कुछ तस्वीरें, कुछ पंक्तियाँ
‘शोले’ असफल हो गई !
सुनते हैं 1975 में जब शोले रिलीज़ हुई थी, तो पहले
सप्ताह में उसके ‘फ्लॉप’ हो जाने का अंदेशा
हो गया था । लेकिन उसके बाद फिल्म ने जो रफ्तार पकड़ी, बस सारे
कीर्तिमान छोटे पड़ गए ।‘ शोले’ तब तो असफल
नहीं हुई, रिलीज़ के पचास वर्षों बाद उसके असफल हो जाने के कारण
सामने आ गए हैं । कोई फिल्म किस रूप में याद की जाती है, वही
उसके सफल या असफल होने का सबसे बड़ा आधार होता है । एक लोकप्रिय राष्ट्रीय पत्रिका के
एक प्रबुद्ध साहित्यकार लेखक के ‘शोले’ के प्रति उद्गार देखने के बाद ‘शोले’ के सफल होने पर शक पैदा हो जाता है । लेखक के उद्गारों
को देखिए –
मैंने धर्मेन्द्र को ठेलकर गिरा दिया था, अब बन्दूक चलाना मैं सिखा रहा था । मेरी हथेलियों ने बसन्ती के गदराये बदन का स्पर्श पाया था । इस एहसास के लिए न जाने कितनी बार ‘शोले’ देखी ।
जया भादुड़ी के प्रति भी यही सद्भाव है । लेखक के विचार देखिए –
जया मुझे अच्छी लगी थीं ‘शोर’ में । यह बात मैंने अपने मित्र से शेयर की थी । उन्हें मेरी पसन्द पर हैरत हुई इसलिए कि जया मांसल नहीं थीं । मेरे वे समझदार मित्र तब तीस के भी नहीं थे । उनके ऐसा कहने से मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ । मुझे अपनी नासमझी पर शर्म आयी थी ।
पचास साल बाद जया बच्चन का सार्वजनिक जीवन में कैसा व्यवहार है, उसका शोले से क्या संबंध ?
इतना ही नहीं, रेखा, जो इस फिल्म में थीं भी नहीं, वे भी लपेटे में आ गईं –
पोस्टर और प्रचार ने रेखा को जिस तरह देखने की उम्मीद जगायी थी, वह पूरी नहीं हुई थी । कई वर्षों बाद अपन ने भी यह फिल्म देखी थी इसी उम्मीद में ।
यह ‘शोले’ की घोर असफलता ही कही जाएगी कि सड़सठ साल के एक व्यक्ति को जब ‘शोले’ याद आ रही है तो किस रूप में !
जब दावे बड़े किए जाने हों, तो आधार पुख्ता होने चाहिए । कई बार हमें लगता है कि चीजें या घटनाएँ किसी खास तरह से ही होनीं चाहिए और हम अपनी धारणाओं को तथ्यों पर आरोपित कर के अपने को सही सिद्ध करने लग जाते हैं । कुछ ऐसा इस लेख में भी किया गया है । यह शायद एक ‘कम्पल्सिव बिहेवियर’ होता है । ‘धर्मात्मा’ फिरोज़ खान की फिल्म है, उसे रमेश सिप्पी की फिल्म बताने से क्या फायदा हुआ ? 1973 में प्रदर्शित हो चुकी ‘ज़ंजीर’ (11-05-1973) 1975 में ‘शोले’ के अतिरिक्त आने वाली फिल्मों में शामिल कर दी गई । यह तो एकदम ‘बेसिक’ जानकारी है किसी भी सिनेप्रेमी के लिए कि ‘ज़ंजीर’ ‘शोले’ से दो साल पहले आ चुकी थी । इतना ही नहीं, अपना नज़रिया सिद्ध करना है तो ‘नमक हराम’ (23-11-1973) और ‘अभिमान’ (27-07-1973) को ‘ज़ंजीर’ के पहले रिलीज़ होने वाली फिल्में बता दिया गया । ‘गूगल’ इतनी जानकारी तो दे ही देता है । हाँ, लेखक के पास अन्य विश्वस्त सूत्रों से कुछ और जानकारी हो तो अलग बात है ।
ऐसी ही बात ‘शोले’ के बाद आने वाली डाकूवाली फिल्मों में डाकुओं की पोशाक पर कही गई है । उदाहरण के लिए ‘बैंडिट क्वीन’, ‘पान सिंह तोमर’ और ‘सोन चिरैया’ जैसी फिल्मों के नाम गिनाए गए हैं । ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘पान सिंह तोमर’ जीवनी-आधारित फिल्में हैं, ‘सोन चिरैया’ भी संभवत: असली डाकुओं के जीवन पर आधारित है । क्या लेखक यह बताना चाहते हैं कि इन असल ज़िंदगी के पात्रों ने ‘शोले’ देखकर पोशाकों की प्रेरणा ली, या फिर इन फिल्मों के निर्देशकों ने धोती-कुर्ता और साड़ी की जगह ‘शोले’ के प्रभाव में उनकी पोशाकें बदल दीं ।
