शुक्रवार, 13 मार्च 2026

जैसे पेड़ खजूर...



 

जैसे पेड़ खजूर...

 

उनके चेहरे पर मुस्कान है । उनके चेहरे पर आत्मतुष्टि और आत्मगौरव की लाली है । वे भले आदमी हैं । वे बड़े आदमी हैं । वे बड़े भले आदमी हैं । 'भले' साइलेंट  है । अतः वे बड़े आदमी हैं । सामने खड़े व्यक्ति के चेहरे पर भी मुस्कान है, पर उसकी मुस्कान में याचना की छौंक लगी हुई है ; उसकी आँखों में  कातरता के रंग हैं ।

वे  देखते-देखते बड़े आदमी हो गए हैं । बल्कि  आसपास के बहुत-से लोग बड़ा बनने की प्रोसेस में हैं ।  उनके रंग बदलते हुए  दिखते रहते हैं ।

सामने खड़े होने वाले व्यक्ति के पास प्रशंसा के कुछ शब्द हैं , जिन्हें वह उदारता के साथ खर्च कर रहा है । बड़े आदमी का जन्मसिद्ध अधिकार है प्रशंसा पाना, जिसे वे प्राप्त कर के ही दम लेते हैं । आप प्रशंसा दें, न दें, वे आपके भीतर से खुद के लिए प्रशंसा निकलवा लेंगे । यह प्रशंसा 'वन वे' होती है । बड़े आदमी के उच्च मानदंडों पर किसी अन्य व्यक्ति का कोई काम खरा नहीं उतरता । बड़ा आदमी अपने उच्च मानदंडों के आगे विवश होता है । सामने खड़ा व्यक्ति भले लाख ठकुरसुहाती करे, ‘प्रति-उपकारमें  बड़े आदमी के मुँह से किसी की प्रशंसा में एक अक्षर निकलना भी असंभवप्राय है । बड़े आदमी के ऊँचे मानदंड !

संसार दो तरह के लोगों में ही तो बॅंटा  हुआ होता है -- बड़े लोग और छोटे लोग । जो बड़े होते हैं वे विशिष्ट होते हैं । विशिष्ट यानी सबसे अलग, पहुँच से बाहर ।

ये बड़े आदमी भी सामने वाले व्यक्ति के लिए विशिष्ट हैं । सामने खड़ा व्यक्ति गुण गाए जा रहा है । गुण गाते-गाते कुछ समय बीत चुका है । सामने खड़े व्यक्ति को यह लग रहा है कि अब सही समय आ गया है अपनी अर्जी लगाने का । उसने बड़ी धीमी आवाज में अपनी बात कहनी शुरू की है । बड़े व्यक्ति ने बात बदल दी है, उसने अपने किसी पुराने काम के विषय में पूछ दिया है । सामने खड़े व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि पहले भी कई बार बताई हुई बात को एक बार फिर पूरी गंभीरता के साथ बताए । और बड़े व्यक्ति की प्रशंसा करता चले । बड़ा व्यक्ति प्रशंसा से प्रसन्न रहता है । जब तक प्रशंसा सुनता रहता है, काबू में रहता है। सामने खड़े व्यक्ति ने एक बार फिर अपनी बात करने की कोशिश की है । बड़े आदमी के चेहरे पर अन्यमनस्कता के भाव उभर आए हैं ।

सामने खड़ा व्यक्ति जरूरत में है । उसे अपनी बात कहने की जल्दी है । बड़ा आदमी अपने में मगन है । उसकी भी जरूरतें हैं । सामने खड़ा व्यक्ति उसकी इतनी ही जरूरत पूरी कर सकता है कि बड़े आदमी की प्रशंसा करता रहे । वह बड़े आदमी की जरूरत पूरी कर रहा है । सामने खड़े व्यक्ति की जरूरत आवश्यक आवश्यकता नहीं होती है । आवश्यक आवश्यकताएँ सिर्फ बड़े आदमी की होती हैं ।

