मुदा देख रहा हूँ




मुदा देख रहा हूँ

[ व्यंग्य-निबन्‍ध-संग्रह]

अनुक्रम : ( किसी खास निबन्‍ध पर जाने के लिए निबन्‍ध-शीर्षक पर क्लिक करें, वापस ऊपर आने के लिए निबन्‍ध के अंत में ↑ चिह्न पर)

1.       भगवान जी बचा ले जाएँगे  2.       परफेक्ट बारात   3.       रेस ज़िंदगी की    4.       इतना तो चलता है            5.       टोकना मना है    6.       एक टिपिकल पिता   7.       आज का कवि सम्मेलन   8.       उसकी होली     9.       क्रम भंग: हौसला बनाए रखिए  10.  क्रम भंग 2: मन को मनाए रखिए   11.  क्रम भंग 3: अच्छी चीजों का देखा जाना  जरूरी है  12.  हारा हुआ आदमी                                                 


 भगवान जी बचा ले जाएँगे

स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है | आवश्यकता आविष्कार की जननी है| या फिर रैप सॉन्ग मैं चाहे ये करूँ , मैं चाहे वो करूँ मेरी मर्जी| ये सारे के सारे कथन भारतीय रेल के सफर के दौरान ही पाए गए होंगे | नि:संदेह |

जीवन के सत्यों से साक्षात्कार करते रहने के लिए भारतीय रेल का सफर जरूरी है | नॉन एसी हो तो बेहतर , अनरिजर्वड् हो तो और भी अच्छा | और बगैर रिजर्वेशन , रिजर्वेशन वाले डब्बे में हों तो कहना ही क्या ! तो नियति ने जोर मारा और मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ ऐसी ही एक यात्रा का |

नियत समय पर स्टेशन पहुँचा लेकिन ट्रेन आएगी कि नहीं उसके लिए बार- बार आसमान की ओर देखा | ज्यादातर मामलों में ऊपरवाला ही याद आता है | प्लेटफॉर्म पर अभी तक मंदिर की व्यवस्था नहीं है, वरना टीका-घंटी तो हो ही सकता था | धर्म की आस्था इस तरह कूट- कूट कर भरी हुई है कि यह लिखते भी डर हो रहा है, जबकि दूसरी तरफ यह भी विश्वास है कि सही गलत तो उस शक्ति को भी जरूर ही दिखता होगा और ज्यादा दिखता होगा | यही बात तो है कि मेरिट और मेहनत से ज्यादा आडंबरों को निभाने पर ध्यान है |
तो ट्रेन आ भी गई | प्लेटफॉर्म और गाड़ी संख्या मिला लेने के बाद भी तीन लोगों से कन्फर्म किया वही ट्रेन तो है ! तीन के दान सत् दान !

बोगी में पहुँचता हूँ | अपनी सीट तक पहुँचता हूँ | दो- तीन बार सीट नम्बर मिलाता हूँ और फिर झिझकते हुए सीट पर बैठे व्यक्ति को बताता हूँ कि जिस पर वह विराजमान है वह सीट मेरी है | अच्छा , आपकी सीट है? उसे अपने गलत चयन और मेरे पूछ लेने के दुस्साहस पर यकीन नहीं होता | उसे गिनती करा कर समझाता हूँ कि वह गलत सीट पर है | पर वाह रे होनी ! अभी बैग रखा भी नहीं था कि एक महिला ने निर्देश दिया - आप , वहाँ उधर बैठ जाइए | फैमिली साथ है | इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, कह पाता साजो-सामान व इंसानों के साथ उन्होंने सीट पर दाखिल-खारिज कर लिया | मुझे अपनी आँखों से चिंगारियाँ फूटती- सी लगीं , और एक पल को निगाहें भी मिलीं लेकिन गालिब न वो समझे थे न समझेंगे मेरी बात...!मैं निर्दिष्ट सीट पर आ गया और यहाँ एक बार और खिसका दिया गया इस ज्ञान के साथ कि सफर ही तो है कहीं भी बैठ कर कर लो |

बैठते ही सामने लगे बोर्ड पर नजर गई –

हिंदी हैं हम,

वतन है हिंदोस्तां हमारा |

कुछ संगत नहीं बैठा पाया | हो न हो किसी राजभाषा अधिकारी के अधिकृत ज्ञान का नतीजा होगा , जिसमें थोड़ी ड्यूटी पूरी करने की जबरदस्ती, थोड़ी बड़े साहब की चापलूसी और थोड़ी बोर्ड बनवाने से उत्पन्न होने वाली कमीशन मिली होगी |
गाड़ी अपना धर्म बचाते हुए, निभाते हुए तीन मिनट की देरी से चली | जितनी सीटें उससे दुगने लोग कम से कम | भारतीय रेल दुधारु गाय है, कम दुहाने पर तबीयत खराब हो जाएगी !

पैसेज में खड़े लोग, सीट के हत्थों पर टिके लोग, सीट को थ्री बाइ फोर करते हुए लोग | न किसी से कुछ पूछना, न किसी ने कुछ पूछना |

सहिष्णु देश, सहिष्णु लोग | हो न हो भगवान जी को याद कराते रहने में रेल का भी हाथ हो| हे भगवान सही- सलामत यात्रा पूरी करा दाजिए | अभावग्रस्त देश के अभावग्रस्त लोगों के दर्द पर भगवान ही मरहम लगा सकते हैं! बाकी जिन्होंने ये जिम्मेदारी ली है वो तो अपनी पुश्तों के लिए इंतजाम करने में लगे हैं |

सामने की सीट पर देश के भविष्य बैठे हैं | उनकी मूछों की रेघी अभी फूट रही है , उनके सपनों और हमारी उम्मीदों की | लेकिन उन्हें कुल्ला खिड़की से बाहर फेकने में ये खयाल तक नहीं कि किसी पर पड़ भी सकता है | सोचा , समझाऊँ | फिर सोचा, बेटे को समझा पाया हूँ कभी ! चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगा |

यह एक सूखा घोषित क्षेत्र था | सुबह का समय था | सुबह के रस में नशा नहीं होता है | नियम का फायदा उठाने के लिए लोग ताड़ और खजूर के पेड़ों के इर्द- गिर्द जमा थे | यह सरकार का हठ योग था | बाकी सारी समस्याएँ इस हठ के आगे संठ हो गई हैं |

सरकारें अपना-अपना झुनझुना बजा रही हैं | अपनी डफली अपना राग कर रही हैं | पब्लिक यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ कर रही है | डेमोग्राफिक डिविडेंड का भोंपू बज रहा है , मूल शेयर के भाव का  ठिकाना ही नहीं !

रेल चलती चली जा रही है | सारी कारगुजारियों के साथ, सारी कारगुजारियों के बावजूद |
लोग भी स्थिर, जैसे डब्बे को हिला- डुला कर आँटे को बैठा दिया गया है | लोग अपनी चिंताओं, योजनाओं,सपनों और चर्चाओं में मशगूल हो गए हैं | पटरियों का संगीत छा गया है | इसी तरह देश चलता- बचता रहेगा | भगवान जी बचा ले जाएँगे|     

  

परफेक्ट बारात


बड़े संजोग से एक परफेक्ट बारात में शरीक होने का मौका मिला । आप ही सोचकर देखिए, आजकल ऐसी बारात का सौभाग्य कहाँ प्राप्त होता है कि बारात हो, देर से लगे, ,जनवासा हो, हुल्लड़बाजी हो, मार-धाड़ हो, थाना-पुलिस हो । है न एकदम परफेक्ट?

तो शुरू से सुनाता हूँ –

गरमी अभी पूरी खिली नहीं थी । पर इतनी तो हो ही चुकी थी कि दिनभर के दफ्तर के थके-माँदे कपड़े-जूतों को बदल कर सैंडल और जीन्‍स में आ जाया जाए । दफ्तर के साहब को दफ्तर में ही छोड़ना अच्छी बात होती है, पर जो खून में उतर आई हो बात उसका क्या करें ? कम से कम रंगाए जोगी कपड़ा.....!

शाम घिरने के बाद और रात के जवान होने से पहले का समय था । मेरे साहब, मैं और कुछ और लोग बारात में शामिल होने निकले । नहीं, मैं भी साहब हूँ, पर असली साहब तो बड़े साहब ही होते हैं ।  हम लोग दफ्तर वाले थे , सो अलग से पहुँचे । हर्ड मेंटेलिटि । पर बारात अभी पहुँची नहीं थी । हमलोग भी वैसे देर से ही थे, पर वो बारात भी बारात क्या जो देर के भी देर से न पहुँचे! दरवाजे के पास कुछ देर मंडराने के बाद एक ऐसे सज्जन को ढूँढा गया जो हमारे ओहदों से वाकिफ़ हो और जो हमलोगों को ससम्मान यथास्थान बैठा दे ।

जनवासा जनवासे जैसा था । जनवासा, जहाँ बारात फाइनल जुलूस के पहले देह-हाथ सीधे करती है, सजती-संवरता है,अल्पाहार और पसंद के हिसाब से पेय पदार्थ लेती है । यह पेय पदार्थ ही बारात को बारात बनाता है। अभी कुछ इलाकों में बारात बारात बन ही नहीं पा रही। कुछ लोगों ने कोशिश की थी, धरा गए । भीतर हो गए । खैर ।

एक घर- जैसा कम्युनिटि हॉल या कम्युनिटि हॉल- जैसा घर । बाहर खुले में लगी हुई प्लास्टिक की कुर्सियाँ । हम विराजमान हो गए । बारात पहुँची नहीं थी । चूँकि हम साहब लोग थे, जलपान चला दिया गया । एक लड़के के हाथ में भरा हुआ जग, एक के हाथ में गिलास । गिलास पकड़ा कर पेय पदार्थ ढाला जाने लगा । किसी ने पूछा क्या है? बाँटने वाले लड़के ने कहा पता नहीं । वाह, क्या बात ! युग के युवा तुझे कुछ नहीं पता ! आचार्य विनोबा ने भी बताया था तत: किम् वाला किस्सा । अभी तक हमारे नौजवानों को पता नहीं चला है तत: किम् ? चखने पर पता चला बहुत ही मीठी ठंढई जैसी चीज थी । फिर नाश्ते के पैकेट चले। टिपिकल बारात वाले पैकेट ।