‘गब्बर सिंह परिस्थितिजन्य डकैत नहीं है । ...पहले फिल्मों में डाकू बनने की कहानी होती थी।... ‘शोले’ इस पारम्परिक झमेले में नहीं पड़ती।’ अगर आपने ‘शोले’ के लेखक जावेद अख्तर साहब के इंटरव्यू देखें हों, तो आपको पता होगा कि जावेद साहब ने शोले के किरदारों के विषय में ये सब बताया हुआ है । उन्होंने तो यह भी कहा है कि “ जय और वीरु का कोई बैकग्राउंड नहीं दिखाया गया है, ऐसा किसी फिल्म में पहली बार हुआ “ ।
लेखक लेख में, बीच-बीच में बौद्धिकता का वजन भी डालते रहते हैं । वे कहते हैं कि गब्बर ने ‘स्टेट’ के दोनों हाथ काट दिये हैं । ... यह यह वक्त था जब निजी फायदे के लिए ‘स्टेट’ के पर काटने का चलन जोर पकड़ रहा था । आज तो चरम पर है। व्यवस्था विवश है । लेख के अंतिम हिस्से में वे कहते हैं इन्दिरा गाँधी और संजय गाँधी को तो लोगों ने सबक सिखा दिया,लेकिन वही लोग गब्बर को सर पर बिठा कर नाच रहे थे । क्या आज नहीं नाच रहे हैं लोग गब्बर को सर पर उठा कर? …. कौन जानता था कि फेंकू सूरमा भोपाली का नया अवतार पैदा हो जाएगा । कौन जानता था कि फिल्मी गब्बर सिंह विश्व पटल पर टैरिफ सिंह बनकर जन्म लेगा? फिल्म के आकलन को, या फिल्म के प्रभाव को ये बातें कितना स्पष्ट करती हैं ? ‘शोले’ इमरजेंसी लागू होने के करीब दो महीने बाद रिलीज़ हुई थी । तो क्या संजय गाँधी ने जानते-बूझते ‘स्टेट’ के हाथ काट देने वाले गब्बर के चरित्र को लोगों के सामने आने दिया कि ‘पचास कोस दूर’ भी उनका (संजय गाँधी का) नाम सुनकर बच्चे डर जाएँ ? कई बार हम हर बात में अर्थ/सत्य का इतना ज्यादा अन्वेषण करने लगते हैं कि सत्य का आविष्कार कर लेते हैं, अपनी सहूलियत के हिसाब से । ऐसी ही एक बात बच्चों के बीच चाचा नेहरू और गब्बर की लोकप्रियता की तुलना की है । बिस्कुट के रैपर पर गब्बर की तस्वीर का आना इस बात का सूचक नहीं है कि गब्बर बच्चों का आदर्श हो गया है । यह दर्शाता है कि बच्चे इतने तेज हो गए हैं कि गब्बर उनके लिए फिल्म या कॉमिक्स का एक पात्र भर है । बच्चे जानते हैं कि गब्बर नकली है, और मनोरंजन का साधन ।
लेखक का आकलन है कि ‘ ऐसा पहली बार हुआ कि एक खलनायक ने खलनायक जैसा प्रभाव नहीं छोड़ा । यह एक संकेत है कि केवल फिल्म में ही नहीं समाज और राजनीति में भी खलनायक नायक की जगह ले रहा था’ । लेखक फिल्मों पर गंभीर नजर रखते हैं , उन्हें जरूर पता होगा कि अपने समय में देव आनंद ने ‘एंटी हीरो’ की भूमिकाओं में लोकप्रियता हासिल की थी । प्राण, शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना के द्वारा निभाए गए खल-पात्र भी हीरो से ज्यादा तालियाँ बटोरते थे । असल में दर्शकों की अक्ल पर भरोसा किया जाना चाहिए । फिल्मों के सारे प्रभाव के बावजूद दर्शक ‘रील’ और ‘रियल’ के अन्तर को जानता है । अब तो छोटे -छोटे बच्चे भी फिल्मों में इस्तेमाल किए गए वीएफएक्स को आसानी से पकड़ लेते हैं ।
‘शोले’ में दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह की शक्लो-सूरत वाले पात्र को मसखरे के रूप में दिखा कर क्या कोई सकारात्मक संदेश नहीं दिया गया ? जय और वीरु ने दोस्ती को एक नए रूप में क्या परिभाषित नहीं किया ? आज से पचास साल पहले गाँव की एक लड़की ताँगा चलाए, क्या यह हैरानी की बात नहीं है ? बात वही है कि हमारा दिमाग जहाँ अटका है, हम वही देखना-सुनना चाहते हैं ।
जीवन खेल
: उजले मन की उजली कविताएँ
नब्बे के दशक में कविता
की पिच पर उभरे और अब तक डट कर जमे लोकप्रिय एवं शब्दसिद्ध कवि प्रेम रंजन अनिमेष
का नया संग्रह है ‘जीवन खेल , खेल के बहाने जीवन की कुछ कवितायें’
। समर्पण-पृष्ठ के पहले के पृष्ठ पर दी गईं पंक्तियाँ इस प्रकार हैं
–
खेल खेल में
जीवन कितना
जीवन में भी
कितना खेल...
