शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती - ३

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती - ३


आदरणीय सम्पादक जी,

प्रणाम स्वीकारें ।


कहनाम यह है कि बहुत हिम्मत जुटा कर आपको लिखने का जतन कर पा रहे हैं। एक ऐसा लेखक जो डेढ़ सौ शब्द की एक टिप्पणी भी ढंग से नहीं लिख पाता, यदि सम्पादक जी को पत्र लिख बैठे तो क्या ही कहा जाए ! आप तो हमारा नाम भी नहीं सुने होंगे। कुछ कवि, लेखक, आलोचक, सम्पादक-सहायक सम्पादक आदि के हाथ-पैर जोड़ रहे हैं; किसी का दिल पसीज गया तो आप तक मेरा नाम भी पहुँचा देंगे वे । 

         आप पर जितना दबाव रहता है, आप जिस तनाव में रहते हैं, उसे दूसरा कोई भी व्यक्ति समझ नहीं सकता । उस पर आप हिन्दी के सम्पादक हैं । सारे के सारे सम्पादक अवैतनिक ! अब आदमी मठाधीशी भी न‌ करे तो‌ क्या करे‌ । खैर ।  हाल‌ तो यह है -- 'ठण्डा मतलब कोकाकोला' भले हो जाए, हिन्दी मतलब क्या, इसका सही अंदाजा तो लग ही नहीं पा रहा । पहला सवाल तो यह कि हिन्दी किसकी -- मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा जैसे कितने प्रश्न जाने कब से हवा में तैर रहे हैं । फिर यह सवाल कि लेखक कौन ? जिसको भी लिखना आए वह लेखक । जैसे, जो भी अपना नाम लिख सके वह साक्षर !! इतना लिखा जा रहा है कि अच्छा लेखन भूसे में सूई ढूँढ़ने जैसा होता जा रहा है। जब हमारे जैसा लेखक भी समझ लेता है कि 'उसका लेखन मेरे लेखन से बेहतर कैसे?' , फिर उसके बाद बचता ही क्या है ?  शायद इन्हीं कारणों से आपने सम्पादन की नैया भाग्य की पतवारों के भरोसे छोड़ दी है । वैसे भी समय कहाँ है आपके पास ? दुनिया भर के कितने तो काम होते हैं आपको। आपने 'रेफरल' सिस्टम को अपना लिया है । रेफरल यानी सिफारिश । किसी की सिफारिश के साथ रचना पहुँचे तो स्क्रूटनी के नियम शिथिल किए जा सकते हैं । अगर किसी की वजह से कोई तगड़ा विज्ञापन मिल रहा हो तो फिर बात ही क्या है ! विज्ञापन की आशा हो तो सम्बन्धित लेखक की पुस्तकों, साहित्य में उसके अवदान की प्रशंसात्मक समीक्षा छापने के उपाय स्वत: कर लिए जाते हैं ।

          हिन्दी आपकी अपनी ही भाषा है । आप जैसे चाहे इस्तेमाल करें । वर्तनी की टाँग तोड़ें, चाहे व्याकरण की बाँह मरोड़ें। हाँ, अँगरेजी या उर्दू के शब्द हों तो 'अतिथि देवो भव' करना पड़ता है । 

          आप या आपके लोग लेखकों को रचना की पावती की सूचना देना भी जरूरी नहीं समझते। वैसे ठीक ही है , लेखन की पहली शर्त ही है धीरज ।  फिर, आपको माल भी एकदम ताजा चाहिए। वह भी फ्री ऑफ कॉस्ट ! पहले कहीं छपी हुई चीज तो बिल्कुल ही नहीं । हाँ,  रेफरल सिस्टम से आया हुआ कुछ हो, या खुद रेफरी का ही कुछ हो, तब नियमों को शिथिल करने में कोई दोष नहीं लगता --  सब शुद्ध-सात्विक माना जाता है ।'मुफ्त की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते' कहावत को आपने झुठला दिया है । बदले में आप लेखक को वह चीज देते हैं, जो उसे अपने घर में भी शायद ही प्राप्त होती हो -- प्रतिष्ठा । आदमी जीता क्यों है, प्रतिष्ठा के लिए ! लेखक हो , तब तो एकदम पक्का । 

