मुदा देख रहा हूँ
[ व्यंग्य-निबन्ध-संग्रह]
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1. भगवान जी बचा ले जाएँगे 2. परफेक्ट बारात 3. रेस ज़िंदगी की 4. इतना तो चलता है 5. टोकना मना है 6. एक टिपिकल पिता 7. आज का कवि सम्मेलन 8. उसकी होली 9. क्रम भंग: हौसला बनाए रखिए 10. क्रम भंग 2: मन को मनाए रखिए 11. क्रम भंग 3: अच्छी चीजों का देखा जाना जरूरी है 12. हारा हुआ आदमी
भगवान जी बचा ले जाएँगे
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है | आवश्यकता आविष्कार की जननी है| या फिर रैप सॉन्ग मैं चाहे ये करूँ , मैं चाहे वो करूँ मेरी मर्जी| ये सारे के सारे कथन भारतीय रेल के सफर के दौरान ही पाए गए होंगे | नि:संदेह |
जीवन के सत्यों से साक्षात्कार करते
रहने के लिए भारतीय रेल का सफर जरूरी है | नॉन
एसी हो तो बेहतर , अनरिजर्वड् हो तो और भी अच्छा | और
बगैर रिजर्वेशन , रिजर्वेशन वाले डब्बे में हों तो कहना ही क्या ! तो
नियति ने जोर मारा और मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ ऐसी ही एक यात्रा का |
नियत समय पर स्टेशन पहुँचा लेकिन ट्रेन
आएगी कि नहीं उसके लिए बार- बार आसमान की ओर देखा | ज्यादातर
मामलों में ऊपरवाला ही याद आता है | प्लेटफॉर्म पर अभी तक मंदिर की व्यवस्था नहीं है, वरना
टीका-घंटी तो हो ही सकता था | धर्म की आस्था इस तरह कूट- कूट कर भरी हुई है कि यह
लिखते भी डर हो रहा है, जबकि दूसरी तरफ यह भी विश्वास है कि सही गलत तो उस
शक्ति को भी जरूर ही दिखता होगा और ज्यादा दिखता होगा | यही
बात तो है कि मेरिट और मेहनत से ज्यादा आडंबरों को निभाने पर ध्यान है |
तो ट्रेन आ भी गई | प्लेटफॉर्म
और गाड़ी संख्या मिला लेने के बाद भी तीन लोगों से कन्फर्म किया वही ट्रेन तो है !
तीन के दान सत् दान !
बोगी में पहुँचता हूँ | अपनी
सीट तक पहुँचता हूँ | दो- तीन बार सीट नम्बर मिलाता हूँ और फिर झिझकते हुए
सीट पर बैठे व्यक्ति को बताता हूँ कि जिस पर वह विराजमान है वह सीट मेरी है | अच्छा
, आपकी सीट है? उसे
अपने गलत चयन और मेरे पूछ लेने के दुस्साहस पर यकीन नहीं होता | उसे
गिनती करा कर समझाता हूँ कि वह गलत सीट पर है | पर
वाह रे होनी ! अभी बैग रखा भी नहीं था कि एक महिला ने निर्देश दिया - आप , वहाँ
उधर बैठ जाइए | फैमिली साथ है | इससे
पहले कि मैं कुछ समझ पाता, कह पाता साजो-सामान व इंसानों के साथ उन्होंने सीट पर
दाखिल-खारिज कर लिया | मुझे अपनी आँखों से चिंगारियाँ फूटती- सी लगीं , और एक
पल को निगाहें भी मिलीं लेकिन गालिब न वो समझे थे न समझेंगे मेरी बात...!मैं
निर्दिष्ट सीट पर आ गया और यहाँ एक बार और खिसका दिया गया इस ज्ञान के साथ कि सफर
ही तो है कहीं भी बैठ कर कर लो |
बैठते ही सामने लगे बोर्ड पर नजर गई –
हिंदी हैं हम,
वतन है हिंदोस्तां हमारा |
पैसेज में खड़े लोग, सीट
के हत्थों पर टिके लोग, सीट को थ्री बाइ फोर करते हुए लोग | न
किसी से कुछ पूछना, न किसी ने कुछ पूछना |
सहिष्णु देश, सहिष्णु
लोग | हो न हो भगवान जी को याद कराते रहने में रेल का भी
हाथ हो| हे भगवान सही- सलामत यात्रा पूरी करा दाजिए | अभावग्रस्त
देश के अभावग्रस्त लोगों के दर्द पर भगवान ही मरहम लगा सकते हैं! बाकी जिन्होंने
ये जिम्मेदारी ली है वो तो अपनी पुश्तों के लिए इंतजाम करने में लगे हैं |
सामने की सीट पर देश के भविष्य बैठे
हैं | उनकी मूछों की रेघी अभी फूट रही है , उनके
सपनों और हमारी उम्मीदों की | लेकिन उन्हें कुल्ला खिड़की से बाहर फेकने में ये
खयाल तक नहीं कि किसी पर पड़ भी सकता है | सोचा , समझाऊँ
| फिर सोचा, बेटे को समझा पाया हूँ कभी ! चुपचाप खिड़की से बाहर
देखने लगा |
यह एक सूखा घोषित क्षेत्र था | सुबह
का समय था | सुबह के रस में नशा नहीं होता है | नियम
का फायदा उठाने के लिए लोग ताड़ और खजूर के पेड़ों के इर्द- गिर्द जमा थे | यह
सरकार का हठ योग था | बाकी सारी समस्याएँ इस हठ के आगे संठ हो गई हैं |
सरकारें अपना-अपना झुनझुना बजा रही हैं
| अपनी डफली अपना राग कर रही हैं | पब्लिक
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ कर रही है | डेमोग्राफिक
डिविडेंड का भोंपू बज रहा है , मूल शेयर के भाव का ठिकाना
ही नहीं !
