मंगलवार, 18 अगस्त 2026

चलिए कोई बात नहीं है

 

चलिए कोई बात नहीं है

 

कुछ करने  को बात नहीं है

चलिए  कोई  बात  नहीं है      

 

मन में जाने क्या- क्या तो है

कहने को  कोई बात नहीं है

 

मुझसे कोई काम नहीं है

मुझसे कोई बात नहीं है

 

उनसे मिलना कैसे होगा

देने  को  सौगात नहीं है

 

झूठ- दिखावे  की  दुनिया है

अपनी कुछ औकात नहीं है

 

बच्चा भी समझा  जाता है

अपने बस की बात नहीं है

 

मन थोड़ा-थोड़ा दुखता है

वैसे  कोई  बात   नहीं  है

 

बादल  छाए  हैं  छाने  दो

लेकिन दिन है रात नहीं है

                                        छंद-११  

शनिवार, 15 अगस्त 2026

जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं : २

जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं : २ 


पहली बात

फिर रेल का सफर है । बगल वाले भाई जी ने भेज खाना मँगवाया है। खाना देने वाले से पूछा है मांस, मछली, अंडा से टचमेंट नहीं न है । स्टाफ ने जवाब दिया है - नहीं । बात सब ने समझ ली । आपने भी समझ ली होगी । बताइए, लोग हैं कि लगे रहते हैं , शुद्ध भाषा, शुद्ध उच्चारण । शुद्ध संस्कार !!

क्या अंग्रेजी विदेशी मूल की भाषा रह गई है ?

दूसरी बात 

कमजोर आदमी को गुस्सा ज्यादा आता है । कमजोर चाहे देह से हो, पोजीशन से हो, पावर से हो । उससे गुस्सा कंट्रोल नहीं हो पाता । वह मौका तलाशते रहता है गुस्से की निकासी का । इस चक्कर में वह कभी - कभी एक्टिविस्ट, कभी सत्य के रखवाले, कभी व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने का दबाव बनाने वाला बन जाता है, शिकायतकर्ता बन बैठता है वह । थोड़ा भी ' अपर हैंड ' हुआ नहीं कि उसके भीतर का शेर जाग जाता है ।

गुस्सा अच्छी चीज नहीं है । गुस्से की शुरुआत शिकायत से होती है । शिकायत अच्छी चीज नहीं है। मानता कौन है लेकिन ?

तीसरी बात 

एक समय आता है जब आदमी की नजर कमजोर होने लगती है । नजदीक की चीजें साफ नजर नहीं आतीं । दूर - दूर की दिखती है, दूर - दूर की सूझती है ।

एक समय ऐसा आता है जब सुनने की क्षमता भी कम होने लगती है । किसी - किसी को ज्यादा दिक्कत हो जाती है । लेकिन वैसे लोग भी कुछ खास तरह की बातों को अच्छी-खासी दूरी से और धीमी आवाज में कहे जाने के बाद भी सुन लेते हैं और दूसरे लोगों को चकित कर देते हैं।

एक उम्र आती है जब आदमी के सोच की लोच समाप्तप्राय हो जाती है। जैसे पुराने पेड़ की शाखाएँ। कमाल यह है कि व्यक्ति हर हाल में अपनी ही बात को सही माने बैठा रहता है। जिसको माना तो माना, नहीं माना तो नहीं माना । उसके लिए सच में बीच का रास्ता नहीं होता !

जब आसपास के लोगों में ऐसे लक्षण दिखने लगते हैं, तो कष्ट होता है । मेडिकल कारण तो फिर भी सहे जा सकते हैं, किसी का मन यदि ' टिल्टेड' दिखने लगे तब मुश्किल होती है ।

अपने-अपने सत्य से लोगों को मोह होता है । 

चौथी बात 

आदमी अपनी नजर में हीरो बने रहना चाहता है । होरो बनना सफल होने पर निर्भर करता है । सफल होने के लिए कभी-कभी वह कार्येतर कार्यों को भी कर जाता है । उसके बाद वह चाह कर भी हीरो नहीं बन पाता । पब्लिक चाहे जो समझे ।

पाँचवीं बात

आप अपने दोस्तों से प्रेम करना चाहते हैं । आपके दोस्त आपसे प्रेम करना चाहते हैं । आप अपने दोस्तों के लिए प्रेम जतलाते हैं । आपके दोस्त आपके लिए प्रेम जतलाते हैं । 