            आप अटल हैं ।आप अपनी धारणा के विपरीत नहीं जा सकते । लेखक को सेटल होना है, वह आपकी धारणा के विपरीत नहीं जा सकता। साहित्य की धारा धारणाओं के आधार पर बनती है । साहित्य बहती गंगा है, बशर्ते आपको धारा के साथ बहना आता हो । आप एक परम्परा का इसलिए विरोध कर सकते हैं कि आपको किसी दूसरी परम्परा की लीक पीटनी है । साहित्य क्या है --  कुछ बीज-शब्दों के इर्द-गिर्द  शब्दों का नृत्य ! आप लेखक बनाते हैं, लेखन को सींचकर उसे स्वयं पनपने नहीं देते -- अराजक बेलें सुन्दरता को ढॅंक ले सकती हैं । आपको साँचे में ढले लेखक पसन्द आते हैं । लेखक प्रिय हो, तो कुरुचि-सुरुचिपूर्ण जैसी भी हो, रचना श्लाघ्य हो जाती है । आप स्वयं अपने श्रीमुख से उसकी प्रशंसा करते थकते नहीं, अपने करकमलों से उसे शेयर करते ऊबते नहीं।

            आपने कठोरता को सत्य का पर्याय मान लिया है । जितनी ज्यादा कठोरता, उतनी ज्यादा सत्य की पक्षधरता । साहित्य, राजनीति, साहित्य की राजनीति, राजनीति का साहित्य -- मोटा-मोटी यही साहित्य है । इसके अलावा तो सब सिलेबस वाली पढ़ाई है ।  साहित्य दुःख भरा तालाब है, कष्टों का पहाड़ है, विरोध की रेल है । आपके जानते जीवन में जो भी सुन्दर है, स्वादु है, नफीस है -- सब विलासिता है, जो जीवन के लिए कतई आवश्यक नहीं । इसीलिए त्याज्य है । 

             इतना लिखते-लिखते हम समझ गए हैं कि इनमें से कोई भी बात आप पर लागू नहीं होती । ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कुण्ठित लेखक की आत्मा कलम पर सवार हो गई है। सम्पादक और लेखक के बीच तो प्रेम-सम्बन्ध होता है -- क्षणे तुष्टा, क्षणे रुष्टा ! छप गए तो प्यार, नहीं तो मार !


जो भी हो, धुआँ दिखे तो मानना चाहिए कि कहीं न कहीं आग भी लगी होगी...l 


बाकी सब कुशल-मंगल ।


शेष फिर ।


आपका अपना,

सिद्धप्रसिद्ध

उर्फ बुरलेल जी 


***
मैथिली में 'बुरलेल' आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो मूर्ख, नासमझ, बुद्धिहीन, या बेवकूफ हो। कभी-कभी इसे बहुत सीधे-साधे या मंदबुद्धि व्यक्ति के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

‘बच्चन के स्वर में बच्चन’ के बहाने





‘बच्चन के स्वर में बच्चन’ के बहाने

[ यह निबन्‍ध आठ वर्ष पहले लिखा गया था ]  

 

बरसों पहले एक एल.पी रेकॉर्ड आया था जिसमें हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का पाठ उनके अभिनेता पुत्र अमिताभ बच्चन ने किया था । इसके साथ ही एक और रेकॉर्ड था जिसमें मधुशाला की चुनी हुई रुबाइयों को गायक मन्ना डे ने गाया था । इसमें एक रुबाई स्वयं बच्चन जी की आवाज़ में भी थी । बच्चन जी मंच के एक अति-लोकप्रिय कवि थे । उनके कण्‍ठ की प्रशंसा हर जगह थी। ध्यान रहे कि यह रेकॉर्ड तब आया था जब यू-ट्यूब जैसे साधन नहीं थे । आज तो कवियों की कविताओं का पाठ अलग-अलग क्षेत्र के लोग कर रहे हैं। कुमार विश्वास, मनीष गुप्ता, नीलेश मिश्रा ऐसे कुछ नाम हैं जो हिन्दी कविता को लोगों के सामने वीडियो के माध्यम से ला रहे हैं ।

