेट को देखते हुए कवि के मन में उत्पन्न भावों का प्रकटीकरण हुआ, इन कविताओं में कोई एक कथा-सूत्र पकड़ में नहीं आता । कहने का अर्थ यह कि संग्रह में प्रबंध काव्य की तरह कथा प्रवाह नहीं है, जबकि एक ही विषय के इर्दगिर्द इतनी संख्या में लिखी गई कविताओं में यह संभव हो सकता था । संभव है कवि अनिमेष भविष्य में कोई ऐसा संग्रह लेकर आएँ । जीवन खेलऔर उनके अन्य संग्रहों की कविताओं को देख कर पाठक यह सहज ही समझ सकता है कि कवि अनिमेष की कविताओं में विषयों की विविधता है, और यह भी कि कवि किसी भी विषय को काव्य-वस्तु बनाने की दक्षता रखता है । उनकी कविताओं में विषय इस सहजता से काव्य-वस्तु में परिणत हो जाते हैं कि जरा देर को भी कविता के विषयों के असामान्य या अनोखे होने पर ध्यान नहीं जाता । उनकी सरल सहज भाषा पाठक को बाँध लेती है और अपने साथ लिए चलती है ।

 

            क्रिकेट के खेल जैसे विषय पर कविताएँ लिखने में कविताओं में इतिवृत्तात्मकता आना स्वाभाविक है । जब खेल की बारीकियों को भी कविता में ढालना हो तो उनके वर्णन से बचा नहीं जा सकता है । अच्छी बात यह है कि यह इतिवृत्तात्मकता खलती नहीं है, पाठक को बोर नहीं करती है ।

 

            संग्रह की अधिकांश कविताएँ बल्लेबाज और बल्लेबाजी को केंद्र में रखती हैं । यह कवि की अपनी रुचि के कारण होगा । दूसरी एक बात यह भी है कि इन कविताओं में आनेवाला बल्लेबाज एक पुरुष बल्लेबाज है । संग्रह की कविता नाजुक जगह वाली चोट  की अंतिम पंक्तियाँ विशुद्ध पुरुष नजरिए की चुगली कर जाती हैं ।

 

            संग्रह की एक कविता सायेअपनी रोचकता के कारण विशेष है । इस कविता में परछाईंशब्द की आवृत्ति कविता को रोचकता को कई गुणा बढ़ा देती हैं । इसके साथ ही कवि ने इस कविता में भी जीवन-दर्शन को बखूबी पिरोया है । इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं –

 

                         जब सारे साये मिल जायेंगे

                        पक्ष विपक्ष गेंद बल्ले के

 

                        खेल आज का

                        पूरा होगा

 

                        हो जायेगा सम्पन्न...

 

 

भारतीय महिला क्रिकेट टीम द्वारा विश्व कप जीतने के परिप्रेक्ष्य में संग्रह की कविता विजया एकादशीकुछ और ही विशेष हो उठी है । इस पूरे संग्रह में, और यदि मुझे ठीक स्मरण है, तो अनिमेष जी के सम्पूर्ण काव्य में व्यक्तियों का नाम सिर्फ इसी कविता में लिया गया है । यह कवि के हृदय में स्त्रियों के प्रति सम्मान की गवाही है । यह कविता उजले पक्षों की बात करती है,  लेकिन चुपके से निर्भयाका नाम भी ले लेती है , पर उसे अभय बनाने की आकांक्षा के साथ ! जीवन के उजले पक्षों पर निरंतर नजर बनाए रखना प्रेम रंजन अनिमेष के लेखन की बड़ी विशेषता है । इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ देखिए –

 

                          नवनारी

                          नवशक्ति

                          उदय हो...

 

 क्या आपको किसी पुरखे कवि की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं ?—

 

                       

                         नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

 नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;

 नव नभ के नव विहग-वृंद को

             नव पर, नव स्वर दे!

 

 वर दे, वीणावादिनि वर दे।  

 

 

कवि अनिमेष के चर्चित संग्रह संक्रमण कालकी अंतिम कविता का शीर्षक है पुनरारंभ जिसकी अंतिम पंक्ति है --  जग जीवन जय हे जीवन खेलकी अंतिम कविता है पुनर्नवा। इसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं –

 

                                     अभी कोई बच्चा

                                     डंडा लेकर आयेगा

                                    और हाँकेगा उसे

 

                                    खेल शुरू होता है

                                    यहीं से...

