जैसे
पेड़ खजूर...
उनके चेहरे पर मुस्कान है । उनके चेहरे पर आत्मतुष्टि और आत्मगौरव की लाली है । वे भले आदमी हैं । वे बड़े आदमी हैं । वे बड़े भले आदमी हैं । 'भले' साइलेंट है । अतः वे बड़े आदमी हैं । सामने खड़े व्यक्ति के चेहरे पर भी मुस्कान है, पर उसकी मुस्कान में याचना की छौंक लगी हुई है ; उसकी आँखों में कातरता के रंग हैं ।
वे देखते-देखते बड़े आदमी हो गए हैं । बल्कि आसपास के बहुत-से लोग बड़ा बनने की प्रोसेस में हैं । उनके रंग बदलते हुए दिखते रहते हैं ।
सामने खड़े होने वाले व्यक्ति के पास प्रशंसा के कुछ शब्द हैं , जिन्हें वह उदारता के साथ खर्च कर रहा है । बड़े आदमी का जन्मसिद्ध अधिकार है प्रशंसा पाना, जिसे वे प्राप्त कर के ही दम लेते हैं । आप प्रशंसा दें, न दें, वे आपके भीतर से खुद के लिए प्रशंसा निकलवा लेंगे । यह प्रशंसा 'वन वे' होती है । बड़े आदमी के उच्च मानदंडों पर किसी अन्य व्यक्ति का कोई काम खरा नहीं उतरता । बड़ा आदमी अपने उच्च मानदंडों के आगे विवश होता है । सामने खड़ा व्यक्ति भले लाख ठकुरसुहाती करे, ‘प्रति-उपकार’ में बड़े आदमी के मुँह से किसी की प्रशंसा में एक अक्षर निकलना भी असंभवप्राय है । बड़े आदमी के ऊँचे मानदंड !
संसार दो तरह के लोगों में ही तो बॅंटा हुआ होता है -- बड़े लोग और छोटे लोग । जो बड़े होते हैं वे विशिष्ट होते हैं । विशिष्ट यानी सबसे अलग, पहुँच से बाहर ।
ये बड़े आदमी भी सामने वाले व्यक्ति के लिए विशिष्ट हैं । सामने खड़ा व्यक्ति गुण गाए जा रहा है । गुण गाते-गाते कुछ समय बीत चुका है । सामने खड़े व्यक्ति को यह लग रहा है कि अब सही समय आ गया है अपनी अर्जी लगाने का । उसने बड़ी धीमी आवाज में अपनी बात कहनी शुरू की है । बड़े व्यक्ति ने बात बदल दी है, उसने अपने किसी पुराने काम के विषय में पूछ दिया है । सामने खड़े व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि पहले भी कई बार बताई हुई बात को एक बार फिर पूरी गंभीरता के साथ बताए । और बड़े व्यक्ति की प्रशंसा करता चले । बड़ा व्यक्ति प्रशंसा से प्रसन्न रहता है । जब तक प्रशंसा सुनता रहता है, काबू में रहता है। सामने खड़े व्यक्ति ने एक बार फिर अपनी बात करने की कोशिश की है । बड़े आदमी के चेहरे पर अन्यमनस्कता के भाव उभर आए हैं ।
सामने खड़ा व्यक्ति जरूरत में है । उसे अपनी बात कहने की जल्दी है । बड़ा आदमी अपने में मगन है । उसकी भी जरूरतें हैं । सामने खड़ा व्यक्ति उसकी इतनी ही जरूरत पूरी कर सकता है कि बड़े आदमी की प्रशंसा करता रहे । वह बड़े आदमी की जरूरत पूरी कर रहा है । सामने खड़े व्यक्ति की जरूरत आवश्यक आवश्यकता नहीं होती है । आवश्यक आवश्यकताएँ सिर्फ बड़े आदमी की होती हैं ।
बड़ा आदमी, जिस भी फील्ड का हो, उसे उस फील्ड में दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता । उसकी अपनी जमीन भले ही सूखी-बंजर हो । वह खुद को महान समझता है -- निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते । सामने खड़ा व्यक्ति चाह कर भी बड़े आदमी को असली फलदार वृक्षों के विषय में नहीं बता पाता । वह प्रयास भी करता है तो बड़े आदमी के पास अनेकों तर्क होते हैं जिनसे वह फलों को बेकार सिद्ध कर देता है ।
बड़े आदमी की हर चीज बड़ी होती है । उसके सुख, उसके दुख, उसकी सफलताएँ , उसकी विफलताएँ— उसकी हर बात विलक्षण होती है । हर विवरण भव्यता-रंजित ।
सामने खड़ा व्यक्ति जो भी बात कहता है, उससे संबंधित दो-एक दृष्टांत बड़ा आदमी भी प्रस्तुत कर देता है । वह भी इतनी तेजी और कुशलता के साथ कि सामने खड़े व्यक्ति के अनुभव अपनी ही क्षुद्रता के चुल्लू में डूब कर मर जाते हैं ।
सामने खड़े व्यक्ति की विशेषता होती है कि वह स्वयं को बड़े आदमी का शुभचिंतक मानता है । इसी नाते कभी-कभी बड़े आदमी को कुछ सुझाव देने की चेष्टा कर बैठता है । बड़ा आदमी उसे अपना शुभचिंतक नहीं मानता । बड़ा आदमी सुझावों को सुनने के लिए बैठा नहीं होता है । वह बड़े अधिकारी की तरह ही किसी का नहीं होता । वह किसी पार्टी का नहीं, सिर्फ सत्ता का होता है और सिर्फ उसी की सुनता है।
सामने खड़े व्यक्ति ने बड़ी मिमियाती हुई आवाज में बड़े आदमी से अनुरोध किया है कि एक बहुत ही जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता के लिए वे कुछ कर दें । बड़ा आदमी मित और मिष्ट- भाषी है । यह गुण उसकी रूखी उदासीनता को छुपा लेता है । बड़े आदमी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया है । बड़ा आदमी है, मित भाषी भी, मिष्ट भाषी भी । शहद में डुबा कर कुनैन की गोली पिला दी है उसने । बड़े आदमी के साधन, संसाधन, जान-पहचान ,पहुँच-पैरवी– सभी कुछ उसके निजी उपयोग के लिए होते हैं । स्वत्वाधिकार सुरक्षित !
