धूप तुम्हारे साथ है
(कविता : 2025)
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1.जो जीत में विनीत है 2.यत् भावो तत् भवति 3.हँसो 4.उठो, वसंत आया है 5.फागुन आ गया है 6.चरैवेति
7.मिसरीकंद 8.सुपर बॉस 9.कभी रेता में जाओ 10.बेतरतीबी 11.जाने
उसमें क्या बात है 12.अपनी बात
13.जय बजरंगबली 14.असंतुलन 15.नाता 16.अभिगृहीत 17.(दु:) आग्रही 18.हल
19.बोध 20.मशवरा 21.कामरेड, सच बोलिए 22.बलम जाना नहीं कलकत्ते 23.कविता की क्लास 24.कवि
की क्लास
25.क्या करते 26.दिल्ली बोल रही है 27.शिनाख्त 28.कहो तो मेरे
दोस्त 29.किसने बचाया है मुझे 30.रौनक
31.जाने रौनक कहाँ गई ! 32.अभिमत 33.प्रण 34.ऋण-शोधन 35.प्रस्तुत 36.आर्तनाद
अन्तर्नाद
37.मन की गति 38.अथ कविकथा 39.हे कविश्रेष्ठ ! 40.उड़ान 41.दीया एक
ही धरा है 42.दीया तो जलता है
43.मनवा तू काहे दुखी है 44.चौदवीं का चाँद 45.सुबह नहीं इस रात की
46.याद 47.छत पर चाँद 48.हँसें मुस्कुराएँ
49.खेवैय्या 50.पात्रता 51.घेरा 52.यह सपना नहीं, सच है 53.दोस्तो, यह हमारा सच है !! 54.धूप
55.जीवन 56.आह्वान 57.मन खिला सकता है गुल 58.निमंत्रण 59.नसीहत 60.हिन्दी
कमतर क्यों हो
61.दुख गाते हैं, सुख बजाते है 62.नए समय में (
कविता-शृंखला)
जो जीत में विनीत है
जो जीत में विनीत है
जीत उसी की जीत है
डटकर खड़ा रहा अटल
समय उसी का मीत है
भींगी हुई आँखें हैं
छलक रही जो
प्रीत है
कृतज्ञ मन को देखकर
मन हो रहा
पुनीत है
साध्य से है साधना
बड़ी, यही तो रीत है
कामों में सुर - ताल है
बातों में संगीत है
जिन्दगी है धूप -छाँह
जिन्दगी एक गीत है ३१.१०.२०२५ ⇑ ऊपर जाएँ
[ जेमिमा
रोड्रिग्स 127 नॉट आउट, पोस्ट मैच इंटरव्यू (३०१०२०२५),भारत
बनाम ऑस्ट्रेलिया,भारत विजयी ]
यत् भावो तत् भवति
जो चाहो वो पाओ
मन
को मत उलझाओ
यत्
भावो तत् भवति
मन
से करते जाओ
जीवन
भरते जाओ
यत्
भावो तत् भवति
ज्यादा
मत ललचाओ
खुद
को भी समझाओ
यत्
भावो तत् भवति
अच्छा
करते जाओ
अच्छा
पाते जाओ
यत्
भावो तत् भवति
जीवन
की लय पकड़े
सीधे
चलते जाओ
यत्
भावो तत् भवति
हौसला
उड़ानों का
पाखों
भरते जाओ
यत्
भावो तत् भवति
मन
को भाते जाओ
तुम
मुस्काते जाओ
यत्
भावो तत् भवति १६.१२.२०२५ ⇑
हँसो
हँसो
कि तुम्हारे हँसने से
रोशन हो जाता है घर
चमक उठती है फ़िज़ा
खिल उठता है मौसम
हँसो
कि तुम्हारे हँसने से
टूटती है जकड़न
ज़र्द पड़े लम्हों में
लौट आती है हरियाली
ठंढे पड़ते जा रहे व्यवहारों में
आ जाती है गरमाहट
हँसो
कि तुम्हारे हँसने से
दुश्वारी लगती नहीं फिर
कोई दुश्वारी
दिन कोई नहीं लगता बोझिल
रात नहीं लगती भारी
हँसो
कि हँसना, हँसते रहना
सच में बहुत ज़रूरी है !! २२.०१.२०२५
उठो, वसंत आया
है
ऋतुओं का राजा है
उठो, वसंत आया है !
सरसों फूले,मंजर आए
मदमाने लगी हवा
भरने लगा
मन स्फुरण से
मौसम गरमाया है !
रगों में हरारत
दिलों में शरारत
फागुन की आहट
क्या माहौल जमाया है !
बैठे-बैठे थक-थक के
उकताए मन पक-पक के
करिए,कुछ
करिए,कुछ कर ही लीजै
विश्व कर्मप्रधान ,बाकी सब
खाली, खाली माया है !
जो करम करे,वही राजा होए
कितना हमको समझाया है
कुछ करो,वसंत
आया है
उठो,वसंत
आया है ! ०३.०२.२०२५
फागुन आ गया है
प्रकृति के समवेत सुरों में
और विविध रंगों में
हो रही उद्घोषणा --
आ गया,आ
गया !
फागुन आ गया है !
रँगिए, रँग जाइए
रँगवाइए खुद को
रंग चढ़ने दीजिए
इस रुत,इस
मौसम का
भंग कीजिए जीवन की
एकरसता, नीरसता को
यथासंभव,यथाशीघ्र
!! १५.०२.२०२५
चरैवेति
कभी-कभी
दिन शाम में निकलता है
कमल उम्मीद का खिलता है
मौसम पाला बदलता है
कभी-कभी शाम में...
एक शाम सुबह हो जाती है
उम्र की बिसात पर
रात मोहरे चलती है
दूसरे घर पहुँचाती है
राजा, मंत्री, ऊँट,घोड़ा,हाथी
जो चाहे बन जाता है
एक शख़्स नया हो जाता है
रात के रात
सुबहें,शामें,रातें अपनी
दिन अपने और सपने सारे
धरा, गगन सब एक हैं
इस मोड़ से आगे
चरैवेति-चरैवेति...! ३१.०१.२०२५
(एक
मित्र की सेवानिवृत्ति पर)
मिसरीकंद
मिसरीकंद !
यदि नहीं खाया है तुमने
हे मतिमंद!
खोलो अपनी स्वाद-ग्रंथियाँ,
अनुभूति के रंध्र
तुम खोलो अपने
चक्षु बंद !
खुली आँखों में भरा यदि
अहंकार शहरी कुलीन
आँखों वाले अंधे जैसे,
हो
बन बैठे मद-अंध
याद करो कि
मालपूए नहीं,
न केवल बस मिष्टान्न
ज्ञान की देवी को प्रिय लगते
प्यारे मिसरीकंद
मिसरीकंद !! ०५.०२.२०२५
सुपर बॉस
[ ‘अ
से अमिताभ : ‘कथन-उपकथन’]
सुनो!
