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1. ध्यानाकर्षण
2. कुत्ता 3. जन्मदिन पर 4. तरावट 5. विदा 6. उफान 7. यूँ भी होता है... 8. प्यार...
आखिरकार 9. हकीकत 10. दरअसल 11. सिद्धांततः 12. एक सवाल 13. जय हो 14. जड़ 15. पुनश्च
16. आत्म-समर्पण 17. समां 18. पहचान 19. पिता 20. आशा 21. एक इतवार का दिन 22. अस्पताल
में अपना कोई 23. ताजगी का रंग और गंध 24. काश...! 25. बच्चों का दिल 26. मेरे
सपनों का रंग 27. लाचारगी 28. इंतज़ार 29. एक पीली नदी हरे पाटों के बीच बहती हुई 30.
घर आया मैं 31. छोटे-छोटे पाँवों की चप्पल 32. घर का नौकर 33. कुछ सवाल 34. माँ की
हँसी 35. रोजनामचा 36. मन की बात 37. एक दिन ज़िंदगी
तरावट
[ ‘एक पीली नदी हरे पाटों के बीच बहती हुई’ प्रकाशित कविता-संग्रह
से कुछ कविताएँ हटाने के बाद ]
ध्यानाकर्षण
हठात्
दिख
गई
सड़क
पर घूमती
एकदम
नंगी लड़की
कम-उमर
ही रही होगी
रूखे-सूखे
से वाल
बायें
हाथ में एक कटोरा
बढ़
रही थी
चौराहे
की ओर
जहाँ
भगवान
बिरसा
मूर्ति
रूप में स्थापित हैं
मुनि-महात्मा
तो थी नहीं
वरना
अनुयायियों
की भीड़
साथ
होती,
गले
में
होती
एक माला कम-से-कम
असह्य हो गया होगा दबाव
चटक
गई होगी
नस
कोई दिमाग की,
कर
दिया होगा संज्ञा-विहीन-
न
भला कुछ, न बुरा
न
सही, न गलत
बस
एक देह है
जिसको
जिंदा रखा जाना है
प्रतिशोध
भी हो सकता है
कि
जिस खातिर किया गया बेबस,
पार
कर दी गई
सोच
तक की हदें
उन्हीं
लोलुप नजरों को
धिक्कार!
दीवानावार !
हथिया
लेना ही सबकुछ
हो
ध्येय, तो, लो यही सबकुछ
परोसा
हुआ-निर्विकार !
देह
बस
देह-रूप
सड़क
पर चलायमान
कुछ
ने मुँह फेरा भी होगा
कुछ
ने शायद घेरा भी होगा।
हमारे
मेयर-महापौर
सत्ता
के सिरमौर
संज्ञान
की बात करेंगे !
याकि
बात का संगीन होना अभी बाकी है!
कुछ
दूर आगे उसी सड़क पर
बीचो-बीच
पड़ी है एक कुत्ते की मरी देह-
ये
कल भी थी-
अब
वो देह रौंदी जाएगी
आती-जाती
गाड़ियों के चक्कों से
धूल
हो जाने तक-
मरी
देह को पीड़ा नहीं होती !
हमारे
मेयर-महापौर
करेंगे
कुछ ?
लड़की
ने क्या देख-समझ लिया था
कुत्ते
की मृत देह का हश्र !
उसका
मन भी तो कहीं
रौंदा
जाकर धूल नहीं हो चुका !
और
देह, हालाँकि साँस बाकी है,
सड़क
पर इसीलिए है
कि
आती-जाती नजरों से,
फिकरों
से, बातों से, घातों से
रौंद
दी जाए धूल होने तक।
मरे
हुए को पीड़ा नहीं होती !!
ये
हमारे युग का प्रतीक है
कि
चेतावनी, कौन जाने ?
कौन
बताएगा?
हमारा
देश तो चिंतकों,
विचारकों का देश है
विमर्श
तक ही
संकल्प-सामर्थ्य
की सीमा है।
खिन्न
मन !