हँसी-ठिठोली चल रही थी । चुटकुलों का दौर चल रहा थ । कुछ अपने पर हँस के जग को हँसाया जैसा भी ।  बड़े साहब को गुड ह्यूमर में रखा जाना पहली प्राथमिकता होती है । बड़े साहब हों तो मसखरे जैसा बने रहिए । साहब गुड ह्यूमर में रहें तो आशीर्वाद फलता है ।

साहब मतलब बड़े साहब । बाकी साहब कोई साहब थोड़े ही होते हैं ! साहब वो जो सबसे देर से आए। जिसको सब नमस्कार-प्रणाम करें और जो सिर्फ मुंडी हिला दे । हाथ मिला ले तब तो बहुत ही ज्यादा । हाथ भी सबसे न मिलाए । एक-दो से मिलाए, बाकियों को देख भर ले। जैसे बता दे कि देखो हाथ ऐसे मिलाते हैं....नेक्स्ट दाइम ! साहब, जिसको बैठने को सबसे पहले कुर्सी दी जाए । पीने को सबसे पहले पानी दिया जाए । नाश्ते के पैकेट का जिससे लोकार्पण कराया जाए । जिसकी कुर्सी के इर्दगिर्द अनुगृहीत लोगों की टोली खड़ी हो; चाटुकार व्यावहारिक शब्द है । साहब, जिसके लिए खाने की प्लेट सजा कर लाने को कई-कई हाथ उद्यत हों । जिसको यह बताने के लिए कि कितने तरह के और कैसे व्यंजन बने हैं, एक एक्सपर्ट टीम लगी हो । और जो ज़रा-सा खाना टुंग के किसी जरूरी काम को याद कर निकल ले ।
यह तो साफ ही है कि यह सब दफ्तर के बाद भी, दफ्तर के बाहर भी वाली बातें हैं- दफ्तर वाली बातों का ही एक्सटेंशन ।

तो बड़े साहब बैठे हुए थे।
मैं मसखरा बना हुआ था । कुछ लोग हँसने-हँसाने में हाथ बँटा रहे थे ।
लड़के के पिता अवतरित हुए । हमें दफ्तर वाला सलाम-प्रणाम कर व्यस्त हो गए । आज उनका दिन था ।

ढिमा ढम ढम ढम ढम...ढोल-ड्रम बज रहे थे ।
पटाखे फूट रहे थे...
नाच चल रह था...वीर जवानों से लेकर नागिन डांस तक ।
माथे पर बत्तियाँ उठाए सूखे-मुरझाए-से चेहरों वाली औरतें बाकायदा साथ चल रही थीं । नाच-गाने से असंपृक्त ।
कि अचानक कुछ गहमागहमी का माहौल बनने लगा ।

जो पुलिस कहीं बुलाए पर नहीं पहुँचती, जो किसी के बताए पर कोई रिपोर्ट नहीं लिखती , वही भक-भुक करती बत्तियों वाली गाड़ी के साथ मौका-ए-वारदात पर हाजिर थी । हाजिर ही नहीं, मुस्तैद थी ।
हुआ क्या था?

अरे भाई, वर्दी नहीं, सोंटा नहीं और बारात को रास्ता समझाने लगिएगा तो नाच-नाच के गरम हुआ खून उछल तो जाएगा ही न! वैसे भी बारात राष्ट्रीय ज़रिया है  खुशी का । सड़क तो वैसे भी बारातों, जुलूसों की ही पहले होती है । फिर, बारात में किसी न किसी ने टैक्स तो भरा होगा जिसका उपयोग सड़क बनाने में हुआ होगा !

खून उछल गया था और किसी पुलिस वाले को छू गया था ।  कम से कम पुलिस को ऐसा ही लगा ।  फिर क्या सोंटा भी आ गया, गाड़ियाँ भी आ गईं , वर्दी वाले भी आ गए । गली अपनी गली बन गई, शेर दहाड़ने लगे ।

कुछ लड़के जनवासे में भाग आए । पुलिस की ज्यादतियों को कोसा जैसे हम-आप या विपक्ष सरकार को कोसते हैं । किसी ने हल्का-सा समझाया । वो झट् से मान गए, इससे पहले कि मौका हाथ से निकल जाए.और फिर उनका खाना-पीना चालू ।
उधर पुलिस ने भी भभकियाँ दीं, अपनी महत्ता सिद्ध की और विदा हुई ।  विदाई क्या मिली, पता नहीं ।

मैं तो शरीफ-ज़हीन मध्यवर्गीय आदमी की तरह दूर-दूर से जायजा लेता रहा । बीच-बीच में घटनाक्रम पर क्रिया-प्रतिक्रिया भी चलती रही । यह विचार भी रखा कि बड़े साहब को ले कर सुरक्षित निकल जाऊँ । सुरक्षा बड़े साहब की सबसे पहले ।

इस सब में बारात के और भी लेट होने का जेनउइन रीज़न बन ही गया था !

किसी ने बुद्धिमतापूर्ण सुझाव दिया, हमलोग पहले चल के खाना खा लें ।
साहब और हम सब चल पड़े ।
स्टॉल लगे थे । लड़के तैयार थे । बड़े साहब आए थे । प्लेट के प्लेट सज के आने लगे । बड़े साहब से घटते हुए क्रम में बँटे ।
लड़के वैसे भी इंतजार कर- कर के बोर हो चुके थे । सब के सब खिलाने पर टूट पड़े ।
खाना खाया । प्लेट टब में पटका । नैपकिन से हाथ पोछा । फिल्टर से गिलास भर पानी लिया । थोड़ा पिया ।  थोड़े से , उसी टब-बाल्टी में हाथ धोए । शुद्ध हुआ । बिन पानी सब सून । भले ही आस-पास किचकिच हो जाए । भारतीय संस्कृति में शुद्धता अहम भूमिका निभाती है । तौर-तरीकों में बदलाव आए तो आए, शुद्धता की रक्षा तो करनी ही पड़ेगी ।
संस्कृतियों का फ़्यूज़न।  अपना कन्फ़्यूज़न ।

खाना खा कर हम सब लोगों को कुछ न कुछ जरूरी काम याद आ गए, जो कि उचित ही था।
हमलोग समय को और बर्बाद किए बिना वापस निकल लिए. पहले बड़े साहब और फिर घटते हुए क्रम में बाकी। 

 

रेस ज़िंदगी की

 

जैसा कि अक्सर होता है , कितना भी जल्दी-जल्दी करिए, दफ्तर के लिए हमेशा ही देर हो जाती है, इस बार भी हो रही थी ।

यों तो देरी के कितने भी उचित-अनुचित कारण हो सकते हैं, लेकिन असली बात यह है कि देर हो जाती है । मैं देर करता नहीं , देर हो जाती है !

जब देर हो जाती है तो आप तेज़ हो जाते हैं । कम से कम अपनी ओर से । 

तो मेरी कार भागी चली जा रही थी । कुछ उसी स्पीड में जैसे कि " ऐसा तो आदमी दोइच् टाइम भागता है, ओलम्पिक का रेस हो या पुलिस का केस हो "। स्पीड का काँटा मानो आज तो छू ही लेगा आखिरी बिंदु को ।

स्पीड ज्यादा, खिड़की बंद, एसी चालू, गाना ऑन । देखता क्या हूँ कि आगे एक सवारी गाड़ी है, ठीक आगे । वही वाली गाड़ी जिसमें आगे वाली सीट समानांतर होती है, पीछे वाली लंबवत। खिड़कियों और एसी को तो भूल ही जाइए । खिड़की के नाम पर तिरपाल की तरह के कपड़े की ओट । गाना, पर बाजाबता फ़ुल वॉल्यूम । ये वही गाड़ियां होती हैं जो रोज़ाना कितनी ही ज़िम्मेदारियों, सपनों, मजबूरियों को ढोती हैं ।  इन गाडियो में बैठे लोगों की आँखें खोई- खोई सी रहती हैं । शायद गाड़ी की चाल का असर, जिसको भी जल्दी रहती है खेप पूरी कर दूसरी खेप शुरू करने की । और रास्ते भर सवारी उतारने, सवारी चढ़ाने की ।  ऐसी चंद आँखें मिल गईं मेरी आँखों से। भावशून्य पथराई- सी आँखें  । शायद उन आँखों में सपनों के जीवित बच पाने की गुंजाइश न बची थी । या फिर वो भयभीत थीं वक्त के बहेलिए से जो आँखों में बसे उम्मीदों के चूज़ों को मारने निकला है । चूँकि गाड़ियाँ खुली थीं, तो खतरा ज़्यादा था । 

और उन आँखों में सवाल भी थे । दो गाड़ियों के फ़ासले को ख़त्म करने में कितने जन्म लगेंगे ?

फिर वही हुआ जो होता है । जो होना चाहिए । जो सवाल परेशान करने लग पड़ें, उन सवालों को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाना चाहिए । वैसे भी एसी वाले सवाल झरझरिया गाड़ी की सवारी के सवालों से अलग होते हैं । दूसरे, ड्राइवर को एक ही जगह बहुत देर नहीं देखना चाहिए । दुर्घटना हो जा सकती है । वो ड्राइवर जो ड्राइव तो करे गाड़ी पर समझे कि ज़िन्दगी ड्राइव कर रहा है ।

हॉर्न पर हॉर्न । और मेरी कार ने सवारी गाड़ी को पीछे छोड़ दिया । ग़ौर करें कार ने, मैंने नहीं । कुछ उसी तरह जैसे सिस्टम बिगड़ता या बिगाड़ता है । सिस्टम कराता है । सिस्टम फेल करता है । हम नहीं । लेकिन हम ही निमित्त होते हैं । यह बात याद रखने की नहीं आज के जुग में !