रेल चलती चली जा रही है | सारी
कारगुजारियों के साथ, सारी कारगुजारियों के बावजूद |
लोग भी स्थिर, जैसे
डब्बे को हिला- डुला कर आँटे को बैठा दिया गया है | लोग
अपनी चिंताओं, योजनाओं,सपनों और चर्चाओं में मशगूल हो गए हैं | पटरियों
का संगीत छा गया है | इसी तरह देश चलता- बचता रहेगा | भगवान
जी बचा ले जाएँगे| ↑
परफेक्ट बारात
रेस ज़िंदगी की
जैसा कि अक्सर होता है , कितना भी जल्दी-जल्दी करिए, दफ्तर के लिए हमेशा ही देर हो जाती है, इस बार भी हो रही थी ।
यों तो देरी के कितने भी उचित-अनुचित कारण हो सकते हैं, लेकिन असली बात यह है कि देर हो जाती है । मैं देर करता नहीं , देर हो जाती है !
जब देर हो जाती है तो आप तेज़ हो जाते
हैं । कम से कम अपनी ओर से ।
तो मेरी कार भागी चली जा रही थी । कुछ
उसी स्पीड में जैसे कि " ऐसा तो आदमी दोइच् टाइम भागता है, ओलम्पिक
का रेस हो या पुलिस का केस हो "। स्पीड का काँटा मानो आज तो छू ही लेगा आखिरी
बिंदु को ।
स्पीड ज्यादा, खिड़की बंद, एसी चालू, गाना ऑन । देखता क्या हूँ कि आगे एक सवारी गाड़ी है, ठीक आगे । वही वाली गाड़ी जिसमें आगे वाली सीट समानांतर होती है, पीछे वाली लंबवत। खिड़कियों और एसी को तो भूल ही जाइए । खिड़की के नाम पर तिरपाल की तरह के कपड़े की ओट । गाना, पर बाजाबता फ़ुल वॉल्यूम । ये वही गाड़ियां होती हैं जो रोज़ाना कितनी ही ज़िम्मेदारियों, सपनों, मजबूरियों को ढोती हैं । इन गाडियो में बैठे लोगों की आँखें खोई- खोई सी रहती हैं । शायद गाड़ी की चाल का असर, जिसको भी जल्दी रहती है खेप पूरी कर दूसरी खेप शुरू करने की । और रास्ते भर सवारी उतारने, सवारी चढ़ाने की । ऐसी चंद आँखें मिल गईं मेरी आँखों से। भावशून्य पथराई- सी आँखें । शायद उन आँखों में सपनों के जीवित बच पाने की गुंजाइश न बची थी । या फिर वो भयभीत थीं वक्त के बहेलिए से जो आँखों में बसे उम्मीदों के चूज़ों को मारने निकला है । चूँकि गाड़ियाँ खुली थीं, तो खतरा ज़्यादा था ।
और उन आँखों में सवाल भी थे । दो
गाड़ियों के फ़ासले को ख़त्म करने में कितने जन्म लगेंगे ?
फिर वही हुआ जो होता है । जो होना चाहिए । जो सवाल परेशान करने लग पड़ें, उन सवालों को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाना चाहिए । वैसे भी एसी वाले सवाल झरझरिया गाड़ी की सवारी के सवालों से अलग होते हैं । दूसरे, ड्राइवर को एक ही जगह बहुत देर नहीं देखना चाहिए । दुर्घटना हो जा सकती है । वो ड्राइवर जो ड्राइव तो करे गाड़ी पर समझे कि ज़िन्दगी ड्राइव कर रहा है ।
हॉर्न पर हॉर्न । और मेरी कार ने सवारी गाड़ी को पीछे छोड़ दिया । ग़ौर करें कार ने, मैंने नहीं । कुछ उसी तरह जैसे सिस्टम बिगड़ता या बिगाड़ता है । सिस्टम कराता है । सिस्टम फेल करता है । हम नहीं । लेकिन हम ही निमित्त होते हैं । यह बात याद रखने की नहीं आज के जुग में !
गाड़ियों को ओवरटेक करना स्टेटस की बात होती है । कभी किसी लाल-पीली बत्ती वाली गाड़ी को पास देते देखा है ? गलती से कभी उनके आगे पड़ गए तो उनकी खा जाने वाली नज़रों को झेला है ? कभी ट्रक वालों से पाला पड़ा है ? कभी एकदम चकाचक एस यू वी को सर्र से पास करते देखा है ? कभी किसी सिग्नल पर किसी बाइक को लहरा कर आगे निकल जाते देखा है ? बस यही समझिए कि मैंने भी ओवरटेक किया तो इन सब बातों का थोड़ा-थोड़ा बदला ले लिया । बदला लेते रहना चाहिए। खासकर उनसे जो बदला ले सकने की स्थिति में नहीं हों । कतिपय कारणों से । सवारी गाड़ी को सवारी उठाने की चिंता न होती , फिर देखते ! उन पथराई-सी आँखों वालों के हाथ भी अगर एक अच्छी गाड़ी के स्टेयरिंग पर होते, फिर देखते !