दोस्ती और लोकतंत्र की राजनीति में बड़ा साम्य है । 

होता सब है, पर होता कुछ भी नहीं ।

बीच में व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टा, एक्स के कई रेगिस्तान हैं। रेगिस्तान में कभी-कभी नखलिस्तान भी दिख जाते हैं । 

आदमी कठजीव है । जी जाता है ।

छठी बात

हाथी के दो दाँत होते हैं । आदमी के दो स्वभाव। बशीर बद्र साहब ने शायद इसीलिए अपने एक शेर में कहा " परखना मत " ।

ज्यादा देखना । ज्यादा गौर से देखना । ज्यादा गौर करना । आपसी संबंधों के लिए ठीक नहीं । ' यात्री केवल अपने सामान की सुरक्षा के लिए जिम्मेवार हैं ' ! 

सातवीं बात 

मेरे शुभचिंतक मुझे कम मेहनत करने, कम ईमानदारी बरतने, दूसरों के बारे में कम सोचने, कम प्रश्न पूछने आदि के सुझाव देते रहते हैं । वे मुझे समझते हैं और मुझे समझाते हैं कि मुझसे हो नहीं पाएगा।

उनकी बात और है । वे तो बेस्ट हैं । एकदम बेस्टम बेस्ट ! 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

कुछ छंद में : ९ व १०

कुछ छंद में : ९ व १० 


          पैरवी

 

बिगड़े कई काम बनाती है पैरवी

छूटे हुए काम कराती है पैरवी

दिखे नहीं, उसको दिखाती है पैरवी

जाने हुए को कि जनाती है पैरवी

 

झुके हुए सर को उठाती है पैरवी

तनती हुई चाल चलाती है पैरवी

जाके किसी माथ बिठाती है पैरवी

खूबियाँ भी खूब गिनाती है पैरवी

 

नाम से ही नाम मिलाती है पैरवी

और सारे काम भुलाती है पैरवी

कि लाड़ में भी मुँह फुलाती है पैरवी

फिर लड़ि-हँसि हँसि-लड़ि मनाती है पैरवी

 

दुनिया देखिए कि चलाती है पैरवी

कि कितने मनोरथ फलाती है पैरवी

पाँव वहीं कस के हलाती है पैरवी

मन्नतों-सी चाह मनाती है पैरवी

                                                छंद-९

 

 

        खबर है ?

 

पंथियों ने पंथ देखा

और बातें पंथ की कीं

कुछ रास्ता आए निकल

परवाह वही कहीं नहीं

 

और कुछ जो संघ में थे

उन सभी के सर चढ़े थे

झुका रहा जो बचा रहा

चरण गहे बस उठे वही

 

जन बहुत थे आवाज गुम  

कुछ ही हमथे बाकी तुम

टिपकारी थी ऊपर से

और भीतर से फाँक थी

 

जो कि चिल्लाते रहे वे

नाम लिखवाते रहे वे

सूचियों में नाम खुद का

आगे बढ़ते रहे वही

 

भाई थे, कहीं दास थे

जो कहीं नहीं, उदास थे

पक्षधर या पक्षपाती

गरज किसे पड़ी किसे थी

 

बस अँधेरे से अँधेरे

बढ़ रहे हैं रोज फेरे

सब खड़े हैं राह घेरे

है सुन रहा कोई नहीं

 

अब ये सुनें या वे सुनें

अब राह ऐसी ही चुनें

जो खरा है वो खरा है

झूठा सिक्का चले नहीं

                                    छंद-१०


गुरुवार, 6 अगस्त 2026

अ से अमिताभ : कथन-उपकथन 32



 

अ से अमिताभ : कथन-उपकथन 32


हवा तेज चलता है दिनकर राव

टोपी संभालो, उड़ जाएगा


अग्निपथ, 1990, निर्देशक : मुकुल एस. आनंद, लेखक : संतोष सरोज, कादर खान


*** 


बारिश थम नहीं रही

प्रश्न भींग चुके हैं

आग फिर भी बरकरार है


खलने वाली 

कुछ रणनीतिक चुप्पियाँ 

अखर जाने वाले

सीनाजोर सवाल कुछ 

डट चुके हैं अपने-अपने मोर्चों पर


मक्खियाँ भिनभिना रहीं हैं 

मवाद पर 

जख्म की दवा

कोई नहीं ला रहा 

दर्द रिस रहा है 


एक-दो बरस नहीं

बरस-बरस की बात है

एक-दो जगह नहीं

यह हर जगह की बात है

सरकारें बदल जाती हैं

दिन बदलते नहीं...