मेरी बातें ध्यान से सुनो
ताली भी बजाते रहो
बीच - बीच में
मैं रुकूँ यदि
व्यंजना की भाव - भंगिमा के साथ
तो हँसो
तुम्हारे हँसने का मौका है यह
हामी तो यूँ भरते चलो
कि गरदन में लगी हो स्प्रिंग
सुनो!
कहने का अधिकार
नहीं है तुम्हारे पास
सहो, कुछ मत कहो
सुनो!
मेरी वाणी में
प्रेरणा के सोते हैं
छक कर पियो
मैं जैसा कहता हूँ
वैसा जियो
मैं आदर्श का पाठ पढ़ा सकता हूँ
फिर उसका उलट करवा सकता हूँ
उलटी गिनती गिनवा सकता हूँ
भले - बुरे हर काल में
सुनो!
यह हक़ है मेरा
कि मैं
तुम्हारे बॉस के बॉस का बॉस हूँ
"मैं
जो भी हूँ, इस वक्त
तुम्हारे मालिक का मालिक हूँ"
सुपर मून देखा होगा
मैं बॉस हूँ सुपर !! ०६.०२.२०२५
कभी रेता में जाओ
कभी रेता में जाओ
चाँदनी की नदी में नहाओ
कभी छत पर बैठो
बस निहारे जाओ
चूने से पुते दीवारों से
कभी रंग चाँदनी के मिलाओ
हँसो, मुस्कुराओ
किसी को देख कर
खिलो, खिलखिलाओ
कंधे मत झुकाओ
मन को मत गिराओ
कुछ उजली कविताएँ लिखो
कविता में
शुक्ल पक्ष भी लाओ
मावस है जीवन में
तो पूर्णिमा भी है
चाँद पूरा भी है
पूरा नहीं भी है
स्वीकार करो जीवन को
इस जग को अंगीकार करो
ज्यादा मत उड़ो, ज्यादा
मन के घोड़े मत दौड़ाओ ! १२.०२.२०२५
इतने करीने से
सजी हैं किताबें
बहुत नफीस हो गया है मंजर --
पिक्चर परफेक्ट !
हाथ भी लगाते
लगता है डर, मगर
अपना ही है घर...
जैसे बालों में उँगलियाँ डालें
उनको थोड़ा बिखरा लें
गले मिलने से पहले
हटा लें अपनी सारी अकड़
जिन्दगी में
थोड़ी बेतरतीबी जरूरी है
अपने अधूरेपन में ही
यह जिन्दगी पूरी है ! १६.०२.२०२५
जब रात
थोड़ी गुज़र जाती है
जब चाँदनी
छत पर उतर आती है
जब नींद
आने से मुकर जाती है
खुल जाती है किताब यादों की
कोई सफ़ा निकलता है
जाने क्या-क्या मिलता है !
आँखों में तैर जाते हैं
दृश्य जाने कब-कब के
अपना ही अक्स पुराना
दिखता है, तो कभी
कोई टीस पुरानी उठती है
कोई घाव पुराना छिलता है
कोई नाम भला याद आता है
जो हँसता-मुस्कुराता है
जाने उसमें क्या बात है,
' ऊधो, मनमाने की बात है! '
जाने उससे क्या मिलता है
मन का कँवल भी खिलता है
मन स्थिर होने लगता है
मन की
स्थिति सुधर जाती है
!! १६.०२.२०२५
झूठ को झूठ नहीं कह सकता मैं
सच को सच नहीं कह सकता हूँ
न इनसे कुछ कह सकता हूँ
न उनसे कुछ कह सकता हूँ
अब दोस्त भी दुश्मन लगते हैं
सब जान के दुश्मन लगते हैं
उनके ये और वे इनके
दोनों का मैं
न पूरा गलत कुछ होता है
और ना ही कुछ पूरा ही सही
धुँधली आँखें,गंदला पानी
क्या साफ भला दिख पाएगा
उनको ये, और वे इनको
दोनों को मैं
बस उनकी बात ही मानें सब,
दोनों चाहें
बात को बदलें,बात से मुकरें चाहे जब,दोनों
चाहें
ये एक दूजे को गलत कहें
दोनों मुझको
सोचता हूँ अब क्या ही करूँ
इनसे उनसे कबतक मैं डरू
भारत का रहनेवाला हूँ
भारत की बात मैं क्यूँ न करूँ
"अति
सर्वत्र वर्जयेत् " । १७.०२.२०२५
जय बजरंगबली
हर दुविधा-विपदा टली
जिसकी जो गति हो
सब आपसे ही सँभली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
सूरज तव किरपा
छँटे दुख की हर बदली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
भय की शीत बढ़ी
अब आप ही दें कमली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
द्वेष न राग रहे
हो मन की नदी उजली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
आगे ठीक रखें
रही गलती यदि पिछली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
उनकी मति फेरें
मति जिनकी रही मचली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
छोटे बच्चे हम
बस थामे रहें उँगली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
कितना क्या माँगें
रहे हालत सब सँभली
जय बजरंगबली, जय बजरंगबली
दुनिया
पैसे पर टिकी है
जैसे पृथ्वी
अपने अक्ष पर
एक ओर झुकी हुई
! ०९.०३.२०२५
एक झलक देखी हो
दो टुक बातें की
हों
मुश्किल थम जाती
है
हाल सुधर जाता है
जाने क्या नाता है !
लोहा को लोहा भले काटे
आग से आग नहीं बुझती है ०९.०४.२०२५
तुम्हारी उपेक्षा ने
मुझे और भी
आग्रही बना दिया है
मैं तुमको
मना कर ही दम लूँगा
अपना
बनाकर ही दम लूँगा
! १३.०४.२०२५
कुछ और चुप हो जाना है
जीने का यही तरीका
यही बहाना है ०५.०७.२०२५
दोस्तों को आप कह रहा हूँ
सुनिए, मैं साफ कह रहा हूँ १२.११.२०२५
गुजरा वक्त अच्छा होता है
मैं तुम्हारे
गुजरे वक्त की निशानी हूँ
बात किया करो
अच्छा लगेगा... १३.११.२०२५
कामरेड, सच बोलिए
जो वाहवाही करें
आप उनके ही
रहें
आपकी
पहचान है
आप उनका दम
भरें
भाव
उनके अनमने
मुँह दिखा
हम क्या करें
हम गए-
बीते रहे
वे सदा ऊपर
रहें
एक स्मित तक नहीं
है
वे ठठा कर क्या
हँसें?