पहले की कविताएँ गेय हुआ करती थीं। यह शायद वाचिक परम्‍परा का असर था । नई कविता के आने, बल्कि निराला के द्वारा कविता को छन्‍द-मुक्त करने के बाद,  कवितायें श्रव्य से ज्यादा पाठय् रूप में सामने आने लगीं । हाल के वर्षों में तो मंच पर सिर्फ और सिर्फ हास्य कविताओं का बोलबाला हो गया है।

आज से कोई चालीस वर्ष पहले कविताओं का रेकॉर्ड निकाला जाना एक बड़ी घटना थी । बड़ी इसलिए कि हिन्दी कविताओं का कोई अलबम उसके पहले नहीं आया था। और आया भी हो तो प्रसिद्ध नहीं हुआ था । रेकॉर्ड के कवर पर बच्चन जी की उक्ति थी कि “कविता लिखना कला है तो कविता पढ़ना भी कला है ।” यह भी कि अमिताभ बच्चन के पास कविताओं के प्रति न्याय करने के लिए आवाज के साथ, जो उससे भी महत्त्वपूर्ण गुण है, वह है इन कविताओं के साथ उनकी तन्मयता-एकात्मता । इस रेकॉर्ड का महत्त्व यह भी है कि यह सिद्ध करता है कि पढ़ने आता हो तो छन्‍द-मुक्त कविताएँ भी सुनने में आनन्‍द देती हैं और ढंग से पढ़ी जाएँ तो ऐसी कविताओं की पंक्तियाँ भी याद हो सकती हैं । साधारण तौर पर देखें तो हिन्दी कविता अपनी पैठ खोती जा रही है । इसका कारण है कविताओं का छन्‍द में नहीं होना या उसका स्मरण करने में कठिन बन जाना है । कविताएँ अगर याद न हो पाएँ तो उद्धृत नहीं की जाएँगी, और अगर "कोटेबल" नहीं हैं, तो कविताओं की महत्त्व कम हो ही जाता है । ध्यान दे कर देखें कि लोग "कोट" क्या करते हैं- शेर या फिर पुरानी कविताएँ । ऐसा इसलिए कि शेर और कविताएँ लोगों की जुबान पर आसानी से चढ़ जाती हैं और एक तरह से मुहावरों का स्थान ले लेती हैं । नई कविता के साथ दिक्कत यह भी हो गई है उसे सिर्फ तथाकथित हिन्दी के साहित्यकार ही पढ़ते-सुनते हैं । पाठक/श्रोता शायद किसी को चाहिए ही नहीं ।