बड़ा आदमी, जिस भी फील्ड का हो, उसे उस फील्ड में दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता । उसकी अपनी जमीन भले ही सूखी-बंजर हो । वह खुद को महान समझता है -- निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते । सामने खड़ा व्यक्ति चाह कर भी बड़े आदमी को असली फलदार वृक्षों के विषय में नहीं बता पाता । वह प्रयास भी करता है तो बड़े आदमी के पास अनेकों तर्क होते हैं जिनसे वह फलों को बेकार सिद्ध कर देता है ।

बड़े आदमी की हर चीज बड़ी होती है । उसके सुख, उसके दुख, उसकी सफलताएँ , उसकी विफलताएँ—  उसकी हर बात विलक्षण होती है । हर विवरण भव्यता-रंजित ।

सामने खड़ा व्यक्ति जो भी बात कहता है, उससे संबंधित दो-एक दृष्टांत बड़ा आदमी भी प्रस्तुत कर देता है । वह भी इतनी तेजी और कुशलता के साथ कि सामने खड़े व्यक्ति के अनुभव अपनी ही क्षुद्रता के चुल्लू में डूब कर मर जाते हैं ।

सामने खड़े व्यक्ति की विशेषता होती है कि वह स्वयं को बड़े आदमी का शुभचिंतक मानता है । इसी नाते कभी-कभी बड़े आदमी को कुछ सुझाव देने की चेष्टा कर बैठता है । बड़ा आदमी उसे अपना शुभचिंतक नहीं मानता । बड़ा आदमी सुझावों को सुनने के लिए बैठा नहीं होता है । वह बड़े अधिकारी की तरह ही किसी का नहीं होता । वह किसी पार्टी का नहीं, सिर्फ सत्ता का होता है और सिर्फ उसी की सुनता है।

सामने खड़े व्यक्ति ने बड़ी मिमियाती हुई आवाज में बड़े आदमी से अनुरोध किया है कि एक बहुत ही जरूरतमंद  व्यक्ति की सहायता के लिए वे कुछ कर दें । बड़ा आदमी मित और मिष्ट- भाषी है । यह गुण उसकी रूखी उदासीनता को छुपा लेता है । बड़े आदमी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया है । बड़ा आदमी है, मित भाषी भी, मिष्ट भाषी भी । शहद में डुबा कर कुनैन की गोली पिला दी है उसने । बड़े आदमी के साधन, संसाधन, जान-पहचान ,पहुँच-पैरवी–  सभी कुछ उसके निजी उपयोग के लिए होते हैं । स्वत्वाधिकार सुरक्षित !

सामने खड़े व्यक्ति से बड़े आदमी ने पुराने कामों के विषय में पूछा है । सामने खड़े व्यक्ति ने सभी कामों के पूरा हो जाने की सूचना दी है । साथ ही, उसने हर काम के पूरा होने का श्रेय बड़े आदमी को दे दिया है ।  बड़ा आदमी प्रसन्न हो गया है -- न हींग लगे न फिटकरी...। उसने फिर एक नई सूची पकड़ा दी है । सामने खड़ा व्यक्ति बड़े आदमी का मातहत होता है । सामने खड़ा व्यक्ति हमेशा फुर्सत में होता है, कम-से-कम बड़े आदमी की नजरों में । जो फुर्सत में होता है, वह फालतू होता है और पालतू भी । उसका समय मुफ्त का होता है । उसने कामों की सूची सहर्ष स्वीकार कर ली है । आत्मकेंद्रित होना बड़े आदमी का गुण है, पर-आश्रित होना सामने खड़े व्यक्ति का ।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है । इसलिए एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से कभी-न-कभी, कुछ-न-कुछ काम पड़ जाया करता है । जिससे कुछ काम होने की, कुछ सहायता प्राप्त होने की संभावना दिखती है, वह स्वतः बड़ा आदमी हो जाता है । जैसे ही आपने सहायता के लिए मुँह खोला, उसके 'बड़ा आदमी' बनने के तंतु सक्रिय हो जाते हैं । उसके बात करने का लहजा बदल जाता है, उसकी नजरें बदल जाती हैं—  जिसको मिला भाव, उसी ने खाया ताव । उसे आदर्शवाद के सारे पाठ याद हो आते हैं। वह सामने खड़े व्यक्ति को वही पाठ पढ़ाने भी लगता है ।