 

 पुनरारंभऔर पुनर्नवाजैसी कविताओं से संग्रहों का समाप्त होना महज संयोग नहीं है । यह प्रेम रंजन अनिमेष के उजले मन और उसकी उजली कविताओं का द्योतक है । ऐसी कविताएँ निश्‍चय ही स्वागत एवं संरक्षण के योग्य हैं ।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

प्रज्ञा गुप्‍ता अपने मुहल्ले की ही हैं !

 

प्रज्ञा गुप्‍ता अपने मुहल्ले की ही हैं !

[ प्रज्ञा गुप्‍ता के काव्य-संग्रह काँस के फूलों ने कहा जोहार !

की एक निजी व्याख्या ]

 

 

            आपने सेमल के फूल के पेड़ से गिरने की आवाज तो सुनी ही होगी – धपाक् ! मैंने भी सुनी है, लेकिन अब बरसों बीत चुके हैं सेमल के उतने करीब गए और वहाँ कुछ देर रुके । घर की छत से सेमल का एक पेड़ दिखता जरूर है । सेमल के फूल के गिरने की आवाज टनकती या खनकती हुई नहीं होती, बस जज़्ब हो जाती है धरती में जैसे ।  मेरे भीतर भी यह आवाज जज़्ब हो चुकी है । काँस के फूलों ने कहा जोहार!की बहुत सारी कविताओं की तासीर भी वैसी ही है, आपके भीतर जज़्ब हो जाने वाली । वैसे जिक्र तो पलाश का भी है किताब में । लेकिन पलाश के साथ एक तो आग-अंगार जुड़ गया है और दूसरे यह कि उसकी इतनी चर्चा हुई है ! वह राज्यों का राजकीय फूल भी घोषित हो चुका है । पलाश का ओहदा ऊँचा हो चुका है । सो, वह थोड़ा पहुँच के बाहर हो गया-सा लगता है । सेमल तो सबकी पहुँच में है। इसके फूलों में अंगारे नहीं दहकते हैं, इससे जंगल में आग नहीं लगती है । इसके फूलों में फागुन की पिचकारी से छूटे ताजा, चमकते रंगों के फव्वारे हैं । खिले-खिले  सेमल के फूल लाल-लाल,  टह-टह खूब लाल-लाल ! प्रज्ञा गुप्‍ता यही खिलनाअपनी कविताओं में लेकर आईं  हैं ।   कास के फूल भी  केतकी, गुलाब, जूही , चम्पा, चमेलीनहीं हैं ! उनका उजलापन जादुई-सा होता है । देखें, तो देखते ही जाएँ ! मन न अघाए । अच्छी कविताओं से भी मन नहीं अघाता।  

             अनुनासिकता लाड़-दुलार, मनुहार और किसी को मानने का द्योतक है ।  अनुनासिकता शब्दों को एक मुलायमियत, एक सहज अपनेपन से भर देती है । माँ में चन्‍द्रबिन्‍दु आखिर क्यों है ? लिखने को कासभी लिखा जा सकता है, लेकिन इसमें वो बात कहाँ ! कितनी अजीब बात है कि  हम हिन्‍दी से अनुनासिक ( चन्‍द्रबिन्‍दु) को हटाने पर तुले हुए हैं !