कैद हैं अच्छाइयाँ
जो भले हैं
डर रहें
कामरेड, सच बोलिए
या कि हम ही सच कहें? २१.०३.२०२५
पेड़ों पर आ गए नए- नए पत्ते
अभी मौसम बदल
रहा कपड़े-लत्ते
मधु भी पाइएगा, जी बस दम धरिए
मधुमक्खियों
के बन रहे
नए छत्ते
उनके हाथों में
जब वहाँ कटार है
अपने हाथों में
यहाँ हैं बस
गत्ते
वेतन तक तो
देते नहीं हैं
पूरा
क्या ही माँगेंगे
उनसे अन्य भत्ते
जोहते रहे हैं
मुँह सदा औरों
का
किया वही जो
करें ‘ईर बीर फत्ते’
अपने जादू में
बाँध रख लेती
हैं
बलम जाना नहीं तुम कभी कलकत्ते ३१.०३.२०२५
हरेक माल सात सौ पचास
वे कवि बनाते
खासमखास
कवि बनो, छपाओ, बँटवाओ
कुछ वे निकाल
देंगे भड़ास
कवि हैं उनका
नाम बहुत है
यूँही
नहीं करते सम्भाष
दाम चुका कवि को सुन
लीजे
वरना कौन डाले
है घास
उनसे क्या ही
करें उम्मीद
वे तो खुद
हैं पानीफ़राश
कहें बड़े कवि जो
सुधा वचन
वही छोटन का
वाग्विलास
खदबद-खदबद कवि करते हैं
उनपर कोई डाले
प्रकाश
उगे हैं जैसे
कुकुरमुत्ते
जैसे बाद बरखा
के कास
दिल्ली
दूर ही रहे
अच्छा
अगर हो संगदिलों
का वास ०१.०४.२०२५
आपने सिखाया मैडम
कवि हमें बनाया मैडम
पैसा देते छप जाते
कहीं ना कहीं खप जाते
पैकेज में कमी थी जो
आपने पुराया मैडम
आपने सिखाया मैडम
स्वयंसिद्ध स्व-अभिप्रमाणित
जाने कितने फिरते हैं
एक कहो सौ गिरते हैं
आपने उठाया मैडम
कवि हमें बनाया मैडम
नाम क्या, नई धारा है !
साहित्य को सँवारा है !
कितना भाईचारा है !
आपने निभाया मैडम
आपने सिखाया मैडम
अगली पंक्ति बैठ
बड़े
पिछलों को तो भाव न दें
पीछे नीचे वालों को
हल्के सहलाया मैडम
कवि हमें बनाया मैडम
कितना अच्छा, निविदा हो!
सबको कितनी सुविधा हो!
संपादकों ने नहीं तो
मुफ्त सर खुजाया मैडम
कवि हमें बनाया मैडम
किसकी सुनता कौन यहाँ
किसको चुनता कौन यहाँ
सब ही उम्मीदवार हैं
अभी समझ आया मैडम
आपने सिखाया मैडम
पहुँच पैरवी जो लाए
वह तो जग पर छा जाए
वरना पिछली बेंच बैठ
रहे बौखलाया मैडम
आपने बचाया मैडम
माना कि अंगूर खट्टे
हम सारे खाते बट्टे
हम नाकारा नाकाबिल
है मन बौराया मैडम
हमें कवि बनाया मैडम
!!
अग्रज सारे दिग्गज हैं
बाकी सारे पदरज
हैं
कुछ भी कर अग्रज होऊँ
कवि यही मनाया मैडम
आपने सिखाया मैडम
कौन कब ठगाया मैडम
कौन बरगलाया मैडम
चिकनी-चुपड़ी बातों का
छुरा कौन चलाया मैडम
जग झूठा जग चालबाज
आपको फँसाया मैडम
!! १३.०४.२०२५
पुरसिशे-हाल भी क्या करते
हम कुछ सवाल ही
क्या करते
हथियार
डाल दिए हों
अगर
फिर कुछ बवाल भी
क्या करते
दुआ-सलाम
कहो क्या करते
अपना काम कहो
क्या करते
नमक ही झूठा
रहा सारा
हराम हलाल भी
क्या करते
तुम अपने महलों
में हो शाद
हम अपनी गलियों
में नौशाद
सभी के रस्ते
यहाँ अपने
गो कुछ खयाल भी क्या करते
तेरे जमाल का
क्या करते
अपने जलाल का
क्या करते
नज़रें फिर ही
जानी थीं जब
खोकर मलाल भी
क्या करते २२.०४.२०२५
गाँठें मन की खोल रही है
देखो
दिल्ली बोल रही
है
ज़हर हवा में
क्या ही कम था
बातों में
भी घोल रही
है
अलग-अलग कोनों को पकड़े
दुनिया फिर भी
गोल रही है
मन पर असर
कहाँ होता है
दुनिया
क्योंकर डोल रही है
दुनिया के कान
न जूँ रेंगे
मेरी वाणी ढोल
रही है
अच्छाई के पलड़े
में अब
गलती खुद को तोल रही है
अपनी ही करनी
से देखो
खुलती सबकी पोल रही है
मन के भीतर झाँक सके जो
आँख वही ‘की-होल’ रही है
*** *** ***
सुनिए , सुनिए कहे बसंता
दूत हूँ वसंत-आगमन
का
चैत बैसाख बीत
चले हैं
समय हो चला अभी गमन का
देस - बिदेस भला
क्या होता
जहाँ रमाएँ , है मन
रमता
भरे पड़े हैं
माना दुर्जन
बस आप न
छोड़ें सज्जनता
पहले बरसों निभ
जाती थीं
अब तो है
हर बात तुरंता
सोते
सारे खुले हुए
हैं
पीने वाले
की अब क्षमता
उनको इक- इक बात याद है
मशहूर अपनी
भुलक्कड़ता
लोग पुराने जब
हो जाएँ
मन यादों में
रचता- बसता ०२.०५.२०२५
सिर्फ यही सच है !
चयनितों, पुरस्कृतों
नव प्रोन्नतों, नव स्थापितों को
प्रत्याशियों को
छूट गए प्रतिभागियों को
करने होते हैं बहुत सारे काम
सजानी होती है कई जगहों पर फील्डिंग
भिड़ाना होता है जगह-जगह जुगाड़
निकम्मे निठल्ले नाकारे
मैदान से भागे हुए
करते हैं कमेंटरी
बिना जाने-समझे
खुद को देते तसल्ली --
इनसे तो हम ही भले
!! १२.०५.२०२५
दो बार हमारा सामना हुआ
दो बार हमने नजरें चुराईं
दो बार हम कुछ व्यस्त हो गए
दो बार हम कुछ और खो गए
दो बार कुछ तेज हो गई चाल
होते-होते रह गई पुरसिशे-हाल
इतने तेज और इतने ध्यानमग्न
कब हुए थे हम, कहो तो मेरे दोस्त? २७.०५.२०२५
मुझमें जो बची है
थोड़ी-सी अच्छाई
थोड़ी-सी ईमानदारी
थोड़ी-सी संवेदना
थोड़ा-सा प्रेम
थोड़ी-सी उमंग
थोड़ा-सा उत्साह
आँखों में थोड़ी-सी नमी
इस बहुत खराब हो चली दुनिया में
इन सबने बचाया है मुझे
आज फिर दिल भर आया
बात करके किसी से
कितने अजनबी हो गए हैं,
देखिए
हमारे रास्ते
थोड़ा-थोड़ा-सा बहुत-सी बातों ने
फिर संभाला है मुझे ११.०६.२०२५
लड़कियों
के रहने से
घर
सजा रहता है
घर
का नक्शा सँवरा रहता है
घर
में रौनक रहती है
खुशियाँ
घर में चहकती हैं
खुरदरापन
मिट जाता है
सब
बिखरा सिमट जाता है
दुनिया,दुनिया रहती है
जीवन
जीवन हो जाता है २०.०६.२०२५
अब लेकिन डर लगता है
जिसको
भारत कहते हैं, उसमें
क्या-क्या
घटता रहता है
अखबारों
में यह छपता है
सुरक्षित
नहीं हैं बच्चियाँ
न
लड़कियाँ,
न
औरतें
अब
किससे हम क्या कहें
डरते-सहमते
सब रहें
कैसी
बदली है हवा
इस
मर्ज की है क्या दवा २७.१२.२०२५
अभिमत
आपके प्रेम के
दावों
के बावजूद
आपकी
'
ए
'-लिस्ट में नहीं हूँ
यह
दु:ख किससे कहूँ !