आगे बढ़ने पर पन्नियों में जामुन बिकते दिखे । जंगली जामुन । बड़े अच्छे लग रहे थे । लेकिन पहुँचने की जल्दी थी । पीछे छोड़ आगे बढ़ना ही पड़ा । जल्दी पहुँचने की होड़ में हम क्या-कुछ नहीं छोड़ देते हैं ? दाद दीजिए लेकिन अर्जुन जैसी नज़रों की । सिर्फ और सिर्फ जामुन दिखे । उसे बेचने वाले बच्चे नहीं । उनकी स्कूल ड्रेस जैसी मैली- कुचली ड्रेस नहीं । उनके रूखे- से बाल नहीं । कोई सवाल नहीं उठा, न उनके स्कूल जाने का, न उनके पहनने-ओढने का, न उनके स्वास्थ्य का, न उनकी माली हालत का । ये सवाल करना सिस्टम का काम है । और जवाब में आँकड़े देना । मुझे तो जल्दी पहुँचना था । आँकड़े मुझे भी प्रस्तुत करने थे । कितना क्या किया ? कितने तीर मारे? कितने फोटो खिंचाए ? और किससे कितना बेहतर किया । हमेशा ही बड़ा है तो बेहतर है । ज़्यादा है तो बेहतर है । न धर्म कुछ । न न्याय कुछ । न नीति कुछ । न तर्क कुछ । न शिष्ट कुछ । न अशिष्ट कुछ । न श्लील कुछ। न अश्लील कुछ ।
सिस्टम ही ऐसा है !
और मुझे अभी सुनना भी था । हर वक्त आदमी बदला ले लेने की स्थिति में नहीं रहता है । कतिपय कारणों से ! ↑
इतना तो चलता है
एक स्कूल का मुख्य द्वार है । अंदर से बंद किया हुआ ।एक आदमी द्वार के बाहर खड़ा है। साथ में एक बच्ची भी है । कोई 12-12:30 बजे दिन का समय है । आदमी दरवाजा खड़का रहा है खोले जाने के लिए । अंदर से कोई बता रहा है कि समय बीत चुका है, दरवाजा नहीं खोला जा सकता है ।
दरअसल एक प्रवेश परीक्षा आयोजित है । प्रवेश पत्र पर साफ-साफ लिखा हुआ है कि देर से आने वालों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी । परीक्षा का निर्धारित समय 11 बजे का है ।
आदमी समझदार है । वह जानता है कि लिखे हुए का महत्त्व कागज में ही होता है । कागज तक ही होता है । लिखा हुआ कुछ और होता है, किया कुछ और जाता है । समझा कुछ और ही । कोई नियम, कोई कानून, कोई संविधान – सब व्यक्ति कि व्यक्तिगत व्याख्याओं पर निर्भर होता है । उसी से निर्धारित होता है । तो वह आदमी समझता है कि लिखे हुए से कुछ नहीं होता। होगा वही, जो वह चाहेगा ।
दरवाजे का खड़काना और आदमी की आवाज दोनों तेज होने लगे हैं । दरवाजे के अंदर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलने पर आदमी की बेचैनी बढ़ गई है और पारा चढ़ गया है। उसने कहा – खोलना तो पड़ेगा । और उसकी उंगलियाँ मोबाइल पर सक्रिय हो गईं ।
एक
और आदमी जो थोड़ी ही देर पहले आया है , सबकुछ देख-सुन रहा है ।
उसके साथ भी एक बच्चा है । उसको भी परीक्षा देनी है । वह भी देर से आया है । उस
आदमी की उंगलियाँ भी उसके फोन पर फिरने लगी हैं ....।
हमारे देश में फोन न हो, जान-पहचान न हो, पहुँच- पैगाम नहीं हो तो साधारण से साधारण काम भी असाधारण रूप से कठिन हो जाता है । बिजली बिल की गड़बड़ी ठीक करानी हो, सरकारी दफ्तर में जमा अर्जी के बारे में पता करना हो, सरकारी साहब से मिलना हो, बैंक के खाते की प्रविष्टियों के बारे में पता करना हो, उसे ठीक कराना हो , और तो और किसी कस्टमर केयर पर शिकायत दर्ज कराने के बाद उसकी स्थिति ही जानना क्यों न हो ! जान-पहचान नहीं तो बस जै सियाराम ! भगवान ही मदद करें तो कुछ हो !
एक फोन-पहचान निकल आए तो कुछ-न-कुछ राहत तो मिल ही जाएगी ।
तो दोनों आदमी भी राहत पाने की कोशिश में हैं । उनकी गलती है ही क्या ? थोड़ी देर से ही आए हैं न ! इतना तो चलता है । बच्चों का अधिकार है परीक्षा में बैठना जिससे आप उन्हें वंचित नहीं कर सकते हैं । कर्तव्य न तो उनका है कुछ, न उनके अभिभावक का ! आदमी के पास देरी को क्षम्य मानने के सारे कारण हैं – परीक्षा का फॉर्म कहने को नि:शुल्क है , इंटरनेट कैफे में तो बिना पैसे चुकाए कुछ होना नहीं है । और हर घर में कम्प्यूटर की उपस्थिति कोई मान कर चले तो उसकी बुद्धि की बलिहारी है ! अपनी जानकारी के अनुसार किसी दूसरे स्कूल पहुँच गए तो गलती तो किसी की नहीं ही है ! ऑटो वाले ने सवारी के लिए देर करा दी, उसको भी क्या कहा जा सकता है ! जब हर जगह थोड़ा-बहुत एडजस्ट करने की गुंजाइश है तो परीक्षा में थोडी देर ,यही घंटे भर , से बैठने की अनुमति देने में क्या है !
