शनिवार, 16 मई 2026

लेखक की भावुकता

 लेखक की दुनिया : कुछ गैरशास्त्रीय टिप्पणियाँ- १


               लेखक की भावुकता 



लेखन प्रथमत: लेखक की प्रतिक्रिया है।  किसी बात के प्रति, अपने परिवेश के प्रति या किसी घटना के प्रति । रचनात्मक लेखन में इसके एकपक्षीय होने की संभावना होती है । हम चाहे तो इसे पक्षधरता कह लें।  कुछ लोग इसे पक्षपात भी कह सकते हैं ।


लेखक भावुक होता है । लेखक को भावुक होना चाहिए । लेखक की भावुकता वह चिंगारी है जिससे रचना का जन्म होता है । लेकिन भावुकता की कुछ सीमा भी होनी चाहिए । यदि भावनाओं में क्रोध भी शामिल हो, तब मुश्किल और ज्यादा है । तर्क से भावों को नहीं समझा जा सकता, भावों से तर्क को नहीं काटा जा सकता । बात इतनी ही है । विह्वलता कैसी भी हो, अच्छी नहीं होती। 


लेखक को भावों में गोते लगाना चाहिए, लेकिन पानी से बाहर निकल का साँस लेने की भी जरूरत होती है । आसपास नजर दौड़ाने की भी जरूरत है । लेखक को अर्जुन की तरह सिर्फ  'मछली की आँख ' देखने वाला नहीं होना चाहिए ।  शायद इसलिए, कि लेखन बहुत ज्यादा लक्ष्य साध कर नहीं हो सकता । एक दिशा में बढ़ना तो तय किया जा सकता है , लेकिन रास्ता और मंजिल  शायद ही पूर्वनियोजित रह पाते हैं । 


अति भावावेश में आकर कही गई बात हो सकता है कि किसी एक पक्ष के प्रति मानवीय व्यवहार को अवरुद्ध कर दे । लेखक को कहने से ज्यादा लिखकर बात करनी चाहिए । लिखी हुई बात ज्यादा पक्की होगी । कम-से-कम इस खयाल से कि उस लेखक को वह बात सिद्ध करनी पड़ सकती है या उस बात पर उससे सवाल - जवाब किया जा सकता है । एक और बात यह कि लेखक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो बात वह कहने या लिखने जा रहा है, उसे वह सार्वजनिक तौर पर भी कह सके । एकांत में कही गई बात, खास तौर पर समीक्षात्मक/ आलोचनात्मक ज्यादा ही व्यक्तिगत ( हमला ) मान ली जा सकती है ।


स्टैंड अप कॉमेडी का दारोमदार भी लेखन पर ही होता है । यह किसी कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए कैरीकेचर के समान ही है । कार्टून में किसी उभरी हुई चीज को और भी, अनुपात से कहीं ज्यादा, उभार दिया जाता है ताकि जो बात कही जानी है, वह खूब उभर कर सामने आए । 


बातों को साफ - साफ उभार कर कहना लेखन की विशेषता है । भावों को संप्रेषित करने के लिए तो ठीक है, लेकिन क्या यह व्यवस्था पर टिप्पणी करने, या किसी नियम या परिस्थिति की समीक्षा करने के लिए भी कारगर उपाय सिद्ध हो सकता है ? 


जैसा कि ऊपर भी कहा गया है, लेखन प्रथमत: लेखक की प्रतिक्रिया है । स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया उस बात पर ज्यादा होगी, जो ज्यादा उभर कर सामने आई है।  ऐसे में उस प्रतिक्रिया के क्रोध या व्यथा से सहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन क्या यह पूर्ण प्रतिक्रिया / अभिव्यक्ति भी है ? 