वो जमाना जा चुका जब बड़े लोग आम से लदे पेड़ों की तरह हुआ करते थे । अब बड़े लोग खजूर के पेड़ के समान हैं —  "पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर" । खजूर के पेड़ के तने काँटेदार होते हैं । उसपर चढ़ने के लिए पैरों को छान के रखना होता है । और भर बाँहों पकड़ के रखना होता है । बड़े व्यक्ति के पैर खजूर के तने होते हैं । सामने खड़ा  व्यक्ति भी अपने पैरों को छानकर, बड़े आदमी के पैरों से लिपट कर अरदास कर रहा है । उसके मन में रसीले, मुलायम और मीठे खजूर की यादें बसी हुई हैं । दुनिया भर में भी खजूर का यह रूप प्रसिद्ध है।  लेकिन खजूर का एक और रूप होता है, सूखा और कड़ा । छुहारे का रूप ।  सामने खड़े व्यक्ति को यह समझ आ गया है कि  बड़ा आदमी छुहारा हो चुका है । उसके ताजा-मुलायम खजूर होने की गुंजाइश नहीं बची है । दुनिया यह बात नहीं मानेगी । सामने खड़ा व्यक्ति यह समझता है । वह चुप है । बड़ा आदमी बार-बार अपना बड़ा होना सिद्ध करता रहता है । यह सच सामने खड़े व्यक्ति पर एक और बार सिद्ध हो गया है।

मुझे बहुत-से बड़े लोगों के चेहरे याद आ रहे हैं । 'शोले' का डायलॉग याद आ रहा है— "मुझे तो सब पुलिस वालों की सूरतें एक जैसी लगती हैं"।  बड़े लोगों के चेहरों पर उपेक्षाभरी मुस्कानों की याद आ गई है । मन ने तुरंत ही मन की बात काटी है । 'शोले' का अगला डायलॉग आ गया है -- "इसकी तो आदत है बकबक करने की" । मुझे भी पानी में रहना है। मुझे केवल 'प्रियं ब्रूयात्' करना चाहिए । कम-से-कम मुँह तो बंद रखना ही चाहिए ।  मैं इसे शिष्टाचार या लिहाज का नाम दे ले रहा हूँ । ऐसा कर के मैं राहत की साँस ले पा रहा हूँ । 

सोमवार, 2 मार्च 2026

कुछ होली में

 

        कुछ होली में ...     


            (१)