इन बातों के बर-अक्स ‘बच्चन के स्वर में बच्चन’ को देखें । ठीक है कि अमिताभ बच्चन एक ऐसा नाम था जो किसी भी चीज की लोकप्रियता निश्चित कर सकता था, पर उनकी भी हर फिल्म हिट नहीं होती । फिर यह तो एकदम हिन्‍दी कविता की बात थी । एक जोखिम ही था म्यूजिक कम्पनी के लिए और शायद बच्चन जी और अमिताभ बच्चन के लिए भी । इस कैसेट में बच्चन जी की चौदह कविताएँ संकलित की गई हैं जो गेय नहीं, पढ़े जाने के लिए हैं । एक दूसरे रेकॉर्ड ‘मधुशाला’ की तरह इसमें कवि की आवाज में कुछ भी नहीं था । जहाँ मधुशाला में बच्चन जी की आवाज़ में एक रुबाई का होना रेकॉर्ड का टोन तय करता है और श्रोता को थोड़ा-सा नॉस्टैल्जिक भी करता है, ‘बच्चन के स्वर में बच्चन’ में पूरा दारोमदार अमिताभ बच्चन की अदायगी पर है । अमिताभ बच्चन अपनी असरदार आवाज के लिए जाने जाते हैं और लोग उनके मुँह से ‘गब्बर सिंह अपने आदमियों से कह दो अपनी बंदूकें फेंक दें’ जैसे डायलॉग सुनने के आदी थे । फिल्मों में तो दृश्य का भी अपना अलग असर होता है, यहाँ उन्हें अपने पिता की कविताओं का पाठ करना था और इस तरह करना था कि श्रोता के हृदय तक कविता अपने सही भावों और अर्थों के साथ पहुँच जाए । भवानी प्रसाद मिश्र ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था "गद्य आपको सुनते ही याद नहीं हो जाता, जबकि कविता हो सकती है यानी कविता वक्त पर काम आती है... छन्दहीन कविता की सबसे बड़ी खराबी यही है कि उसकी कोटेबिलिटी अर्थात उद्धृत करने की भी योग्यता कम हो जाती है।" ऐसे में एक ऐसे कवि की बिना छन्‍द वाली कविताओं का पाठ, जो अपने मंच के गायन/पाठ के लिए प्रसिद्ध रहा हो, चुनौतीपूर्ण था । दूसरी चुनौती यह थी कि यह कविता पाठ एक ऐसे अभिनेता के द्वारा किया जाना था जिसकी छवि "एंग्री यंगमैन" की थी । इस अलबम में छोटी-बड़ी चौदह कविताएँ हैं । पार्श्वसंगीत या इंटरल्यूड के रूप में मुरलीमनोहर स्वरूप का संगीत है । मुकेश के द्वारा गाए हुए रामचरितमानस के संगीतकार भी मुरलीमनोहर स्वरूप ही हैं । चौदह कविताओं में ‘अग्निपथ’, ‘जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला’, ‘मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़’, ‘कोयल कैक्टस और कवि’, ‘बुद्ध और नाच घर’ जैसी कविताएँ हैं ।

इन कविताओं को सुनते वक्त आप आसानी से महसूस कर सकते हैं कि अमिताभ बच्चन ने कविताओं को कविता के लिए  उचित ठहराव के साथ पढ़ा है । ऊपर जिस तन्मयता-एकात्मता की बात की गई है, उसी में आगे बच्चन जी कहते हैं कि इन कविताओं के साथ उनकी तन्मयता-एकात्मता है जो पिता-पुत्र के आजन्म संपर्क-संस्कार से उन्हें मिली है । ‘अग्निपथ’ कविता को बहुत संभव था कि अमिताभ अपनी लोकप्रिय सिने-छवि के अनुरूप एंग्री यंगमैन के अंदाज़ में पढ़ जाते । इस कविता को उन्होंने एकदम ठहर कर पढ़ा है । पूरी कविता किसी गुस्से में नहीं, बल्कि स्थिति को जानने व स्वीकार करने के भाव के साथ पढ़ी गई है । ‘जीवन की आपाधापी’ में एक ऐसी कविता है जिसे अमिताभ ने कई मौकों पर पढ़ा- सुनाया है । यह अपेक्षाकृत एक लम्‍बी कविता है । यह कविता जब आप पढ़ते हैं तो उसमें भावों का एक तेज प्रवाह अनुभव कर सकते हैं । इस कविता के पाठ की भी यह विशेषता है कि यह भावों के सारे प्रवाह का अनुभव आपको कराती है, बिना किसी शब्द के उच्चारण को कम या ज्यादा महत्त्व दिए । बहुत संभव था कि प्रवाह के लोभ में संप्रेषणीयता दरकिनार हो जाती । उसी तरह जब आप ‘मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़’ सुनते हैं तो आप खुद उस भावलोक में पहुँच जाते हैं जहाँ आप भी कहें कि “ मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़” । ‘बुद्ध और नाचघर’ इस संकलन की सबसे लम्‍बी कविता है, जिसमें अमिताभ अपनी आवाज की लोच का बखूबी इस्तेमाल करते हैं । ‘कोयल कैक्टस और कवि’ में जब आप ये पंक्तियाँ सुनते हैं कि "किसी विवशता से खिलता हूँ / खिलने की साध तो नहीं है, जग में अनजाना रह जाना / कोई अपराध तो नहीं है" तो आप एक जीवन-दर्शन पाते हैं और पंक्तियाँ एक सूक्ति की तरह आपको याद हो जाती हैं । एक साक्षात्कार में हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध डायरेक्टर राजकुमार हिरानी ने अमिताभ की विशेषता के बारे में बोलते हुए कहा है कि अमिताभ बच्चन जिस तरह संवाद अदायगी में स्वर के आरोह-अवरोह का नियंत्रण रखते हैं वो एक साधारण से संवाद को भी रोचक और महत्त्वपूर्ण बना देता है । यह बात नोट करने लायक है । अब चूँकि छन्‍द कविता से बाहर है, तो गाया जाना संभव नहीं । गाई हुई कविता याद आसानी से होती ही है । तो अब ऐसे में आप कविता की अदायगी कैसे करते हैं वह बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है । बल्कि यों कहें कि कविता में अभिनय कला का समावेश सम्प्रेषण के लिए जरूरी हो गया है, तो बात गलत नहीं होगी । कविता में अब संवाद अदायगी की अदा उसको ग्राह्य बनाती है । यह ‘बच्चन के स्वर में बच्चन’ ने दिखा दिया था । बाद में कैफ़ी साहब की आवाज में ‘कैफियत’ और नीरज की आवाज में उनके कविता संकलन ने भी । मनीष गुप्ता के द्वारा  बनाए गए वीडियो में, जो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है, पुष्पा भरती द्वारा कनुप्रिया का पाठ भी सुन कर देखिए ।