             जीवन में हर चीज एक लय में , एक रिदम में है । कविता या गीत हमें इसलिए इतना भा जाते हैं क्योंकि उनके अन्‍दर भी एक लय होती है, और वह लय जीवन की लय से मेल खाती है । कविता में यह लय आ कैसे सकती है ? जो कवि जीवन से जुड़ कर चलेगा, वही इसे संभव कर पाएगा । पोथी पढ़ने से यह नहीं सध सकता । इस संग्रह की कविताओं में जीवन  वही लय विद्यमान है,  जो  कविता को कविता बना देती है । यह लय है सहजता की । कविताएँ आरोपित या प्रत्यारोपित नहीं लगतीं । दूसरी खास बात जो कविता में होती है, वह यह कि वह पढ़ने वाले को आईना दिखा देती है । साहित्य समाज का दर्पण होगा, पर वह पाठक के लिए भी एक दर्पण है और वह भी आदमकद । पाठक नजरें बचा नहीं सकता । दरअसल, हम  हर रचना में लेखक या अपने किसी जाननेवाले या किसी जानेमाने व्यक्ति के जीवन की घटनाओं या परिस्थितियों को ढूँढ़ने लगते हैं । उसका एक कारण यह भी है, कि हम चाहते हैं कि कोई मिल जाए तो हम खुद को तसल्ली दे सकें कि यह हम नहीं ! हम अपने करतूतों की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं । लेकिन इस संग्रह की कुछ कविताएँ बहुत तीक्ष्ण दृष्‍टि के साथ पाठक के चेहरे पर सवालिया निगाह डालती हैं, खासकर यदि पाठक पुल्लिंग है ! हूबहू घटनाएँ या संवाद  हों न हों, पाठक अपने जीवन की बहुत-सी बातों को तुरंत याद कर जाता है  और एक अपराधबोध या ग्लानिबोध उस पर तारी जरूर होता है । अपनी माँ, बहन, चाची, भाभी  के सामने उसने कभी खाने की थाली फेंकी हो या नहीं, उनके हँसने के तरीके पर कभी टोका हो या नहीं, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उन्हें कभी औड़म-बौड़म कहा हो या नहीं, वह जानता है कि ऐसी ही कोई न कोई बात तो वह कर चुका है या कभी भी कर सकता है ! मेल-ईगोकिसी से दबाया जा सका है कभी ! दो-एक साल पहले एक फिल्म आई थी डॉक्टर  G’ । इस फिल्म में, परिस्थितियों के फेर से, फिल्म का नायक मेडिकल कॉलेज में गायनाकोलॉजी की पढ़ाई करने आता है । फिल्म के नायक का विभाग बदल नहीं पा रहा, और उसका मन इस विभाग में लग नहीं रहा । ऐसे में एक दिन उसकी प्रोफेसर उससे कुछ ऐसा कहती है “ अपने अंदर से मेल टचको निकालो और डॉक्टर-टचको लाओ, तभी तुम स्त्रियों के डॉक्टर यानी गायनाकोलॉजिस्ट बन सकते हो” । एक भाई या पिता के रूप में हमारी सशंकित निगाहें बहनों-बेटियों के साथ रास्ते में कुछ दूर तक जाती हैं । एक बच्ची अपनी माँ से हिम्मत माँगती है कि वह बड़ी होकर अकेली बस स्टॉप से घर आ सके । यह सारा मसला मेल-टचऔर मेल-गेज़का है । पति, पिता, भाई -- कोई भी इसलिए निश्‍चिंत नहीं हो पाता कि वह भी अपने भीतर के मेल टचऔर मेल-गेज़की करतूतों को बखूबी जानता है । मेल-ईगो’, मेल-टचऔर मेल-गेज़की त्रयी जीवन को सहज-सरल नहीं रहने दे रही । और सुधरना उसे आता नहीं !  स्त्रियों को हमने रोज एक खबरमें बदल कर रख दिया है । पुरुष के अंदर का पशु क्या सचमुच नहीं मर सकता ?