अचानक
एक मकान के छोटे-से बगीचे में
दिखती
है हरी घास
उस
पर जमा हुआ थोड़ा-सा पानी
और
दो नन्हें पाँव-
छप
! छप । छप ! छप !
यहीं
है संभावना,
यही
है
नन्हें
पाँवों ने
सीमाओं
का किया होगा विस्तार
नहीं
मानी होंगी
कुछ
बंदिशें, कुछ जड़ नियम
कुछ
नया, अच्छा पाने की चाह में
नई
अनुभूति, और उसकी खुशी के लिए
बँधी-बँधाई
चीजों से छुड़ा कर हाथ,
किया
होगा साहस बढ़ जाने का,
कर जाने का
न
इतिहास का बोझ कंधों पर,
न
सुदूर भविष्य की चिंता
न
की होगी घंटों बहस
न
किया होगा इंतजार किसी और के भी बढ़ने का
बस
कदम बढ़ गए होंगे
नए
एहसाह, नई पुलक की ओर
सूत-सूत
भर भी
आदमी
चलता-बदलता रहे
तो
बदल सकती है रूपरेखा
बदल
सकते हैं विचार
फिर
न रहेगी आवश्यकता किसी और के संज्ञान लेने की
नहीं
तो
कथा-पुराणों
में ही होता है कल्कि अवतार ! ⇑
कुत्ता
खाकर
लात का आघात
छिटक
कर दूर खड़ा हुआ है
अब
तक जो बैठा था
बरामदे
के कोने में बोरे पर
कटोरे
से मुँह को लगाए
बस
पनीली आँखों से
देखता
है, भावशून्य-सा
हतप्रभ
नहीं होता अब
पहली
बार की तरह
घर
की चौकीदारी करना
दिखाना
बहादुरी
प्रदर्शनी-प्रतियोगिताओं
में
जो
आएँ मेहमान घर में
तो
सूँघ-सूँघकर पाँव
बता
देना वफादारी
उठाकर
ले आना गेंद,
बच्चों
की फेंकी हुई
और
सुबह, दोपहर, शाम
मानकर
एहसान
खा
लेना रोटी के टुकड़ों को
बचे-खुचे
खाने को
कभी
सहला दिए जाने पर प्यार से
दिखाना
करतब संगीतमय
कूँ...
कूँ... कूँ...
लेकिन
कुत्ते की जात
अड़
गया एक दिन
नहीं
खाई सूखी रोटी
पड़
गई लात
फिर
क्या, लात पर लात
कभी
कालीन पर सो जाने को
कभी
दौड़ के न आने को
गले
में पट्टा हो
तो
दुम
दबी
रहनी चाहिए
कुत्ते
को
सोचना
नहीं चाहिए ! ⇑
जन्मदिन पर
तुमको हमारी उमर लग जाए
उमर
का क्या,
जाने
कब, कहाँ चुक जाए
चाँद-सितारे
दुपट्टे पर तुम्हारे
टॅंक
तो जाएँ, पर
ये
ख्वाहिशें किताबी हैं
किताबों
से बाहर तो आएँ
फूल, खुशबू
तोहफे, रंगीनियाँ
कीमत
है क्या, इनका जीवन कहाँ
अब
क्या उपाय?