हो
तो शत-प्रतिशत हो
जिसका
ऐसा अभिमत हो
ऐसे
मन का मालिक हूँ
यह
कितना फिर से कहूँ ! २८.१२.२०२५
हटाने ही पड़ेंगे
कुछ प्रसंग
जबरन
हर दफे
जीत नहीं सकता है मन
मन का करना हो तो
उठाने पड़ेंगे कुछ पन ३०.०६.२०२५
हर बात का जवाब जरूरी है
हर बात का हिसाब जरूरी है
यह तो अच्छा हुआ,तुममें
अभी स्वाभिमान बाकी है !
तुम भला क्यों सहो,
तुम पर
किसी के बाप ऋण तो नहीं है !
सुनना तक मंजूर नहीं जहाँ बात
सह जाने की बात कौन करे ?
जानबूझ कर कौन मरे ?
कुछ रास्ते जिन्दगी में
एकतरफा हुआ करते हैं...!! ०४.०७.२०२५
रावण के बिना
रामायण क्या ?
राम किसे मारेंगे ?
रावण मरा, तभी
खुशियों के दीप जलेंगे
आप किस रास्ते चलेंगे ?
मैं प्रस्तुत हूँ वध किए जाने हेतु ...
भरी बारिश में
भरा हुआ
एक भला मन
अश्रु
नि:शब्द
निराकार... ११.०७.२०२५
कितने भी अनमने-से आओ पटना
खींच कर भींच ही लेता है
भर देता है ऊष्मा से
वाष्पचालित इंजन-सा
दौड़ने लगता है मन
छुक-छुक
छुक-छुक...
"धड़क-धड़क
लोहे की सड़क
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक..." २८.०७.२०२५
सारे काम-धाम वही
सारी बात-वात वही
मदिरा का पान वही
राजनीति-ज्ञान वही
कहने को सारगर्भित
दरअसल पतित-गर्हित
लोभी, लंपट,कपटी
करते छीना-झपटी
पर,सबसे
अलग दिखने को
आगे सबसे बढ़ने को
देखिए कि उनका
कवि का मुखौटा है !
पूर्णकालिक धंधे के
पीछे-पीछे चलती है
गले का हार बनने को
माथे पे चढ़ने को
हर घड़ी मचलती है
रोज ही फिसलती है
ऐसे में कहिए तो
कविता जँचती कैसे
कविता बचती कैसे
खुद बुरी नजर वालों के
हाथों में आजकल
कविता का कजरौटा है !
सूखी रोटी की महिमा
निर्धनता की गरिमा
कितना बखाने हैं
कितने सयाने हैं !
कोई भला क्या जाने
जो ही सुने वही माने
जनता की आँखों पर
महिमा की पट्टी है
कविता तो इन दिनों,बस
पढ़ा रही पट्टी है
इधर टिफिन में कवियों की
भरा घी का परौठा है !
कवि ही तो है पाठक
और कवि आलोचक
आयोजक भी कवि
कवि ही तो प्रायोजक
कविता के खाँचे हैं
कविता का चूल्हा है
कविता की निमकी है
कविता का ठेकुआ है
या जैसे फँसाने को
दवा-मिला आँटा है
या कविता चूहा है
और कवि बिलौटा है ! ३१.०७.२०२५
हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे !!
भाषा पर अधिकार
बहुत अच्छा
कवि का व्यवहार
बहुत अच्छा
कवि ने जो किया सेवा-सत्कार
बहुत अच्छा
दिया उसने जो भेंट-उपहार
बहुत अच्छा
सब लेन-देन, सौदा-सुलुफ
विशुद्ध व्यापार
बहुत अच्छा
सारे अच्छे बाह्य तत्वों से ही गोया
उसकी कविता सधी है
उसके दुआरे पर गैया नहीं,
कविता बँधी है,
कवि के लिए तो
चारा यही है
कवि- आलोचक- प्रकाशक- संपादक
जिसके चरणों में लोट रहे
हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे !!
कवि की नैतिकता
कवि का शृंगार
कभी करघनी
कभी गले का हार
कवि व्यक्ति विशिष्ट
विशिष्ट
उसका शिष्टाचार
फूलती-फलती है कविता
कवि निरामिष
करता है फलाहार
साहित्य के सिलबट्टे
लेखन की भाँग को
अपने हाथों से जी
जैसे तुम घोंट रहे
जैसी भी हवा हो चाहे
तुमको ही वोट रहे
नाम हो तुम्हारा,
और
डंके की चोट रहे
हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे !! २४.०३.२०२५
खूब इन उड़ानों की तैयारी थी
कितनी-कितनी ख्वाहिशें हमारी थीं
पर बुलंदी से खुल जाने हैं,
सुनो
पुकारती ऊॅंचाइयाँ तुम्हारी थीं
पिछले कई सफ़ों का हिसाब है यह
हाशिए पर भी लकीरें सारी थीं
कहाँ से चली बात कहाँ पहुँची है
पलकें सब इंतज़ार से भारी थीं
पंछी ढूँढ़ ही लेंगे गगन अपना
धरती की बातें भी तो प्यारी थीं १२.०९.२०२५
दीया एक ही धरा है
पूरी
वसुन्धरा है
एक
ही दीये की चाह में खड़ी
प्रेम
ही बाती, प्रेम ही तेल
और
प्रकाश प्रेम ही
प्रेम
के दीये की लौ सबसे बड़ी २०.१०.२०२५
दीये के नीचे अंधेरा
दीये
के पीछे अंधेरा
लेकिन
दीया तो जलता है
राहों
में हों जितने कंटक
तरह-तरह
के या हों संकट
चलने
वाला तो चलता है
किसके
रोके कौन रुका कब
समय
आ गया हो जिसका जब
फलने
वाला तो फलता है
जितना
भी भीतर दमखम है
जैसा
जो भी ज्यादा कम है
जो
दीया है वो बलता है २०.१०.२०२५
बेटा तो पढ़ने गया है
कुछ आगे बढ़ने गया है
बोल, तुझ-सा कौन सुखी है
मनवा तू काहे दुखी है
चल रही यही तो कथा है
कोई सूरज उग रहा है
तो कहीं शाम ढल चुकी है
मनवा तू काहे दुखी है
अब सबकी अपनी व्यथा है
तेरा दुख टिकता कहाँ है
क्यों गाड़ी तेरी रुकी है
मनवा तू काहे दुखी है २४.१०.२०२५
चौदवीं का चाँद है, क्या कहें
मन
यह थका-माँद है,
क्या कहें
आसमाँ उदास
है देखिए
चाँद उसके
काँध है, क्या
कहें
सोच
रहे कर ही लें
फोन अब
मन
का बड़ा बाँध है, क्या
कहें
लज़्ज़तें
किस काम की हैं भला
अपना वही नाँद है, क्या कहें
मन ही
तेज अश्व है हर घड़ी
मन ही स्वयं छाँद है, क्या
कहें
• छाँद - छान, छानने की रस्सी ०४.११.२०२५ ⇑
चाँद जगा
रात
जगी
और
जगी ख्वाहिशें
किस-किस
को फोन करें
किस-किस
का नाम लें !!