सामने खड़े व्यक्ति से बड़े आदमी ने पुराने कामों के विषय में पूछा है । सामने खड़े व्यक्ति ने सभी कामों के पूरा हो जाने की सूचना दी है । साथ ही, उसने हर काम के पूरा होने का श्रेय बड़े आदमी को दे दिया है । बड़ा आदमी प्रसन्न हो गया है -- न हींग लगे न फिटकरी...। उसने फिर एक नई सूची पकड़ा दी है । सामने खड़ा व्यक्ति बड़े आदमी का मातहत होता है । सामने खड़ा व्यक्ति हमेशा फुर्सत में होता है, कम-से-कम बड़े आदमी की नजरों में । जो फुर्सत में होता है, वह फालतू होता है और पालतू भी । उसका समय मुफ्त का होता है । उसने कामों की सूची सहर्ष स्वीकार कर ली है । आत्मकेंद्रित होना बड़े आदमी का गुण है, पर-आश्रित होना सामने खड़े व्यक्ति का ।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है । इसलिए एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से कभी-न-कभी, कुछ-न-कुछ काम पड़ जाया करता है । जिससे कुछ काम होने की, कुछ सहायता प्राप्त होने की संभावना दिखती है, वह स्वतः बड़ा आदमी हो जाता है । जैसे ही आपने सहायता के लिए मुँह खोला, उसके 'बड़ा आदमी' बनने के तंतु सक्रिय हो जाते हैं । उसके बात करने का लहजा बदल जाता है, उसकी नजरें बदल जाती हैं— जिसको मिला भाव, उसी ने खाया ताव । उसे आदर्शवाद के सारे पाठ याद हो आते हैं। वह सामने खड़े व्यक्ति को वही पाठ पढ़ाने भी लगता है ।
वो जमाना जा चुका जब बड़े लोग आम से लदे पेड़ों की तरह हुआ करते थे । अब बड़े लोग खजूर के पेड़ के समान हैं — "पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर" । खजूर के पेड़ के तने काँटेदार होते हैं । उसपर चढ़ने के लिए पैरों को छान के रखना होता है । और भर बाँहों पकड़ के रखना होता है । बड़े व्यक्ति के पैर खजूर के तने होते हैं । सामने खड़ा व्यक्ति भी अपने पैरों को छानकर, बड़े आदमी के पैरों से लिपट कर अरदास कर रहा है । उसके मन में रसीले, मुलायम और मीठे खजूर की यादें बसी हुई हैं । दुनिया भर में भी खजूर का यह रूप प्रसिद्ध है। लेकिन खजूर का एक और रूप होता है, सूखा और कड़ा । छुहारे का रूप । सामने खड़े व्यक्ति को यह समझ आ गया है कि बड़ा आदमी छुहारा हो चुका है । उसके ताजा-मुलायम खजूर होने की गुंजाइश नहीं बची है । दुनिया यह बात नहीं मानेगी । सामने खड़ा व्यक्ति यह समझता है । वह चुप है । बड़ा आदमी बार-बार अपना बड़ा होना सिद्ध करता रहता है । यह सच सामने खड़े व्यक्ति पर एक और बार सिद्ध हो गया है।
मुझे बहुत-से बड़े लोगों के चेहरे याद आ रहे हैं । 'शोले' का डायलॉग याद आ रहा है— "मुझे तो सब पुलिस वालों की सूरतें एक जैसी लगती हैं"। बड़े लोगों के चेहरों पर उपेक्षाभरी मुस्कानों की याद आ गई है । मन ने तुरंत ही मन की बात काटी है । 'शोले' का अगला डायलॉग आ गया है -- "इसकी तो आदत है बकबक करने की" । मुझे भी पानी में रहना है। मुझे केवल 'प्रियं ब्रूयात्' करना चाहिए । कम-से-कम मुँह तो बंद रखना ही चाहिए । मैं इसे शिष्टाचार या लिहाज का नाम दे ले रहा हूँ । ऐसा कर के मैं राहत की साँस ले पा रहा हूँ ।

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