             भारत का लगभग हर व्यक्ति ही विस्थापित है । वह गाँव से निकला हुआ व्यक्ति है । यदि वह खुद नहीं तो उसके एक पीढ़ी ऊपर के लोग गाँव से ही निकल कर आए हुए हैं । वह गाँव से निकल तो आता है, गाँव उससे निकल नहीं पाता। लेकिन वह गाँव कभी लौट भी नहीं पाता ।  एक कवि के लिए राजेश जोशी इसे ही कवि का दोहरी नागरिकताका होना कहते हैं । साहिर लुधियानवी ने एक शेर में कहा है “ मैं और तुमसे तर्क-ए-मुहब्बत की आरज़ू/ दीवाना कर दिया है ग़मे-रोज़गार ने” । हमारी स्मृतियों की चीजें गायब होती चली जा रही हैं ।  विस्थापन तो हो ही रहा है, प्रतिस्थापन भी हो रहा है । कोई पन्‍द्रह वर्ष पहले की बात है, साइकिल पर ले जाए जाते हुए कोयले को दिखाकर अपने बेटे को बताया था कि देखो कोयला यही होता है । कुछ परिवर्तन जीवन में अवश्यम्भावी होते हैं ! मँझली मौसी’, ‘सँझली मौसी’, ‘बड़के चाचा’, ‘बड़की भौजी’—हो सकता है आने वाले दिनों में इन सम्बोधनों के अर्थ समझने-समझाने वाले ही न बचें । भइया और भाई के या दीदी और बहन के अन्‍तर को समझाने के लिए उदाहरण कम पड़ जाएँ । मौसेरे, ममेरे, चचेरे, फूफेरे – ये सारे रिश्‍ते ही कज़नमें समाहित हो जाएँ । भारतीय संस्कृति में सबसे छोटी इकाई परिवार है । इसका भी अस्तित्व खतरे में है । परिवार यानी कुटुम्ब । कुटुम्ब या तो अब कुटुम्ब न्यायालयके सन्‍दर्भ में याद आता है, या वसुधैव कुटुम्बकम्को जपने में ! गाँव तो छोड़िए,शहरों में मुहल्ले अपना अर्थ खो चुके हैं । लोग अपने-अपने मकानों, फ्लैटों में सिमट कर रह गए हैं । बात अब तो मकानों के अलग-अलग कमरों और उसमें भी मोबाइल के स्क्रीनों तक सिमटती जा रही है ।

             काँस के फूलों ने कहा जोहार!की कविताओं में परिवार बार-बार , अलग-अलग बहाने से आता है । भाँति-भाँति से, अपनी तरह से परिवार को बचाने के प्रयास में भी हैं ये कविताएँ । इन कविताओं में पारिवारिक-सामाजिक ताना-बाना अपने सौन्‍दर्य के साथ उपस्थित है । उड़द की बड़ियाँहैं, तो उसके साथ-साथ प्लास्टिक पर धूप में  सूखने के लिए रखे हुए आलू-चिप्स की छवियाँ भी आँखों में उतर आती हैं । बोइयामों में रखे अचारों की याद मुँह में पानी ले आती है । बहन के हाथ के बुने स्वेटर के बहाने आप अपने बक्से से माँ या नानी का बुना कोई स्वेटर निकाल कर धूप में डाल आते हैं, इन सर्दियों में पहने जाने के लिए ।  वेजिटेरियन मटनकटहल की सब्जी बहुत जोरों से याद आने लगती है । नेनुआ के फूल खिले दिखने लगते हैं । मालती की भीनी खुशबू नासिका-रन्‍ध्रों में जाने कहाँ से भर जाती है । ओस की छुअन की याद आनंद से भर देती है मन को । एक कविता संग्रह से आप क्या-क्या चाहेंगे भाई !

             इस संग्रह की कविताओं को पढ़कर एक लड़की के जीवन का पूरा आर्कआपके सामने खिंच जाता है । बस जरा-सा ध्यान से आप कनेक्टिंग द डॉट्‍सकरते चलें । जीवन का स्त्री-पक्ष जीवन की तरलता है, हृदय की नमी है, आँखों का पानी है । उस जीवन की कल्पना भी कितनी भयावह है जब कवि को कहना पड़े “ सोचती हूँ वह अंतिम पुरुष कौन होगा/ जिसका रोना सुनने के लिए नहीं बचेगी कोई स्त्री । स्त्रियों के शाप से तो देवता भी नहीं बच सके।

             साहित्य की हर अच्छी रचना का एक काम यह भी है कि वह अपने लोक के शब्दों का स्मरण कराए, उनका संरक्षण करे । इस संग्रह में ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं । मेर मन अटक रहा है संग्रह में आए शब्दों – सूप, करइत, बइर, खोइंछा, गाछ – पर और नेनुआ के फूल’  पर । आपका मन कहीं और अटकेगा !