ख्वाहिशों
का अन्त नहीं
रात
का तो है,
लेकिन सुनो
सुबह
नहीं इस रात की
फोन
इक किए बिना ...! ०४.११.२०२५
सुना
कल रात
सबसे
चमकीला चाँद था
सुनो, कल रात
तुम
याद आए थे ! ०६.११.२०२५
चाँद छत पर उतर आया है
अब
तुम्हारी याद की बारी है ...
प्रतिबिम्ब
ही सही, चाँद तो है
हल्की
ही, कोई याद तो है...
***
चाँद छत पर उतर गया है
थक
कर पसर गया है
क्या
काम था हमारा,अरे
कुछ
तो बिसर गया है
हो
बात भले पुरानी ही
दुख
तो मगर नया है
मुहब्बत
आप कह रहे हैं
यह
तो मगर दया है
फिर
ढूँढ़ते रहोगे मुझे -
देखो
किधर गया है
रखें
मुश्किलें ही दबदबा
चाहे
सदर नया है
हालात
बाज जैसे बनें
उम्मीद
'गर बया है
वह
मुस्कुरा रहा है अगर
फिर
बेखबर गया है
किसी
से क्या मिलें हर जगह
बस
जहर भर गया है ०६.११.२०२५
वही चाँद छत पे
वही
रास्तों में
वही
मुलाकातों
वही
हादसों में
कहो
तो कहो हम
कहाँ
बच के जाएँ
अपनी
है हालत
कि
बस मुस्कुराएँ
सरदी
क्या गरमी
तल्खी
क्या नरमी
कभी
बेतकल्लुफ
या
शरमा-शरमी
तुम्हें
देखते ही
सभी
भूल जाएँ
जितने
हैं मौसम
हमें
बस सताएँ
आँखों
के तारे
कि
टुकड़े जिगर के
साथी-संघाती
सब
फि़त्नागर-से
हाले-दिल
किसको
कहो
क्या सुनाएँ
सुना
दें अगर तो
पीछे
पछताएँ
अकेले-अकेले
चल
तन्हा-तन्हा
सूना
है रस्ता
दिल
डूबा- डूबा
इस
डूबे दिल को
चलो
हम बचाएँ
चाहे
हों तन्हा
हँसें
मुस्कुराएँ
नाविक तू नहीं
है
रे खेवैय्या
धारा
नदी की
गति
ये पवन की
मर्जी
भी तेरी है नहीं तेरी
है
कोई सारे जग का खेवैय्या
मत
छोड़ आशा
है
सब तमाशा
खेल
खिलौना
है
जग सारा
बस
एक तू और
एक
तेरी नैय्या
तुम इस राज में प्रवेश के इच्छुक हो ?
तुम लाते रह जाओगे
अनुभवों की प्रामाणिकता
भावों की उदात्तता
अभिव्यक्ति की सफाई
कथन की मार्मिकता
वे आएँगे
ढूँढ़-ढूँढ़ कर निकालेंगे संदर्भ
और तुम्हें 'शून्य' सिद्ध कर देंगे
खारिज कर देंगे तुम्हारी हर बात
बेदखल कर देंगे तुम्हें अपने राजपाट से
तुम कुछ नहीं कर पाओगे... ०९.११.२०२५ ⇑
उनसे मुलाकात
एक तमगे की तरह है
सीने पे लगाए फिरता हूँ
थोड़ा सर को झुकाता हूँ
थोड़ा चरणों में गिरता हूँ
महत्त्वाकांक्षाएँ कितनी
और कितना मैं घिरता हूँ ! १२.११.२०२५
यह सपना नहीं, सच है
दोस्त का सपने में आना
अच्छा शगुन है !
सुबह-सुबह
खुशगवार हो गया दिन
स्मित फैला रहा कुछ देर चेहरे पर
रंग दीवारों का
हो गया खुशनुमा
पानी में
कुछ ज्यादा स्वाद आया
चाय से आई
ताजगी कुछ ज्यादा...
बड़ी देर सोचता रहा
दोस्त और उसकी व्यस्तता के बारे में
अंततः
लगा ही लिया फोन
कहा दोस्त ने
इस कॉल से
दिन उसका भी बन गया है
दोस्त को फोन लगाने के लिए
उसका सपने में आ जाना जरूरी नहीं
इतना तो
समझते ही हैं आप ! १८.११.२०२५
दोस्तो, यह हमारा सच है !!
तीन जने वहीं के थे
आ गए और सत्ताईस
हो गए पूरे तीस
सूरमा हो गए भोपाली
घटती बढ़ती रही गिनती
आते जाते रहे लोग
रंग लेकिन उतरा नहीं किसी का
किसी से छूटा नहीं भोपाल
साधारण जन थे
असाधारण एक पथ के पथिक
अपनी गति से अपनी गति को प्राप्त हो रहे
थोड़े कम थोड़े अधिक
सत्ताईस होते हैं नक्षत्र
सत्ताईस की उम्र में आई थी
अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म
और हर्षद संख्या है तीस
संयोग मिलाए जा सकते हों
तो मिला लिए जाने चाहिए संयोग
कुछ भी ,कैसे
भी ! !
हँसना, मुस्कुराना
खिलना, खिलखिलाना
याद करना, याद आना
हाल पूछना, बताना
जीवन इसी तरह बिताना
तीसरा पहर है
उतरे शाम सुरमयी ,
गुलाबी
मौसम रहे सुहाना
है चलते चले जाना
उद्गम से दूर भले पहुँच जाए धार नदी की,
धाराएँ बन जाएँ अनेक भले ही
धाराएँ रहती हैं नदी की ही
भोपाल --
अपना उद्गम-स्थल !
दिल के बीचो-बीच
बिल्कुल !!
दोस्तो, यह हमारा सच है !! २७.१०.२०२५
धूप
१.
ओह
री ! चकचक धूप
ओह
री ! कचकच धूप
मन
ताजा, मन खिच्चा !
रात
पूस की कितनी भारी !
और
दिन यह पूस का कितना हल्का !!
देखो, समझो
समय का चक्का !
२.