आदमी
फोन भी लगाए जा रहा था और दरवाजा भी खड़काए जा रहा है ।
आखिर
स्कूल परिसर में तैनात सशस्त्र बल के सदस्यों को आ कर समझाना पड़ा । लाठी-बंदूक-पद
में बहुत बल होता है ! दिखा देने भर से असर हो जाता है ।
उस
आदमी के साथ बल ने वहाँ बच्चों के इंतज़ार में खड़े सभी अभिभावकों को भी समझा दिया
है । यानी कि सभी को हटा दिया गया है, कोई भी द्वार के निकट
खड़ा नहीं रह सका । सारे बल कभी-कभी ही नियमों को सब पर एक समान लागू कर पाते हैं !
खास तौर पर जब उनसे बड़ा कोई वी.आइ.पी उपस्थित न हो तब !
सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि विद्यालय परिसर में , प्रवेश-परीक्षा के लिए या ऐसे भी, सशस्त्र बल की उपस्थिति क्यों आवश्यक है ?
जवाब
यह भी दिया जा सकता है कि हर छोटी-बड़ी जगह पर ट्रैफिक को सुचारु रखने के लिए
एक-न-एक सिपाही क्यों चाहिए? बस वैसे ही ।
थोड़ा-सा विषयांतर करते हुए यह पूछा जा सकता है कि सुरक्षा-बलों के ठहरने के लिए स्कूलों की इमारतों का अधिग्रहण क्यों कर लिया जाता है ? बच्चों को क्लास-रूम से बाहर बैठने पर क्यों मजबूर कर दिया जाता है ?
जवाब
यह दिया जा सकता है – स्कूलों में ऐसे ही कौन सी पढ़ाई होती है ? !
दोनों
आदमी यही तो समझ रहे हैं कि जब सबकुछ में ‘ चलता है’ , ‘ कुछ होने न
होने से से फर्क नहीं पड़ता है’ तो एक-दो बच्चों को परीक्षा में देर से बैठने की
अनुमति दे देने से क्या हो जाएगा ?!
लेकिन
नियम-कानून कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं तो माने जाने चाहिए । लोगों की आस्था व्यवस्था
में बनी रह जाती है !
इस
गैर-जरूरी से काम, शिक्षा-प्रवेश-परीक्षा आदि से संबंधित, में लागू होना
ही चाहिए ,
खास
तौर पर जब किसी वीआइपी पर इसका असर न पड़ रहा हो !
और
उन दो आदमियों को भी क्या और क्यों समझाया जाए ? पूरे केंद्र पर
दो ही लोग तो देर से पहुँचे थे , जिसको देर कहा जा सके । इतना तो चलता है । दो
बच्चों के बैठ जाने से क्या फर्क पड़ जाता है? वे कम-से-कम एक जिम्मेदारी निभा तो लेंगे !
लेकिन
यही छोटी-छोटी बातें तो हमारे और देश के चरित्र को भी निर्धारित करती हैं, यह भी बात तो
है ही ! गलत को सही संतुलित नहीं कर रहा है । गलत को गलत ही संतुलित कर रहा है ।
बात तो यह है !! ↑
टोकना मना है
मुख्य
सड़क से कॉलनी को मिलाने वाली एक सड़क है । चौड़ी इतनी ही कि दो गाड़ियाँ आ जाएँ तो
बहुत संभल कर निकलना होता है । ऐसी सड़क पर एक भारी-भरकम मोटरसाइकिल साइड स्टैंड पर
टिकी है । बीच सड़क पर तो नहीं, पर जितनी किनारे होनी चाहिए उससे बहुत कम । बाइक
स्टैंड पर,
और
उससे टिक कर खड़ा हुआ एक नवयुवक । फैशन में बढ़ी हुई दाढ़ी और फैशन में कटे हुए
डिजाइनदार केश । उसकी टी शर्ट का रंग वही है जो अभी-अभी चुनाव जीती पार्टी के झंडे
का है । वही रंग नंबर प्लेट पर भी । ऐसे रंगों के खिलने का यही मौसम होता है । रंग
तय कर देता है आप कैसा व्यवहार करेंगे या आपसे कैसा व्यवहार किया जाएगा । लोग ऐसे
रंगों से भिड़ते नहीं हैं, बच कर निकल जाते हैं । बुद्धिमता इसी को कहते
हैं । ट्रैफिक पुलिस वाले भी अक्सर ऐसे रंग वालों को देखने की बजाय इधर-उधर देखना
पसंद करते हैं ।
सही तो है – कहाँ-कहाँ टोकिएगा । साहिर ने कहा तो है न – “ आजकल किसी को वो टोकता नहीं, चाहे कुछ भी कीजिए रोकता नहीं” । समझिए ये ‘वो’ कौन है – भगवान है, सरकार है, हाकिम है और आप भी हैं ! “ हो रही है लूटमार , फट रहे हैं बम” – फिर भी कोई टोकता, रोकता नहीं है । टोकना, रोकना चाहता नहीं है । टोकना, रोकना संभव नहीं है दरअसल ।
सड़कों पर गाड़ी बेतरतीब लगे, दफतरों में साहब देर से आएँ, शिकायतों पर कोई सुनवाई न हो, स्कूलों में पढ़ाई न हो, अस्पतालों में दवाई न हो – कहीं किसी को टोकना नहीं है । टोकने का असर टोके जाने वाले पर तो खैर क्या होगा , टोकने वाले पर ही हो जाता है । जैसे प्रशंसा से आप किसी को भी जीत सकते हैं , वैसे ही किसी को अनदेखा कर आप उसको हरा सकते हैं पूरी तरह । आस-पास नजर दौडा कर देखिए लोग कैसे बातों की अनदेखी कर बातों को मार देते हैं । दरअसल, जब हर आदमी ही सबसे बड़ा ज्ञानी हो तो दूसरे की कौन सुने ?