गाड़ियों को ओवरटेक करना स्टेटस की बात होती है । कभी किसी लाल-पीली बत्ती वाली गाड़ी को पास देते देखा है गलती से कभी उनके आगे पड़ गए तो उनकी खा जाने वाली नज़रों को झेला है ? कभी ट्रक वालों से पाला पड़ा है कभी एकदम चकाचक एस यू वी को सर्र से पास करते देखा है ? कभी किसी सिग्नल पर किसी बाइक को लहरा कर आगे निकल जाते देखा है ? बस यही समझिए कि मैंने भी ओवरटेक किया तो इन सब बातों का थोड़ा-थोड़ा बदला ले लिया । बदला लेते रहना चाहिए। खासकर उनसे जो बदला ले सकने की स्थिति में नहीं हों । कतिपय कारणों से । सवारी गाड़ी को सवारी उठाने की चिंता न होती , फिर देखते ! उन पथराई-सी आँखों वालों के हाथ भी अगर एक अच्छी गाड़ी के स्टेयरिंग पर होते, फिर देखते !

आगे बढ़ने पर पन्नियों में जामुन बिकते दिखे । जंगली जामुन । बड़े अच्छे लग रहे थे । लेकिन पहुँचने की जल्दी थी । पीछे छोड़ आगे बढ़ना ही पड़ा ।  जल्दी पहुँचने की होड़ में हम क्या-कुछ नहीं छोड़ देते हैं ? दाद दीजिए लेकिन अर्जुन जैसी नज़रों की । सिर्फ और सिर्फ जामुन दिखे । उसे बेचने वाले बच्चे नहीं । उनकी स्कूल ड्रेस जैसी  मैली- कुचली ड्रेस नहीं । उनके रूखे- से बाल नहीं । कोई सवाल नहीं उठा, न उनके स्कूल जाने का, न उनके पहनने-ओढने का, न उनके स्वास्थ्य का, न उनकी माली हालत का । ये सवाल करना सिस्टम का काम है । और जवाब में आँकड़े देना । मुझे तो जल्दी पहुँचना था । आँकड़े मुझे भी प्रस्तुत करने थे । कितना क्या किया ? कितने तीर मारे? कितने फोटो खिंचाए ? और किससे कितना बेहतर किया । हमेशा ही बड़ा है तो बेहतर है । ज़्यादा है तो बेहतर है । न धर्म कुछ । न न्याय कुछ । न नीति कुछ । न तर्क कुछ । न शिष्ट कुछ । न अशिष्ट कुछ । न श्लील कुछ। न अश्लील कुछ । 

सिस्टम ही ऐसा है !

और मुझे अभी सुनना भी था । हर वक्त आदमी बदला ले लेने की स्थिति में नहीं रहता है । कतिपय कारणों से ! 

  

इतना तो चलता है


एक स्कूल का मुख्य द्वार है । अंदर से बंद किया हुआ ।एक आदमी द्वार के बाहर खड़ा है। साथ में एक बच्ची भी है । कोई 12-12:30 बजे दिन का समय है । आदमी दरवाजा खड़का रहा है खोले जाने के लिए । अंदर से कोई बता रहा है कि समय बीत चुका है, दरवाजा नहीं खोला जा सकता है ।

दरअसल एक प्रवेश परीक्षा आयोजित है । प्रवेश पत्र पर साफ-साफ लिखा हुआ है कि देर से आने वालों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी । परीक्षा का निर्धारित समय 11 बजे का है ।

आदमी समझदार है । वह जानता है कि लिखे हुए का महत्त्व कागज में ही होता है । कागज तक ही होता है । लिखा हुआ कुछ और होता है, किया कुछ और जाता है । समझा कुछ और ही । कोई नियम, कोई कानून, कोई संविधान – सब व्यक्ति कि व्यक्तिगत व्याख्याओं पर निर्भर होता है ।  उसी से निर्धारित होता है । तो वह आदमी समझता है कि लिखे हुए से कुछ नहीं होता। होगा वही, जो वह चाहेगा ।

दरवाजे का खड़काना और आदमी की आवाज दोनों तेज होने लगे हैं । दरवाजे के अंदर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलने पर आदमी की बेचैनी बढ़ गई है और पारा चढ़ गया है। उसने कहा – खोलना तो पड़ेगा । और उसकी उंगलियाँ मोबाइल पर सक्रिय हो गईं ।

एक और आदमी जो थोड़ी ही देर पहले आया है , सबकुछ देख-सुन रहा है । उसके साथ भी एक बच्चा है । उसको भी परीक्षा देनी है । वह भी देर से आया है । उस आदमी की उंगलियाँ भी उसके फोन पर फिरने लगी हैं ....।

हमारे देश में फोन न हो, जान-पहचान न हो, पहुँच- पैगाम नहीं हो तो साधारण से साधारण काम भी असाधारण रूप से कठिन हो जाता है । बिजली बिल की गड़बड़ी ठीक करानी हो, सरकारी दफ्तर में जमा अर्जी के बारे में पता करना हो, सरकारी साहब से मिलना हो, बैंक के खाते की प्रविष्टियों के बारे में पता करना हो, उसे ठीक कराना हो , और तो और किसी कस्टमर केयर पर शिकायत दर्ज कराने के बाद उसकी स्थिति ही जानना क्यों न हो ! जान-पहचान नहीं तो बस जै सियाराम ! भगवान ही मदद करें तो कुछ हो !

एक फोन-पहचान निकल आए तो कुछ-न-कुछ राहत तो मिल ही जाएगी ।

तो दोनों आदमी भी राहत पाने की कोशिश में हैं । उनकी गलती है ही क्या ? थोड़ी देर से ही आए हैं न ! इतना तो चलता है । बच्चों का अधिकार है परीक्षा में बैठना जिससे आप उन्हें वंचित नहीं कर सकते हैं । कर्तव्य न तो उनका है कुछ, न उनके अभिभावक का ! आदमी के पास देरी को क्षम्य मानने के सारे कारण हैं – परीक्षा का फॉर्म कहने को नि:शुल्क है , इंटरनेट कैफे में तो बिना पैसे चुकाए कुछ होना नहीं है । और हर घर में कम्प्यूटर की उपस्थिति कोई मान कर चले तो उसकी बुद्धि की बलिहारी है ! अपनी जानकारी के अनुसार किसी दूसरे स्कूल पहुँच गए तो गलती तो किसी की नहीं ही है ! ऑटो वाले ने सवारी के लिए देर करा दी, उसको भी क्या कहा जा सकता है ! जब हर जगह थोड़ा-बहुत एडजस्ट करने की गुंजाइश है तो परीक्षा में थोडी देर ,यही घंटे भर , से बैठने की अनुमति देने में क्या है !

आदमी फोन भी लगाए जा रहा था और दरवाजा भी खड़काए जा रहा है ।

आखिर स्कूल परिसर में तैनात सशस्त्र बल के सदस्यों को आ कर समझाना पड़ा । लाठी-बंदूक-पद में बहुत बल होता है ! दिखा देने भर से असर हो जाता है ।

उस आदमी के साथ बल ने वहाँ बच्चों के इंतज़ार में खड़े सभी अभिभावकों को भी समझा दिया है । यानी कि सभी को हटा दिया गया है, कोई भी द्वार के निकट खड़ा नहीं रह सका । सारे बल कभी-कभी ही नियमों को सब पर एक समान लागू कर पाते हैं ! खास तौर पर जब उनसे बड़ा कोई वी.आइ.पी उपस्थित न हो तब !

सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि विद्यालय परिसर में , प्रवेश-परीक्षा के लिए या ऐसे भी, सशस्त्र बल की उपस्थिति क्यों आवश्यक है ?

जवाब यह भी दिया जा सकता है कि हर छोटी-बड़ी जगह पर ट्रैफिक को सुचारु रखने के लिए एक-न-एक सिपाही क्यों चाहिए? बस वैसे ही ।

थोड़ा-सा विषयांतर करते हुए यह पूछा जा सकता है कि सुरक्षा-बलों के ठहरने के लिए स्कूलों की इमारतों का अधिग्रहण क्यों कर लिया जाता है ? बच्चों को क्लास-रूम से बाहर बैठने पर क्यों मजबूर कर दिया जाता है ?

जवाब यह दिया जा सकता है – स्कूलों में ऐसे ही कौन सी पढ़ाई होती है ? !

दोनों आदमी यही तो समझ रहे हैं कि जब सबकुछ में चलता है’ , ‘ कुछ होने न होने से से फर्क नहीं पड़ता है  तो  एक-दो बच्चों को परीक्षा में देर से बैठने की अनुमति दे देने से क्या हो जाएगा ?!

लेकिन नियम-कानून कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं तो माने जाने चाहिए । लोगों की आस्था व्यवस्था में बनी रह जाती है !

इस गैर-जरूरी से काम, शिक्षा-प्रवेश-परीक्षा आदि से संबंधित, में लागू होना ही चाहिए , खास तौर पर जब किसी वीआइपी पर इसका असर न पड़ रहा हो !

और उन दो आदमियों को भी क्या और क्यों समझाया जाए ? पूरे केंद्र पर दो ही लोग तो देर से पहुँचे थे , जिसको देर कहा जा सके । इतना तो चलता है । दो बच्चों के बैठ जाने से क्या फर्क पड़ जाता है?  वे  कम-से-कम एक जिम्मेदारी निभा तो लेंगे !

लेकिन यही छोटी-छोटी बातें तो हमारे और देश के चरित्र को भी निर्धारित करती हैं, यह भी बात तो है ही ! गलत को सही संतुलित नहीं कर रहा है । गलत को गलत ही संतुलित कर रहा है । बात तो यह है !! 