आसमाँ
बुलाता है
खोलो, अपने
पर खोलो
धूप
तुम्हारे साथ है
जीवन
गाओ, गीत है
शीत
मीत है
पक्की
जीत है
धूप
तुम्हारे साथ है
कुहासे
में भी आस है
जो
चाहो, सब पास है
हो
छुपा हुआ सब परतों में,
मन की
धूप
तुम्हारे साथ है
वही
चाँदनी में,
रूप की
चाशनी
में वही
मुस्कुराहटों
में वही
हर
शुभ में और शुभ्रता में
धूप
तुम्हारे साथ है
महसूसो
मन के सूर्य को
और
उसके ताप को
हर
जीवन में शिशिर आता है
मत
दुबको,
तुम्हारी
धूप
तुम्हारे साथ है २६.१२.२०२५
एक गुलाबी फूल
दो हरी पत्तियाँ
कुछ फूटती हुईं
कोंपलें
जिंदगी की शाख पतली
जीवन से भरी
अरसे बाद
मिल रहा है परिवार
संग-संग बैठ के
बतिया रहा है आज
जीवन का रूप-रंग
जीवन के रंग-ढंग
साधारण-सी बातों में
भरी हुई असाधारणता !!
द्वार के पार द्वार
द्वार के भीतर द्वार
क्रमशः प्रकट होता है जीवन
क्रमशः खुलते हैं गवाक्ष
अवसरों के
चलना न छोड़ें ! ११.०१.२०२५
मुश्किलों में
पैर टिके रहते हैं
घनी धुंध में भी
ताड़ लेती है नजर
पत्थर पर
खिल जाते हैं फूल
मन खिला सकता है
जाने क्या-क्या गुल
!
मन!
मन तो समझते हैं न आप !! १३.०१.२०२५
भींगा भींगा है शिशिर महकी महकी ओस
सुबह गाँव की दे रही मन को कितना तोस
मन छूटे जब
गाँव में छूटे
कब खपरैल
मन से मन को जोड़ती छोटी कितनी
गैल
पगडंडियों
पेड़ों को लिपटा
रहा कुहास
मन के भीतर तैरती धुँधली-धुँधली आस
शहराती
कोई भले सबके
भीतर गाँव
भरी जेठ की दुपहरी ज्यों शीतल हो
छाँव
जैसे इतने दिन
गये जायेंगे कुछ
और
पूस माघ के बाद
ही बिछती फागुन
सौर १४.०१.२०२५
खेलो-कूदो भी तुम लेकिन
पढ़ने में भी
ध्यान लगाओ
समय
निकालो खेलो-कूदो
तुम खाली मत
पढ़ते जाओ
हर काम करो
तुम ध्यान लगा
जो भिड़ो अगर जी-जान
लगा
पढ़ना क्या
और खेलना क्या
सदा
जीतते बढ़ते जाओ
नानी
नाना दादी बाबा
मौसी
मामा फूआ चाचा
इनको भी तुम
फोन लगाओ
इनसे भी तुम
मिलने जाओ
टीचर
पूछें तो जवाब
दो
ना समझो वह
भी बतला दो
नई-नई
बातें सीखो तुम
नया-नया
कुछ करते जाओ
थोड़ा-थोड़ा
रोज पढ़ो तुम
थोड़ा-थोड़ा
रोज बढ़ो तुम
एक-एक कर अपनी
सारी
सीढ़ी-सीढ़ी
चढ़ते जाओ
दिल्ली
लंदन अमरीका है
घर के आगे
सब फीका है
किस गाँव में
है घर तुम्हारा
जरा गाँव का नाम बताओ ⇑
(१)
हिन्दी हिन्दीतर क्यों
हो
कोई भी कमतर क्यों हो
गंगा यमुना सिंधु गोदावरी
नर्मदा कावेरी व सरस्वती
नदियाँ सारी अपनी हैं
भाषाएँ भी सब अपनी
मुश्किल भला डगर क्यों हो
इसमें अगर-मगर क्यों हो
भाषा बहता पानी है
परबत मैदाँ दरिया सब
एकम एक हुए जाते
बिन पानी है सूना सब
उलटा कहीं असर क्यों हो
कोशिशों में कसर क्यों हो
आवाजाही होने दें
क्यों कोताही होने दें
देखें,मन
को मिलने दें
मन-उपवन को खिलने दें
खाली बकर-बकर क्यों हो
हिन्दी बिना असर क्यों हो
(२)
हिन्दी हिन्दीतर क्यों
हो
कोई भी कमतर क्यों हो
मुश्किल भला डगर क्यों हो
इसमें अगर-मगर क्यों हो
उलटा कहीं असर क्यों हो
कोशिशों में कसर क्यों हो
खाली बकर-बकर क्यों हो
हिन्दी बिना असर क्यों हो
दुख गाते हैं, सुख बजाते है
('समिधा' – छाया, ‘समिधा’ पंकज मित्र की कहानी है )
अपना दुख हम गाते हैं
और सुख हम
बजाते हैं
अपने तौर
- तरीकों
से
दुनिया को समझाते
हैं
आँखों में उँगली
डाले
दुनिया को दिखलाते
हैं
दुनिया की जो गलती हो
वह दूना कर
जाते हैं
दुनिया में
दुनिया भर के
खेल- खिलाड़ी
आते हैं
हम जो छोटे
सिक्के हैं
वही
उछाले जाते हैं
बस जिंदा रहने
भर को
मरते - खपते
जाते हैं
हवन कुंड हो जिसका भी
हम समिधा बन जाते हैं ०८.१०.२०२५ ⇑
(१)
मगध में नए सम्राट का उदय हुआ है आर्य !
तुम्हारी सूचना अपूर्ण है वत्स
फ़िलवक़्त कई सारे सम्राट हैं मगध में
सुब्हो-शाम जाने कितने तैयार भी हो रहे हैं
ये कैसी अनार्य भाषा का प्रयोग कर रहे हैं आप?
और एक ही साथ कई सम्राट कैसे संभव हैं आर्य?
सम्राट होने की अर्हता बदल चुकी है वत्स
यह समय राज का नहीं जन का है
जहाँ भी जन है, सम्राट निकल सकता है
दिशानुकूल, भावानुकूल
यानी किसी भी दिशा से सम्राट आ सकते हैं आर्य?
प्राच्य पश्च दक्षिण वाम?
दिशाएँ दस होती हैं वत्स
और फिर कई सारे
परम्युटेशन कॉम्बिनेशन भी तो बनते हैं!
इस नए समय में
सम्राट की पहचान क्या है आर्य?
जिसके कुछ भी अनुयायी हों,
वही सम्राट है
अनुयायी अर्थात् भीड़?
वह तो किसी प्रमाण-पत्र,
किसी पुरस्कार-वितरण समारोह से भी संभव है आर्य !
संभव तो रात्रिभोज से भी है !
आप भी तो सम्राट हैं आर्य?
नहीं, मैं सम्राट के अतिरिक्त प्रभार में हूँ
दरअसल मैं एक चाणक्य हूँ वत्स !