नवयुवक भी सबसे बड़ा ज्ञानी ही है । खासकर तब जब वह सत्ताधारी पार्टी का घोषित समर्थक भी हो । प्रशासन सत्ता की सेवा के लिए है । सत्ता दल के सदस्यों और समर्थकों की होती है । तो प्रशासन का दल के सदस्यों और समर्थकों का सेवा करना सिद्ध हुआ ! वैसे यह बात तो ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ को चरितार्थ करने वाली है ।
सामाजिक स्तर पर भी चूँकि शरीफ और समझदार लोग बच कर चलने में और मौके पर बगलें झाँकने में विश्वास रखते हैं, नवयुवक निश्चिंत भाव से अपने में मगन है । वह जानता है , जब तक एकदम ही व्यक्तिगत नुकसान न पहुँचाए , कोई भी व्यक्ति उसको कुछ कहेगा नहीं दृढ़तापूर्वक । और व्यक्तिगत नुकसान भी किसी ऐसे व्यक्ति का हो रहा हो जिसका कुछ-न-कुछ हित नवयुवक द्वारा सधता हो तो वह जानता है कि हित ही सबसे ऊपर रहता है !
बाइक वैसे ही लगी है । नवयुवक वैसे ही टिका है । मोबाइल वैसे ही चालू है । लोग वैसे ही खुद-ब-खुद बगल हो कर निकल रहे हैं । और सड़क की यह स्थिति तो एक प्रतीक भर है देश-समाज-काल का ! ↑
एक टिपिकल पिता ...
आज उन्होंने अपने लड़के को पकड़ लिया था । यों तो उनकी उम्र के पिता द्वारा इस उम्र के बेटे को पकड़ पाना मुश्किल ही होता है, पर आज उनको मौका लग ही गया था । वे बेटे को समझा रहे थे –“ प्लस टू बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है । बारहवीं में तो खास ध्यान देने की जरूरत है । हमारे समय में तो इतने सारे विकल्प नहीं थे, पर अब तो बहुत कुछ किया जा सकता है । और इसके लिए जरूरी है कि प्लस टू अच्छे से पास किया जाए । साल भर मेहनत करने की जरूरत है बस ! रोज 1-2 घंटे भी नियम से पढ़ोगे तो तुम्हारे जैसे लड़के को कोई रोक नहीं सकता है” । वे एक अच्छे, जिम्मेदार पिता की तरह बात कर रहे थे । बेटा भी एक योग्य बेटे की तरह तन्मयता से सुन रहा था और पिता की हर बात में हामी भर रहा था । साथ में यह याद भी करा रहा था कि अब तक तो अच्छा करता आया है । आगे भी करेगा । वे उसे फिर भी समझा रहे थे कि वो सब ठीक है , पर प्लस टू से ही कैरियर के रास्ते खुलते हैं । बस साल भर की तो बात है । एक बार सही लाइन पकड़ ली फिर सब ठीक है ।
वे
शायद भूल रहे हैं कि उनका बेटा जिस उम्र में है वो पिता की हर बात को उलट देने
वाली उम्र है । और उनकी जो उम्र है वो अपनी हर बात को अपनी उम्र के हवाले से सही
मनवाने वाली उम्र है । उम्र के हवाले से और आवाज़ के ज़ोर से ।
आज का कवि सम्मेलन
थोडे
कम वरिष्ठ कवि ने पूरे सत्र की कविताओं का विश्लेषण कर दिया है । थोड़ी तारीफ, थोड़ी सीख, थोड़े उदाहरण, थोड़े उद्धरण ।
और अंत में अपनी किताब खोलकर उसमें से कुछ पंक्तियों का पाठ ।
उसकी
होली
होली आई । हर बरस
की तरह इस बरस भी । और होली चली गई । पिछले कुछ सालों से तो होली भिंगाती भी नहीं
है । होली मिलने-मिलाने का त्योहार होती थी । शायद अब भी हो कहीं-न- -कहीं ! होली
का आना तो वही रहा है, होली का होना कम होते जा
रहा है । कुछ तो ग्लोबल वार्मिंग और पानी के कम होने की समझ होने के कारण,
कुछ रिश्तों के ठंडे पड़ जाने और आँखों में पानी खत्म हो जाने के
कारण । इस बरस कोरोना वायरस ने भीड़-भाड़ से बचने की एडवायजरी घोषित करवा कर काम को
और आसान करवा दिया है । आदमी को अपनी जान कितनी प्यारी होती है,
इस बात से समझ में आ जाता है । वरना किसी धरने,
प्रदर्शन, सभा,
जुलूस , यात्रा-
किसी को भी रोकने की कोशिश की बात भी कर के देख लीजिए, लोग
आपकी लानत-मलामत न कर दें तो फिर कहिए !