चलो
फिर से दिल लगाएँ'1
फिर
से मुस्कुराएँ
मिल
के मुस्कुराएँ
जोशे-जुनूँ
जगाएँ
मुहब्बत
की बारिश
जम
के भीग जाएँ
मिल
के बाँटें खुशियाँ
जग
को जगमगाएँ।
1. फ़ैज़ की नज़्म की एक पंक्ति
तरावट
भटक रहा हूँ सड़कों पर
'टैम्पू' में घूम रहा हूँ
ये
मेरा शहर है पटना,
और
मैं
यहाँ कोई नौकर नहीं हूँ ।
विदा
आज तज के भाव सारे
और
तज के घाव सारे,
अच्छे-बुरे
प्रभाव सारे
राह
पर नई एक फिर चलना है
जो
जिया, जैसा जिया, जितना जिया
जो
किया, जैसा किया, जितना किया
याद
लेकर साथ
छोड़
कुछ एहसास
साँचे
में नए फिर ढलना है
दृश्य, ध्वनि
गंध, स्पर्श
अपनी-अपनी
तर्ज पर
मन-मस्तिष्क
के पत्र पर
छपे
हुए, मिटे हुए
और
ये उम्मीद,
जो
हो सके
यादों
में कहीं फिर पलना है।
उफान
जी चाहता है
तोड़
दूँ
जी
चाहता है
फोड़
दूँ
सब
झूठ का साजो-सामान ।
बासी
हवा,
बोझिल
माहौल
खोल
दूँ सब खिड़कियाँ
जंग
लगे सब तोड़ दूँ
ताले-जाले
जी
चाहता है।
झुकी
रीढ़ को तान दूँ
थोड़ी
आग खून में डाल दूँ
सज्दे
को तोड़ूँ ज़रा
ज़रा
आँखों में आँखें डाल दूँ
जी
चाहता है।
कर-बद्ध
विनय किसके लिए
हर
हाँ में हाँ किसके लिए
ये
एकतरफा लाजो-लिहाज
अब
छोड़ दूँ सब छोड़ दूँ
जी
चाहता है।
जोशे-जुनूं
को छोड़ दूँ
दिल
के सुकूं को छोड़ दूँ
अपने
दिल को तोड़ दूँ
उसके
सिर को फोड़ दूँ
जी
चाहता है।
कितना
सोचूँ, किससे पूछूँ
किसको
बोलूँ, किसको लिक्खूँ
अब
कर जाऊँ, बस कर गुजरूँ
जी
चाहता है। 10-5-2013
यूँ भी होता है...
यूँ भी होता है
बना
देती है
बेफ़िक्री, लापरवाह
सादगी, अहमक
शराफत, बुजदिल...
यूँ
ही होता है । 24-3-2013
प्यार... आखिरकार
गुस्से
को
गुज़र
जाने दो
जीतेगा
प्यार...
आखिरकार
। 2013
हकीकत
उम्र
बड़े
दबे पाँवों आती है
और
आप
धर
लिए जाते हैं औचक
निस्सहाय, निरुपाय
10-05-2013
दरअसल
उत्साह का आधिक्य, कभी
संबल
की कमी
बात
इसीलिए
कहीं
नहीं बनी। 10-05-2013
सिद्धांततः
राजा माने कानून
कानून
माने हुक्म
हुक्म
माने....
उठ
तो उठ बैठ तो बैठ
नौकर
माने वफादारी
वफादारी
माने जी-हुजूरी
जी-हुजूरी
माने...
उठ
तो उठ बैठ तो बैठ 2013
एक सवाल
ज़िद की जद में
आती
नहीं है कोई बात
न
कायम रहता है गुस्सा जरा देर
कचोटती
भी नहीं है कोई गलती
मन
को किसी तरह
आप
कहते हैं
बदलनी
है सूरते-हाल
भला
कैसे ?
भला
क्योंकर ? 11-05-2013
जय हो
क्षणिक नेम
क्षणिक
क्षेम
और
क्षणिक प्रेम
जय
हो !
क्षणिक
बोध
क्षणिक
क्रोध
और
क्षणिक शोध
जय
हो !
क्षणिक
ध्यान
क्षणिक
मान
और
क्षणिक संधान
जय
हो !
क्षणिक
प्रतिक्रिया,
क्रिया क्षणिक
क्षणिक
कृति, स्वीकृति क्षणिक
क्षणिक
क्रांति, शांति क्षणिक
क्षणिक
धर्म
क्षणिक
कर्म
क्षणिक
मर्म
सब
क्षणिक, क्षणिक,
क्षणिक
जय
हो, जय हो, जय हो ! 10-06-2013
जड़
ये शराफत ये ईमान
ये
मुद्दों पर घमासान
सब
बातें हैं दुरुस्त
ये
प्यार ये बलिदान
लिया-दिया
मान-सम्मान
ये
भी ठीक बात
ज़मीन
के ऊपर की बातें हैं ये
जड़
में
अहं-तुष्टि
है
फुनगी
पर चाहे जो दिखे ! 10-6-2016
पुनश्च
आपकी उपयोगिता ?