             कभी-कभी हम वैसी बातों का कहना जरूरी समझते हैं , जिसे कहने से हमारी उपस्थिति खास मौकों या स्थानों पर दर्ज हो सके । हो सकता है ऐसी बातें बहुत लोग बहुत बार कर भी चुके हों, फिर भी हम कह देने का एक नैतिक दबाव महसूस करने लगते हैं ।  जितनी तानाशाहदिल्ली है, उससे कम पटना या राँची भी नहीं । बल्कि हमारे आसपास, घर-परिवार, जान-पहचान, दफ्तर-वफ्तर  हर जगह तानाशाही के किस्से हैं । कहीं प्रकट, कहीं अप्रकट । और बहुत सारी जगहों पर, बहुत सारी बातों में हम खुद को तानाशाहोंकी जी-हुजूरी करते, उनकी लल्लो-चप्पो करते हुए पा सकते हैं। इसे स्वीकार कर पाना एक अलग बात है ।

             कोई आइडिया, कोई विचार, कोई आन्‍दोलन एकबारगी उठ खड़ा नहीं होता । कोई एक बात यहाँ, दो बातें वहाँ इस तरह कर-करके बात आगे बढ़ती है । फिर एक ऐसा समय आता है जब वह बात अपने टिपिंग प्वाइंटपर पहुँच जाती है । फिर वही बात हमें चारों तरफ होती हुई दिखने लगती है । इस संग्रह की कविताओं में ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जो जिस दिन अपने टिपिंग प्वाइंटपर पहुँचेंगी, चारों ओर दिखने लगेंगी । चाहे वो बातें पर्यावरण संबंधी हों, चाहे गाँव-घर-परिवार संबंधी हों, चाहे एक लड़की के सम्मान और अधिकार संबंधी हों ।

             मैं अपनी बेटी से ककहरा सीख रही हूँ’ ,‘मेरी बेटी इन दिनों मेरी दोस्त हैऔर स्पर्शसरीखी कविताएँ बताती हैं कि माँ-बेटी के संबन्ध एक अलग ही धरातल पर होते हैं । ये कविताएँ इस तरह से मन में उतरती हैं कि उजास भर जाता है मन में । एक बच्ची की नन्हीं हथेलियों के कोमल स्पर्श को महसूस करने लगते हैं आप अपने चेहरे पर  । वहीं बचा हुआ है वह मुझमेंकविता का दर्द, सब खो देने का भाव, अवशता और एक मौन आर्तनाद पाठक के हृदय को स्तब्ध कर जाता है। वह जड़वत् बैठा रह जाता है कुछ क्षण ।

               ये कविताएँ मन के इतने करीब, हमारे इतने आसपास की हैं । यह लगता ही नहीं कि कवि और हमारी ज़िंदगियाँ अलग-अलग हैं । कविता को यही बात तो खास बना देती है । मुझे तो यह लगता है कि प्रज्ञा गुप्‍ता अपने मुहल्ले की ही  हैं । वे देख-समझ रही हैं हमारा सारा हाल । और मेरा विश्‍वास है कि हर पाठक को यही लगेगा । हाँ, आलोचकों की बात मैं नहीं जानता ।   

 

             


बुधवार, 26 नवंबर 2025

‘असम्भव के विरुद्ध’: बह रहा है बीज रचना का

असम्भव के विरुद्ध: बह रहा है बीज रचना का

[ ‘असम्भव के विरुद्ध’, प्रकाश देवकुलिश, वाणी प्रकाशन, 2024 ]


         अपने नयी कविता की प्रकृतिशीर्षक निबन्‍ध में मुक्तिबोध ने लिखा है --  ध्यान रखने की बात है कि एक कला- सिद्धान्‍त के पीछे एक विशेष जीवन-दृष्‍टि होती है, उस जीवन-दृष्‍टि के पीछे एक जीवन-दर्शन होता है और उस जीवन-दर्शन के पीछे, आजकल के जमाने में एक राजनैतिक दृष्‍टि भी लगी रहती है ।  प्रकाश देवकुलिश के पहले कविता संग्रह असम्भव के विरुद्धपढ़ते हुए कवि की राजनैतिक दृष्‍टिसम्पन्नता के दर्शन बार-बार होते हैं । आज के समय में जब जीवन के हर क्षेत्र में राजनीति घुसी हुई है, यह सर्वथा स्वाभाविक ही है कि कवि राजनीति के कारण पैदा हुए सवालों से बार-बार जूझे । हालाँकि इस वजह से असम्भव के विरुद्धकी कविताओं को एकांगी या एकरस समझ लेना ज्यादती होगी । संग्रह की अड़सठ कविताओं से कवि ने ऐसा वितान ताना है जो बहुरंगी और बहुआयामी है । संग्रह की इसी खूबसूरती को इंगित करते हुए कवि अरूण कमल ने संग्रह के कवर पर दी गई संस्तुति में लिखा है – नितान्‍त निजी, ललित भावनाओं से लेकर बेहद बेधक राजनैतिक कविताओं तक जीवन के बहुत बड़े भाग को आयत्त करतीं ये कविताएँ समकालीन हिन्‍दी कविता को एक नया विन्‍यास देती हैं

