फिर कही बात ...2
मन को तुम्हारे टटोले हुए हैं
अब आँखें अपनी खोले हुए हैं
रात और दिन का फ़र्क कुछ नहीं
करेंगे वही जो बोले हुए हैं
कल तक वही थे आँखों के सपने
जो आज दिल के फफोले हुए हैं
मन मे ज़हर ही ज़हर घुल रहा है
रस बातों कैसा घोले हुए हैं
माना तुम्हीं-तुम बड़े हो गए हो
माना कि बस हम मँझोले हुए हैं
चिंताएँ कितनी ठूॅंसी हुई हैं
इंसान हैं याकि झोले हुए हैं
मन था- नज़रों में ऊॅंचा उठेंगे
वे कि तराजू में तौले हुए हैं
लगता है कि हम चूके यहीं पर
हमीं भेद सारे खोले हुए हैं
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ऊब न जाओ डरता हूँ
कितनी बातें करता हूँ
तुम भी अच्छे लगते हो
तुम पर भी मैं मरता हूँ
उनको दिक्कत है ,मैं ही
खतो-किताबत करता हूँ
दिन भर खाली बैठा हूँ
दिन भर आहें भरता हूँ
सोच-समझ कर कहते हैं
मैं कह, सोचा करता हूँ
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बस बाल-बाल बचे हैं
बुझे हुए अगरचे हैं
किस्से सभी मेरे हैं
जाने किसने रचे हैं
सब बॅंधे-से बैठे हैं
खूबरुओं के चर्चे हैं
खुल के बोलनेवाले
अब भला किसे पचे हैं