                                                                           

टोकना मना है

 

मुख्य सड़क से कॉलनी को मिलाने वाली एक सड़क है । चौड़ी इतनी ही कि दो गाड़ियाँ आ जाएँ तो बहुत संभल कर निकलना होता है । ऐसी सड़क पर एक भारी-भरकम मोटरसाइकिल साइड स्टैंड पर टिकी है । बीच सड़क पर तो नहीं, पर जितनी किनारे होनी चाहिए उससे बहुत कम । बाइक स्टैंड पर, और उससे टिक कर खड़ा हुआ एक नवयुवक । फैशन में बढ़ी हुई दाढ़ी और फैशन में कटे हुए डिजाइनदार केश । उसकी टी शर्ट का रंग वही है जो अभी-अभी चुनाव जीती पार्टी के झंडे का है । वही रंग नंबर प्लेट पर भी । ऐसे रंगों के खिलने का यही मौसम होता है । रंग तय कर देता है आप कैसा व्यवहार करेंगे या आपसे कैसा व्यवहार किया जाएगा । लोग ऐसे रंगों से भिड़ते नहीं हैं, बच कर निकल जाते हैं । बुद्धिमता इसी को कहते हैं । ट्रैफिक पुलिस वाले भी अक्सर ऐसे रंग वालों को देखने की बजाय इधर-उधर देखना पसंद करते हैं ।

 बाइक पर टिके हुए भाई साहब मोबाइल पर लगे हैं । आने-जाने वाली गाड़ियों को थोड़ी दिक्कत हो रही है । होती है तो हो ! लोग गाड़ी को,  फिर टी-शर्ट को , फिर नंबर प्लेट के रंग को और उस पर बने छाप को और अंत में नवयुवक के हाव-भाव को देख कर खुद ही बगल हो कर निकल जा रहे हैं । समझदारी की असली पहचान यही है – बच कर निकल जाना ! एक-दो लोग फिर भी ऐसे निकल ही आते हैं जो बाइक के पास थोड़ा रुक कर यह जताने की कोशिश करते हैं कि बाइक के कारण आने-जाने में दिक्कत हो रही है । लेकिन नवयुवक निर्बाध तन्मयता के साथ फोन पर लगा है । लोग खुद ही समझ जाते हैं और निकल जाते हैं बगल से । जनता अक्सर समझदार होती है । वैसे समझदार लोग समझाने की कोशिश भी बहुत सोच-समझ कर ही करते हैं । समझने वाला हमेशा नेति नेति की अवस्था में ही रहता है । इसीलिए ज्यादातर लोग किसी को समझाने के बाद यह समझे हुए होते हैं कि किसी को भी समझाना उनका काम नहीं है । फिर भी ऐसे कुछ लोग तो बचे ही रहते हैं जिनको यह ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ होता है । ऐसे ही कुछ लोग नवयुवक को समझाने की चेष्टा कर बैठे हैं । पहले तो नवयुवक ने अपना इग्नोर बटन’  दबाए रखा,  फोन पर बात करता रहा । लोग फिर भी नहीं हिले तो फोन कान से हटा कर, गुटखा एक बार थूक कर एकदम प्रश्न भरी निगाहों से पूछ्ने वाले को देखता है । पूछने वाला भी ढीठ ही है । कह बैठता है बाइक ज़रा साइड कर लीजिए । नवयुवक बड़े ही शांत स्वर में रास्ते की ओर हाथ दिखा कर प्रतिप्रश्न कर देता है “ और कितनी जगह चाहिए?” और बिना किसी को देखे फोन को कान के पास ले आता है , बात के क्रम को पुन: शुरु करने के लिए। फोन पर बीच- भरी सड़क पर बिना डिस्टर्ब हुए बात करना भी साधना ही है । पूछने वाला व्यक्ति फिर भी कुछ सेकेंड खड़ा रहता है कि युवक कुछ तो करेगा । अब जनता का धैर्य जवाब दे जाता है । पूछने वाले व्यक्ति को ही कहा जाता है भाई आगे बढ़ो। आगे बढ़ो ! रास्ता मत जाम करो । भाई, वो सुनेगा नहीं । गाड़ी का नंबर प्लेट देखिए और आगे बढ़िए । कहाँ-कहाँ टोकिएगा भाई !

सही तो है – कहाँ-कहाँ टोकिएगा । साहिर ने कहा तो है न – आजकल किसी को वो टोकता नहीं, चाहे कुछ भी कीजिए रोकता नहीं” । समझिए ये वोकौन है – भगवान है, सरकार है, हाकिम है और आप भी हैं ! “ हो रही है लूटमार , फट रहे हैं बम” – फिर भी कोई टोकता, रोकता नहीं है । टोकना, रोकना चाहता नहीं है । टोकना, रोकना संभव नहीं है दरअसल ।

सड़कों पर गाड़ी बेतरतीब लगे, दफतरों में साहब देर से आएँ, शिकायतों पर कोई सुनवाई न हो, स्कूलों में पढ़ाई न हो, अस्पतालों में दवाई न होकहीं किसी को टोकना नहीं है । टोकने का असर टोके जाने वाले पर तो खैर क्या होगा , टोकने वाले पर ही हो जाता है । जैसे प्रशंसा से आप किसी को भी जीत सकते हैं , वैसे ही किसी को अनदेखा कर आप उसको हरा सकते हैं पूरी तरह । आस-पास नजर दौडा कर देखिए लोग कैसे बातों की अनदेखी कर बातों को मार देते हैं । दरअसल,  जब हर आदमी ही सबसे बड़ा ज्ञानी हो तो दूसरे की कौन सुने ?

नवयुवक भी सबसे बड़ा ज्ञानी ही है । खासकर तब जब वह सत्ताधारी पार्टी का घोषित समर्थक भी हो । प्रशासन सत्ता की सेवा के लिए है । सत्ता दल के सदस्यों और समर्थकों की होती है । तो प्रशासन का दल के सदस्यों और समर्थकों का सेवा करना सिद्ध हुआ ! वैसे यह बात तो हाथ कंगन को आरसी क्याको चरितार्थ करने वाली है ।

सामाजिक स्तर पर भी चूँकि शरीफ और समझदार लोग बच कर चलने में और मौके पर बगलें झाँकने में विश्वास रखते हैं, नवयुवक निश्चिंत भाव से अपने में मगन है । वह जानता है , जब तक एकदम ही व्यक्तिगत नुकसान न पहुँचाए , कोई भी व्यक्ति उसको कुछ कहेगा नहीं दृढ़तापूर्वक । और व्यक्तिगत नुकसान भी किसी ऐसे व्यक्ति का हो रहा हो जिसका कुछ-न-कुछ हित नवयुवक द्वारा सधता हो तो वह जानता है कि हित ही सबसे ऊपर रहता है !

बाइक वैसे ही लगी है । नवयुवक वैसे ही टिका है । मोबाइल वैसे ही चालू है । लोग वैसे ही खुद-ब-खुद बगल हो कर निकल रहे हैं । और सड़क की यह स्थिति तो एक प्रतीक भर है देश-समाज-काल का ! 


                                                                    

एक टिपिकल पिता ...

 

आज उन्होंने अपने लड़के को पकड़ लिया था । यों तो उनकी उम्र के पिता द्वारा इस उम्र के बेटे को पकड़ पाना मुश्किल ही होता है, पर आज उनको मौका लग ही गया था । वे बेटे को समझा रहे थे –“ प्लस टू बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है । बारहवीं में तो खास ध्यान देने की जरूरत है । हमारे समय में तो इतने सारे विकल्प नहीं थे, पर अब तो बहुत कुछ किया जा सकता है । और इसके लिए जरूरी है कि प्लस टू अच्छे से पास किया जाए । साल भर मेहनत करने की जरूरत है बस ! रोज 1-2 घंटे भी नियम से पढ़ोगे तो तुम्हारे जैसे लड़के को कोई रोक नहीं सकता है” । वे एक अच्छे, जिम्मेदार पिता की तरह बात कर रहे थे । बेटा भी एक योग्य बेटे की तरह तन्मयता से सुन रहा था और पिता की हर बात में हामी भर रहा था । साथ में यह याद भी करा रहा था कि अब तक तो अच्छा करता आया है । आगे भी करेगा । वे उसे फिर भी समझा रहे थे कि वो सब ठीक है , पर प्लस टू से ही कैरियर के रास्ते खुलते हैं । बस साल भर की तो बात है । एक बार सही लाइन पकड़ ली फिर सब ठीक है ।

 बेटे को बार-बार समझा वे तसल्ली कर रहे थे अपनी । हो न हो उन्हें अपने दिन याद आ रहे हों । उन्होंने भी तो अपने पिता को बहलाया-फुसलाया था कि सब ठीक रहेगा और कुछ ऐसा समझा दिया था कि पिता हमेशा यही मानते रहे कि इन्होंने जो किया अच्छा किया , वैसे क्षमता तो इनमें कुछ भी बन जाने की थी ।

 वे बेटे को तो समझाते हैं ही , पिता को भी समझाते हैं – “ स्वास्थ्य का ध्यान खुद ही रखना पड़ता है, अगर सही माने में स्वस्थ रहना है । रिटायरमेंट के बाद तो आपके पास समय ही समय है घूमिए, पढ़िए, लिखिए” । उनके पिता उनको समझा देते हैं कभी-कभी- “व्यस्त आदमी के पास ही अपने हर काम के लिए समय होता है । तुम भी थोड़ा अपने पर ध्यान दो । तुम बहुत कुछ कर सकते हो” । वे पिता की ऐसी बातों को सुन कर थोड़ा -सा फूल जाते और एक बार फिर से मन-ही-मन दुहरा लेते कि आदमी चाहे तो क्या नहीं कर सकता ! बस सोचने की बात है । लेकिन सोचने से वे आगे नहीं बढ़ पाते हैं ।  जीवन की आधी सदी निकल जाने के बाद भी वे यह तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें कितनी देर सोना चाहिए । डॉक्टरों द्वारा सलाह दी गई आठ घंटे की नींद या यू ट्यूब पर गुरुओं द्वारा दिया ज्ञान कि नींद की क्वालिटी ज्यादा जरूरी है ;  आठ घंटे, पाँच घंटे से फर्क नहीं पड़ता । वे यह तय नहीं कर पाए हैं कि रात में देर तक जगना ठीक है या सुबह जल्दी उठना । तो उनका जीवन झूलता रहता है – आठ-पाँच घंटे , सुबह जल्दी-देर रात के बीच ।