मैं तेरी  तू मेरी हरदम बरबस पीठ खुजाय 

दुनिया ऐसे ही चलती है चाहे भाय न भाय

                            आओ कि पीठ खुजाएँ 


कितने मीठे बोल कहे हैं है प्यारी मुस्कान

प्यारी-प्यारी बातों में ही छुपते तीर कमान

                              निशाना साध लीजिए


मन में क्या-क्या घुलता रहता मुँह में मगही पान

जाने क्या-क्या भेद भरे हैं जान-जान हल्कान 

                                अजी दम साधे रहिए


उड़ने वाले के पर काटो है उनका फरमान

वे ही खाली उड़ते जाएँ उनका है अरमान

                                 कोई तो खड्ग उठाय


उनको लगता है सबसे वो हम समझे हम तेज

'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' कितना मानीखेज

                                 आओ कि पाठ पढ़ाएँ 


चला रहे हैं चक्कर बैठे हाथों लिए लगाम

आम-आम को खास बना दें और खास को आम

                                    आप भी चरण दबाएँ 


वे हँस के हैं हामी भरते हम करते तारीफ

हम जैसे हैं नौकर-चाकर वे हैं अपने चीफ

                                    बड़े वे बहुत भले हैं 


इसको काटें उसको बदलें सम्पादक का काम

सबसे पहले वे देखे हैं आपका क्या है नाम

                                  किसी से कहवाएँ जी



तुम जाकर जिस मंच चढ़े हो वह तो है बदनाम

धुला-धुलाया चमका-चमका मेरा है ईनाम

                                    तुम्हें कुछ खबर नहीं है


खूब गले लगाइए चाहे करिए मन की बात 

कितने दिन कोई सुन पाए खाकर छूछा भात

                                 थाल को कुछ तो भरिए


बाहर अच्छी धूप खिली है कवि बहुत है उदास

दुखी होने से कवि गुणी हो उसको होना पास

                                    लटका रहे मुँह थोड़ा


दुनिया कटती-बॅंटती रहती कवि तो रस का दास

कवि तो कुछ ना जाने भाई जाने वास-सुवास

                                    कवि चित्त का ग्राहक है 


साहब साहबी छोड़ पाएँ बहुत कठिन है काम

साहब होना दीन-धरम है साहब उनका नाम 

                                   जनता उनकी प्रजा है 


बच्चे बूढ़े बहुत हो चले बूढ़े हुए जवान

कलजुग की यह रीत नई है क्या ही पकड़ें कान

                                      खेल का खेल देखिए 


एक कवि हमने यहाँ देखा जिसका ऊँचा दाम

छोटी आँखें चुॅंधिया जाएँ कवि का इतना नाम 

                                अजी कवि-भाव देखिए


कभी कवि को पाठक न भाए कैसी है यह बात

या यह कवि जी सोच रहे हैं इनकी क्या औकात

                                    कवि की महिमा देखिए


हमने जिनके पैर दबाए सेवा की भरपूर

पेड़ खजूर वही बन बैठें फल रख दें अति दूर

                                 जगत की रीत यही है


जितना झुकता जाता जो भी उतना झुकता जाय

गधा खड़ा हो अगर सामने क्यों ना बोझ लदाय

                                         गधा तो गधा रहेगा



                     ( २ )



देखीं,कइसन कइसन राजा ,कइसन कइसन मेठ

भितरि जे जेतना भिखमंगा,उहे कहावे सेठ

जो गी रा सा र रा रा

 

कुछ पइला से मन ना लागे,कइसन राग- बिराग

भरल जवानी बूढ़ भइल बा,ठंढाइल बा आग

जो गी रा सा र रा रा

 

हम बोलीं तहरा तू बोलs हमरे मनवा चोर

रोजे रोजे गल्ती होला,रोज पराला भोर

जो गी रा सा र रा रा

 

केकरा के हम संघी कहीं, केकरा बामपंथि

खाली लेके बइठल बाड़ें, आपन आपन ग्रंथि

जो गी रा सा र रा रा

 

मूस मुटइहें लोढ़ा बनिहें, फिर भी रहिहें मूस

कतनो खुस हो जाई तब्बो, परजा घासे-फूस

जो गी रा सा र रा रा

 

काम करावे खातिर देखीं,सब रस्ता बा सेट

दाम चुकाईं मेवा पाईं,जइसन सुतरे रेट

 जो गी रा सा र रा रा

 

जे ना बूझे ऊहे बोले,खूब अलापे राग

कोयल बन बइठल मुस्कावे,मुँहवा खोले काग

जो गी रा सा र रा रा

 

सोझ के मुँह त कुतवो चाटे, रहे टेढ़ से सोझ

दुनिया चाँपल चाहे देके,माथे भर-भर बोझ

जो गी रा सा र रा रा

 

