एक नया
वर्ष यह भी !
मुझे तो लगता है कि नववर्षों की
गिनती करते-करते आजिज आकर ही मजाज़ ने यह शेर कहा होगा –
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म
नहीं है
विक्रम संवत् का नया वर्ष शुरू नहीं हुआ था , कि पिछले सप्ताह ( आधिकारिक) भारतीय नववर्ष शुरू हो गया । अभी भारतीय नववर्ष ठीक से शुरू नहीं हुआ है कि एक और नया वर्ष सामने खड़ा है ! यह नया वर्ष भी अखिल भारतीय प्रकृति का है । हम सब, यानी हर करदाता, बैलेंसशीट बनाने वाला हर प्रतिष्ठान, कम-से-कम वित्त मंत्रालय आदि, इस नए वर्ष को जानते हैं, मानते भी हैं, लेकिन मनाते नहीं ! इस नए वर्ष को हम ‘वित्तीय वर्ष’ कहते हैं । अंग्रेजी में जिसे Fiscal year या Financial year कहते हैं ।
वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने ‘मार्च’ की महत्ता से हम परिचित हैं ही । बैंकों में जाइए, कम्पनियों में जाइए, जिनके बिल विभागों में अटके पड़े हैं, उन ठेकेदारों के पास जाइए, जिन विभागों द्वारा राशियों की निकासी करनी है, वहाँ जाइए, जिलों के ‘ट्रेजरी’ विभागों में जाइए – हर जगह मार्च चढ़ा हुआ है ! गहमागहमी, युद्ध का माहौल ! सरकारी विभागों द्वारा ट्रेजरी से निकासी के लिए मार्च के महीने में की जानेवाली धुआँधार कोशिशों को ‘मार्च-लूट’ भी कह दिया जाता है । अभी हाल के ही एक अखबार के संपादकीय में भी ‘मार्च’ महीने की महिमा गाई गई है – मार्च का नाम ‘मार्स’ (अर्थात् मंगल) ग्रह के नाम पर रखा हुआ है । ‘मंगल’ आक्रामक ग्रह है ! ईसा पूर्व सन् 44 में ‘सीजर’ की हत्या मार्च महीने में हुई थी और जूनियर बुश ने मार्च, 2003 में ईराक-युद्ध शुरू किया था । वहीं, गाँधी की ‘नमक-यात्रा’ 12 मार्च को शुरू हुई थी और मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संग्राम की शुरुआत की थी । और तो और, 1867 के मार्च महीने में ही रूस ने अमेरिका को ‘अलास्का’ बेचा था ।
1867 में ही ब्रिटिश सरकार ने भारत के वित्तीय वर्ष की अवधि मई-अप्रैल से बदल कर अप्रैल-मार्च की थी । तब से यह परिपाटी चली आ रही है । वित्तीय वर्ष (Financial Year - FY) 12 महीने की वह अवधि है जिसका उपयोग सरकार और व्यवसायों द्वारा लेखांकन (Accounting), कर निर्धारण (Taxation) और बजट बनाने के लिए किया जाता है। भारत में यह 1 अप्रैल से शुरू होकर अगले वर्ष के 31 मार्च को समाप्त होता है । उदाहरण के लिए, वित्तीय वर्ष 2026-27, 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027 तक चलेगा। जैसा ऊपर जिक्र किया गया है , वित्तीय वर्ष को Fiscal year भी कहते हैं । ‘Fisc’ का अर्थ राजकीय कोष होता है । राजकीय कोष, यानी Govt Treasury, यानी सरकारी खजाना । ‘राजकीय कोष’ सरकार को होने वाली आय से भरता है । यह आय दो तरह की होती है , राजस्व आय जिसके अंतर्गत भू-लगान और विभिन्न कर ( टैक्स) आते हैं तथा गैर-राजस्व आय जिसके अंतर्गत ब्याज, फीस आदि आते हैं ।
सन् 1772 में बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने लगान आदि की वसूली के लिए ‘कलेक्टर’ के पद की स्थापना की । पहले वे ‘सुपरवाइजर’ कहे जाते थे । कालांतर में ‘कलेक्टर’ सरकारी तंत्र की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कड़ी बन गया , और ढाई सौ साल से भी आधिक समय से इसकी महत्ता बरकरार है । हिन्दी में संग्रहण या वसूली के लिए शब्द है – समाहरण। इसीलिए कलेक्टरेट को समाहरणालय कहते हैं और कलेक्टर को समाहर्त्ता । खैर ।
बात वित्तीय-वर्ष की हो रही थी । इंटरनेट पर उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार विश्व के 193 देशों में 145 देशों इसकी अवधि 1 जनवरी- 31दिसंबर है और 18 देशों में 1अप्रैल- 31मार्च है । अमेरिका में, सरकार के लिए 1 अक्टूबर से 30 सितंबर और व्यक्तियों के लिए 1 जनवरी से 31 दिसम्बर । यूनाइटेड किंग्डम का वित्तीय वर्ष 6 अप्रैल से 5 अप्रैल तक का है ।
बच्चन जी ने मधुशाला में लिखा है -- स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी । सन् 1867 में अप्रैल-मार्च का वित्तीय-वर्ष लागू किए जाने के साथ ही, बल्कि थोड़ा पहले से ही, भारत के वित्तीय-वर्ष को बदलने के सुझाव प्रस्तुत किए जाते रहे हैं । 1865 और 1867 से ही भारतीय वित्तीय-वर्ष को अप्रैल-मार्च की जगह जनवरी-दिसम्बर किए जाने की माँग उठती आ रही है । आजादी के बाद 1966,1969, 1977 एवं 1979 में भी यह सुझाव दिया गया । वित्तीय-वर्ष में बदलाव लाने पर विचार करने हेतु सन् 1984 में श्री एल.के झा की अध्यक्षता में एक समिति क गठन किया गया । समिति ने अनेक बिंदुओं पर अध्ययन एवं विचार करने के बाद एक सौ बीस पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की । तत्कालीन वित्त मंत्री (स्व.) वी.पी.सिंह को रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अपने पत्र में समिति के अध्यक्ष श्री झा ने लिखा –
The starting point of our enquiry, as of others undertaken in the past, was to consider
which particular timing for the preparation and presentation of the
budget would be most
suitable from the point of view of taking account of the impact of South-West monsoon- which is the more crucial
one - on the Indian economy in terms of the size of the kharif crop, outlays necessitated by floods and droughts and pressures on
the price level. It seemed to us that maklng January-Decamber the financial
year would be the most advantageous from this point of view, as it would enable
the budget to be presented in November when the size of the kharif crop would
be known, and a preview of the rabi crop would be possible. The choice would
also be helpful in the compilation of statistical data for purposes of National Accounts, in line with
international practice, and do away with the confusion caused by having to
refer to the financial year for some purposes and the calendar year for others.
