गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

स्मृतिबन्‍ध

 




स्मृतिबन्‍ध

 

सारी बातें अपने ही मन को मनाने के लिए होती हैं ।

अभी तो साल शुरू हुआ था ! और अब, बस खतम...!

फिर नया वर्ष आने को है । एक नया वर्ष चैत में भी आएगा । जीवन का एक नया वर्ष जन्मदिवस से भी शुरू होगा । हम जीवन में नयेपन की तलाश में फिरते रहते हैं । कुछ नहीं तो ई कोठी का धान उ कोठी’ ! कहते हैं कविता में भी कुछ नया होना चाहिए, तभी कविता होती है । नयापन उत्साह का संवाहक होता है । भय और संशय का भी हो सकता है, लेकिन भाता वही नयापन है जो मन को उत्साह और उमंग से भर दे ।

मनुष्य का जीवन स्मृतियों से बना हुआ है । जिसे हम जीन्‍सकहते हैं, वह भी तो स्मृति-पुञ्‍ज ही है ! जाने कितनी पीढ़ियों की बातें हममें प्रकट होती रहती हैं । जीवन जाने कब कबकी बात याद कर ले !   हर क्षण प्रतिक्षण स्मृतियों में बदलता जाता है ।  यह साल भी !

विक्रम संवत् के महीने शुरू होते हैं कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से । लेकिन नया वर्ष शुरू होता है चैत के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से । ऐसा क्यों? इसीलिए न कि हम आगे देखें तो उज्ज्वलतर चीजों की ओर देखें ? हम जीवन में शुक्ल पक्ष के आकांक्षी हों । तो फिर महीने कृष्ण पक्ष से क्यों शुरू होते हैं ? वह इसलिए कि हम जीवन में थोड़ी कठिनाई, थोड़े संघर्ष सबको पार करते हुए पूर्णिमा के चाँद की तरह पूर्णता की ओर अग्रसर हों ।

स्मृतियाँ बन्‍धन नहीं होतीं । वे बाँधती नहीं मुक्‍त करती हैं । बाँधता तो मोह है । स्मृतियाँ प्रबन्‍ध हैं । हमें ऐसा लगता है कि जीवन का प्रत्येक दिन एक अलग मुक्‍तक है, लेकिन स्मृतियों का एक प्रबन्‍ध काव्य है हमारा जीवन ।  स्मृतियों से रचा हुआ प्रबन्‍ध काव्य । बस, इसमें यही है कि हम पन्ने पलट कर आगे नहीं जा सकते । जब समय आएगा, पन्ने तो तभी पलटे जाएँगे और तभी हम पढ़ पाएँगे कि उनमें लिखा क्या है । जिस तरह किताबों में कई लोग कुछ पंक्तियों को अंडरलाइन करते चलते हैं, हमारा मन भी कुछ स्मृतियों के नीचे लाइन खींच देता है । यह लाइन एक हाइपरलिंक बन जाती है । उस पर क्लिक कीजिए तो जीवन का एक अलग पृष्‍ठ खुल जाता है । फिर उस पृष्‍ठ पर कितनी सारी स्मृतियाँ। उनमें से कुछ के नीचे खिंची हुई लाइन, एक और हाइपरलिंक बनाती हुई ।  

शैलेन्‍द्र ने एक गीत में लिखा है –“ कि मर के भी किसी को याद आएँगे/ किसी के आँसुओं में मुस्कुराएँगे ” । हम सभी याद आना चाहते हैं , और एक भले ,एक अच्छे व्यक्ति के रूप में याद आना चाहते हैं । ये यादें ही हमारी असली कमाई हैं । जावेद अख्तर कहते हैं –“ मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम”

किसी मंदिर के पास से गुजरते हुए अगरबत्ती की बहुत मीठी सुगंध नाक में भरती है, आपको कोई पुरानी जगह याद आ जाती है। किसी खिड़की से घी में बनते हुए परौठे की सुंगंध आपके कदम रोक लेती है , रात की रानी की खुशबू का झोंका मन-प्राण को सहला जाता है, रूई के  फाहे पर इत्र की सुवास बचपन के किसी दुपहर की याद दिला जाती है । कोई पुराना प्रियास्कूटर पास से गुजरता है, किसी के बाल बनाने का अंदाज, किसी के मुस्कुराने का अंदाज – याद के कितने सारे ट्रिगर प्वाइंट हैं ! दरअसल हमारे अंग-प्रत्यंग में स्मृतियों का वास है ।

स्मृतियों का जितना महत्त्व है, उतनी ही बड़ी नेमत है भूलना भी ।  यदि हमें एक-एक बात याद रहने लगे तो जीना मुश्‍किल हो जाए । संगीत या कविता में यति-गति की बात करते हैं , ताल में मात्राएँ गिनने में ताली और खाली की गिनती करते हैं । ताल का सौन्‍दर्य ताली में तो है ही, खाली उस सौन्‍दर्य को बढ़ाता है, उभारता है । खाली जगहों की बहुत जरूरत होती है जीवन में । भूलना हमें स्पेस देता है । यह अलग बात है कि कुछ लोगों का भूलना सेलेक्टिव होता है ।

कुछ स्मृतियाँ अपने में दंश छुपाए भी होती हैं । स्मृति-दंश को जड़ से खत्म कर पाना लगभग असंभव है । उनको नियंत्रित किया जा सकता है, सुषुप्‍तावस्था में रखा जा सकता है । ऐसी स्मृतियाँ खींच-खींच कर हमें अपने गुजरे हुए समय में ले जाना चहती हैं। 