 वे बेटे को समझाए जा रहे हैं  - रोज नियम से पढ़ना जरूरी है । थोड़ा खेलना जरूरी है, उतना भर कि पढ़ाई पर असर न पड़े । घूमना- टहलना जरूरी है । कोर्स के बाहर की किताबें भी पढ़ना जरूरी है । अच्छे दोस्तों से थोड़ा-बहुत मिलना जरूरी है । अंग्रेजी बोलना जरूरी है । अखबार पढ़ना जरूरी है । शायद जितना उन्होंने सुना था, अब सुना रहे हैं । वैसे भी ज्ञान बाँटने की चीज है । उनको शायद ही पता हो कि बेटा कहाँ, कब, क्या करता है, पर ज्ञान का उससे क्या संबंध ?  अच्छी बातें तो बताई जाती रहनी चाहिए एट द कॉस्ट ऑफ़ रिपीटिशनभी !!

वे शायद भूल रहे हैं कि उनका बेटा जिस उम्र में है वो पिता की हर बात को उलट देने वाली उम्र है । और उनकी जो उम्र है वो अपनी हर बात को अपनी उम्र के हवाले से सही मनवाने वाली उम्र है । उम्र के हवाले से और आवाज़ के ज़ोर से । 

 वे बेटे को समझा रहे हैं । वे पिता को समझाते हैं । वे पत्नी को हिदायत देते हैं । और तो और टीवी के सामने बैठ कर क्रिकेट टीम के कैप्टन को खेलना भी सिखाते रहते हैं । वे भूल जाते हैं कि सिर्फ बायोलॉजिकलीपिता, पुत्र, पति बल्कि इंसान ही होने से कुछ नहीं होता , आपकी बातों, आपके चाल-चलन से भी यह सिद्ध होते रहना चाहिए ।   

 

                                                                            

आज का कवि सम्मेलन


 एक हिंदी-भाषी राज्य है । राज्य की राजधानी है । बड़ा शहर । एक आधुनिक संग्रहालय है – खूब बड़ा । उसमें कुछ सभागार हैं – वातानुकूलित । एक सभागार में साहित्य- प्रेमियों का जमावड़ा है । एक कवि-सम्मेलन है और कविता पर चर्चा का आयोजन है । कुछ वरिष्ठ कवि हैं, आशीर्वाद-स्वरूप उपस्थिति दर्ज कराते हुए । कुछ उनसे थोड़े कम वरिष्ठ कवि हैं – विश्लेषणात्मक ज्ञान को बाँटने के लिए । कुछ कवि हैं अपनी विचार वाली कविताओं के साथ – कवि हैं तो कवि दिखने भी चाहिए के अंदाज़ में । वो भी आधुनिक यथार्थवादी प्रगतिशील कवि । और फिर जनता भी है – साहित्य-प्रेमी, काव्य-रसिक, अंदर ही अंदर कवि । कुछ ऐसे भी लोग जिनके पास समय बिताने की समस्या है, वे भी समस्या समाधान हेतु आ गए हैं ।

 सभागार में एक मंच है । मंच पर एक बैनर है काले बैकग्राउंड वाला । एसी और काला बैनर एक माहौल बना देते हैं । मंच पर कवि आसीन हैं । एक वरिष्ठ कवि के आशीर्वचन के बाद कविता पाठ शुरू हो गया है । कवि आते हैं, कविता पढ़ते हैं, चले जाते हैं । गौर कीजिए , कविता पढ़ते हैं !! जितने भी कवि आ रहे हैं, उनमें से ज्यादातर ने हाथ में कागज-किताब पकड़ी हुई है । कागजों को देख-देख कर कविता पढ़ी जा रही है । जब कवि अपनी ही कविता याद नहीं कर सकते तो श्रोता क्या करेंगे !

 सभागार वातानुकूलित है । कोई सौ लोगों के बैठने का इंतज़ाम है । फिर भी हॉल भरा-भरा ही लग रहा है । आजकल तो मल्टीप्लेक्स का ज़माना है । हर चीज़ एक “एक्स्पीरियंस’” होनी चाहिए ! एसी वाले कमरों में ऐसे ही शांति विराजमान होती है। फिर यहाँ तो कविता का राज है । ध्यानपूर्वक सुना जाना है । एक-एक शब्द सुनकर समझने की कोशिश की जानी है । वैसे कवि कविता का स्तर इतना नहीं गिरने देते कि आम लोगों की समझ में आसानी से आ जाए । कविता में अर्थ खोज लेने का सुख हर कवि पाठक को भरपूर देना चाहता है । कवि की कविता कोई दो मिनट वाली मैगी तो है नहीं !

 एक कवि कविता पढ़ रहे हैं । पूरे भाव-भंगिमा के साथ । उनको अचानक शायद यह खयाल आया है कि श्रोताओं की तारीफ भी करते चलें । वे कह रहे हैं कविता के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण दिन है । इसलिए नहीं कि इतने बड़े-बड़े कवि एक मंच पर उपस्थित हैं , बल्कि इसलिए कि आज के समय में भी कविता को सुनने के लिए इतनी बड़ी संख्या में सुधि जन उपस्थित हुए हैं। कविता का भविष्य अभी समाप्त नहीं हुआ है । आपके शहर से ऐसी ही आशा हमें थी । कवियों का गणित थोड़ा खराब होता है। एकाध शून्य तो संख्या की दायीं तरफ बढ़ा ही लेते हैं । वरना सौ की संख्या इतनी बड़ी संख्या तो नहीं ! लेकिन बात यह भी है कि एसी कमरों का चार्ज होता है, तो उतना ही बड़ा कमरा लिया जा सकता है जिसमें यह कहा जा सके कि सम्मेलन था !! खैर, कवि महोदय कविता पूरी कर अपने हिस्से की ताली ले कर बैठ गए । यह जनता का कर्तव्य होता है कि हौसला अफ़जाई करती रहे । हाँ, यह अलग बात है कि जिस तरह कवि पन्ने देख-देख कर कविता पढ़ते हैं , जनता भी उसी तरह एक-दूसरे को देख- देख कर ही ताली बजाती है । वो भी एसी जैसी शांत-शांत, दबी-दबी !

 अब एक कवयित्री उठी हैं । उन्होंने भूमिका बाँधी है कि उनकी कविताएँ सीधे जीवन से उठकर आई हैं । उनकी कविताओं में यथार्थपरक प्रेम है जिसे श्रोतागण खुद ही समझ सकते हैं । वे कविता पढ़ रही हैं । प्रेम शब्द का उच्चारण हर कुछ सेकेंड के बाद हो रहा है । अंतत: कविता समाप्त हुई है और जनता को यह महसूस हो रहा है कि कविता ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रेम शाश्वत होता है – “ हेन्स प्रूव्ड” की तर्ज पर ।

 कवि आ रहे हैं । समय सीमित है । समय सीमित ही होता है । कागज-किताब खुल रहे हैं एक के बाद एक । कवि धीर-गंभीर बने हुए हैं । गंभीरतापूर्वक गंभीर कविताएँ पढ़ रहे हैं । पूर्ण साहित्यिक गोष्ठियों में गंभीरता अनिवार्यता होती है । हाँ, बीच-बीच में एक-दो बातें, आध-एक लतीफ़े सुना कर यह बता ज़रूर देते हैं कि सेंस ऑफ़ ह्यूमरउनमें है तो पर यह समय मज़ाक का नहीं है । उन्हें अपनी जिम्मेदारी का भान है । कवि वैसे भी दु:ख का अन्वेषी होता है । और खुशी तो वैसे भी यथार्थ नहीं है ।

 कुछ कवियों के बाद एक वरिष्ठ कवि को मंच सौंपा गया है । उन्होंने कुछ आशीर्वचन कहे हैं। उन्होंने कवयित्री को लक्ष्य कर के कह दिया है कि कविता में प्रेम लिख देने से कविता में प्रेम नहीं आ जाता, कविता प्रेम-कविता नहीं हो जाती । कवयित्री को बात नागवार गुजर गई है । वे दुबारा मंच पर आ गई हैं । क्रम को भंग कर के । और अपना विरोध उन्होंने अपने स्पष्टीकरण के साथ दर्ज किया है । लोगों ने कुछ भी दर्ज किया या नहीं, यह देखना उनका काम नहीं ।

थोडे कम वरिष्ठ कवि ने पूरे सत्र की कविताओं का विश्लेषण कर दिया है । थोड़ी तारीफ, थोड़ी सीख, थोड़े उदाहरण, थोड़े उद्धरण । और अंत में अपनी किताब खोलकर उसमें से कुछ पंक्तियों का पाठ ।

 कम-से-कम कुछ श्रोता जैसे रेगिस्तान में नखलिस्तान की खोज में हैं । कोई तो कवि मिले, कुछ तो कविता मिले, कुछ तो सरस मिले । सभागार में इतनी देर बैठने के बाद , पद्य के कार्यक्रम में गद्य का मजा लेने के बाद वे भी अब बस इस आशा में हैं कि कार्यक्रम -समाप्ति की घोषणा के साथ जलपान और चाय का इंतजाम होने की भी घोषणा होगी । बाकी तो आए ही इसलिए थी कि एसी में बैठ भी लेंगे , चाय-जलपान भी हो जाएगा ! 