हाल - फिलहाल की दो घटनाएँ/ बातें इस सम्बन्ध में देखी जा सकती हैं - 


1. भारत के प्रधानमंत्री ने  जनता से सात बिंदुओं पर अपील की है।

2. मृत बहन के खाते के निपटारे ( मृतक के खाते का)  के क्रम में एक आदिवासी युवक का अपनी बहन के शव को लेकर बैंक पहुॅंच जाने के घटना की अखबारों में रिपोर्टिंग ।


इन दोनों ही बातों पर लेखकों ( स्टैंड अप कॉमेडी सहित) की धारदार प्रतिक्रियाएँ ( टिप्पणी, कविता, कॉमेडी शो आदि) आईं । इन प्रतिक्रियाओं ने आम जन के आक्रोश या उस आदिवासी युवक की व्यथा को बखूबी रेखांकित किया । लेकिन क्या यह भाव से तर्क को काटना नहीं हुआ ? क्या अर्थव्यवस्था को लेकर प्रकट की गई चिंताएँ एकदम ही निराधार हैं ? क्या तेल की कीमतें, सोने का आयात, विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति -- इन सब का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव सिर्फ अभी का मामला है ? अपील या घोषणा की टाइमिंग या तरीके पर आपत्ति हो सकती है, पर इसकी आवश्यकता भी क्या  बेमानी है ?  इसी तरह , क्या उस आदिवासी युवक को बैंक के द्वारा वैसा करने को कहा गया था ? क्या मृतक के खाते की राशि के भुगतान  के लिए नियमानुसार दस्तावेज अपेक्षित नहीं होते ? यह बिल्कुल हुआ होगा कि ठीक से समझाने में लापरवाही बरती गई हो ? व्यथित मन की प्रतिक्रिया में यह extreme कदम उठाया गया होगा । लेकिन इसमें सारा समाज दोषी नहीं है क्या ? हम सिर्फ व्यवस्था पर दोष देकर बरी नहीं हो जा सकते ।


लेखन का काम दोष देखना भी है, उसे सुधारने के लिए कुछ करना भी है । दोषारोपण सिर्फ पहला काम है, यदि है तो । अंतिम काम नहीं । 



मंगलवार, 5 मई 2026

फिर कही बात...३

 फिर कही बात...3

(बतर्ज़े-ग़ज़ल)


दर्द  अपना  बता  कर   क्या  होगा

अब किसी को रुला कर क्या होगा


आइनों को हटा कर क्या होगा

बेवजह मुस्कुरा कर क्या होगा


मैं जो हूँ अब हूँ, तुम जो हो,  हो

यहाँ रिश्ता बना कर क्या होगा


मेरी नज़र में तुम  क्या  हो, अभी

ये किसी को बता कर क्या होगा


तुमसे पहले कुछ कहाँ  यक़ीं  था

तुम नहीं,आज़मा कर क्या होगा


***


क्या कहें कि क्या माजरा है

सच  तो  उनको  भी  पता है


लब हैं कि हँस  रहे  हैं  बहुत

दिल है कि बहुत दुख रहा है


अभी है सब, अभी सब खतम 

जीवन  का   क्या   आसरा  है


***


दिल में ज़हर हर तौर है

पेशे-नज़र कुछ  और है


भरोसा   वे     दिलाते   हैं

अपनी खबर कुछ और है


न सहो, कह ही डालो अब

बाकी  अगर  कुछ  और है 


कब  जाँ  निसार   करता   है 

कि नया  बशर  कुछ  और है

सोमवार, 4 मई 2026

ध्यातव्य

 

ध्यातव्य : १

( कुछ सोचने योग्य...)


मन खुश हो तो बाकी ( नापसंद) बातें इग्नोर कर दी जाती हैं। 

बाकी ( नापसंद) बातों को इग्नोर कीजिए। मन खुश हो जाएगा, एक न एक दिन जरूर। 


***


जिंदगी लक्षणा या व्यंजना में पूछती है और चाहती है कि हम उत्तर अभिधा में दें।    


***


कई बार एकदम साफ दिख रही, सबको समझ आ रही बातों का भी कहा जाना जरूरी होता है। 


कुछ बातों का मर्म उनके कहे जाने में छिपा होता है । 


***


कर्मों का हिसाब भी जरूरी नहीं कि जहाँ किया गया हो, वहीं हो जाए। वह किसी भी स्थान पर किसी भी रूप में मिल जा सकता है। कोर बैंकिग में जमा किए गए पैसों की तरह । कहीं जमा कीजिए, कहीं निकाल लीजिए ।