छिद्रयुक्त हो चली है पूरी व्यवस्था

और चरित्र की बात तो खैर जाने ही दें

जिसका जितना हक बनता है

उतना तो दें

जो संदेसा ले के आए

उन-सा ही तो बनना था

वो एक मौका, वो उम्मीद तो मत छीनें


टूटने की कगार पर पहुँच चुका है बाँध 

सुषुप्त ज्वालामुखी भी जाग जा सकते हैं

समय की आवाज को पहचानो

"हवा तेज चलता है दिनकर राव

टोपी संभालो, उड़ जाएगा"

'दिनकर राव' भले ही एक काल्पनिक चरित्र है

यह चेतावनी मगर बिल्कुल ही सही है

यह दु:ख असली है, असली है यह पीड़ा

यह गुस्सा कभी भी क्वथनांक को छू सकता है

यह हवा‌ किसी मामूली आँधी की सूचना नहीं है

यह किसी चक्रवात, किसी बवंडर का संकेत है


हर 'दिनकर राव' को सँभल जाना चाहिए

एक नहीं कई-कई 'विजय' उठ खड़े हुए हैं

कई-कई जगहों से


'विजय' रुका नहीं करते 'अग्निपथ' के सामने...


अब न सँभले, तो फिर

सँभाले नहीं सँभलेगा 

इतिहास रौंद डालेगा


हम कुछ तो समझदार बनें...!





मंगलवार, 4 अगस्त 2026

कुछ दर्द पुराने होते हैं

कुछ  दर्द  पुराने होते हैं


कुछ  दर्द  पुराने होते हैं

हर शब सिरहाने होते हैं 

    कुछ सुख के खाते भी हमको 

    पहले     तुड़‌वाने    होते     हैं 

कहते-कहते रुक जाने के

अब लाख  बहाने  होते है 

   झाँको मन में तो जानो तुम

   मन  में   तहखाने  होते   हैं 

जब सच हकलाने लगते हैं 

तब  झूठ  सुहाने  होते   हैं 

   कुछ धक्का देने को उद्यत 

   कुछ  खड़े  मुहाने  होते हैं


छंद -९


शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

रंग-दुरंगी

 

रंग-दुरंगी

 

जब भी गुस्साए हैं

पीछे  पछताए   हैं

 

गुस्सा कर निकल गए हैं

फिर, फिर  कर  आए  हैं

 

अपना पराया कोई नहीं

खुद   को   समझाए  हैं

 

हैं साहब के पीछे

जैसे हम साए  हैं

 

उनकी तो बात न पूछो

हम  जा कर  आए  हैं

 

क्या बस में इतना ही,

खाली  फुसलाए हैं ?

 

क्या किसके हिस्से में

क्या-क्या  गटकाए हैं

 

        ॥॥॥

 

हमसे वो गुस्साए हैं

हम ही  बमकाए  हैं

 

जब इतना कोंचे हैं

तब तो  गरमाए  हैं

 

वो हम पर हँसते  हैं

हम भी भकुआए हैं


अब हमको देख यहाँ

सब मुँह ठिसुआए  हैं

 

हम चलनी चाले हैं

सूपे    फटकाए   हैं

                              छंद-८ 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

बा-खबर हो

 

बा-खबर हो

 

दर्द  अपना  ही   यहाँ

बस जानता है आदमी

दूसरों  का  दर्द   देखो

जान  के  डर  जाओगे

 

कल वहीं है, जो  जहाँ था

क्यों खींचना उसे आज पर

आज को बाँहों में भर लो

जो कर सको तर जाओगे

 

अपनी ज़िद में  आदमी

कुछ देख पाता ही नहीं

यूँ   करोगे   अपनी  ही

आँख से गिर जाओगे

 

तुम  तो  दरिया  हो अगर

चलते रहे तुम एक सिम्त

एक दिन जा कर, समंदर

से  गले   मिल  जाओगे

 

जो मिला है  उसको तो

पहले सँभालो तुम यहाँ

उम्र    छोटी   है   बहुत

क्या-क्या भला कर पाओगे

 

इस  कदर  खीजे रहोगे

कुछ न फिर हो जाएगा

उम्र   भर   रोते   रहोगे

एक  दिन  मर  जाओगे

 

दर्द    की   रेखा   अगर

मिटती नहीं है, फिर सुनो

दाग  माथे  का  बना लो

चाँद- सा खिल जाओगे

 

खैरियत  भी  चाहते  हो

तँग  भी  करते  हो   तुम

इस  तरह  तो  क्या  पता

किसका भला कर पाओगे   छंद-७