बच्चन जी की कविताओं के दोनों रेकॉर्ड 'मधुशाला' और 'बच्चन के स्वर में बच्चन' आज भी प्रसिद्ध हैं । इन रेकॉर्ड्स के बाद और भी ऐसे प्रयास हुए हैं । नीरज की आवाज़ में उनकी कविताओं का रेकॉर्ड और कैफी साहब की आवाज़ में उनकी नज्मों और ग़ज़लों के रेकॉर्ड भी लोकप्रिय और संग्रहणीय हैं । हमारे देश का साहित्य हमारी धरोहर है। आज जबकि लोग साहित्य से दूर होते जा रहे हैं, और कविता से तो खासकर और भी, इस तरह के प्रयासों की आवश्यकता बढ़ गई है । मनीष गुप्ता हिन्दी और उर्दू कविता को अलग-अलग लोगों के द्वारा प्रस्तुत करवा कर उसके प्रचार-प्रसार में लगे हैं तो कवि कुमार विश्वास और नीलेश मिश्र भी कवि और कविताओं पर लगातार चर्चा कर रहे हैं । आज कविता का अर्थ हो गया है येन-केन-प्रकारेण छप जाना, कुछ चर्चा करवा लेना और प्रतिष्ठित (!) हो जाना । कविता किताबों में ही बन्‍द हो कर रह गई है या फिर परिचितों, मित्रों तक सिमट कर रह गई है । एक कारण तो शायद यह है कि छन्‍द के हट जाने से कविता में रस की थोड़ी कमी आ गई है । रही-रही कसर कवियों की बौद्धिकता से अतिशय प्रेम के कारण कविता के भारी हो जाने ने पूरी कर दी है । कविता कवियों के बाहर जा ही नही रही । ‘तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ’ चल रहा है बस । सारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में काव्यशास्त्र, छन्दशास्त्र की पढ़ाई होती है । पर उसकी उपयोगिता कविता के विकास में क्या रह गई है? जो वस्तु कविता में निषिद्ध कर दी गई उस पर छात्रों और शिक्षकों की वर्षों की मेहनत क्यों लगायी जाए? स्कूल के स्तर तक तो शायद कविता पाठ या कविता लेखन जैसे क्रिया-कलाप होते हैं, महाविद्यालयों- विश्वविद्यालयों से इसका लोप क्यों हो गया है? क्या सिर्फ गोष्ठियों, चर्चाओं, समीक्षाओं से भविष्य सुरक्षित रह सकेगा ?