***


कर्मों का हिसाब अकाउंट पेयी चेक से ही होता है, कर्ता के नाम के। 


***


किसी से 

अपेक्षा रखिए मत

किसी की

उपेक्षा करिए मत 


सुखी रहेंगे


***


दुःख का कारण बाहर नहीं, अंदर है । 

दुःख का निवारण बाहर नहीं , अंदर है । 


***


क्रोध असंतोष का लक्षण है। 

क्रोध कमजोरी की निशानी है । 

क्रोध अपने से कमतर माने जाने वालों के प्रति उद्गार है। 

क्रोध स्वयं रोग है, न कि उपचार है। 


***


बस एक व्यक्ति मेरी बात को अच्छा मान ले। 

बस एक व्यक्ति मेरे काम को अच्छा मान ले। 

बस एक व्यक्ति मुझको अच्छा मान ले... 


वह एक व्यक्ति आप स्वयं हैं। 

उत्तरदायी बनिए।          


***


आदमी को किसी और से ज्यादा compare नहीं करना चाहिए। अपना better version बनने की कोशिश करते रहना चाहिए।


***


आपको शक्तियाँ मिली हैं तो आपके व्यवहार में जिम्मेदारी भी स्वतः आनी चाहिए। 

अपने privilege को अहंकार न बनने दें। 


***


पूर्वग्रह वैमनस्य में नहीं बदलना चाहिए। 


व्यक्तिगत पसंद/ नापसंद सामूहिक क्रियाकलाप में बाधा नहीं पहुँचाना चाहिए। समूह की  नीति व्यक्तिगत सोच से अलग हो सकती है। 


***


कोई भी व्यक्ति उतना अच्छा नहीं होता, जितना वह प्रदर्शित करता है। 

कोई भी व्यक्ति उतना बुरा नहीं होता, जितना वह दिखता है। 


***


लोग व्यक्तिगत छवि को हर हाल में चमकाना चाहते हैं। 


***


कोई आपके पैर छूता हो तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपकी इज्जत भी करता हो। 


***




रविवार, 3 मई 2026

फिर कही बात ...2

 फिर कही बात ...2


मन को तुम्हारे टटोले हुए हैं

अब आँखें अपनी खोले हुए हैं


रात और दिन का फ़र्क कुछ नहीं

करेंगे वही जो बोले हुए हैं


कल तक वही थे आँखों के सपने  

जो आज दिल के फफोले हुए हैं


मन मे ज़हर ही ज़हर घुल रहा है

रस बातों कैसा घोले हुए हैं


माना तुम्हीं-तुम बड़े हो गए हो

माना कि बस हम मँझोले हुए हैं  


चिंताएँ कितनी ठूॅंसी हुई हैं

इंसान हैं याकि झोले हुए हैं


मन था- नज़रों में ऊॅंचा उठेंगे 

वे कि तराजू में तौले हुए हैं


लगता है कि हम चूके यहीं पर

हमीं भेद सारे खोले हुए हैं


+++


ऊब न जाओ डरता हूँ 

कितनी बातें करता हूँ 


तुम भी अच्छे लगते हो

तुम पर भी मैं मरता हूँ 


उनको दिक्कत है ,मैं ही

खतो-किताबत करता हूँ 


दिन भर खाली बैठा हूँ 

दिन भर आहें भरता हूँ 


सोच-समझ कर कहते हैं

मैं कह, सोचा करता हूँ 


+++


बस बाल-बाल बचे हैं

बुझे हुए अगरचे हैं


किस्से सभी मेरे हैं

जाने किसने रचे हैं


सब बॅंधे-से बैठे हैं

खूबरुओं के चर्चे हैं


खुल के बोलनेवाले 

अब भला किसे पचे हैं

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

फिर कही बात...

फिर कही बात... 