हाथ जोर जे करे निहोरा,बोली बोले मीठ

काम पुरे पर देखीं ओही,कतना बड़का ढीठ

जोगी रा सा र रा रा                                                      


  

  

                               

                                





                    



शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

अथ कविकथा

 

अथ कविकथा

 

कवि के गुण, कविता के गुर

        (1)

किसी कवि या कलाकार से

मिलने के पहले

यह तय कर लें

कहीं ढूँढ़ने तो नहीं जा रहे

उसकी कविता या कला को

उसके भाव और व्यवहार में

 

कविता या कला के क्षण

बहुत थोड़े ही होते हैं

बाकी समय तो आदमी

पूरा व्यवहारिक होता है

झूठ- मूठ का हँसता है

झूठ- मूठ का रोता है  !     

 

          (2)

आपने सुनाई कविताएँ

सुनी- सुनाई

 

इतने पैसे और इन सुविधाओं में

संभव है

इतनी ही समाई

 

        (3)

घोर असाहित्यिक सभा में

आप आए सब जानते हुए

 

आपने चाहा--

जब मंच पर आएँ

आप कुछ सुनाएँ

लोग छोड़कर सारी बातें

अपनी प्लेटें,बाकी काम

बस देकर पूरा ध्यान

सुनें आपको

 

आप कवि हैं

आप कुछ भी सोच सकते हैं   !

 

       (4)

कवि में कब अफसर दिख जाए

कब अफसर कवि हो जाए

कहना कठिन है

 

पहले भी था

समय

अब और भी मलिन है  !

 

       (5)

कौन किसको नाध रहा है

कौन क्या कुछ साध रहा है

कुछ भी करना, पाना सम्मान

कवि, सावधान  !

 

     (6)

आपने कहीं

सफ़ारिश की

कि वो भला इन्सान

कवि भी है महान

 

आप

आप ही बन गए महान  !

हींग लगे न फिटकरी ...

     (7)

कवि की

कविताएँ पढ़ीं

चकित हुआ

 

कवि का

व्यवहार देखा

चकित हुआ

 

चकित

होने-होने में

कितना फ़र्क है

कितना ज़्यादा  !

 

हे कविश्रेष्‍ठ !

हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे  !!

 

भाषा पर अधिकार

बहुत अच्छा

कवि का व्यवहार

बहुत अच्छा

कवि ने जो किया सेवा-सत्कार

बहुत अच्छा

दिया उसने जो भेंट-उपहार

बहुत अच्छा

सब लेन-देन, सौदा-सुलुफ

विशुद्ध व्यापार

बहुत अच्छा

 

सारे अच्छे बाह्य तत्वों से ही गोया

उसकी कविता सधी है

उसके दुआरे पर गैया नहीं,

कविता बँधी है,

कवि के लिए तो

चारा यही है

 

कवि- आलोचक- प्रकाशक- संपादक

जिसके चरणों में लोट रहे

 

हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे  !!     

            

कवि की नैतिकता

कवि का शृंगार

कभी करघनी

कभी गले का हार

कवि व्यक्ति विशिष्ट

विशिष्ट

उसका शिष्टाचार

 

फूलती-फलती है कविता

कवि निरामिष 

करता है फलाहार

 

साहित्य के सिलबट्टे

लेखन की भाँग को

अपने हाथों से जी

जैसे तुम घोंट रहे

जैसी भी हवा हो चाहे

तुमको ही वोट रहे

नाम हो तुम्हारा, और

डंके की चोट रहे


हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे  !!    