चलिए, उपयोगिता
न सही,
सुन्दरता
?
तो
फिर
आप
हैं. किसलिए जनाब ?
और
हाँ,
सनद
रहे,
उपयोगिता
और सुंदरता
पर
- रुच की
बातें
हैं । 21-6-2013
आत्म-समर्पण
कहा,
असर
कुछ नहीं हुआ
खून
ही जला
किया,
घूम-फिरकर
वही बात
ढाक
के तीन पात
तय
यही किया है
अब
कुछ नहीं कहेंगे
तय
यही किया है
काम
काम
भर करेंगे,
बस ! 21-6-2013
समां
हवा बही है
पत्ते
झूमे हैं
बादल
आए हैं
मौसम
भीगा है
खुशबू
फैली है
मन
उमग आया है
दो
आँखें शरमाई हैं
इक
जाँ है, बौराई है
यही
बात कमोबेश
हर
ओर है
कि
चाँद है चकोर है
और
प्रकृति
का नियम है यह
नाचता
तो मोर है! 11-7-2013
पहचान
बच्चे ने
खेल-खेल
में
खींच
दी हैं कुछ लकीरें
पिता
की हथेली पर
पिता
ने भी खेल को बढ़ाया है,
पूछा-
"क्या लिख दिया है"
आपका
नाम
क्या
नाम है मेरा?
बच्चे
ने फुसफुसाकर कहा- "पापा"!
दफ्तर
में
साहब
ने पटक दी है फाइल मेज़ पर एक तरफ
और
उछाल दिया है प्रश्न-
ये
है क्या? क्या है ये?
और
आप हैं कौन साहब ?
बाहर
चपरासी
ने की थी आनाकानी
तो
जमायी थी धौंस
जानते
हो, कौन हूँ?
'कौन' का स्थानापन्न 'क्या'
हो गया है
'कौन' गौण कहीं खो गया है । 11-7-2013
पिता
(एक)
बहुत कठिन है
बूढ़े
होते बीमार-से पिता को मनाना
ज़िद
उनकी कि तरीका वही है सही
मान
उनका, वो कम नहीं हैं कहीं
उम्मीद
उनकी
कोई
बात तो हो कहीं.....
(दो)
बड़ा नाजुक है मसला
बिगड़े-बीमार
बेटे के पिता को समझाना
समझाना
कि समझते हैं सब
कि
परिस्थितियाँ काबिज़ हैं
बात
बस वक्त की है।
निराशा को तौले हुए उम्मीद से
शिकायत
को तारीफ से
बनाए
रखना संतुलन
उस
अंतराल में
जिसमें
बस
टूटने को हो हिम्मत ! 11-7-2013
आशा
सोचिए
कितना
भला हो जाए
जो
बैठ जाए ताल-मेल कुछ ऐसा
जो
हो स्वतःस्फूर्त,
स्वान्तःसुखाय
हो
वही
बहुजन
हिताय, बहुजन सुखाय ।
एक इतवार का दिन
इतवार की सुबह..
देह
की घड़ी को मालूम है
आज
हड़बड़ी नहीं है
पड़े-पड़े
बिस्तर पर
सीधे
हो रहे देह-हाथ
आईने
में शक्ल देखी है
चला
गया है ध्यान
कान
पर चढ़ गए हैं बाल ,और अब
अमिताभ
बच्चन का फ़ैन दिखने की
उमर
भी नहीं रही
सैलून
में गद्दे वाली कुर्सी पर
सिर
को टिकाए हुए पीछे
गले
तक लिपटा हुआ चादरनुमा तौलिया
बैठा
हूँ आराम से पैर पसारे
मारी
गई है फुहार पानी की चेहरे पर
मुँद
गईं हैं आँखें...
कितना
सुकून है
अहा
!