  

उसकी होली

 

होली आई  । हर बरस की तरह इस बरस भी । और होली चली गई । पिछले कुछ सालों से तो होली भिंगाती भी नहीं है । होली मिलने-मिलाने का त्योहार होती थी । शायद अब भी हो कहीं-न- -कहीं ! होली का आना तो वही रहा है, होली का होना कम होते जा रहा है । कुछ तो ग्लोबल वार्मिंग और पानी के कम होने की समझ होने के कारण, कुछ रिश्तों के ठंडे पड़ जाने और आँखों में पानी खत्म हो जाने के कारण । इस बरस कोरोना वायरस ने भीड़-भाड़ से बचने की एडवायजरी घोषित करवा कर काम को और आसान करवा दिया है । आदमी को अपनी जान कितनी प्यारी होती है, इस बात से समझ में आ जाता है । वरना किसी धरने, प्रदर्शन, सभा, जुलूस , यात्रा- किसी को भी रोकने की कोशिश की बात भी कर के देख लीजिए, लोग आपकी लानत-मलामत न कर दें तो फिर कहिए !

दिन के ग्यारह बजे ही सन्नाटा -सा छा गया है । थोड़ी दूर कहीं लाउडस्पीकर जरूर याद दिला रहा है कि 'होली है !' अधपके बाल वालों के साथ यही दिक्कत होती है । न तो वो पिछली पीढ़ी के होते हैं, न वर्तमान । भविष्य तो खैर वैसे भी युवाओं का होता है । एक अधपके बालों वाला मध्यवर्गीय व्यक्ति , आखिर होली मनाए भी तो क्यों । मध्यवर्गीय आदमी जिंदगी भर आगे बढ़ने की ही सोचता रहता है, आगे बढ़ने के लिए ही कुछ न कुछ करता रहता है । उसकी महत्वाकांक्षा ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है । एक अधपके बालों वाला कुछ-कुछ अधेड़ आदमी , बरामदे में खड़ा अपने बीते दिनों को याद कर रहा है - वो भी क्या दिन थे ! क्या होली मनाई जाती थी ! लोग कितना मिलते-जुलते थे ! लोग कितना हुलसते थे ! बीते दिनों की याद करना उसका पसंदीदा शगल है । लोग जब वर्तमान में नहीं जी पाते हैं तो बीते दिनों में पहुँच जाते हैं । वह वैसे भी भाग रहा है आजकल । जीने की फुर्सत मिलती ही कहाँ है ! उसको भाग-भाग कर सबसे आगे पहुँचना है । कहाँ पहुँचना है, यह बाद में तय होगा । भागते रहने पर उसे लगता है कि वो आगे बढ़ता जा रहा है । आगे बढ़ने के लिए अकेले होना पड़ता है । विकास सबका साथ नहीं हो सकता है , वो भली -भाँति जानता है । अकेला होने के लिए अकेला दिखना भी पड़ता है । होली अकेले मनाया जाने वाला त्योहार नहीं है । इसीलिए होली से वो दूर रहता है । होली खेलने वालों को दूर रखता है । वैसे भी शराफत का पाठ पढ़ते-पढ़ाते होली भी उसके लिए अब आग्रह की वस्तु हो गई है । आग्रह और अनुमति की । आग्रह रंग लगवाने का, अनुमति रंग लगाने की । यह न समझा जाए कि पहले होली में शराफत नहीं रहती थी । शराफत तो थी ही, थोड़ी शरारत भी थी, थोड़ी चुहल भी थी । फिर क्या हुआ कि शरारत के लिए लोगों का  किसी मौके का इंतज़ार करना  खत्म हो गया । स्कोप और स्केल दोनों में शरारतें बढ़ गईं । बारहो मास । होली क्या अब कुछ भी वैसा नहीं बचा जैसा होना चाहिए । जैसे कि अब किसी मॉल में जा कर तसल्ली से खर्च कर तसल्ली करने के लिए किसी भी पर्व-त्योहार या किसी खास अवसर का इंतज़ार करने की आवश्यकता खत्म हो चुकी है । हर चीज बारहमासा हो गई है । लोग खुश हैं कि उल्लास अब उनकी उंगलियों पर नाचता है । इधर खर्च, उधर मज़ा ।

वो बीते दिनों को याद कर रहा है । होली को याद कर रहा है ।दोस्तों को याद कर रहा है । सामने से गुजरती होली और घर-पड़ोस में उपलब्ध लोग उसे नहीं दिख पा रहे हैं । ज्यादा मिलना-मिलाना वो ठीक नहीं समझता है । उसका समय और परिश्रम सिर्फ सही जगह पर लगाने के लिए हैं । होली पर गिफ्ट का चलन अभी नहीं हुआ है वरना वो कही-न-कहीं गिफ्ट पहुंचाने जाता जरूर ।  वो हर बात में विनिमय देख सकता है । या विनमय की बात हो तभी वो बात कर पाता है । करीबी से करीबी लोगों के साथ भीजरूरी से जरूरी काम की बात में भी । वैसे भी होली में रखा क्या है । गंदा ही तो होना है सबकुछ । कितना भी बढ़िया रंग रखिए । और फिर साफ करने में उससे भी ज्यादा झंझट । बेदाग रहना ही तो असली कला है । नौकरी करते पूरी उम्र निकल जाए और कोई दाग न लगे, तब न कोई बात है । वैसे भी रंगाना तो मन को चाहिए । और उसके लिए मन का मिलना जरूरी है , जिसके लिए किसी के पास आज समय नहीं है । उसके पास भी । वो किसी से कोई कम है क्या ! वैसे भी उससे वही लोग बात करते हैं जिनसे वो बात करता है । वह किसी से तभी बात कर पाता है जब किसी के लिए उपयोगी, कम से कम , एक बात उसके पास हो । लोगों से बात करते करते उसे इस बात का अच्छी तरह आभास हो गया है कि पूजा काम की ही होती है । उस काम की जो आप दूसरों के लिए कर सकते हैं । उस काम की कीमत के हिसाब से ही आपके साथ व्यवहार किया जाता है । वरना आप लोगों को याद करते रहें, कराते रहें । आदमी को अपनी महत्ता खुद ही बनानी होती है ।

बरामदे में खड़ा वह मुफ्त में ही भावुक हुआ जा रहा है । भावना तो जानवरों में भी होती है, दिमाग लगाने की शक्ति नहीं । जितनी बार उसे इस बात का अहसास होता है, वो कसमें खाता है दिमाग से काम लेने की । वह यह समझने लगा है कि अच्छाई श्रृंगार होती है । और बहुत पुरानी सीख है - पर रुच सिंगार !  सामने वाले को अच्छा नहीं लगा तो सब व्यर्थ। एक समय था वह अपने को एक अच्छा आदमी समझता था । फिर उसने देखा कि जिन आदतों-बातों को वह बुरा समझता था, वो तो बुरी मानी ही नहीं जाती हैं । सारी बातें एक तरफ, आपका नज़राना एक तरफ । फिर कौन-सा कोई जीवन भर किसी के साथ रहता है। और अगर रहता भी है तो विनिमय तो अनवरत क्रम है !

एक पहचान का आदमी सामने से निकला । निकलते हुए पूछ गया - कभी दिखते ही नहीं ? न कोई फोन , न मुलाकात ? और उलाहना देते हुए वह निकल गया । बरामदे में खड़ा वह सोच रहा है कि यही सारी बातें तो पूछने वाले पर भी लागू होती हैं ! उसने जाने वाले को रोकने की कोशिश भी की , कि दो-चार मिनट तो रुक के बातें कर ले । जाने वाले को किसी के यहाँ समय पर पहुँचना था इसीलिए वह रुक नहीं सकता था । रोकने वाले के पास वैसे भी क्या था ? लोग उसकी बात सुनते ही क्यों? न तो वह किसी को कुछ नुकसान पहुँचा सकता है कि लोग उससे डरें, न ही वह किसी के काम आ सकता है कि लोग उसकी खुशामद करें ! वो थोड़ा पुराने खयाल का भी है । किसी का भला करता भी है तो इस तरह कि खुद को भी खबर न हो ! अब ऐसे आदमी का भला कोई क्या कर सकता है !

बहुत देर तक बरामदे में खड़े -खड़े रास्ते को देखने के बाद वह अंदर चला आया है । चुपचाप, बिना आवाज किए, किचन में जा कर चाय चढ़ाई है । घर के लोग बाहर निकले हैं होली खेलने ; बाकी सभी लोग व्यावहारिक हैं । उनको सबसे मिलना-जुलना रहता है । बिगाड़ के डर को वे समझते हैं । इसलिए भी इसके साथ चलने के लिए वे इसरार नहीं करते हैं ।

चाय लेकर वह ट्रांज़िस्टर के पास बैठ गया है । वो जानता है कि विविध भारती पर उसके मन के लायक कुछ न कुछ आ ही जाएगा । मन की बात वैसे भी आजकल आकाशवाणी से ही होती है !