 किसी कवि की वैचारिक और भावनात्मक बुनियाद या बुनावट कवि को उन विषयों की ओर ले जाती है जिन्हें वह अपनी कविताओं में उतारता है ।  कवि देवकुलिश की पक्षधरता किस तरफ है यह संग्रह की बहुत सी कविताओं में कामगरों, मजदूरों और किसानों की उपस्थिति से स्वत: स्पष्ट है । हर कविता संदर्भ-सापेक्ष होती है । कुछ कविताओं में संदर्भ स्पष्ट होते हैं, कुछ में अप्रकट । इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक गत दस-पन्‍द्रह वर्षों के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य की उपस्थिति को पहचान सकता है । उदाहरण के लिए रामशीर्षक कविता की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है –

                         उस राम को पाने कहाँ जाऊँ

                        किस मन्‍दिर –

                        निर्मित या निर्माणाधीन

                        किस मठ, किस पीठाधीश्‍वर के पास ?

                        किस कचहरी,किस न्यायमूर्ति के पास ?

 इसी कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस तरह से हैं –

                                     किन शालाओं, स्थापत्य कलाओं में,     

                                    किस भूमि पर,

                                    किस प्रांगण में ढूँढूँ तुम्हें

                                    हे अन्‍तर्वासी राम !

 कवि का ईश्‍वर रूढ़ियों, रिवाजों या दिखावों में बसने वाला ईश्‍वर नहीं है । संग्रह की एक अन्य कविता ईश्‍वरमें कवि ईश्‍वर का अर्थ समझने का आह्वान करता है । उसका कहना है कि ईश्‍वर जहाँ भी और जो भी है, अपने श्रेष्ठतम रूप में होता है । जरूरत है हमें सुन्‍दरम्,सत्यम्, शिवम् को समझने की ।

             संग्रह की कविताओं में मजदूर वर्ग, किसान, सत्ता, धर्म या पौराणिक सन्‍दर्भ, इतिहास के प्रसंग, प्रकृति, स्मृतियाँ आदि सब एक दूसरे से गुँथे हुए हैं । प्राय: हर कविता यथास्थिति को समझने, उसे बदलने एवम् गलत का प्रतिकार करने, लोगों को उनका उचित श्रेय देने, और एक बेहतर समय की कामना के लिए प्रस्तुत होती है ।

             प्रकाश देवकुलिश की कविताओं को पढ़ने- समझने के लिए पाठक की ओर से भी थोड़ी तैयारी अपेक्षित है । इनकी कविताओं में आए कुछ नाम, कुछ घटनाएँ, कुछ तिथियाँ यदि पाठक की जानकारी में रहें तो पाठक पर कविताओं का प्रभाव निश्‍चित तौर पर ज्यादा होगा । मैं समझता हूँ, ये कविताएँ इतनी अपेक्षा रखती हैं कि यदि पाठक कविता में ऊपर बताई गई बातों से अनभिज्ञ हो, तो गूगल तो कर ही ले कम से कम । अज्ञेय ने कहा है --  आज कवि से ही अधिक माँग की जाती है । पाठक से नहीं कहा जाता है कि वह काव्य सुनने या पढ़ने का पात्र बने ।  इस बात को समझने के लिए दो कविताओं से कुछ पंक्तियाँ । पहले हम कहाँ कुछ बोलते हैंकी ये पंक्तियाँ –

                          लद गये दिन तुष्‍ट करने के

                        जैसे बड़े दिनों की चाह

                        हो रही हो पूरी

                        अफीम ली

                        सबने थोड़ी-थोड़ी

 अब लेनिनग्राद अब बदल जाएगा पीटर्सबर्ग मेंकी इन पंक्तियों को देखिए –

                         ओ साथी !