ये पंक्तियाँ किताब के
मिजाज का पता देती हैं । प्रेम रंजन अनिमेष के अब तक प्रकाशित हुए काव्य-संग्रहों
के आधार पर यदि उनकी कविताओं को एक भले व्यक्ति की भली कविताएँ कहा जाए तो यह सही
ही होगा । इस संग्रह की कविताएँ भी
क्रिकेट के खेल को आधार बना कर जीवन को संबोधित भली कविताएँ कही जा सकती हैं ।
वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने अपनी पुस्तक ‘एक कवि की नोटबुक’ में लिखा है – कुछ कवि होते हैं जो मुग्ध होते हैं । उनकी निगाह
हमेशा जीवन के कुछ उजले पक्षों और उजली चीजों की ओर ही उठती है। प्रेम
रंजन अनिमेष के इस संग्रह ‘जीवन खेल’ को
पढ़ते हुए भी पाठक को कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है । क्रिकेट के विभिन्न
पक्षों को लेकर जीवन से साम्य बैठाती हुई कविताएँ पाठक के मन को एक मुलायमियत से
भर देती हैं । आज के परिदृश्य में कविताओं में नर्म और उज्ज्वल कविताओं की संभावना
ही कम बन पाती है । ऐसे में ‘जीवन खेल’ की कविताओं से गुजरना सुखकर है । राजेश जोशी ने लिखा है -- कभी-कभी तो मुझे यह भी लगता है कि मनुष्य के
दुखों और यातनाओं से एक औसत प्रभाव पैदा करने वाली कविता बनाना कुछ हद तक आसान है
लेकिन जीवन और सृष्टि में जो सुन्दर है
उसे दर्ज करते हुए पूरे मन से उसे, उसके
उल्लास और उत्सव को दर्ज कराते हुए एक अच्छी कविता रच पाना ज्यादा मुशकिल काम है ।
... ऐसी कविता अपने पाठक से एक हद तक सब्जेक्टिव होने की माँग करती है...शायद । प्रेम रंजन अनिमेष का काव्य कर्म
इसी ‘ज्यादा मुश्किल काम’ को आसान
बनाने की कवायद है । ‘जीवन खेल’ की
कविताओं से गुजरते हुए भी पाठक इसी बात की पुष्टि पाता है ।
जैसा कि संग्रह के मुखपृष्ठ पर उल्लेख
भी है कि संग्रह की कविताएँ ‘ खेल के बहाने जीवन की कुछ कवितायें’ हैं, कविताओं में कवि का जीवन दर्शन गुँथा हुआ है ।
संग्रह की तीसरी कविता ‘खेल भावना’ की ये पंक्तियाँ देखिए –
बस यह एह्तियात रहे
किसी
के हृदय
किसी
की भावना से
न
खेला जाये
ऐसे
खेलने से तो बेहतर
खेलना
न आये...