कभी मेरे आवास पर आओ तो पता चले...
(२)
इस अजूबे समय में
मगध का हर व्यक्ति सम्राट हो जाना चाहता है
अचरज इस बात पर उतना नहीं
जितना कि इस बात पर
कि हर व्यक्ति, सामर्थ्यवान से सामर्थ्यवान व्यक्ति भी,
सिर्फ अपनी सामर्थ्य के भरोसे
आगे नहीं बढ़ना चाहता
उसकी सफलता के उपादान बदल चुके हैं आर्य !
वत्स, जब समय का ही धीरज चुक गया हो
मनुष्य में कहाँ बचेगा धैर्य ?
सफलता के मापदंड जब बदल गए हों
पीछे छूट जाने का जोखिम कोई कैसे उठाए ?
आज व्यक्ति कोई कसर नहीं उठा रखता
वह जानता है पीछे छूट गए लोगों का हश्र
स-फल होना सु-फल होना नहीं है
कोई इन्हें समझाता क्यों नहीं आर्य?
बहुत लोगों की दुकान बंद हो जाएगी वत्स
समझा करो !
जीवन की क्षणभंगुरता में विश्वास करो
और अपनी अमरता में...
(३)
बड़ा विचित्र समय हो गया है आर्य
अमात्य सारे चाटुकार हो गए हैं
सचिव, गुरु, वैद्य अमात्यों के अधीन
कुलपति पथभ्रष्ट होने लगे हैं
आचार्यगण व्यवसायी
अब तो न्यायाधीशों की साख पर भी
बट्टा लगने लगा है
अंतिम सिरे पर खड़ा व्यक्ति किस ओर देखे?
वत्स, पीछे देखे और आगे बढ़े
औरों को पीछे छोड़े और आगे बढ़े
सबसे पहले स्वयं की सहायता का ध्यान रखे
जब ऑक्सीजन कम हो
मास्क पहले खुद को लगाएँ
पूरे वातावरण में ऑक्सीजन कम हो रहा है आर्य !
(४)
मगध में स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं आर्य !
उनका सम्मान नहीं हो रहा इन दिनों
ऐसा कब नहीं था वत्स?
अपवादों की बात छोड़ो
हाशिया हमेशा हाशिया ही रहता है
स्थितियों कभी तो बदलेंगी
हम कभी तो बदलेंगे आर्य ?
कोई भी दूरगामी परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से होता है
अपनी आँखें खुली रखो,
वत्स
परिवर्तन के चिह्न दिखेंगे
हाँ, हर समय में प्रतिगामी शक्तियाँ सक्रिय होती हैं
उन पर अपनी ताकत मत बर्बाद करो
हमारा तुम्हारा जीवन बहुत छोटा है
यथासंभव प्रयास करो...
(५)
मगध में ऐसा कोई घर नहीं बचा है आर्य
जहाँ कोई बिना बताए,
बिना पूछे जा सके
हर चीज बढ़ी है,
लेकिन फुर्सत कम हो गई है
लोगों को दम लेने की भी फुर्सत नहीं
व्यर्थ व्यथित मत हो वत्स
जीवन में बातें घटित होती हैं
व्यक्ति की प्राथमिकताओं के आधार पर
जो चाहोगे, सो पाओगे
कुछ नहीं चाहोगे,
कुछ नहीं पाओगे
आप तो निश्चिंत दिखते हैं आर्य !
आपके दरवाजे तो सदा खुले रहते हैं
आगंतुकों के लिए
यह तो प्रेरणादायी है
हर बात के निहितार्थ होते हैं वत्स...
(६)
मगध में वृद्ध बहुत अकेले हो गए हैं आर्य !
यह आधुनिक समाज की निशानी है वत्स !
वृद्ध जब युवा होते हैं,
अंधाधुंध दौड़ रहे होते हैं
जबतक ठहरने का समय आता है
पिछली पीढ़ी जा चुकी होती है
अगली पीढ़ी बहुत आगे निकल चुकी होती है
अकेलापन तो अवश्यंभावी है
पुत्र-पुत्रियों बंधु-बांधवों से आगे देख
समाज में निवेश करें,
डिविडेंड जरूर मिलेगा
आप क्या और कैसे कर रहे हैं आर्य ?
फिलहाल तो एक कमरा बुक कर लिया है हरिद्वार में
अभी से आर्य ?
उम्र का क्या ठिकाना,
कब ढल जाए
लोगों का मन कब बदल जाए
आजकल किसी के लिए कुछ भी कर दो
समय पर कोई काम नहीं आता
यह एक अलग समस्या है...
(७)
शिक्षा और स्वास्थ्य-व्यवस्थाओं का बहुत बुरा हाल है
आर्य
इसलिए कि सरकारें डरती हैं वत्स
वे शिक्षित और स्वस्थ जनता नहीं चाहतीं
उन्हें बर्दाश्त नहीं होता
असहज करने वाले प्रश्नों का पूछा जाना
सरकारें यथास्थिति बनाए रखना चाहती हैं
यथास्थिति उनकी ढाल है,
जिसके सहारे
वे रोके और दबाए रखती हैं जनता को
हमें और तुम्हें
आप तो दबाए गए नहीं लगते आर्य
क्योंकि मैंने भी अपने हाथों में
एक छोटी ढाल उठा ली है
मेरे पीछे लेकिन एक बड़ी ढाल लगी है
मुझे रोकती, मुझे दबाती
(८)
मगध में अब कोई किसी को
अपनी तरफ से कुछ नहीं बताता है आर्य, मित्र भी नहीं
सब हाल सरकारी दफ्तरों-सा हो गया है
जरूरत हो तो पूछ लो
उनकी सुविधा और समय से जवाब मिलेगा
अगर मिला तो
दुनिया की संस्कृति आगे बढ़ चुकी है वत्स !
लोगों की निजता का प्रश्न है !
बताने वाला निजता को क्यों उजागर करे
पूछने वाला खलल क्यों डाले उसमें
फिर आभासी दुनिया का इतना बड़ा संसार जो है
संवाद और घोषणा के लिए
सब को सब पता है
और कोई कुछ जानता भी नहीं
बहुत मायावी संसार है यह
वत्स, तुम तीसरी दुनिया के नागरिक कब तक बने रहोगे?
१७.०५.२०२५
(९)
मगध में नागरिकों से ज्यादा कवि हो गए हैं आर्य!
तुम्हारा क्या तात्पर्य है वत्स?
बांग्लादेशी?
कविता में 'वसुधैव कुटुंबकम्' होता है, इतना नहीं जानते?
कविता में बांग्लादेश ही नहीं फिलीस्तीन भी होता है
रूस भी होता है,
चीन भी होता है
इंग्लैण्ड अमेरिका तो हैं ही
नहीं होता है कविता में चर्चा
तो उज्जैन अवध मगध अवंतिका
अंग कोशल चेर चोल पल्लव का
इतिहास से ज्यादा निष्ठुर इतिहासकार होता है
खैर, कवि को क्या !