क्रम- भंग : हौसला बनाए
रखिए
पिछ्ले
कुछ दिनों से,
देख
रहा हूँ,
कोयल
लगातार बोल रही है । बोलती तो वह हर बरस होगी, मगर इस बरस
मुझे लग रहा है कि कुछ ज्यादा ही बोल रही है । कोयल बोल रही है दूर से, पास से । और
कोयल की कूक का मन की हूक से कुछ न कुछ संबंध है जरूर । और भी चिड़ियों की आवाज़ें
सुन पा रहा हूँ , जो अमूमन सुनने में नहीं आती । वसंत तो है । आम भी बौराए हैं। चैत चढ़ चुका है । होली जा चुकी है । समय तो कोयल के गाने का ही है । ऐसा क्यों
लग रहा है कि कोयल गा तो रही है, पर वह खुद से ही बातें भी कर रही है । क्या वह
अकेलेपन से घबराई हुई है ? अपने आस-पास के
सन्नाटे से चकित है ? समय कोरोना का भी है । कठिन समय ।
एक अनदेखा , अजाना शत्रु और उसका भय ! सारी दुनिया चपेट में है । ऐसा क्यों हुआ , यह शोध का विषय है और शोध हो भी रहे हैं । लेकिन अब जो होना है और जो होगा, वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है । कोरोना और उसके भय के क्रम को भंग करने के लिए यथासंभव बल्कि उससे भी ज्यादा प्रयास आवश्यक हैं और किए भी जा रहे हैं । इस दौर के बाद दुनिया वही नहीं रहेगी , बदल चुकी होगी । उसे बदलना ही चाहिए । उसे बदलना ही होगा।
कम कितना कम हो सकता है वह तय है – यानी कि शून्य , एकदम नहीं होना । मगर कितना ज्यादा ,ज्यादा होगा उसकी कोई सीमा नहीं है । क्षमता और सोच ज्यादा को ज्यादा बनाती है । इस दुनिया में जीने का हक तो सबको समान होना चाहिए । लेकिन ऐसा रहा नहीं है । ऐसा रहने नहीं दिया गया है । सामर्थ्य की सीमा तय करती है कि जीने का किसको कितना हक है । राज कपूर की फिल्म “आवारा” में एक संवाद है – “ इस अदालत के ऊपर भी एक अदालत है” । और वो अदालत है । आज सभी लोग एक भय से एक समान ही डरे हुए हैं । हाँ, यह जरूर है कि जिनके पास महीने भर का राशन जमा है वो थोड़ा निश्चिंत हैं । लेकिन मन ही मन वो यह भी जनते हैं कि ‘तक्षक’ कहीं भी , किसी भी वेष में पहुँच सकता है । हमको अपने जीने का तरीका बदलना ही होगा ।
राशन की दुकानों पर, दूध के बूथों पर, दवा की दुकानों में, सब्जी बेचने वालों के यहाँ भीड जरूर है । पर कब तक ? हम अपनी क्षमता के अनुसार जीने के प्रयास में हैं । कहीं जरूरत भर, कहीं जरूरत से ज्यादा भी । सब्जी वालों के चेहरों पर भाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं “ महीना कैसे बीतेगा ? सब्जियाँ पड़ी-पड़ी कुम्हला जाएँगी । आज जो थोड़ी- बहुत भीड़ है , समय बीतने के साथ खत्म होगी ही । तब उनका क्या होगा ?!”
हाथ में कुदाल-टोकरी लिए हुए इक्का-दुक्का लोग अब भी चौराहे पर आ गए हैं । इस उम्मीद में कि ऐसे में भी उनके चूल्हे की आग का इंतजाम हो जाएगा ।
बाकी सारी चीजें ठप हों तो जीवन को जीवंत रखना बहुत कठिन है । भय की छाया साफ-साफ है । इस बेमौसम के मौसम की तरह भय के बादल रह-रह कर घुमड़ रहे हैं । बरस भी रहे हैं ।
डर से डरना और भी डरा देता है । भय तो कुत्ता है । उसके सामने दम साधे चलते रहिए । जैसे ही आप डरे , डर कर दौड़ पड़े कि वो भी लपकेगा आपके पीछे । काट भी ले कहीं !