इन पंक्तियों से कवि की
जीवन-दृष्टि भी हमारे सामने खुलती है । हमलोगों ने कार्बन फुटप्रिंट की बात सुनी
है । कवि जीवन में भावनाओं के मामले में भी ऐसी ही धारणा रखता प्रतीत होता है ।
दूसरों का इतना खयाल कि अपनी भावनाओं का कोई नकारात्मक असर नहीं होने देना चाहता ।
मानो वह उतने ही हल्के कदमों से चलना चाहता है जैसे किसी ताजा पोछे गए कमरे में
घुसते ही कोई संभल कर चले । कविता में गुँथी हुई कवि की जीवन-दृष्टि पाठकों के लिए
भी मार्गदर्शन का काम करती है। प्रेमचंद ने अपने निबन्ध ‘साहित्य
का उद्देश्य’ में
लिखा है – साहित्य की बहुत सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की
आलोचना’ है । यह ‘जीवन की आलोचना’ ही तो जीवन-दृष्टि है । आलोचना का
गुणधर्म है नीर-क्षीर विवेक । कवि अनिमेष का यह नीर-क्षीर विवेक संग्रह की कविताओं
में बार-बार प्रकट होता है । अपने उसी निबन्ध में प्रेमचंद लिखते हैं –
नीति-शास्त्र और साहित्य-शास्त्र का लक्ष्य एक ही है – केवल उपदेश की विधि में
अंतर है । ‘जीवन खेल’ की
कविताओं को पढ़ते हुए यह अहसास पुष्ट होता है ।
इस संग्रह की कविताओं में कवि प्रेम
रंजन अनिमेष क्रिकेट को देख रहे हैं, और खेल के साथ-साथ जीवन को भी
दार्शनिक की नजर से देख रहे हैं । जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति का
आदर्श व्यवहार कैसा होना चाहिए, इस ओर इंगित करती हैं ‘जीवन खेल’ की कविताएँ । ‘दृश्यपटल’
कविता की इन पंक्तियों को देखिए –
यह
भूला हुआ
कि है हाथ
में ढाल
रोकना भी है
बचाना
और करना
प्रतिकार
जवाबी
प्रहार...
ये पंक्तियाँ क्रिकेट
के खेल में उत्पन्न हुई स्थितियों का वर्णन तो हैं ही, जीवन
में उपस्थित होने वाले कई ऐसे मौकों के लिए सीख भी हैं जब हम अपनी सामर्थ्य को भूल
परिस्थियों के सामने घुटने टेक देते हैं । हम यह भूल जाते हैं कि सिर्फ हमलावर होना ही
उपाय नहीं, उत्तर नहीं किसी अन्याय या अप्रीतिकर बातों का।
अपनी जमीन पर खड़े रहते हुए अपने को बचाए रखना भी है जवाबी प्रहार ।
कवि की दृष्टि पूरे वैश्विक परिदृश्य
पर है । कविताओं को सिर्फ क्रिकेट वाली कविताएँ समझ कर पढ़ने से बारीकी से कही गई
बातें पकड़ में नहीं भी आ सकती हैं । बल्लेबाज के बल्ले से लगकर ऊपर उठी हुई गेंद कैच
होने के बजाय ऐसी जगह पर गिरती है जहाँ कोई फील्डर नहीं । इस आशय की कविता जहाँ
कोई नहीं की इन पक्तियों को देखिए –
गिरें कभी
तो गिरें
कोई जहाँ नहीं
वरना देखते देखते
इतने तो आत्मघात के
सामान जुटा
लिये गये
कहीं भूल बड़ी न
हो जाये
कि पृथ्वी ही
अपनी
बन जाये
जगह ऐसी
जहाँ कोई
नहीं...!
इन पंक्तियों का इशारा
क्या युद्ध में उलझे हुए देशों की तरफ नहीं ? इसमें कवि कि सदिच्छा भी शामिल है कि ऐसा कुछ
घटित हो भी तो गिरें कोई जहाँ नहीं । कवि अनिमेष की कविताओं में
अपने परिवेश या घटनाओं के प्रति आलोचना सधे-संयत शब्दों में ही आती है । इस कारण उनकी कविताओं में ताप की कमी महसूस की
जा सकती है । ऊपर राजेश जोशी के हवाले से ‘मुग्ध कवियों’
की बात की गई है । उसी क्रम में राजेश जोशी आगे लिखते हैं -- इस तरह के कवियों की कविता में आलोचनात्मक तेवर
कम होता है या एक तरह से उससे कतराने की कोशिश इनमें दिख सकती है । उनकी कविता में
कहीं-कहीं गुस्सा दिख सकता है। यह गुस्सा वस्तुत: सुन्दर को नष्ट किए जाने से उपजी
पीड़ा है । हिन्दी कविता में इस मुग्ध भाव को कभी ठीक-ठाक व्याख्यायित नहीं किया
गया । प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं पर भी ये बातें लागू की जा सकती हैं ।
यह मामला संभवत: व्यक्ति प्रेम रंजन अनिमेष या इन जैसे अन्य कवियों के सरल-मृदुल स्वभाव
या विशेष सहज मनोवृत्ति का है ।
प्रेम रंजन अनिमेष के लेखन की एक
शक्ति इसकी प्रवाहपूर्ण और त्रुटिरहित भाषा है । भाषा पर उनका अधिकार उन्हें
शब्द-क्रीड़ा करने की स्वतंत्रता और सलाहियत प्रदान करता है । उदाहरण के तौर पर कुछ
पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं –
पानी की घूँट
अटूट...
