कुछ होली में ...
(१)
मैं तेरी तू मेरी हरदम बरबस पीठ खुजाय
दुनिया ऐसे ही चलती है चाहे भाय न भाय
आओ कि पीठ खुजाएँ
कितने मीठे बोल कहे हैं है प्यारी मुस्कान
प्यारी-प्यारी बातों में ही छुपते तीर कमान
निशाना साध लीजिए
मन में क्या-क्या घुलता रहता मुँह में मगही पान
जाने क्या-क्या भेद भरे हैं जान-जान हल्कान
अजी दम साधे रहिए
उड़ने वाले के पर काटो है उनका फरमान
वे ही खाली उड़ते जाएँ उनका है अरमान
कोई तो खड्ग उठाय
उनको लगता है सबसे वो हम समझे हम तेज
'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' कितना मानीखेज
आओ कि पाठ पढ़ाएँ
चला रहे हैं चक्कर बैठे हाथों लिए लगाम
आम-आम को खास बना दें और खास को आम
आप भी चरण दबाएँ
वे हँस के हैं हामी भरते हम करते तारीफ
हम जैसे हैं नौकर-चाकर वे हैं अपने चीफ
बड़े वे बहुत भले हैं
इसको काटें उसको बदलें सम्पादक का काम
सबसे पहले वे देखे हैं आपका क्या है नाम
किसी से कहवाएँ जी
तुम जाकर जिस मंच चढ़े हो वह तो है बदनाम
धुला-धुलाया चमका-चमका मेरा है ईनाम
तुम्हें कुछ खबर नहीं है
खूब गले लगाइए चाहे करिए मन की बात
कितने दिन कोई सुन पाए खाकर छूछा भात
थाल को कुछ तो भरिए
बाहर अच्छी धूप खिली है कवि बहुत है उदास
दुखी होने से कवि गुणी हो उसको होना पास
लटका रहे मुँह थोड़ा
दुनिया कटती-बॅंटती रहती कवि तो रस का दास
कवि तो कुछ ना जाने भाई जाने वास-सुवास
कवि चित्त का ग्राहक है
साहब साहबी छोड़ पाएँ बहुत कठिन है काम
साहब होना दीन-धरम है साहब उनका नाम
जनता उनकी प्रजा है
बच्चे बूढ़े बहुत हो चले बूढ़े हुए जवान
कलजुग की यह रीत नई है क्या ही पकड़ें कान
खेल का खेल देखिए
एक कवि हमने यहाँ देखा जिसका ऊँचा दाम
छोटी आँखें चुॅंधिया जाएँ कवि का इतना नाम
अजी कवि-भाव देखिए
कभी कवि को पाठक न भाए कैसी है यह बात
या यह कवि जी सोच रहे हैं इनकी क्या औकात
कवि की महिमा देखिए
हमने जिनके पैर दबाए सेवा की भरपूर
पेड़ खजूर वही बन बैठें फल रख दें अति दूर
जगत की रीत यही है
जितना झुकता जाता जो भी उतना झुकता जाय
गधा खड़ा हो अगर सामने क्यों ना बोझ लदाय
गधा तो गधा रहेगा
( २ )
देखीं,कइसन कइसन राजा ,कइसन कइसन मेठ
भितरि जे जेतना भिखमंगा,उहे कहावे सेठ
जो गी रा सा र रा रा
कुछ पइला से मन ना लागे,कइसन राग- बिराग
भरल जवानी बूढ़ भइल बा,ठंढाइल बा आग
जो गी रा सा र रा रा
हम बोलीं तहरा तू बोलs हमरे मनवा चोर
रोजे रोजे गल्ती होला,रोज पराला भोर
जो गी रा सा र रा रा
केकरा के हम संघी कहीं, केकरा बामपंथि
खाली लेके बइठल बाड़ें, आपन आपन ग्रंथि
जो गी रा सा र रा रा
मूस मुटइहें लोढ़ा बनिहें, फिर भी रहिहें मूस
कतनो खुस हो जाई तब्बो, परजा घासे-फूस
जो गी रा सा र रा रा
काम करावे खातिर देखीं,सब रस्ता बा सेट
दाम चुकाईं मेवा पाईं,जइसन सुतरे रेट
जो गी रा सा र रा रा
जे ना बूझे ऊहे बोले,खूब अलापे राग
कोयल बन बइठल मुस्कावे,मुँहवा खोले काग
जो गी रा सा र रा रा
सोझ के मुँह त कुतवो चाटे, रहे टेढ़ से सोझ
दुनिया चाँपल चाहे देके,माथे भर-भर बोझ
जो गी रा सा र रा रा
हाथ जोर जे करे निहोरा,बोली बोले मीठ
काम पुरे पर देखीं ओही,कतना बड़का ढीठ
जोगी रा सा र रा रा
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