बांग्लादेश, फिलीस्तीन, रूस, चीन
इस समय के सच हैं
कवि सच से मुँह नहीं मोड़ सकता
पीछे देखना तो वैसे भी ठीक नहीं
पुरातनपंथी होना कवि को शोभा नहीं देता आर्य !
अंधा हो जाना भी ठीक नहीं
काल से या अन्यथा बँध कर कवि नहीं रहता
निबद्ध कवि, कवि नहीं रहता ...
रही बात नागरिकों से ज्यादा कवि होने की, तो
व्यंजना को समझा करो... २७.०५.२०२५
(१०)
कवि सारे श्रेष्ठ हो गए हैं
और जिन्हें लगता है कि वे श्रेष्ठ हैं,वे कवि
प्रशंसक सारे और कुछ निंदक
आलोचक हो गए हैं
संपादक प्रबंधक,प्रकाशक व्यवसायी
पाठक सारे लेखक हो गए हैं
पाठक कोई नहीं
सुना है हिन्दी भी अँग्रेजी हुई जाती है आर्य !
अब विलोम ही पर्यायवाची हैं वत्स !
शक्ति ही सामर्थ्य है
हर किसी के हाथ में
चढ़ते हुए सूरज के लिए
अर्घ्य है !
मगध में तो डूबते सूर्य को भी अर्घ्य देते हैं आर्य !
वत्स,यह
नया समय है...
सुना ही होगा तुमने
! १८.०६.२०२५
(११)
नए समय में
लोग याद कर रहे हैं मगध में
विभीषिकाओं को, हत्याओं को
इतनी तिक्त तो हवा नहीं थी !
हिंसा
प्रतिहिंसा
व्यक्ति बीच में फॅंसा
मिथ्याचार ही लोकाचार
कवियों के अतीतोन्मुखी नहीं
भविष्योन्मुखी होने की जरूरत है,
आर्य !
समय का चक्र है वत्स !
समय का चक्का
तनी हुई रस्सी पर रक्खा है
जिसे भी चलाना हो
पैडल मारना ही होगा
पैडल वही दो हैं,
जिनके रंग-रूप
रुचि और मत के अनुसार होते हैं,
बस !
कवि द्रष्टा है,
स्रष्टा नहीं !! २५.०६.२०२५
(१२)
मगध में इतना अँधेरा क्यों है आर्य ?
यह कालिमा है वत्स !
कुछ व्यक्तियों की कलुषता से जन्मी हुई
फिर कोई कुछ
करता क्यों नहीं है आर्य ?
यह कैसा समाज है ?
जिनकी वजह से मगध का सिर झुक गया है
उन्हें दण्ड तो मिलना चाहिए न ?
अपराध और दण्ड का निर्धारण
मामला पेचीदा होता है
किसी की जुबान पर ताला,तो
किसी का ऊँचा ओहदा होता है
जिस पर बीती है,
उसी को
देना पड़े जवाब अगर
उसी के बारे में हों कई-कई
अगर-मगर,तो
न्याय की बात कैसे हो?
पानी जब सर से गुजर जाता है
जब आपद् काल आता है
तब जाकर चेतते हैं सब,मगर
फिर से भूल जाने को...!
सिर्फ एक घटना और एक ही
व्यक्ति तक सीमित नहीं है यह बात
एक लंबी परंपरा है दूषित मानसिकता
दुश्चेष्टाओं और व्यभिचार की
बहुत-सी खंडित मूर्तियों को
पूजते आ रहे हैं हम
हमें बात की तह तक पहुँचना होगा
दोष को जड़ से उखाड़ना होगा
सारे पूर्वाग्रहों से हटकर परे
उस हिचक को दूर करना होगा
जो सच को सच, और
अपराध को अपराध कहने से रोके
जब तक शराफत और महानता का मुखौटा पहने
घूमते हैं लोग,
जब तक खैरख्वाह बनकर
घूमते हैं लुटेरे
जब तक लीडर बन-बनकर
किसी की निजता का उड़ाते हैं मजाक
तब तक मगध का सिर झुका है
शर्म से, और
शोक में ...!
नए समय में २९.०६.२०२५
(१३)
द्रुत गति से जाने वाले
भादों के मेघ, सुनो
बताना सबको, मगध में सब अच्छा नहीं है
अमीर लोग फकीरी की बात करते हैं
गरीब पत्थर पर सर पटकते हैं
हम-जैसे लोग
डरते हैं, बहकते हैं और भटकते हैं
बताना सबको
लोग हत्याओं को याद करते हैं
विभीषिकाओं को याद करते हैं
संस्कृति के नाम पर सर्कस करते हैं
दुनिया भर के लोगों को
बुलाते और नचाते हैं
सारे लोग जा-जा कर नाचते हैं
एक अदद चपरासी के पद हेतु
पीएचडियों की लाइन लग जाती है
और नौकरी फिर भी नहीं लगती !
सुविधासंपन्न खानदानी स्कूली शिक्षा तक में अनुत्तीर्ण
साहबान, एमएलए ,एमपी, मंत्री, मुख्यमंत्री कुछ भी बन सकते हैं
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की अर्हताओं में भी
शिक्षा की उपाधियों का कोई दखल नहीं है !
बड़े लोगों के लिए शिक्षा आभूषण से ज्यादा कुछ नहीं
अब गोल्ड हो या 'रोल्ड गोल्ड' !
कभी-कभी कुछ डिग्रियों पर सवाल उठ खड़े होते हैं
लेकिन वे अनिवार्य नहीं होते
कम से कम उत्तरदाता के लिए
पूछनेवाले लाख सर पटकें,
भोंपू बजाएँ
जिनकी जेबों में 'चारों स्तंभ' होते
हैं
उनके ठेंगे पर दुनिया का वास होता है
तुम्हारा तो सब देखा-सुना है ओ' मेघ !
लोग अपने राष्ट्रपतियों,
प्रधानमंत्रियों,खिलाड़ियों
अभिनेता-अभिनेत्रियों,
यहाँ तक
कि कतिपय दुर्दांत व्यक्तियों की भी पूजा करने लगते हैं
अपनी-अपनी पसंद और श्रद्धानुसार,
और अपनी इस 'सादगी' पर वे गर्व भी करते हैं
!
डोर के दूसरे छोर पर खड़े लोग और उनकी पसंद
सबको वाहियात लगती हैं
जो बाँहें चढ़ा कर
आँखें दिखाकर
डरा धमका कर बात करे
लोग उससे डरते हैं,
नत रहते हैं उसके समक्ष
छिद्रान्वेषण प्रिय शगल है
चापलूसी राजधर्म
झूठ युग-सत्य का आधार
युग-सत्य को अगर ठीक कर सको,तो करो
वरना व्यक्तियों के पीछे पड़ोगे,तो भला
कहाँ तक पहुँचोगे ?
कितनों को रास्ते से हटाओगे
कितनों का मत बदल पाओगे ?
व्यक्ति नहीं विचार को देखो
ये कहना उनसे जिनको कहने से कुछ फर्क पड़े
ओ' मेघ भादों के, सुनो
! २७.०८.२०२५

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