कई बार ऐसा लगता है कि समय नहीं गुजर रहा, हम गुजर रहे हैं । अलग-अलग समय खड़े रहते हैं, हम उनमें से होकर निकलते चलते हैं । एक ही साथ कई-कई समय उपस्थित रहते हैं ।  कुछ साल पहले, बरसों बाद ट्रेन के अनारक्षित डब्बे में सफर करने की स्थिति बनी । उस सफर के दौरान बार-बार यह लगता रहा है कि वह समय तो उपस्थित है अपनी आवाजों मे, अपनी बातचीत के मुद्दों और तरीकों में, अपनी चिंताओं और योजनाओं में । मैं अब उस समय से निकल कर किसी और समय में पहुँच चुका हूँ । आपने ध्यान दिया होगा कि जब हम अपनी स्मृतियों में प्रवेश करते हैं तो हमारी देह-दशा, हमारी काया तो अभी की रहती है लेकिन स्मृति में आने वाले व्यक्ति, वस्तु और स्थान वैसे ही रहते हैं , जस का तस ।  स्मृतियाँ हमारे जीवन के दो अलग-अलग समयों को एक साथ खड़ा कर देती हैं । क्या स्मृतियाँ सन्धिकाल हैं? क्या वे जागा हुआ सपना हैं ?  अपने निकटतम से निकटतम एवम् प्रिय से प्रिय व्यक्तियों और स्थानों को हम अपने जीवन का कितना हिस्सा दे पाते हैं ? हम सब अपने-अपने जीवन को अपने तईं सार्थक बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसमें छोटे-बड़े और सही-गलत का कोई प्रश्‍न नहीं होता । जो भी है, वह बस होताहै । यह तो स्मृतियाँ हैं जो हम जीवन-मात्र से ही जुड़ाव महसूस करते चलते हैं ।

हमारे अनुभव स्मृतियों को बनाते हैं । स्मृतियाँ हमें । हम किस छापके हैं, यह तय करने में हमारी स्मृतियों का बहुत बड़ा हाथ होता है । हम कहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । क्यों कहते हैं ? हमारे जीन्‍स’, हमारे गुणसूत्र में छपा हुआ है । हमें साथ चाहिए । यह फेसबुक, व्हाट्‍सेप, एक्स, इन्‍स्टा इतनी व्यापकता के साथ क्यों उपस्थित हैं ? हमें साथ चाहिए । हम अपनी यादों को, अपने होने की यादों को एक-दूसरे की यादों में दर्ज करना चाहते हैं । हम जुड़ना चाहते हैं। जिस परिवार, जिस मुहल्ले, जिस समाज का लोप होता जा रहा है, हम उसे बचा लेना चाहते हैं । हमारे जीन्‍सकी छाप हमारे निष्ठुर होते जा रहे परिवेश से बगावत कर रही है ।

 नदी, पहाड़, पेड़, जंगल, खनिज, पोखर-ताल, फूल, फल, ऋतुएँ, जाने क्या-क्या हमारी सामूहिक स्मृतियाँ हैं । हमारी सामूहिक स्मृतियाँ इन्हीं से बन भी रही हैं । हम इनसे बन रहे हैं । इसके साथ-साथ वैज्ञानिक, आर्थिक, भौतिक जगत में हमने खासी तरक्की कर ली है, और लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं ।  कुछ बातें स्मृति-पटल से मिटती भी जा रही हैं । पंचम वर्णों में ,,का चलन बंद होता जा रहा है । चन्‍द्रबिन्‍दु गायब ही हो चुका है । संस्कृत उपेक्षा का शिकार हो चुकी है । संस्कृत तो जैसे आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपु:जैसी चंद सूक्तियों में सिमट गई है । कहावतें और मुहावरे अपनी आभा खो चुके-से हैं । जिन चीजों को हम उपयोग से बाहर कर देते हैं, वह हमारी स्मृतियों से भी बाहर हो जाती हैं ।

 कोयल कूक उठती है, आम के मंजर की सुगंध मदमाने वाली लगती है, सेमल का एक फूल धप् से गिरता है । गूगल ने  मेरी टूटी-फूटी अंग्रेजी के वाक्य “ Believe it to Have it” का संस्कृत में मोटामोटी अनुवाद किया है --  यत् भावो तत् भवति। नीति वाक्य के रूप में यह जँच गया है । मन को मनाने के ये सारे प्रॉम्प्टहैं । जिंदगी एक नाटक है न !

 सारी जुगत तो मन को मनाने की ही है । ऐसा लगता है जैसे परीक्षाएँ चल रही हैं और हर पेपर के बाद मन को यह समझाया जा रहा है कि अब आगे के पेपर अच्छे से देना है ! परीक्षा देकर  फेल करना हमेशा ज्यादा अच्छा है बिना परीक्षा दिए फेल करने से। और जीवन की परीक्षा में तो फेल होने का चक्कर भी नहीं है । जैसा चाहो, वैसा पाओ । यत् भावो तत् भवति!

अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार साल खत्म हो रहा है । तो, नया शुरू भी तो हो रहा है । फिर चैत है, फिर जन्मदिन है ...एक कैलेण्डर तो मन के भीतर भी है । उसमें रोज एक नया साल शुरू होता है ।


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