फिर
रही है कंघी बालों में,
थिरक
रही है कैंची
कट
के गिर रहे हैं लच्छे के लच्छे बालों के
और
लगता है मानो गिरा जा रहा हो
समय
का दबाव-ओ-तनाव
झर
रही हो जैसे कंधों से सब थकान
आऽऽ
हाऽऽ! आऽऽ हाऽ!
नींद-सी
छाई जा रही है आँखों पर
दूर
कोलाहल से,
चिताओं से परे.....
फिर
से पानी की फुहार चेहरे पर
यानी
समय समाप्ति की घोषणा
वापसी
की तैयारी
फिर
से उसी दिनचर्या में,
गो
थोड़े हल्के-से
तन-मन
से।
अस्पताल में अपना कोई
अमूमन
मरीज
के साथ
अस्पताल
जानेवाले व्यक्ति की
जरूरत
कुछ खास नहीं होती,
कुछ
पूछ लिया डॉक्टर से कभी
खाने-पीने
में परहेज
समझ
लिया
बहुत
हुआ तो नुस्खा दवाइयों का
जो
कि अंततः निभाना होता है खुद मरीज को ही
लेकिन
यह सच है
कोई
साथ आए अस्पताल
और
रहे
तो
अच्छा लगता है। 14-10-2013
ताजगी का रंग और गंध
ताज़ा की ताज़ा
हो
जाए बात
तो
ठीक है, वरना
उतरने
लगता है रंग
बात
होने लगती है बदरंग
जैसे
देर से कटे हुए
प्याज
की गंध
जैसे
देर
से कटे हुए
सेब
का रंग। 14-10-2013
काश...!
बच्चे
भविष्य
नहीं देखते
वर्तमान
जीते हैं
दर्द
नहीं देखते
अपना
काम देखते हैं बच्चे
ऊर्जा
बिखेरते हैं
खुशियों
में फूटते हैं
अंजाम
नहीं जानते
चिंता
को पहचानते नहीं
और
जो कोई प्यार से मिले तो,
बस
प्यार से ही मिलते हैं
कोई
तरकीब हो यारब,
तो
मुझेफिर से
बच्चा
बना दे !! 14-10-2013
बच्चों का दिल
बच्चे
हँस
रहे हैं
उन्मुक्त
हँसी
उनके
साथ
जिनसे
हुई थी
मार-पीट
अभी
रूठना
मनाना
छीनना
बाँटना
-
सब
सहज मन से
अनायास, अप्रत्याशित
भी
बिना
भेद-भाव के
बिना
राग-द्वेष के
आपका
वयस्क मन
समझाता
फिरता है
तौर-तरीके
कायदे-कानून
अच्छा-बुरा
सही-गलत
अपना-पराया
जाने
क्या-क्या
गोया
दिमाग
दिल पर
भारी
पड़ने लगता है
लेकिन, सुनिए
बच्चों
का दिल
आपसे
ज्यादा धड़कता है ! 16-10-2013
मेरे सपनों का रंग
सुन रहे हैं न पापा
समझ
रहे हैं न आप ?
मेरे
सपनों को
रंग
किसने दिया
मुझे
जीने का ढंग किसने दिया
और
आज
जब
मैंने निश्चय किया है कुछ
तो
अनर्थ हो गया !
ये
शिक्षा
ये
विचार
सिर्फ
फैशन के लिए था अगर
दकियानूसी
की चादर के अंदर ही
होना
था विकास,
तो व्यर्थ हुआ है आपका श्रम
नया
जमाना
हमेशा
आगे की ओर देखता है
जड़
नियमों, मिथ्या मापदण्डों से आगे
मैंने
तो यह समझा था
कि
जैसे सारी बातों में आपने सहमति दी
और
जैसे मैंने निराश नहीं किया आपको
मेरे
इस निश्चय को भी आप दृढ़ बनाते
मुझे
हौसला देते
जो
लोग मेरे खिलाफ हैं,
उनसे आप भी लोहा लेते
क्या
अपना जीवन आप जीने का अधिकार नहीं मुझे?