                        मनुष्य को आदत है

                        अफीम खाने की

                        धर्म अफीम नहीं था

                        तुम भी अफीम नहीं थे

                        पर उन्होंने विअसे ही खाया

                        धर्म को भी

                        फिर तुम्हें भी

                        और वैसे ही खाएँगे

                        तुम्हारे नकारे जाने को भी

 पाठक यदि इन दोनों कविताओं में आए अफीमशब्द के सन्‍दर्भों से अपरिचित हो, तो कविता से उत्पन्न होने वाले रस में कुछ कमी जरूर ही आ जाएगी । इन दोनों कविताओं में आए पद राम राम का क्रन्‍दन’ , ‘चाय पर चर्चा’ , ‘लेनिनग्राद’, ‘पीटर्सबर्गया उन्नीस सौ सत्रहभी अपने सन्‍दर्भों के कारण कुछ विशेष अर्थपूर्णहो जाते हैं ।

             अज्ञेय ने कहा है --  काव्य का विषय और काव्य की वस्तु अलग-अलग चीजें हैं ।... वह ( वस्तु) विषय के साथ कवि के रागात्मक सम्बन्‍ध का प्रतिबिम्ब होगी । इस मापदण्ड के अनुसार इस संग्रह की कविताओं में विषय के साथ कवि के रागात्मक सम्बन्‍ध को पाठक लगातार महसूस करता है । इस दृष्टि से संग्रह की तीन कविताएँ रधिया दाई’, ‘अनन्‍दी महतो की कुदालऔर काम से लौटतीं औरतेंकुछ खास ही बन पड़ी हैं । हर पाठक लिए अपनी रधिया दाई, अपने अनन्‍दी महतो और अपनी काम से लौटतीऔरतें उपस्थित हो जाती हैं । इन तीनों कविताओं के पात्र सारी परेशानियों के बावजूद अपनी स्थिति को लेकर दु:ख में डूबे हुए लोग नहीं हैं । वे अपने कर्म से प्रसन्न और सन्‍तुष्ट हैं । कविता का कमाल यह है कि पाठक ही, बकौल कैफ़ी आज़मी, सोचने लगता है कि “ यही दुनिया है तो फिर ऐसी  ये दुनिया क्यों है” ।

             संग्रह की कविताएँ आकार में लम्बी नहीं हैं । सिर्फ तीन कविताएँ तीन पृष्ठों तक गई हैं । बाकी सारी कविताएँ एक या दो पृष्ठों की हैं । कुछ कविताएँ तो दस-पन्‍द्रह पंक्तियों की हैं । आकार के लिहाज से संग्रह की सबसे छोटी कविता मात्र नौ पंक्तियों की है , जिसका शीर्षक है काँच टूटने की आवाज। कवि काफी लम्बे समय से कविताएँ लिख रहे हैं। सम्भव है उनके निरंतर रचनाकर्म ने उनकी अभिव्यक्ति को सघनता प्रदान की हो । कविता के आकार पर विचार करते हुए वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा है – क्या कविता की इकाई का छोटा होना एशियाई विशेषता है ? …यह मात्र शिल्प का मामला नहीं है । मुझे लगता है यह एक मूल्य दृष्टि का सवाल है । एक पूरी मानसिक संरचना का भी । कारण जो भी हो, प्रकाश देवकुलिश की छोटे आकार की कविताएँ भी अनुभूति की तीव्रता के लिहाज से निश्चय ही बड़ी कविताएँ हैं ।

           यों तो इस संग्रह की कविताएँ जमाने से दो-दो हाथ करती हुई-सी कविताएँ हैं, पर कुछ कविताएँ अलहदा रंग लिए हुए हैं  । पन्‍द्रह पंक्तियों की एक कविता है घोंसले में प्यार। बेटी पर लिखी हुई यह एक बहुत ही खूबसूरत कविता है । इसकी शुरुआती पंक्तियाँ देखिए –       

            जैसे बेली में होती है भीनी खुशबू

            चाँद में उजली नरमी

            बयार में नींद

            बौर में महँक

            छुईमुई में लाज

बेटी पर लिखी हुई ऐसी स्नेह-सिक्त पंक्तियाँ कम ही होंगी !