अथवा
न्याय यथोचित
किंचित कदाचित
अथवा
आभार
हर बार
हाहाकार, प्रतिकार,अनिवार
शब्दों के प्रयोग पर
उनकी पकड़ कविता को एक ऐसी लयात्मकता प्रदान करती है जिसके कारण कई कविताएँ छंदरहित
होने के बावजूद गेय प्रतीत होती हैं । पाठक अगर कविताओं का सस्वर पाठ करेंगे तो
कविताओं की इस खूबी को लक्षित कर पाएँगे ।
किसी अच्छे कवि की कोई अच्छी कविता
अपने अंदर जीवन की कई घटनाओं से सादृश्य समेटे रहती है । ‘जीवन
खेल’ की एक कविता है ‘एक लंबी पारी’
। जाहिरा तौर पर यह कविता हाल ही में संपन्न हुए महिला क्रिकेट के
वर्ल्ड कप से पहले की लिखी हुई कविता है , लेकिन इस कविता को
पढ़ते हुए सेमीफाइनल में जेमिमा रॉड्रिग्स द्वारा खेली गई पारी की बार-बार याद आती
है ।
प्रेम रंजन अनिमेष का कवि-मन
कविता-शृंखलाओं को रचने में रमता है, जिनमें एक ही विषय पर वे
अलग-अलग ढंग से विचार करते हुए दिखते हैं । ‘जीवन खेल’
की कविताएँ भी अलग-अलग समयों पर क्रिकेट की किसी घटना से प्रभावित
होकर लिखी गई हैं । संग्रह की अधिकांश कविताएँ आकार में छोटी हैं । इन कविताओं को
प्रगीतात्मक कहा जा सकता है । चूँकि इन कविताओं में अलग-अलग कोणों से क्रिकेट को
देखते हुए कवि के मन में उत्पन्न भावों का प्रकटीकरण हुआ, इन
कविताओं में कोई एक कथा-सूत्र पकड़ में नहीं आता । कहने का अर्थ यह कि संग्रह में
प्रबंध काव्य की तरह कथा प्रवाह नहीं है, जबकि एक ही विषय के
इर्दगिर्द इतनी संख्या में लिखी गई कविताओं में यह संभव हो सकता था । संभव है कवि
अनिमेष भविष्य में कोई ऐसा संग्रह लेकर आएँ । ‘जीवन खेल’
और उनके अन्य संग्रहों की कविताओं को देख कर पाठक यह सहज ही समझ
सकता है कि कवि अनिमेष की कविताओं में विषयों की विविधता है, और यह भी कि कवि किसी भी विषय को काव्य-वस्तु बनाने की दक्षता रखता है । उनकी
कविताओं में विषय इस सहजता से काव्य-वस्तु में परिणत हो जाते हैं कि जरा देर को भी
कविता के विषयों के असामान्य या अनोखे होने पर ध्यान नहीं जाता । उनकी सरल सहज
भाषा पाठक को बाँध लेती है और अपने साथ लिए चलती है ।
क्रिकेट के खेल जैसे विषय पर कविताएँ
लिखने में कविताओं में इतिवृत्तात्मकता आना स्वाभाविक है । जब खेल की बारीकियों को
भी कविता में ढालना हो तो उनके वर्णन से बचा नहीं जा सकता है । अच्छी बात यह है कि
यह इतिवृत्तात्मकता खलती नहीं है, पाठक को बोर नहीं करती है ।
संग्रह की अधिकांश कविताएँ बल्लेबाज
और बल्लेबाजी को केंद्र में रखती हैं । यह कवि की अपनी रुचि के कारण होगा । दूसरी
एक बात यह भी है कि इन कविताओं में आनेवाला बल्लेबाज एक पुरुष बल्लेबाज है । संग्रह
की कविता ‘नाजुक जगह वाली चोट’ की अंतिम पंक्तियाँ विशुद्ध पुरुष नजरिए की चुगली कर जाती हैं ।
संग्रह की एक कविता ‘साये’
अपनी रोचकता के कारण विशेष है । इस कविता में ‘परछाईं’ शब्द की आवृत्ति कविता को रोचकता को कई गुणा
बढ़ा देती हैं । इसके साथ ही कवि ने इस कविता में भी जीवन-दर्शन को बखूबी पिरोया है
। इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं –
जब सारे साये मिल जायेंगे
पक्ष विपक्ष गेंद बल्ले
के
खेल आज का
पूरा होगा
हो जायेगा सम्पन्न...