क्या
इसे मैं गिरवी मानूँ आपकी अहंमन्यता के साथ
और
आपने शायद
मूँद
ली हैं आँखें वरना
दुनिया
बदल गई है,
देखते आप
और
इधर अरसे से
आपने
पूछा नहीं है मेरा हाल
जब
भी हुई है बात तो आपकी ज़िद की
संदेशे
ले के भी आते हैं जो लोग वो भी
हाल
पूछने के बहाने जता जाते हैं
कि
गलत हूँ मैं
धमका
जाते हैं
कई-कई
स्वरों-सुरों में
आखिर
क्यों ?
क्या
किसी ने भी मुझसे पूछकर लिये हैं निर्णय
क्या
किसी को भी मैंने सुनाया है फैसला
जैसे
मुझे सुनाया जाता है?
आखिर
थक जाता है आदमी
तभी
करता हैं विद्रोह
खासकर
अपने पिता से
यह
नहीं सोचा आपने
"ठीक
कहती हो बेटा"
पापा
सिर्फ सुना करें!
तुम्हें
दिखती है दकियानूसी
ज़िद, धमकी,
अहंमन्यता
ठीक
ही होगा।
कभी
गौर किया है तुमने
कि
सारी दकियानूसी के बावजूद
तुम्हारे
अधिकारों,
सुविधाओं में
कभी
कोई कमी आई
हर
बार तुम्हारे अपने वादे से
फिरने
के बाद भी
कभी
तुम पर भरोसे में कोई कमी जाहिर हुई;
सहमति
इसके बावजूद बनी रही
आगे
बढ़ना जरूरी है,
मगर
रास्ता सही हो
यह
भी जरूरी है
और
अहंमन्यता किसकी -
जिसका
कोई अहं ही नहीं,
जिसके
स्वाभिमान तक की धज्जियाँ उड़ा दी गई...
हाल
तो तुमने मेरा
समझने
की कोशिश नहीं की
मेरी
बातों में जिद नहीं
घनीभूत
पीड़ा थी मेरी
जो
इतनी अधिक हुई
कि
जमकर कठोर हो गई
कहाँ
दिखते तुम्हें मेरे आँसू ?
और
जिन्हें तुमने धमकी समझा
वो
एक लाचार पिता की आखिरी कोशिशें थीं
कि
भँवर में डूबता हुआ कोई
हाथ-पैर
मारता है जी-तोड़
और
इन सब में
तुमने
यह गौर किया
कि
तुमने अपनी माँ को भी गौण कर दिया है?
खैर...।
“हम
तो सिर्फ सुना करेंगे बेटा
तुम
लोग जहाँ रहो सुखी रहो
और
किसी कष्ट में पड़ोगे
तो
निश्चित रहो
हमें
अपना कर्तव्य याद है!!"
लाचारगी
जो
बस
का नहीं
वह
भी
करने
पर
आमादा
हूँ
इन
दिनों
बाकी
सब कम
नौकर
कुछ
ज़ियादा हूँ ! 27-02-2014
इंतज़ार
आँकड़े, तथ्य, साक्ष्य
प्रस्तुत
किए
जिनसे
बढ़ता
था
अपना
कद
आँखों
के कोनों से
महसूस
किया
असहज
होते हुए
कुछ
चेहरे
और
बिना परवाह
इसके, कि
व्यक्ति, समय व
स्थान-सापेक्ष
हैं
सब
कि
होती
हैं
कुछ
छवियाँ
धूल-धूसरित
इस
उपक्रम में
अभीष्ट
तो
विजय
ही रहा
विजय
ही रखा
कैसे
भी
किसी
पर भी!