चैत का महीना है । प्रकृति में बदलाव का समय है । बादल अगर आएँगे भी तो टिकेंगे नहीं बहुत । यह माना जाए कि कोयल जो लगातार गा रही है , वह यही बता रही है – “ यह भी बीत जाएगा” । कोयल की आवाज जो दूर-दूर तक सुनाई दे रही है वो भी इसलिए कि अपने अंदर की ऊष्मा को बनाए रखिए । उसके संग-संग आप भी गाइए-गुनगुनाइए । कम-से-कम उसे सुनिए तो सही । ठंढे पड़ चुके दिलों में भी लौ जगा रही है । कोयल अपने अकेलेपन से नहीं घबराई है , वो हमारे , हम सब के मन की उदासी को भगाने के लिए ही गा रही है । कुछ ज्यादा ही शायद । देखिए न , इस कठिन समय में भी कोयल गा रही है । कोयल का गाना प्रेम का प्रतीक भी है । प्रेम हौसले का आधार होता है । हम भी तो हौसला बनाए रखें। ↑
क्रम- भंग 2 : मन को
मनाए रखिए
आज कोरोना के पॉज़िटिव केसों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती हुई दिख रही है । यों तो एक अप्रैल मूर्ख बनाने का दिन है । और मन चाह भी यही रहा है कि यह खबर भी अप्रैल फ़ूल बनाने का तरीका हो । लेकिन नहीं ! खबर सही है । मजाक तो है लेकिन एक क्रूर मजाक-सा । ‘सिलसिला’ फिल्म के गाने को थोडा उलट कर याद कर रहा हूँ “ कि जबकि मुझको भी ये खबर है कि तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो / ये दिल है कि कह रहा है तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो” । मन को मनाए रखना है । मैंने कई बार , अलग-अलग समय में, अलग-अलग प्रसंगों में सोचा है कि हमारा देश एक ‘ डायनमिक इक्वीलिब्रियम’ में रहता है । लगता है कि अब गिरा कि तब गिरा ! पर गिरता नहीं है । इस बार भी मन कह तो रहा है – गिरेगा नहीं ! भारत शायद विषम परिस्थितियों में उबर आने का नाम है ।
गलियों, सड़कों पर सहमा हुआ सन्नाटा है ।
‘आनंद विहार’ में जमा हजारों-लाखों लोगों मजदूरों की तस्वीरें आती हैं । आप विचलित हो उठते हैं । बेबसी झल्लाहट में तब्दील होने लग जाती है । ‘मरकज़’ के गैरजिम्मेदार व्यवहार की खबरें आती हैं । आपका गुस्सा कसैला होने लगता है ।
एक अजाने, अनजाने भय को मारने में कोई युक्ति काम नहीं करती जल्दी । बीमारी से बड़ा उसका भय होने लगा है। भय का ईलाज यही है कि भय न करें । सावधान रहने और भयभीत होने में बहुत ही महीन लेकिन गंभीर फर्क है। भय के फैलने की गति वायरस के फैलने की गति से कई-कई गुणा ज्यादा होती है ।
यह मान कर चला जाए कि जो जहाँ है, जैसा है परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है ।
कमरे में रखी किताबों पर नजर जाती है । गीतकार शैलेन्द्र पर आई किताब ‘धरती कहे पुकार के’ पर नजर गई है । शैलेन्द्र के अनेक गीत याद आ गए हैं बरबस । मन हरा होता है थोड़ा । उनके एक प्रार्थना-गीत की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं –“ तुम्हारे हैं तुमसे दया माँगते हैं / तेरे लाड़लों की दुआ माँगते हैं” । मन मन ही मन ऊपर वाले ‘बिग बॉस’ को याद कर लेता है – “ ‘बिग बॉस’ चाहते हैं कि आप संयम से काम लें, मन को शांत रखें । डरें बिल्कुल नहीं” ।
यू ट्यूब पर ‘दि लल्लनटॉप’ का एक वीडियो खुला है – “ सौरभ द्विवेदी नाम है हमारा और आप देखना शुरु कर चुके हैं ‘ दि लल्लनटॉप’” । मन थोड़ा और टनमना जाता है । और जैसे अभी के हालात को कह रहा है ‘ हम भी हैं, तुम भी हो , दोनों हैं आमने -सामने’ ।
मन ! ‘मन समझते हैं न आप’!!
ऐसा बहुत बार हुआ होगा कि आप दिनों, महीनों तक अकेले, अलग-थलग रहे हों, लेकिन वो समय भी पार हो ही जाता है । इस बार के ‘अलग’ रहने में शायद यह भाव अंतर्निहित हो गया है कि ‘ कल हो न हो’ !!
जाने कितनी बातें याद आने लगी हैं । कितनी घटनाएँ याद आने लगी हैं । कितने दोस्त याद आने लगे हैं । और मन में यह संकल्प सा भी बनने लगा है कि तोड़ना कुछ नहीं है । छोड़ना कुछ नहीं है । इस ‘समय’ के पार जब दिन निकलेगा , भले ही थोड़ा कठिन हो, हमको , हमारे रिश्तों को और मजबूत कर के निकलेगा । हम ‘बही’ नहीं लिखते रहेंगे , हम ‘ ज़िंदगी का साथ निभाते’ चलेंगे ।
समय किसी के रोके नहीं रुकता है । यह समय भी नहीं रुक रहा । जीवन अपनी ही चाल से चलता है । हम सबका समय निश्चित है । देखना ये है कि हमारी ज़िंदगी लम्बी जितनी हो सो हो, बड़ी कितनी होती है ?– ‘ बाबू मोशाय ! ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए , लम्बी नहीं’ ।
हम इसे एक नए युग के सूत्रपात की तरह देखें । आने वाला समय हम ‘ साथी हाथ बढ़ाना’ के अंदाज में बिताने के लिए खुद को तैयार करते चलें । जन्म, काल , स्थान ये सभी संयोग की बातें हैं । इन सब के परे चले जाना ही मोक्ष है । मोक्ष इसी जीवन में है, इससे बाहर नहीं ।
लेकिन सब होगा कैसे ?
वही ! मन !
‘मन समझते हैं न आप’?