इन बातों को ध्यान में रखते हुए सोचें तो अमिताभ बच्चन के द्वारा बच्चन जी की कविताओं का पाठ और उसका रेकॉर्ड निकाला जाना एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है । ऐसा ही कुछ उन लोगों काम भी है जो कविता को सोशल मीडिया के द्वारा बढ़ावा दे रहे हैं । विद्यालयों, महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं के बीच भी हिन्दी कविता को ग्राह्य और लोकप्रिय बनाने के लिए निरन्‍तर प्रयास किए जाने चाहिए । हमारी कविता की थाती बहुत समृद्ध है और कविता का भविष्य भी नई पीढ़ी के उद्‌गारों में है । बच्चन जी की लोकप्रियता और अभी भी अमिताभ बच्चन द्वारा अलग-अलग मंचों-अवसरों पर उनकी कविताओं का पाठ इस बात का संकेत है कि सुनाना आए तो कविता सुनी भी जाएगी, गुनी भी जाएगी और फिर बुनी भी जाएगी ।

 

बच्चन जी द्वारा अमिताभ बच्चन के कविता-पाठ पर की गई टिप्पणी जो रेकॉर्ड के कवर पर उपलब्ध है –

 

मेरी कुछ कविताएएँ तो ऐसी हैं जो गेय हैं, अर्थात् जिन्हें राग-ताल में गाया जा सकता है; और कुछ ऐसी हैं जिन्हें भावानुरूप स्वरों के उतार-चढ़ाव के साथ पड़ा जा सकता है ।

इस रेकार्ड के द्वारा मेरी कुछ ऐसी कविताएँ प्रस्तुत की जा रही हैं जो पढ़ी जाने के लिए हैं ।

कविता लिखना कला है तो कविता पढ़ना भी कला है । अच्छी कविता यदि अच्छी तरह पढ़ी भी जाए, यानी कलापूर्ण ढंग से, तो निश्चय वह अधिक प्रभावकारी सिद्ध होगी । इसके विपरीत यदि वह बुरी तरह पढ़ी जाए तो उसका प्रभाव क्षीण भी हो सकता है।

इन कविताओं को प्रस्तुत कर रहे हैं अमिताभ बच्चन - मेरे सुपुत्र, जो सिने-संसार के चोटी के अभिनेता हैं, और जिनकी विशिष्टता उनकी आवाज़ में मानी गई है।

कविताओं के प्रति न्याय करने के लिए, आवाज़ के साथ जो वे उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण गुण लाए हैं वह है इन कविताओं के भावों के साथ उनकी तन्मयता-एकात्मता, जो पिता-पुत्र के आजन्म संपर्क-संस्कार से उन्हें मिली है।

इससे अधिक और में क्या कह सकता हूँ कि इन कविताओं को अमिताभ बच्चन ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे वे उनकी लिखी भी हों- उनकी जीवनानुभूतियों से उद्भूत ।

 

'हाथ कंगन को आरसी क्या है-'

 

यू ट्यूब पर यह रेकॉर्ड उपलब्ध है –

 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

घर की बातें

 

 

घर की बातें 

घर

घर हर लेता है

सब पीड़ा, दुख-तकलीफ;

जहाँ रहते हैं पिता,माँ

 

दीवारें तक बन जाती हैं

सुरक्षा कवच

और लड़े-थके, अस्त-पस्त मन

पहुँच कर हो जाते हैं महफूज,

निश्‍चिंत

 

नींद खुद-ब-खुद समय पर खुलती है

हवा महसूस होती है ताजा-ताजा

धूप भी लगती है खूब उजली,

गरमाहट से भरपूर, पुर-सुकून

और चाँद, रात में बरसाता है नेह

 

घर, घर होता है भाई

वो जहाँ आपका बचपन भटकता है

वो जहाँ कोई सिर पर हाथ रखता है।

 

घर की याद

यूँ फ्लैट भी घर है,लेकिन एक कमरा

थोड़ा ज़्यादा घर-घर लगता है

 

कमरे में है पलंग का एक जोड़ा

जिस पर बिछे हैं गद्दे, मोटे-मोटे

जिनमें भरी हुई है रूई ठसाठस

जिसके जरिए कभी याद आ जाती है धुनिया की

और धुनकी के टंकार की

 

एक तरफ रखे हैं लोहे के दो बक्से

एक के ऊपर एक

जिनको ढँक दिया गया है एक पुरानी-सी चादर से

 