होली जा रही है । वह जाने दे रहा है । 

 

 

क्रम- भंग : हौसला बनाए रखिए


पिछ्ले कुछ दिनों से, देख रहा हूँ, कोयल लगातार बोल रही है । बोलती तो वह हर बरस होगी, मगर इस बरस मुझे लग रहा है कि कुछ ज्यादा ही बोल रही है । कोयल बोल रही है दूर से, पास से । और कोयल की कूक का मन की हूक से कुछ न कुछ संबंध है जरूर । और भी चिड़ियों की आवाज़ें सुन पा रहा हूँ , जो अमूमन सुनने में नहीं आती । वसंत तो है । आम भी बौराए हैं। चैत चढ़ चुका है । होली जा चुकी है । समय तो कोयल के गाने का ही है । ऐसा क्यों लग रहा है कि कोयल गा तो रही है, पर वह खुद से ही बातें भी कर रही है । क्या वह अकेलेपन से घबराई हुई है ?  अपने आस-पास के सन्नाटे से चकित है ? समय कोरोना का भी है । कठिन समय ।

एक अनदेखा , अजाना शत्रु और उसका भय ! सारी दुनिया चपेट में है । ऐसा क्यों हुआ , यह शोध का विषय है और शोध हो भी रहे हैं । लेकिन अब जो होना है और जो होगा, वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है । कोरोना और उसके भय के क्रम को भंग करने के लिए यथासंभव बल्कि उससे भी ज्यादा प्रयास आवश्यक हैं और किए भी जा रहे हैं । इस दौर के बाद दुनिया वही नहीं रहेगी , बदल चुकी होगी । उसे बदलना ही चाहिए । उसे बदलना ही होगा।

कम कितना कम हो सकता है वह तय है – यानी कि शून्य , एकदम नहीं होना । मगर कितना ज्यादा ,ज्यादा होगा उसकी कोई सीमा नहीं है । क्षमता और सोच ज्यादा को ज्यादा बनाती है । इस दुनिया में जीने का हक तो सबको समान होना चाहिए । लेकिन ऐसा रहा नहीं है । ऐसा रहने नहीं दिया गया है । सामर्थ्य की सीमा तय करती है कि जीने का किसको कितना हक है । राज कपूर की फिल्म “आवारा” में एक संवाद है – “ इस अदालत के ऊपर भी एक अदालत है” । और वो अदालत है । आज सभी लोग एक भय से एक समान ही डरे हुए हैं । हाँ, यह जरूर है कि जिनके पास महीने भर का राशन जमा है वो थोड़ा निश्चिंत हैं । लेकिन मन ही मन वो यह भी जनते हैं कि तक्षककहीं भी , किसी भी वेष में पहुँच सकता है । हमको अपने जीने का तरीका बदलना ही होगा ।

राशन की दुकानों पर, दूध के बूथों पर, दवा की दुकानों में,  सब्जी बेचने वालों के यहाँ भीड जरूर है । पर कब तक ? हम अपनी क्षमता के अनुसार जीने के प्रयास में हैं । कहीं जरूरत भर, कहीं जरूरत से ज्यादा भी । सब्जी वालों के चेहरों पर भाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं “ महीना कैसे बीतेगा ? सब्जियाँ पड़ी-पड़ी कुम्हला जाएँगी । आज जो थोड़ी- बहुत भीड़ है , समय बीतने के साथ खत्म होगी ही । तब उनका क्या होगा ?!”

हाथ में कुदाल-टोकरी लिए हुए इक्का-दुक्का लोग अब भी चौराहे पर आ गए हैं । इस उम्मीद में कि ऐसे में भी उनके चूल्हे की आग का इंतजाम हो जाएगा ।

बाकी सारी चीजें ठप हों तो जीवन को जीवंत रखना बहुत कठिन है । भय की छाया साफ-साफ है । इस बेमौसम के मौसम की तरह भय के बादल रह-रह कर घुमड़ रहे हैं । बरस भी रहे हैं ।

डर से डरना और भी डरा देता है । भय तो कुत्ता है । उसके सामने दम साधे चलते रहिए । जैसे ही आप डरे , डर कर दौड़ पड़े कि वो भी लपकेगा आपके पीछे । काट भी ले कहीं !

चैत का महीना है । प्रकृति में बदलाव का समय है । बादल अगर आएँगे भी तो टिकेंगे नहीं बहुत । यह माना जाए कि कोयल जो लगातार गा रही है , वह यही बता रही है – “ यह भी बीत जाएगा” । कोयल की आवाज जो दूर-दूर तक सुनाई दे रही है वो भी इसलिए कि अपने अंदर की ऊष्मा को बनाए रखिए । उसके संग-संग आप भी गाइए-गुनगुनाइए । कम-से-कम उसे सुनिए तो सही । ठंढे पड़ चुके दिलों में भी लौ जगा रही है । कोयल अपने अकेलेपन से नहीं घबराई है , वो हमारे , हम सब के मन की उदासी को भगाने के लिए ही गा रही है । कुछ ज्यादा ही शायद । देखिए न , इस कठिन समय में भी कोयल गा रही है । कोयल का गाना प्रेम का प्रतीक भी है । प्रेम हौसले का आधार होता है । हम भी तो हौसला बनाए रखें। 

  

क्रम- भंग 2 : मन को मनाए रखिए


आज कोरोना के पॉज़िटिव केसों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती हुई दिख रही है । यों तो एक अप्रैल मूर्ख बनाने का दिन है । और मन चाह भी यही रहा है कि यह खबर भी अप्रैल फ़ूल बनाने का तरीका हो । लेकिन नहीं ! खबर सही है । मजाक तो है लेकिन एक क्रूर मजाक-सा । सिलसिलाफिल्म के गाने को थोडा उलट कर याद कर रहा हूँ “ कि जबकि मुझको भी ये खबर है कि तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो / ये दिल है कि कह रहा है तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो” । मन को मनाए रखना है । मैंने कई बार , अलग-अलग समय में, अलग-अलग प्रसंगों में सोचा है कि हमारा देश एक डायनमिक इक्वीलिब्रियममें रहता है । लगता है कि अब गिरा कि तब गिरा ! पर गिरता नहीं है । इस बार भी मन कह तो रहा है – गिरेगा नहीं ! भारत शायद विषम परिस्थितियों में उबर आने का नाम है ।

गलियों, सड़कों पर सहमा हुआ सन्नाटा है ।

आनंद विहारमें जमा हजारों-लाखों लोगों मजदूरों की तस्वीरें आती हैं । आप विचलित हो उठते हैं । बेबसी झल्लाहट में तब्दील होने लग जाती है । मरकज़के गैरजिम्मेदार व्यवहार की खबरें आती हैं । आपका गुस्सा कसैला होने लगता है ।

एक अजाने, अनजाने भय को मारने में कोई युक्ति काम नहीं करती जल्दी । बीमारी से बड़ा उसका भय होने लगा है। भय का ईलाज यही है कि भय न करें । सावधान रहने और भयभीत होने में बहुत ही महीन लेकिन गंभीर फर्क है। भय के फैलने की गति वायरस के फैलने की गति से कई-कई गुणा ज्यादा होती है ।

यह मान कर चला जाए कि जो जहाँ है, जैसा है परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है ।

कमरे में रखी किताबों पर नजर जाती है । गीतकार शैलेन्द्र पर आई किताब धरती कहे पुकार केपर नजर गई है । शैलेन्द्र के अनेक गीत याद आ गए हैं बरबस । मन हरा होता है थोड़ा । उनके एक प्रार्थना-गीत की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं –“ तुम्हारे हैं तुमसे दया माँगते हैं / तेरे लाड़लों की दुआ माँगते हैं” । मन मन ही मन ऊपर वाले बिग बॉसको याद कर लेता है – “ बिग बॉसचाहते हैं कि आप संयम से काम लें, मन को शांत रखें । डरें बिल्कुल नहीं” ।

यू ट्यूब पर दि लल्लनटॉपका एक वीडियो खुला है – “ सौरभ द्विवेदी नाम है हमारा और आप देखना शुरु कर चुके हैं दि लल्लनटॉप’” । मन थोड़ा और टनमना जाता है । और जैसे अभी के हालात को कह रहा है हम भी हैं, तुम भी हो , दोनों हैं आमने -सामने

मन ! मन समझते हैं न आप!!

ऐसा बहुत बार हुआ होगा कि आप दिनों, महीनों तक अकेले, अलग-थलग रहे हों, लेकिन वो समय भी पार हो ही जाता है । इस बार के अलगरहने में शायद यह भाव अंतर्निहित हो गया है कि कल हो न हो’ !!

जाने कितनी बातें याद आने लगी हैं । कितनी घटनाएँ याद आने लगी हैं । कितने दोस्त याद आने लगे हैं । और मन में यह संकल्प सा भी बनने लगा है कि तोड़ना कुछ नहीं है । छोड़ना कुछ नहीं है । इस समयके पार जब दिन निकलेगा , भले ही थोड़ा कठिन हो, हमको , हमारे रिश्तों को और मजबूत कर के निकलेगा । हम बहीनहीं लिखते रहेंगे , हम ज़िंदगी का साथ निभातेचलेंगे ।

समय किसी के रोके नहीं रुकता है । यह समय भी नहीं रुक रहा । जीवन अपनी ही चाल से चलता है । हम सबका समय निश्चित है । देखना ये है कि हमारी ज़िंदगी लम्बी जितनी हो सो हो, बड़ी कितनी होती है ?बाबू मोशाय ! ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए , लम्बी नहीं

हम इसे एक नए युग के सूत्रपात की तरह देखें । आने वाला समय हम साथी हाथ बढ़ानाके अंदाज में बिताने के लिए खुद को तैयार करते चलें । जन्म, काल , स्थान ये सभी संयोग की बातें हैं । इन सब के परे चले जाना ही मोक्ष है । मोक्ष इसी जीवन में है, इससे बाहर नहीं ।

लेकिन सब होगा कैसे ?

वही ! मन !

मन समझते हैं न आप’?

मन को मनाए रखिए । बस ।

मन तो हो रहा है इस्स...कह दें !!   