सब
देख,
सुन,
समझ
के भी
मिथ्या आडंबर में रत हूँ
मैं
हाकिम के सामने
बिलकुल
ही नत हूँ
नहीं
होना था
पर
हूँ
न
अपनी
खाल
मोटी होती है
न उनकी
बातों
की नोक
भोथर
और
एक
बेवजह
की
लाजो-लिहाज
है
एक
बेवजह
की अधीरता
कि
बस चलाए रखती है
जलाए
रखती है
कभी-कभी
यूँ
लगता भी है
हाथ
खंजर
हो जोए
नज़रें शमशीर
और
चीर दिए जाएँ
मुखौटे-दर-मुखौटे
कदमों की थाप से
तोड़
दिए जाएँ
वो
बाट-बटखरे
जिनसे
तुलता है
आदमी
रोज़
के रोज़
देखना
है
किस
हद तक
झुकना
होता है
जिसके
बाद
लपलपा
कर
वापस
तन
जाता है आदमी
और
तनते-तनते
करता
है चोट
मारक
! 28-02-2014
एक पीली नदी हरे पाटों के बीच बहती हुई
मटर के पौधों ने
अपने
बैंगनी, सफेद
फूलों
के साथ कहा है-
"सुबह-सुबह
आओ,
ओस
नहाई पत्तियों को
सुबह
की किरणें
चमकाती
हुई मिलेंगी
तलवे
जब भीगेंगे
ओस
की नमी से,
ठंढक
मन
तक पहुँचेगी
ताजा, ठंढी
हवा
फेफड़ों
की जकड़न को
हर
लेगी
और
धुली-धुलाई हरीतिमा
आँखों
को सुकून देगी।"
अरसे
बाद भी खेतों ने
संवाद
बनाए रखने की कोशिश नहीं छोड़ी है
दूर-दूर
तक फैले हुए नजारों ने
दिलकशी
खोई नहीं है !
दूर
पहाड़ी की जड़ से
एक
पीली नदी हरे पाटों के बीच
बहती
हुई चली आ रही है-
सरसों
के फूलों की
प्याज
के पौधों की उम्र हो गई है,
उनके
फूल निकल आए हैं
मटर
के पौधे छीमियों से लदे पड़े हैं
अरहर
के पौधे सूखकर
कटने
की तैयारी में है
बीच
खेत में बेर का एक पेड़
अपने
हरे, पीले, भूरे बेरों के साथ
झुका
खड़ा है
एक
तरफ बाँस का झरमुट
कुछ
और भी पेड़ों के साथ
पतझड़
के शेड्स बिखेर रहा है
कहीं
हल्के, कहीं गहरे
और, बौराए
हुए आम
भाँति-भाँति
के रूप के,रंग के
मंजर-लदे
मंजर-ही-मंजर
भीनी-भीनी
खुशबू के साथ
प्रकृति
होली खेलने के लिए
चैत्र
कृष्ण प्रतिपदा का
इंतज़ार
नहीं करती !! फरवरी 2014
घर आया मैं
माँ कहती है
दो-चार
दिनों को भी आ जाया करो
अच्छा
लगेगा पापा को भी
और
साहब हमने तो नौकरी की है
फुर्सत
ही नहीं मिलती
इस
बार जोड़-जाड़ के हिसाब छुट्टियों का, काम का
कि
कुछ हर्ज ना हो
आया
हूँ घर बड़ी देर में
चमक
उठी हैं माँ की आँखें
तरावट
आ गई है पापा के चेहरे पर
और
किया नहीं है कुछ खास इन दो दिनों में
बस
आराम ही हुआ है
भरपूर...