भारतीय महिला क्रिकेट
टीम द्वारा विश्व कप जीतने के परिप्रेक्ष्य में संग्रह की कविता ‘विजया
एकादशी’ कुछ और ही विशेष हो उठी है । इस पूरे संग्रह में,
और यदि मुझे ठीक स्मरण है, तो अनिमेष जी के
सम्पूर्ण काव्य में व्यक्तियों का नाम सिर्फ इसी कविता में लिया गया है । यह कवि
के हृदय में स्त्रियों के प्रति सम्मान की गवाही है । यह कविता उजले पक्षों की बात
करती है, लेकिन
चुपके से ‘निर्भया’ का नाम भी ले लेती
है , पर उसे अभय बनाने की आकांक्षा के साथ ! जीवन के उजले
पक्षों पर निरंतर नजर बनाए रखना प्रेम रंजन अनिमेष के लेखन की बड़ी विशेषता है । इस
कविता की अंतिम पंक्तियाँ देखिए –
नवनारी
नवशक्ति
उदय हो...
क्या आपको किसी पुरखे कवि की ये पंक्तियाँ याद आ
रही हैं ?—
नव गति, नव लय,
ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव
जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव
स्वर दे!
वर दे, वीणावादिनि
वर दे।
कवि अनिमेष के चर्चित
संग्रह ‘संक्रमण काल’ की अंतिम कविता का शीर्षक है ‘पुनरारंभ’ जिसकी अंतिम पंक्ति है -- जग जीवन जय हे । ‘जीवन
खेल’ की अंतिम कविता है ‘पुनर्नवा’
। इसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं –
अभी कोई बच्चा
डंडा लेकर आयेगा
और हाँकेगा
उसे
खेल शुरू
होता है
यहीं से...
‘पुनरारंभ’ और
‘पुनर्नवा’ जैसी कविताओं से संग्रहों
का समाप्त होना महज संयोग नहीं है । यह प्रेम रंजन अनिमेष के उजले मन और उसकी उजली
कविताओं का द्योतक है । ऐसी कविताएँ निश्चय ही स्वागत एवं संरक्षण के योग्य हैं ।
टूटा है कौन
कितना ये आकलन कहाँ है*
ताहिर फ़राज़
चले गए । कितनी खामोशी से ! कुछ बरस पहले , लॉकडाउन के समय,
देवल आशीष को पहली बार यूट्यूब पर सुना । और मालूम हुआ कि वे पहले ही
निकल चुके थे अनंत यात्रा पर । दु:ख इसलिए भी गहरा हुआ कि देवल आशीष हमउम्र भी थे ।
इन दोनों को कितना ही जानता हूँ ! तो फिर यह टीस क्यों ? ताहिर फ़राज़ के तीन गीत या नज़्में उनसे परिचय का सबब हैं । देवल आशीष के पाँच-छह गीत । ताहिर फ़राज़ के निधन की खबर सुनकर देवल आशीष भी क्यों याद गए ?
कविता का काम क्या है ? जीवन को सुंदर बनाना , क्षण भर के लिए भी सही । कविता जीवन के रेगिस्तान में नख़लिस्तान है । जिस तरह से हमारे जीवन के आपसी और आत्मीय संबंध सूखते जा रहे हैं, कविता का काम बढ़ता जा रहा है । कविता जीवन के कंठ को तरल रखती है, जीवन का गान तभी संभव हो पाता है ।
ताहिर फ़राज़ को एक बार रू-ब-रू सुनने का मौका मिला, जब वे राँची आए थे । कुमार विश्वास का ही कार्यक्रम था शायद । जहाँ तक याद है, उन्होंने उस दिन अपने दो गीत ‘माई’ और ‘दिन वे भी क्या दिन थे’ सुनाए थे । ‘बहुत खूबसूरत हो तुम’ संभवत: बाद में यू ट्यूब पर सुना । जिन्होंने इन गीतों को सुना है, वे जानते हैं कि ऐसे ही खूसूरत लम्हे जीवन को जीने लायक बचाए रखते हैं । इस तीनों गीतों में कितनी नफ़ासत, कितनी मुलायमियत और कितनी शराफ़त है ! ‘बहुत खूबसूरत हो तुम’ एक विशुद्ध प्रेमगीत है । ताहिर फ़राज़ जब उसे गाते हैं, उनकी अदायगी इस गीत को कुछ दर्जा ऊँचा उठा देती है । इस गीत में दैहिकता मौजूद है, लेकिन जब एक अंतरे के अंत में वे कहते हैं कि “वो पाकीज़ा मूरत हो तुम” तो सारी दैहिकता तिरोहित हो जाती