वित्तीय-वर्ष के निर्धारण हेतु ऊपर के उद्धरण में प्रयुक्त ‘साउथ-वेस्ट मॉनसून, खरीफ और ‘नेशनल अकाउंट्स’ जैसे शब्दों को रेखांकित किया सकता है । जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर भले ही कृषि क्षेत्र का योगदान कम हो, भारत के जनजीवन पर उसका असर व्यापक है । प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कृषि या कृषि-संबंधी गतिविधियों से जुड़े लोगों की संख्या बड़ी तो है ही, कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों ( डेयरी इत्यादि) के प्रभाव की व्यापकता को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक ( CPI- Consumer Price Index) में ‘खाद्य एवं पेय पदार्थों’ को दिए गए महत्त्व ( weightage) से पता चलता है । फरवरी, 2026 में जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार यह 36.75% है । उपभोक्ता मूल्य सूचकांक , महँगाई का सूचक है । देश में मुख्यतया दो फसलें होती हैं – खरीफ और रबी । खरीफ की फसल पर मॉनसून ( साउथ-वेस्ट मॉनसून) का असर पड़ता है । सिंचाई-तकनीकों की सारी उन्नति के बाद भी फसल पर बारिश का असर होता ही है । फसल अच्छी या खराब होने का असर आद्योगिक उत्पादन पर भी पड़ता है । महँगाई पर असर तो पड़ता ही है । ऊपर के उद्धरण में तीसरी बात ‘नेशनल अकाउंट्स’ की कही गई है । 1984 में पैंतीस तरह के आँकड़े संग्रहित किए जा रहे थे,सारणियाँ बनाई जा रही थीं , जिनमें 11 के लिए कैलेंडर-वर्ष ( जनवरी-दिसम्बर), 22 के लिए वित्तीय-वर्ष ( अप्रैल-मार्च) और कृषि-आधारित 2 आँकड़ों के लिए जुलाई-जून का वार्षिक-चक्र लिया जाता था । रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विश्व के अस्सी प्रतिशत देशों में जनवरी-दिसम्बर का वित्तीय-वर्ष ही चलन में है ।
सभी बिंदुओं पर विचार करने के बाद एल.ले. झा समिति ने वित्तीय-वर्ष को ‘जनवरी-दिसम्बर’ किए जाने का सुझाव दिया । हालाँकि, इसे लागू नहीं किया गया और भारत का आधिकारिक वित्तीय-वर्ष वर्तमान में ‘अप्रैल से मार्च’ ही है।
वित्तीय-वर्ष की गणना बदल कर जनवरी-दिसम्बर किए जाने की चर्चा ठंढी पड़ती नहीं है । 2016 में भी इस चर्चा ने एक बार फिर जोर पकड़ा । वित्तीय-वर्ष में बदलाव के प्रश्न पर विचार करने के लिए भारत सरकार ने डॉ.शंकर आचार्य की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया । इस समिति की रिपोर्ट की प्रति इंटरनेट ( मंत्रालयों आदि की वेबसाइट पर) पर दिखी नहीं । 15 जुलाइ, 2019 को लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में यह बतलाया गया कि सरकार ने वित्तीय वर्ष के प्रारंभ होने की तिथि को अप्रैल के स्थान पर जनवरी करने का निर्णय नहीं लिया है । समिति ने 26.12.2016 को रिपोर्ट जमा कर दी थी, जिस पर तबतक निर्णय नहीं लिया गया था । बाद में निर्णय लिए जाने की भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं है ।
इस तरह से, 1 अप्रैल से 31 मार्च तक ही हमारा वित्तीय-वर्ष गिना जाएगा ।
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मार्च होली का महीना है । जिन
पर मार्च ‘चढ़ा’
( ऊपर वर्णित) होता है, उनके लिए समय ‘कठिन’ गुजरता है । सितंबर-अक्टूबर और मार्च-अप्रैल में
बहुत सारे पर्व-त्योहार पड़ते हैं । कितने भी
मॉल खुल जाएँ, भारत की उत्सवधर्मिता अभी भी पर्व-त्योहारों से
जुड़ी हुई है । सितंबर-अक्टूबर तो फिर भी बच जाते हैं, मार्च का
महीना नौकरी की मजबूरियों से बच नहीं पाता – हाय हाय ये मजबूरी,
ये मौसम और ये दूरी / तेरी दो टकियाँ दी नौकरी में... । मार्च में वित्तीय-वर्ष के पूरा होने के पहले सारे ‘टारगेट’ पूरे किए ही जाने हैं !
और जंगल जल रहा है ।
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