  

क्रम- भंग 3 : अच्छी चीज़ों का देखा जाना ज़रूरी है

 

मेरे घर के सामने एक घर है । घर के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है । कोरोना ने शायद शहर में गुजारा कर पाना मुश्किल कर दिया होगा । लोग गाँव चले गए होंगे । और ठीक होंगे । जो जहाँ हैं, वहीं रहें ; ठीक रहें ! उसी घर में बेटे का एक दोस्त भी रहता है । शुरुआती दौर में बेटे से उसके दोस्त के बारे में पूछा भी । अब न तो मैं कुछ पूछता हूँ, न वो कुछ कहता है । कोरोना ने जीवन के कई पहलू उलट-पलट दिए हैं ।

 लॉक डाउन के बढ़ाए जाने की खबरें हैं । बढ़ती हुई संख्या को देख कर इसका बढ़ाया जाना तय ही लग रहा है । अभी दो हफ्ते में ही लोग उकताने लगे हैं । ज्यादा लंबा हो तो बौखला न जाएँ ! मसला बीमारी को रोकने का तो है हीलेकिन यह भी है स्वस्थ और जवान जनसंख्या बिना काम, बिना आय करे भी तो क्या ? बीमारी भी गंभीर है तो दूसरी समस्या भी कम गंभीर नहीं । जीवन बचाना जरूरी है । जीवन जीना भी जरूरी है । जीते रहना भी जरूरी है।

 क्या करें, क्या ना करें ?

 सड़क पर कुत्ते मरियल-से लगने लगे हैं । कबूतर कम दिख रहे हैं । आम में मंजर हैं । मंजर की भीनी खुशबू भी है । कोयल गा रही है । शुक्ल पक्ष का चाँद चमकता भी है । बादल भी छाए हैं । बारिश भी हो गई है । घर से निकलने का मन भी है । घर से निकलने में डर भी है ।

 क्या देखें, क्या ना देखें ?

 फिर से दि लल्लनटॉप। इस बार दि लल्लनटॉपअड्डा । और अड्डे पर हैं अभिनेत संजय मिश्रा । बड़ा अपना-स लगता है । अपना-अपना-सा लगता है । जब कुछ अपना-सा लगता है तो अच्छा-अच्छा लगता है । सारी समस्याएँ हैं, लेकिन उनका अंत भी होगा । हल निकलेगा। जीवन जरूर बदलेगा । जीवन के तौर-तरीके बदलेंगे । गंगा-जमना का पानी, हवा, आसमान – सभी कह रहे हैं कि अब बदलना लाज़िमी है । बदलना जरूरी है।

 लाखों लोग फँसे हैं । आस-निरास के घनघोर भँवर में । और लाखों लोग हैं जो सामना कर रहे हैं एक अजाने-से शत्रु का । दूसरे लाखों लोग हैं जो लड़ाई लड़ रहे हैं हमारे-आपके-सबके लिए । और बचे हुए करोड़ों लोग हैं जो आशंकाओं से घिरे हैं । साथ ही दुआ कर रहे हैं , उम्मीद कर रहे हैं – सब ठीक होगा । सब ठीक ही होगा । जब करोड़ों लोग दुआ कर रहे हों तो दुआ को फलना ही होता है ।

 फिर वही बात – डर तो एक कुत्ता है । दम साधे चलते रहिए , काटेगा नहीं ।

 कई बार किताब पढ़ लेने के बाद , उसकी पंक्तियाँ तो याद नहीं रहतीं , सबक याद रह जाता है। कई बार बहुत-बहुत लंबी बात कर लेने के बाद भी एक शब्द तक याद बहीं रहता – बस एक अहसास साथ रह जाता है । इस कोरोना- काल के बाद हमें इसके ब्योरे याद रहें या न रहें , इसके सबक तो हमारे साथ रहेगा ही । रहना ही चाहिए , यदि जीने का मतलब जीना रखना हो तो !

 ज़िंदगी एक ही मिलती है । जो करना है, जो छोड़ना है सबके लिए यही ज़िंदगी है । ज़िंदगी से नाराज़ मत रहिए । कभी ज़िंदगी ज़रा-सा भी नाराज़ हो जाए तो जीना मुश्किल । देख ही रहे हैं !!

 क्या-क्या करना है , यह सोचा जाए । कैसे करना है , यह सोचा जाए । ज़बरदस्ती का ही सही, समय मिला है । सोचा जाए । फिर किया भी जाए । यह मत देखिए क्या-क्या नहीं मिला है , यह देखिए कि दे क्या-क्या सकते हैं, किया क्या-क्या जा सकता है । सकारात्मक बातों पर ही ध्यान केंद्रित रखें तो भी ज़िंदगी फट से गुज़र जाएगी । नकारात्मक बातों के लिए , देखा जाए, तो समय है नहीं । हम ही बेकार उसमें समय बर्बाद करते रहते हैं । 

 निदा फ़ाज़ली याद आ रहे हैं –

            छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार

            आँखों भर आकाश है बाँहों भर विस्तार

 मैं इंतजार कर रहा हूँ लॉक डाउन-समाप्ति की घोषणा की । सामने वाले घर के दरवाजे के ताले के खुलने की । बेटे और उसके दोस्त के फिर से खेलने की ।  जानता हूँ , वो फिर से ज्यादा खेलेंगे । जानता हूँ , मैं फिर टोकूँगा । लेकिन टोकने टोकने में फर्क होगा। होगा ही होगा ।

 किसी ने एक वीडियो भेजा है । एक मोर पूरे पंख फैलाए बीच सड़क पर नाच रहा है। बादल घिरे होंगे । हवा चली होगी । मोर मगन हुआ । नाच रहा है , बेखबर । पीछे से एक पुकार सुनाई देती है – मम्मीईईईई.......! अच्छी चीज़ों का सबके द्वारा देखा जाना ज़रूरी है । हमेशा ही । आज तो ज्यादा ही !  

 

हारा हुआ आदमी

 

सब्जी की दुकान है । लॉक डाउन है । और न हो तो भी । वे लगे हुए हैं सब्जियाँ उठाने में, पसंद करने में । सारी की सारी पसंद कर ली जाएँ तब तुलें न ! वे इस भाव से लगे हैं कि दुनिया आज खत्म होने ही वाली है । कम-से-कम सब्जियों के लिए तो जरूर ।

और भी लोग लगे हैं लाइन में । ज्यादातर लोग लाइन में लगे रहने के लिए ही बने होते हैं। मगर कुछ ऐसे भी होते हैं जो मजबूरी में ही लाइन लगते हैं । मजबूरी, कभी-कभार ही सही, आ ही जाती है । आज भी है । बढ़ती हुई धूप के साथ उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है । कहीं दुकान बंद न हो जाए ! कहीं सब्जियाँ खत्म न हो जाएँ ! दुकान वाला बीच-बीच में मोरल साइंसभी पढ़ा रहा है – लाइन से ! दूरी बना के ! हालाँकि  ये कोई अलग से सिखाने की बात नहीं है । पर हमारा देश ऐसा ही है । जोर से समझाइए । जोर दे कर समझाइए, तभी समझते हैं लोग । कुछ लोग फिर भी नहीं समझते । इसीलिए हमारे यहाँ पुलिस बड़े काम की चीज है । आज भी । पुलिस वालों के डर से और उनके ही दम से तो दुकानदार मोरल साइंसपढ़ा रहा था । वरना सुनता कौन ? जो जहाँ खड़ा हो जाता है, लाइन वहीं से शुरू हो जाती है !

एक भाई साहब बीच में घुस पड़े हैं लाइन के । उनको कुछ नहीं लगता – न नियम, न रोग ! न ही कोई रोक-टोक ! हेल्मेट जो पहने हैं ! अव्वल तो हमारे यहाँ समय रहते टोकने की प्रथा है नहीं , फिर जब तक पता चलता है, तब तक तो सामने वाला आधा काम निपटा भी चुका होता है । हेल्मेट वाले भाई साहब ने बास्केट उठाया, फटाफट सब्जियाँ चुनीं दुकान वाले को बढ़ा दिया । पीछे से भुनभुनाहट हुई भी । उन्होंने समझा दिया बस 2-3 सब्जी ही तो है! दुकानदार ने भी कहा – इनको जल्दी से निपटा लेते हैं । फिर एकदम लाइन से ! हल्ला-गुल्ला होगा तो.... और दूर खड़े पुलिस वाले की ओर देख लिया । ऐसे समय पर लोग समझदार हो उठते हैं । सब चुप रहे । ट्रैफिक जाम में कैसा होता है – जो जबरन ओवरटेक कर के आगे बढ़ जाता है, उसी के लिए जगह निकलवा कर ट्राफिक शुरु भी किया जाता है अक्सर !

अब एक हेल्मेट वाले थे । और एक बड़े वाले, जो निश्चिंत भाव से सब्जियाँ पसंद किए जा रहे थे ।

पीछे थोड़ी दूर पर उद्घोषणा हो रही थी – अत्यंत आवश्यक होने पर ही निकलें । दूरी बनाए रखें । इसेन्शियलकार्यों के लिए ही निकलें ।

कई बार आपने देखा होगा, सड़क छेक कर चलते लोगों पर गाड़ियों के हॉर्न का रत्ती भर भी असर नहीं होता । वे यह मान कर ही चलते हैं , हॉर्न किसी और के लिए ही बजाया जाता है, उनके लिए नहीं । उद्घोषणाओं और चेतावनियों का भी हश्र होता है – दूसरों के लिए की जाती हैं । 

बड़े वाले का पसंद करना हो चुका था । उसको देखकर सहज ही यह सवाल उठना चाहिए कि क्या कारण है, इतने -ऐसे का ? - - भय, आशंका, शंका, लोभ, पैसा.....?? लेकिन सवाल उठा नहीं। उठता नहीं ।

दरअसल ऐसा आदमी मनुहारों, फटकारों और आदतों के सामने लाचार होता है । और जब सारी की सारी शक्तियाँ लगी हों तब तो आदमी बस निमित्त मात्र बन कर करने लग जाता है – न समझना कुछ, न समझाना कुछ, न शोक, न चिंता, न संतोष, न लाज, न लिहाज --  बस करने लग जाता है । हर तरफ से बँधा हुआ, लाचार, हारा हुआ !!

मैंने अपने आगे वाले भाई साहब को आगे बढ़ने और थोड़ा जल्दी करने के लिए कहा । मेरे दोनों हाथों के झोले भी अब खुल चुके थे । 


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