है । गीत की नरमी, उसकी पाकीज़गी आपके साथ रह जाती है । ‘माई’ को सुनते हुए भला किसका मन बच्चा नहीं बन जाएगा ! “हल्की सी दस्तक पर अपनी तुझे जागता हुआ मैं पाऊँ” यह पंक्ति किस तरह जोड़ लेती है अपने से ! इस भागदौड़ के जीवन में , इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा के समय में हममें इतना सुकून कहाँ बचा है कि पल भर सुस्ता सकें । हममें इतनी औपचारिकता भर गई है कि हम मशीन हो चले हैं। अब तो माँ भी अपने बच्चों से कुछ कहते हिचकती है । बच्चे तो खैर बड़े हो ही चुके हैं ! “फिर कोई शरारत हो मुझसे नाराज़ करूँ फिर तुझको” यह पंक्ति दरअसल जीवन को जीने की कुञ्जी है । हमारे अंदर एक निष्कलुष और बेफिक्र बच्चा छिपा हुआ है, हम ही उससे आँख नहीं मिला पा रहे । यह गीत इसलिए भी मन को छू जाता है क्योंकि इसमें जीवन के उन्मुक्त दिनों की झलक है । ताहिर फ़राज़ से परिचय का तीसरा आधार है उनका गीत ‘ दिन वे भी क्या थे’ है । यह गीत वह गीत है जो हम सबको याद दिलाता है कि हम भारतीय हैं । ‘ वी,द पीपल ऑफ़ इण्डिया’ आखिर यही तो है । आज हम अपना सतहत्तरवाँ गणतंत्र दिवस भी मना रहे हैं । संवेदनाओं को इस गीत में उन्होंने कितने हल्के हाथों से उन्होंने बरता है ! जैसे किसी शीशे के ‘शो-पीस’ को बहुत एहतियात के साथ बड़े हल्के हाथों पोछा जाए । हम सबकी यादों में हमारा मामूली-सा बिछौना और छत पर जाकर सोना है । शहर तो आधुनिक जीवन का पर्याय हैं । हम सब असल में गाँवों से निकल कर आए हुए लोग हैं । अभी हमारे ‘जीन्स’ में गाँव बचा हुआ है । कुछ पीढियों तक तो रहेगा ही अभी । इस आधुनिक जीवन के चक्कर में हम अपनी मिट्टी को भूलते जा रहे हैं । गाँव तो गाँव , शहर से मुहल्ले गायब हो रहे । एक फिल्म के गीत की पंक्ति है “ साँझ ढले, गगन तले, हम कितने एकाकी” । इसी एकाकीपन से लड़ रहा है यह गीत – “ किसी परी की कोई कहानी, किसी जिन्न का जादू-टोना” !
ताहिर फ़राज़
के इन गीतों को उन्हीं से सुनना, सुनने-देखने वालों के लिए तसल्लीबख़्श
है, कि अभी दुनिया खत्म नहीं हुई है । कुछ अच्छा अभी भी बचता
है ! गीतों को सुनते वक़्त हम यह महसूस करते हैं कि बात उनके दिल से निकल रही है और
हमारे दिल तक पहुँच कर अपना घर बना रही है । इन गीतों को उन्होंने जाने कितनी बार सुनाया होगा
। हर गीत में भी पंक्तियों को वे दुहराते हैं । अच्छी बातों का दुहराया जाना जरूरी
है । कहा तो यह भी जाता है कि झूठ भी सौ बार दुहराया जाए तो सच मान लिया जाता है ।
इन गीतों में तो एकदम सच्ची और पक्की बातें हैं ! दुहराए जाने से बातें स्मृतियों में
दर्ज भी होती चलती हैं । हर सुनने वाले के लिए ताहिर फ़राज़ की ये नज़्में उनकी ज़िंदगी
का हिस्सा बन चुकी हैं, बिला शक ! ताहिर फ़राज़ को बार-बार सुनना
अच्छा लगता है । “हम बच्चे ये सब करने के आदेश में रहते थे” – ये गीत पथ-प्रदर्शक ही
तो हैं , हम सब उस आदेश के मुंतज़िर हैं जो हमें, हम जैसे हैं, उससे थोड़ा बेहतर बना दे । ये तीनों गीत
यह भरोसा दिलाते हैं कि ऐसा होना संभव है ।