         संग्रह की दो-तीन कविताओं में माँ की उपस्थिति है । अर्थ अयोध्या काशी कैलाश काशीर्षक कविता में द्वंद है कवि की तीर्थों/धामों की यात्रा के प्रति अनिच्छा और माँ की अस्था के बीच । साधनों के अभाव में माँ की पुण्य धामों को देखने की इच्छा पूरी नहीं हो पाती । और माँ की अनुपस्थिति कवि के मन में उन यात्राओं की निस्सारता, निरर्थकता  और भी तीव्र और दृढ़ हो जाती है । कविता की इन पंक्तियों में कवि का दर्द, उसका अफसोस देखिए –

                          समय के साथ

                        धुँधली न होकर साफ होती जाती है

                        उसकी स्मृति

                        और

                        निरर्थक होता जाता है और भी –

                        अर्थ – चारो धाम का                 

                        अयोध्या, काशी, कैलाश का ।

  ऐसा ही दुख, ऐसा ही अफसोस, थोड़े अलग संदर्भों में युवा कवि राही डूमरचीर की एक कविता की पंक्तियों में भी उतरता है –

                        आज इसी शहर के

                        स्टेशन से

                        विदा ली तुमने आखिरी बार

                        अब क्या ही जाऊँगा

                        धनबाद

 यह निर्जनता और निर्विकल्पता कवि के साथ- साथ पाठक को भी घेर लेती है ।

             प्रकाश देवकुलिश की बहुत-सी कविताएँ ऐसे विषयों को केन्‍द्र में रखकर लिखी गई हैं, समाचारों में जिन पर चर्चा होती रही है । उन्हें चाहें तो पॉपुलर मूडके विषय कह सकते हैं ।  कुम्हार भाई’ , ‘ढोर की तरह वे’, ‘धन्यवाद भूल गया हूँआदि कविताओं के विषय खबरों में बने रह चुके विषय हैं । पाठकों को इन कविताओं में खबरों की पुनरावृत्ति होती हुई लग सकती है । इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कुछ बातों का दुहराया जाना भी जरूरी है , जब तक कि स्थितियाँ सुधर न जाएँ ।

             संग्रह की एक कविता कहना खरी-खरीविषय के अनूठेपन की वजह से खास है ।  हमारे यहाँ की परिपाटी है कि दिवंगत लोगों के प्रति सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें ही कही जाती हैं । कवि इस परिपाटी को बदल देना चाहता है । वह कहता है –

                         दे रहा हूँ जिम्मेवारी तुम्हें

                        जो चला गया उस पर क्या कहेंकी लीक तोड़ने की

                        कहना खरी-खरी

इतना खरा कौन होता है आजकल ?

             संग्रह की दो प्रेम कविताएँ विशेष रूप से पढ़ी जानी चाहिए  -- अच्छा है कि सच कहेंऔर हवा वहीं ठहरी है । प्रेम एक ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं पड़ता । कवि भी कहता है—

                          तुम्हें, मुझे

                        और दुनिया के तमाम लोगों को

                        प्यार करना चाहिए ।

  प्रकाश देवकुलिश एक सजग और सहृदय कवि हैं , इस बात की गवाह  सम्भव के विरुद्धकी कविताएँ हैं ।  कवि नजर हर तरफ है । कवि हर बात पर विचार कर रहा है । मुक्तिबोध ने कहा है --  आज ऐसे कवि-चरित्र की आवश्यकता है, जो मानवीय वास्तविकता का बौद्धिक और हार्दिक आकलन करते हुए सामान्य जनों के गुणों और उनके संघर्षों से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करे, उनके संचित जीवन-विवेक को स्वयं ग्रहण करे तथा उसे और अधिक निखारकर कलात्मक रूप में उन्हीं की चीज को उन्हें लौटा दे ।  असम्भव के विरुद्धकी कविताओं को पढ़कर पाठक यह मानेगा कि मुक्तिबोध का यह कथन कवि प्रकाश देवकुलिश के लिए ही है ।

             कवि और उसकी कविता को उसकी ही पंक्तियाँ परिभाषित कर रही हैं –

                          हुनर के हाथ में

                        घुले श्रम से

                        बह रहा है बीज रचना का ।