उसी पलंग पर बैठे

दिख जाती है कभी,बाहर खिड़की से,

सामने की दीवार पर उतरती हुई

शाम की पीली-पीली धूप

और मन पहुँच जाता है बरसों पीछे खेल के मैदान में

डूबते सूरज से समय का अंदाजा लगाते

 

कमरे में ही है एक पुरानी तस्वीर,

स्टील के फ्रेम में ब्लैक एण्ड व्हाइट

मैं बैठा हूँ पिता की गोद में,

और माँ भी है, भैया भी, बहन भी

इसी तस्वीर ने वजन बढ़ा दिया है कमरे का

 

घर-गाँव जो होता है

वो तो पिता का होता है।

 

कसक

खिड़की के ठीक बीच

सिन्‍दूरी बिन्‍दी-सा सूरज

टिका है फुनगी पर नीम की

 

दो छोरों से होती है

कोयलों की बातचीत

 

अलग-अलग चिड़ियों का

फैलता है मिश्रित संगीत

 

हवा में घुल जाता है

मन

भावातीत

 

आ गई है याद

गाँव की

घर की

उस दुआर की

जो अब नहीं रहेगा  !  

 

ताकीद

अभी कल घर ने कहा

घर पर भी रहा करो कभी

पता तो चले

कहाँ क्या जरूरत है

 

माना, दुनिया सराय है

पर ऐसी भी क्या जल्दी है

कहाँ की भागदौड़ है ?

काहे की हाय-हाय है !

 

ग्लानि

कहते हैं तीनों गाँवों में

सबसे अच्छा था दुआर

 

चढ़ती सीढ़ियाँ और फिर

उतरती

अंदर की ओर

 

दरवाजे के ठीक ऊपर

घड़ी बड़ी-सी

रखी हुई कुछ कुर्सियाँ

काठ की,कभी-कभी

एक चौकी भी

 

एक तस्वीर बाबा

और छोटे बाबा की

सीढ़ियों पर बैठे

 

एक तस्वीर

बाबा-मामा की

 

एक तस्वीर पापा की

उनके बचपन के दिनों की

 

कुछ वैसी ही

गुस्से वाली , मेरी भी

किसी दूसरी जगह

 

और अब फिर

उसी गुस्से वाली तस्वीरें

बेटों की

 

हाल की एक सेल्फी

चाचा के साथ

घर के दुआर पर

 

आप घर में

नहीं रहते हैं

घर

आप में रहता है

 

अब जब

घर नहीं रहेगा

लगता है, मैं

किसी को

बचा नहीं पाया ! 

खुद भी कहाँ बचा मैं

कौन बच सका है

बोलो तो इस जहाँ में

सब मन का मामला है

मिट्‍टी है कैसी मन की...


 

पुनर्नवा

बागीचे में घर के

फूल बेगनबेलिया का

खिला...

 

खिलता हुआ वहीं

मन मिला

 

घर तो समझते हैं न ?!

 

वो नहीं

जिसे आपने बनाया है

बल्कि वो

जिसने

आपको बनाया है !!

 

जहाँ लौट कर

मन जाता है बार-बार !!           

 

स्थायी पता

ग्राम वलिपुर

पोस्ट जमालपुर

जिला मुंगेर

आठ

एक

एक

दो

एक

चार

जीवन का कितना भी

हो जाए फैलाव

कितना भी विस्तार ....

 

वो कुएँ का पानी

आबो-हवा,पूरब रुख का दुआर

साथ-साथ चलता है

चेतन-अवचेतन में

झलक जाता है मुझमें

रंग-रूप,चाल-ढाल

आचार-विचार-व्यवहार

मेरे पुरखों का

यदा-कदा

 

रहूँ कहीं भी

जबकि,अब कहीं का भी नहीं

पूछे जाने पर कहीं

“कहाँ के हो?”

उत्तर एक यही –

ग्राम वलिपुर

पोस्ट जमालपुर

जिला मुंगेर ! 

 

जीवन-सफर

सारा सफर

जिन्‍दगी का

घर पहुँचने तक का है

 

घर कहाँ है !

घर कहाँ है !!

घर कहाँ है !!!