ताहिर फ़राज़ साहब के निधन का समाचार पढ़कर उनके गीत फिर से सुन रहा था, और अचानक देवल आशीष याद आ गए । अच्छे लोगों की स्मृतियाँ, अच्छे लोगों की स्मृतियों को खींच लाती है । देवल आशीष को सुनते हुए बारहा यह लगा है कि उनसे जो आत्मविश्वास की आभा-सी फूटती है, वह सुनने वाले के अंदर भी आत्मविश्वास का संचार कर देती है । देवल आशीष अपनी कविताओं को कितना तल्लीन होकर सुनाते थे ! उनके मुख की भाव-भंगिमा यह बताती है कि सुनाने वाला भी उस रस में डूबा हुआ है जिसमें श्रोता भी डूब-डूब जा रहे हैं । देवल आशीष की कविताओं में प्रयुक्त हिन्दी के शब्दों को सुनकर लगता है कि कितने शब्द हमारे अंदर भी बैठे हुए हैं । ऐसी कविताओं को सुनकर वे जाग उठते हैं । यही बात ताहिर फ़राज़ के गीतों को सुनकर भी लगता है, कि बस यही बात तो हमें भी कहनी है ! हर अच्छी कविता कवि की बात तो कहती ही है, हर पाठक/श्रोता की बात भी कहती है । खूबी तो यही है । खूबसूरती तो यही है । जितना ही देवल आशीष के वीडियो देखता हूँ, उतना ही उनकी अनुपस्थिति खलने लगती है । यह लगभग निश्चित ही है कि वे रहते भी तो उनसे जीवन में कभी भी मिलने का संयोग नहीं ही होता । लेकिन फिर भी उनके नहीं रहने से एक कसक-सी बन गई है । अब ताहिर फ़राज़ साहब के जाने से भी यही हाल है । वे भी अचानक चले गए हैं । यह ठीक है कि उन दोनों की रचनाएँ हमारे साथ हैं, लेकिन आदमी शायद किसी मौजूदगी से मजबूती पाता है, खासकर उसकी मौजूदगी से जिसकी बातें अपनी-सी लगती हैं ।
आदमी नश्वर है , इसमें तो कोई दो मत है ही नहीं । लेकिन यह जो एक-एक कर के हर चीज के छूटते जानेवाली बात है, वही कष्ट देती है । इस बात के लिए मन को मनाना कि अब जो है, जो बचा है, वही सत्य है, वही ठीक है, इतना आसान भी नहीं है। हम अपने खालीपन को भूले हुए भले रह सकते हैं, उसे दूर नहीं कर सकते । एक टीस उभरती है, और पूरे जीवन का खालीपन सामने खड़ा हो जाता है ।
कविता का काम है जीवन के सौंदर्य से साक्षात्कार कराना । जीवन के हर पक्ष में सुंदर है । इस सत्य का आभास हो जाना ही शायद बुद्धत्व की प्राप्ति हो ! सत्यम् शिवम् सुन्दरम् ! कविता या कला या साहित्य के कोई भी अंग अमिय-बिन्दु के समान होते हैं । ये बूँद भर भी हों, तो भी जीवन में स्फूर्ति भर सकते हैं । जीवन को उत्साह से , जिजीविषा से भर सकते हैं । देवल आशीष की पंक्ति “ कान्हा को कान्हा बना गई राधा तो राधा को राधा बना गया कान्हा” कवि और पाठक के संबंधों पर भी बखूबी लागू होती है । ताहिर फ़राज़ और देवल आशीष जितना हमें बनाते हैं, हम भी उनको थोड़ा-बहुत तो बनाते ही हैं । और यही बात हमारे इस दु:ख को थोड़ा और बढ़ा देती है कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं ; हम सब पर अपने-अपने तरीके से इस खबर खबर का असर होगा – “टूटा है कौन कितना ये आकलन कहाँ है” । लेकिन टूटा तो है !
ताहिर फ़राज़ के तीनों गीतों और देवल आशीष के कुछ गीतों के यूट्यूब- लिंक नीचे दिए गए हैं, यदि आप सुनना चाहें –
बहुत खूबसूरत
हो तुम :
https://youtu.be/2xjBPs0Vl2c?si=AfeLBsyM1T3bUEGW
दिन वो भी क्या थे –
https://youtu.be/uZW1LZFA6nI?si=iMNyzsfPe_R13rM0
माई
https://youtu.be/8dKkG4bibNw?si=1LQzyvKLKfM1FZFh
टूटा है कौन ये आकलन कहाँ है
https://youtu.be/a6NLurgsRoc?si=kLvwHYiZ82VJ4B40
गीत गुलज़ार ( कुछ गीत )
https://youtu.be/p9HfpUjZldM?si=4dMhApBoH7V3a_Mv
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*देवल आशीष
के एक गीत की पंक्ति