फिर कही बात...
(कुछ छंद में बतर्ज़े-ग़ज़ल )
मुद्दा तो समीचीन है
इधर पाक, उधर चीन है
धुन वही आप ही की है
जी, आपकी ही बीन है
गौर से सुनिए ज़रा फिर
अगर बात कुछ महीन है
बेफिक्र हो ले जाइए
दिल चीज़ बेहतरीन है
चाहा कि दिल हाथ आता
आ जाता आस्तीन है
तुम्हारा ही है आसमाँ
मुझे ढूॅंढ़नी ज़मीन है
आँख बही जाती है बस
और दिल तमाशबीन है
हाल इसका भी पूछ लो
कि ज़ख्म ताज़ातरीन है
***
कोई दोस्त जब दुश्मन लगे
फिर बुझा-बुझा-सा ये मन लगे
एक हल्के-से झोंके से भी
कभी यूँ टूटता बंधन लगे
कितने सुहाने थे पल मेरे
अब सोचूँ अगर तो सपन लगे
***
कुछ भी करने को तैयार हूँ
जी हाँ, मैं बिल्कुल बेकार हूँ
जो खुद ही डूबा चाहता है
एक ऐसा अजब मँझधार हूँ
कहना तो तुमसे चाहता हूँ
तुम्हारा,देख लो, मैं प्यार हूँ
कांटों में अगर एक खार हूँ
तो गुलों में उनका क़रार हूं
अब तो कुछ करना ही पड़ेगा
यहाँ बहुतों का एतबार हूँ
तुमको सुना-सुना कर हाल सब
अब हल्का-हल्का-सा यार हूँ
***
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