निकलते
वक्त कहा माँ ने
आया
करो
जो
कहा नहीं,
पर जो दिखा एकदम साफ-
अच्छा
लगा! बहुत अच्छा लगा।
और
अपना हाल
गूँगा
क्या बताए गुड़ का स्वाद ! 01-05-2014
छोटे-छोटे पाँवों की चप्पल
एक जोड़ी चप्पल
छोटे-छोटे
पाँवों की
रखी
हैं करीने से
दरवाजे
के पास
जैसे
कोई निकला हो काम पर
होकर
तैयार
जैसे
मंदिर में चढ़ा हो कोई
पूरी
श्रद्धा के साथ
गुलाबी
तलुवों वाले
कोमल
नन्हें पाँवों की नरमी ने
मुलायम
कर दिया है
हवा
को
इतना
ही नहीं
जैसे
चमकती आँखें
लहराते
केश
उचकते
हाथ
सब
मौजूद हैं
गैरमौजूदगी
में भी
फैल
गई है स्निग्धता
मन
में
उतर
आया है उजास
और
जमने लगा है विश्वास -
"नर
हो न निराश करो मन को"! 29-05-2014
घर का नौकर
चप्पल बाहर खोला है कि नहीं
बासी
खाना सबसे बाद में
खाया
है कि नहीं
बर्तन
अलग रखा है कि नहीं
सब
कुछ पूछकर किया है कि नहीं
पुकारे
पर दौड़कर आया है कि नहीं
देह
दबाया है कि नहीं
बेटों
के बेटों को खेलाया है कि नहीं
और
बेटों की जगह काम आया है कि नहीं
वैधानिक
सवाल है,ठीक है,
कि
क्योंकर है?
पर
सच्चाई यही है
छोटू
घर
का नौकर है । 02-9-2016
कुछ सवाल
जो अड़ नहीं सकता है
जो
लड़ नहीं सकता है
उसका
क्या ?
जो
चर नहीं सकता है
जो
हर नहीं सकता है
उसका
क्या ?
जो
ढल नहीं सकता है
जो
छल नहीं सकता है
उसका
क्या ?
जो
बढ़ नहीं सकता है
जो
चढ़ नहीं सकता है
उसका
क्या ?
माँ की हँसी
माँ
तुम
कब हँसी थी
खुलकर
पिछली बार ?
कब
गुनगुनाया
था कुछ
कब
बनाए
थे ढेरों पकवान ?
कब
बुलाए थे
घर
भर मेहमान
कब
मनाई थी -
होली-दिवाली
तीज-त्योहार
कब
उत्सव हुआ था पिछली बार ?
माँ
तुमने
कब
की थी आशा
हमसे
पिछली बार...?
रोजनामचा
(1)
बुलाया गया
बिठाया
गया
सुनाया
गया
बताया
गया
जताया
गया
डराया
गया
दबाया
गया
भगाया
गया
कराया
गया...
एक
और दिन ज़ाया गया।
(2)
बुलाया, तो
चला
गया
बिठाया, तो
बैठ
गया
सुनाया, तो
सुना
दिया
बताया, तो
बता
दिया
जताया, तो
जता
दिया
डराया, तो
डरा
दिया
दबाया, तो
दबा
दिया
न
भगा पाया कोई
न
कुछ करा पाया...
और
दिन यूँ भी जाया गया। 2014
मन की बात
जो करूँ,
सब
तुमसे खुलकर कहूँ
और
फिर भी
स्वीकार
करो
तुम
मुझे
!
एक दिन ज़िंदगी
सरसों का तेल
जाड़े
की धूप
सधे
हुए हाथ
कोई
आँगन या छत
यह
ब्यौरा, तस्वीर नहीं है
यह
जिंदगी हरी-हरी है
धूप
का बिस्तर
सूरज
का 'हीटर'
कुएँ
में 'गीज़र'
हम
तो निकल आए हैं
शहरों
की तरफ
गाँव
यादों का शजर है
जिसकी
अभी पत्ती हरी है
पूरब
रुख का दुआर
सामने
मैदान
पहाड़ी
से उठती सुबह
अब
तो खैर गैस है
वरना
मिट्टी
का चूल्हा
चूल्हे
में कोयला
ताड़
का पंखा
उठता
धुआँ
मुड़ा
हुआ मुँह
अधमिची
आँखें
चाय
का गिलास
बासी
रोटी
अब
सब
रस गायब है
बस, ज़िंदगी
की चीजें,
लोगों
की बातें
बड़ी-बड़ी
हैं ।

आपने आसपास और घर-बाहर की छोटी-बड़ी बातों की सघन अभिव्यक्ति. सभी कविताएं बहुत बढ़िया लगीं. मन में तरावट भर आया.
जवाब देंहटाएंआपको बहुत बधाई 😊