(कुछ छंद में बतर्ज़े-ग़ज़ल )



मुद्दा  तो   समीचीन   है

इधर पाक, उधर चीन है


धुन वही आप ही की है

जी, आपकी ही बीन  है


गौर से सुनिए ज़रा फिर

अगर बात कुछ महीन है


बेफिक्र  हो  ले जाइए

दिल चीज़ बेहतरीन है


चाहा कि दिल हाथ आता

आ    जाता   आस्तीन   है


तुम्हारा ही है  आसमाँ 

मुझे  ढूॅंढ़नी  ज़मीन  है


आँख बही जाती है बस

और दिल तमाशबीन है


हाल इसका भी पूछ लो 

कि ज़ख्म ताज़ातरीन है


***


कोई  दोस्त  जब   दुश्मन   लगे

फिर बुझा-बुझा-सा ये मन लगे


एक हल्के-से झोंके से भी

कभी यूँ टूटता बंधन लगे


कितने   सुहाने   थे   पल   मेरे

अब सोचूँ अगर तो सपन लगे


***


कुछ भी करने को  तैयार  हूँ 

जी हाँ, मैं बिल्कुल बेकार हूँ 


जो खुद ही  डूबा  चाहता है 

एक ऐसा अजब मँझधार हूँ 


कहना तो तुमसे चाहता  हूँ 

तुम्हारा,देख लो, मैं प्यार हूँ 


कांटों में अगर एक खार हूँ 

तो गुलों में उनका क़रार हूं


अब तो कुछ करना ही पड़ेगा

यहाँ  बहुतों  का  एतबार   हूँ


तुमको सुना-सुना कर हाल सब

अब   हल्का-हल्का-सा  यार हूँ 


***


बुधवार, 29 अप्रैल 2026

श्रद्धांजलि

श्रद्धांजलि


चले गए इरफ़ान !

    [ 29.04.2020 ]

 

चले गए इरफ़ान !

 

साथ ले गए 

कुछ

अंत:करण का 

 

भर गए

रह गई खाली जगह को

एक भींगी हुई-सी भावना से

 

साधारण को

जो

असाधारण कर देती है

उस संभावना से !!

 

यहीं तो हैं ऋषि कपूर

    [ 30.04.2020 ]

 प्रेम

अमर होता है

मासूमियत शाश्वत

 

पुर-ज़ोर

हुआ जा सकता है

पुर-शोर

हुए बिना

 

अच्छा होना किसी का

बना रह सकता है...

बचा गए

कितने-कितने दिलों में यह भरोसा

 

चले तो गए हैं

मगर 

यहीं तो हैं

ऋषि कपूर !!

 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

नामाक्षरी

नामाक्षरी 


 

ग में जो प्यारा हो

रज कि तुम्हारा हो

न्‍ यारा हो, दुलारा हो

ना हर तुम,दुनिया ये

ल-थाना थारा  हो

***

सं कल्प सारे पूरित

दी पित सारी खुशियाँ हों

प्‍ यार जग से खूब मिले

रक्कियाँ कदमों में हों

***

य जय      बी  एन  मिश्रा

क यक  दिन  इक मिसरा

ग-जीवन   का  हर  छिन

म-नियम   ढले  हों   दिन

बी     रखीं    हों  खुशियाँ

एन रूट       मन- गलियाँ

मि ताई        भलाई       से

श्रा वण        बरखा    जैसे

***

रा ह अपनी चले चले

जे ठाई   पकड़े   चले

हाना  अंदाज़   धरे

***

वि-सा  रवि  का  रोशन  रहे   नाम

वि शद   विहंगम    रहें   सारे   काम

कु शल  कुशाग्र  प्रवर  प्रखर साकार

मा र्जन- अर्जन- लाभ- यश- प्राकार

चित-रमित-भरित-जड़ित टीमटाम

***

बि ताइए जिन्दगी रंग में

नी र-क्षीर जो मिले संग में

हद मन का सदा बचा रहे

***

 

प्र काश का हो मण्डल

का यल जग, मन उज्ज्वल

बो-रोज़ रंग जमता रहे

***

सु र्ख़रू हों

मी र-ए-कारवाँ भी रहें

हे-दिल की ख़्वाहिशों का तर्जुमा यही है

***

 

चि रनवीन

रं जन-प्रवीण

जी वन अनुशासन

य-कुमोद नित प्रफुलित

***

 

न का ही पाइए

नो श फ़रमाइए

श्न हो ज़िन्दगी, रोज़ की बात हो

***

 

दि ल की कली रहे खिली

ने ह के बँधे रहें फीते

रबती लगती रहें बातें

***

 

दी खें दूर-दूर से

पे श्तर से भी पहले

ख्सियत के रंग तुम्हारे छाए इस जहान में

***