 

     कविता की क्लास

हरेक  माल   सात  सौ  पचास

वे  कवि   बनाते   खासमखास

 

कवि बनो, छपाओबँटवाओ

कुछ  वे  निकाल  देंगे  भड़ास

 

कवि  हैं  उनका  नाम  बहुत है

यूँही    नहीं    करते    सम्भाष

 

दाम चुका कवि को सुन  लीजे

वरना   कौन   डाले   है   घास

 

उनसे  क्या  ही   करें   उम्मीद

वे  तो  खुद   हैं    पानीफ़राश

 

कहें बड़े कवि जो  सुधा वचन

वही  छोटन  का    वाग्विलास

 

खदबद-खदबद कवि करते हैं

उनपर  कोई    डाले   प्रकाश

 

उगे    हैं     जैसे     कुकुरमुत्ते

जैसे  बाद  बरखा   के   कास

 

दिल्ली   दूर  ही   रहे   अच्छा

अगर  हो  संगदिलों  का वास        

 

कवि की क्लास

आपने सिखाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम


पैसा देते छप जाते

कहीं ना कहीं खप जाते

पैकेज में कमी थी जो

आपने पुराया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

स्वयंसिद्ध स्व-अभिप्रमाणित

जाने कितने फिरते हैं

एक कहो सौ गिरते हैं

आपने उठाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम

 

नाम क्या, नई धारा है !

साहित्य को सँवारा है !

कितना भाईचारा है !

आपने निभाया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

अगली पंक्ति  बैठ बड़े

पिछलों को तो भाव न दें

पीछे नीचे वालों को

हल्के सहलाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम

 

कितना अच्छा, निविदा हो!

सबको कितनी सुविधा हो!

संपादकों ने नहीं तो

मुफ्त सर खुजाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम

 

किसकी सुनता कौन यहाँ

किसको चुनता कौन यहाँ

सब ही उम्मीदवार हैं

अभी समझ आया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

पहुँच पैरवी जो लाए

वह तो जग पर छा जाए

वरना पिछली बेंच बैठ

रहे बौखलाया मैडम

आपने बचाया मैडम

 

माना कि अंगूर खट्टे

हम  सारे  खाते बट्टे

हम नाकारा नाकाबिल

है मन बौराया मैडम

हमें कवि बनाया मैडम  !!

 

अग्रज सारे दिग्गज हैं

बाकी  सारे पदरज हैं

कुछ भी कर अग्रज होऊँ

कवि यही मनाया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

कौन कब ठगाया मैडम

कौन बरगलाया मैडम

चिकनी-चुपड़ी बातों का

छुरा कौन चलाया मैडम

जग झूठा जग चालबाज

आपको फँसाया मैडम  !!             

 

अथ कविकथा

सारे काम-धाम वही

सारी बात-वात वही

मदिरा का पान वही

राजनीति-ज्ञान वही

कहने को सारगर्भित

दरअसल पतित-गर्हित

लोभी, लंपट,कपटी

करते छीना-झपटी

पर,सबसे अलग दिखने को

आगे सबसे बढ़ने को

देखिए कि उनका

कवि का मुखौटा है !

 

पूर्णकालिक धंधे के

पीछे-पीछे चलती है

गले का हार बनने को

माथे पे चढ़ने को

हर घड़ी मचलती है

रोज ही फिसलती है

ऐसे में कहिए तो

कविता जँचती कैसे

कविता बचती कैसे

खुद बुरी नजर वालों के

हाथों में आजकल

कविता का कजरौटा है !

 

सूखी रोटी की महिमा

निर्धनता की गरिमा

कितना बखाने हैं

कितने सयाने हैं !

कोई भला क्या जाने

जो ही सुने वही माने

जनता की आँखों पर

महिमा की पट्टी है

कविता तो इन दिनों,बस

पढ़ा रही पट्टी है

इधर टिफिन में कवियों की

भरा घी का परौठा है !

 

कवि ही तो है पाठक

और कवि आलोचक

आयोजक भी कवि

कवि ही तो प्रायोजक

कविता के खाँचे हैं

कविता का चूल्हा है

कविता की निमकी है

कविता का ठेकुआ है

या जैसे फँसाने को

दवा-मिला आँटा है

या कविता चूहा है

और कवि बिलौटा है !