मन को मनाए रखिए । बस ।
मन तो हो रहा है ‘इस्स...’ कह दें !! ↑
क्रम- भंग 3 : अच्छी
चीज़ों का देखा जाना ज़रूरी है
मेरे
घर के सामने एक घर है । घर के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है । कोरोना ने शायद शहर में
गुजारा कर पाना मुश्किल कर दिया होगा । लोग गाँव चले गए होंगे । और ठीक होंगे । जो
जहाँ हैं,
वहीं
रहें ;
ठीक
रहें ! उसी घर में बेटे का एक दोस्त भी रहता है । शुरुआती दौर में बेटे से उसके
दोस्त के बारे में पूछा भी । अब न तो मैं कुछ पूछता हूँ, न वो कुछ कहता
है । कोरोना ने जीवन के कई पहलू उलट-पलट दिए हैं ।
छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाँहों भर विस्तार
हारा हुआ आदमी
सब्जी
की दुकान है । लॉक डाउन है । और न हो तो भी । वे लगे हुए हैं सब्जियाँ उठाने में, पसंद करने में
। सारी की सारी पसंद कर ली जाएँ तब तुलें न ! वे इस भाव से लगे हैं कि दुनिया आज
खत्म होने ही वाली है । कम-से-कम सब्जियों के लिए तो जरूर ।
और भी लोग लगे हैं लाइन में । ज्यादातर लोग लाइन में लगे रहने के लिए ही बने होते हैं। मगर कुछ ऐसे भी होते हैं जो मजबूरी में ही लाइन लगते हैं । मजबूरी, कभी-कभार ही सही, आ ही जाती है । आज भी है । बढ़ती हुई धूप के साथ उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है । कहीं दुकान बंद न हो जाए ! कहीं सब्जियाँ खत्म न हो जाएँ ! दुकान वाला बीच-बीच में ‘मोरल साइंस’ भी पढ़ा रहा है – लाइन से ! दूरी बना के ! हालाँकि ये कोई अलग से सिखाने की बात नहीं है । पर हमारा देश ऐसा ही है । जोर से समझाइए । जोर दे कर समझाइए, तभी समझते हैं लोग । कुछ लोग फिर भी नहीं समझते । इसीलिए हमारे यहाँ पुलिस बड़े काम की चीज है । आज भी । पुलिस वालों के डर से और उनके ही दम से तो दुकानदार ‘मोरल साइंस’ पढ़ा रहा था । वरना सुनता कौन ? जो जहाँ खड़ा हो जाता है, लाइन वहीं से शुरू हो जाती है !
एक भाई साहब बीच में घुस पड़े हैं लाइन के । उनको कुछ नहीं लगता – न नियम, न रोग ! न ही कोई रोक-टोक ! हेल्मेट जो पहने हैं ! अव्वल तो हमारे यहाँ समय रहते टोकने की प्रथा है नहीं , फिर जब तक पता चलता है, तब तक तो सामने वाला आधा काम निपटा भी चुका होता है । हेल्मेट वाले भाई साहब ने बास्केट उठाया, फटाफट सब्जियाँ चुनीं दुकान वाले को बढ़ा दिया । पीछे से भुनभुनाहट हुई भी । उन्होंने समझा दिया बस 2-3 सब्जी ही तो है! दुकानदार ने भी कहा – इनको जल्दी से निपटा लेते हैं । फिर एकदम लाइन से ! हल्ला-गुल्ला होगा तो.... और दूर खड़े पुलिस वाले की ओर देख लिया । ऐसे समय पर लोग समझदार हो उठते हैं । सब चुप रहे । ट्रैफिक जाम में कैसा होता है – जो जबरन ओवरटेक कर के आगे बढ़ जाता है, उसी के लिए जगह निकलवा कर ट्राफिक शुरु भी किया जाता है अक्सर !
अब एक हेल्मेट वाले थे । और एक बड़े वाले, जो निश्चिंत भाव से सब्जियाँ पसंद किए जा रहे थे ।
पीछे थोड़ी दूर पर उद्घोषणा हो रही थी – अत्यंत आवश्यक होने पर ही निकलें । दूरी बनाए रखें । ‘इसेन्शियल’ कार्यों के लिए ही निकलें ।
कई बार आपने देखा होगा, सड़क छेक कर चलते लोगों पर गाड़ियों के हॉर्न का रत्ती भर भी असर नहीं होता । वे यह मान कर ही चलते हैं , हॉर्न किसी और के लिए ही बजाया जाता है, उनके लिए नहीं । उद्घोषणाओं और चेतावनियों का भी हश्र होता है – दूसरों के लिए की जाती हैं ।
बड़े वाले का पसंद करना हो चुका था । उसको देखकर सहज ही यह सवाल उठना चाहिए कि क्या कारण है, इतने -ऐसे का ? - - भय, आशंका, शंका, लोभ, पैसा.....?? लेकिन सवाल उठा नहीं। उठता नहीं ।
दरअसल ऐसा आदमी मनुहारों, फटकारों और आदतों के सामने लाचार होता है । और जब सारी की सारी शक्तियाँ लगी हों तब तो आदमी बस निमित्त मात्र बन कर करने लग जाता है – न समझना कुछ, न समझाना कुछ, न शोक, न चिंता, न संतोष, न लाज, न लिहाज -- बस करने लग जाता है । हर तरफ से बँधा हुआ, लाचार, हारा हुआ !!
मैंने अपने आगे वाले भाई साहब को आगे बढ़ने और थोड़ा जल्दी करने के लिए कहा । मेरे दोनों हाथों के झोले भी अब खुल चुके थे । ↑


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