‘बच्चन के
स्वर में बच्चन’ के बहाने
[ यह निबन्ध आठ वर्ष पहले लिखा गया था ]
बरसों पहले एक एल.पी रेकॉर्ड आया था जिसमें हरिवंश राय बच्चन की कविताओं
का पाठ उनके अभिनेता पुत्र अमिताभ बच्चन ने किया था । इसके साथ ही एक और रेकॉर्ड
था जिसमें मधुशाला की चुनी हुई रुबाइयों को गायक मन्ना डे ने गाया था । इसमें एक
रुबाई स्वयं बच्चन जी की आवाज़ में भी थी । बच्चन जी मंच के एक अति-लोकप्रिय कवि
थे । उनके कण्ठ की प्रशंसा हर जगह थी। ध्यान रहे कि यह रेकॉर्ड तब आया था जब
यू-ट्यूब जैसे साधन नहीं थे । आज तो कवियों की कविताओं का पाठ अलग-अलग क्षेत्र के
लोग कर रहे हैं। कुमार विश्वास, मनीष गुप्ता,
नीलेश मिश्रा ऐसे कुछ नाम हैं जो हिन्दी
कविता को लोगों के सामने वीडियो के माध्यम से ला रहे हैं ।
पहले की कविताएँ गेय हुआ करती थीं। यह शायद वाचिक परम्परा
का असर था । नई कविता के आने, बल्कि निराला के द्वारा कविता को छन्द-मुक्त करने के बाद, कवितायें श्रव्य से ज्यादा पाठय् रूप में सामने
आने लगीं । हाल के वर्षों में तो मंच पर सिर्फ और सिर्फ हास्य कविताओं का बोलबाला
हो गया है।
आज से कोई चालीस वर्ष पहले कविताओं का रेकॉर्ड निकाला
जाना एक बड़ी घटना थी । बड़ी इसलिए कि हिन्दी कविताओं का कोई अलबम उसके पहले नहीं
आया था। और आया भी हो तो प्रसिद्ध नहीं हुआ था । रेकॉर्ड के कवर पर बच्चन जी की
उक्ति थी कि “कविता लिखना कला है तो कविता पढ़ना भी कला है ।” यह भी कि अमिताभ
बच्चन के पास कविताओं के प्रति न्याय करने के लिए आवाज के साथ, जो उससे
भी महत्त्वपूर्ण गुण है, वह है इन कविताओं के साथ उनकी तन्मयता-एकात्मता । इस
रेकॉर्ड का महत्त्व यह भी है कि यह सिद्ध करता है कि पढ़ने आता हो तो छन्द-मुक्त
कविताएँ भी सुनने में आनन्द देती हैं और ढंग से पढ़ी जाएँ तो ऐसी कविताओं की पंक्तियाँ
भी याद हो सकती हैं । साधारण तौर पर देखें तो हिन्दी कविता अपनी पैठ खोती जा रही
है । इसका कारण है कविताओं का छन्द में नहीं होना या उसका स्मरण करने में कठिन बन
जाना है । कविताएँ अगर याद न हो पाएँ तो उद्धृत नहीं की जाएँगी, और अगर
"कोटेबल" नहीं हैं, तो कविताओं की महत्त्व कम हो ही जाता है । ध्यान दे कर
देखें कि लोग "कोट" क्या करते हैं- शेर या फिर पुरानी कविताएँ । ऐसा
इसलिए कि शेर और कविताएँ लोगों की जुबान पर आसानी से चढ़ जाती हैं और एक तरह से
मुहावरों का स्थान ले लेती हैं । नई कविता के साथ दिक्कत यह भी हो गई है उसे सिर्फ
तथाकथित हिन्दी के साहित्यकार ही पढ़ते-सुनते हैं । पाठक/श्रोता शायद किसी को
चाहिए ही नहीं ।
इन बातों के बर-अक्स ‘बच्चन के
स्वर में बच्चन’
को देखें । ठीक है कि अमिताभ बच्चन एक ऐसा नाम था जो किसी भी चीज की लोकप्रियता
निश्चित कर सकता था, पर उनकी भी हर फिल्म हिट नहीं होती । फिर यह तो एकदम हिन्दी
कविता की बात थी । एक जोखिम ही था म्यूजिक कम्पनी के लिए और शायद बच्चन जी और
अमिताभ बच्चन के लिए भी । इस कैसेट में बच्चन जी की चौदह कविताएँ संकलित की गई हैं
जो गेय नहीं, पढ़े
जाने के लिए हैं । एक दूसरे रेकॉर्ड ‘मधुशाला’ की तरह इसमें कवि की आवाज में कुछ भी नहीं था । जहाँ
मधुशाला में बच्चन जी की आवाज़ में एक रुबाई का होना रेकॉर्ड का टोन तय करता है और
श्रोता को थोड़ा-सा नॉस्टैल्जिक भी करता है, ‘बच्चन के
स्वर में बच्चन’
में पूरा दारोमदार अमिताभ बच्चन की अदायगी पर है । अमिताभ बच्चन अपनी असरदार आवाज
के लिए जाने जाते हैं और लोग उनके मुँह से ‘गब्बर
सिंह अपने आदमियों से कह दो अपनी बंदूकें फेंक दें’ जैसे
डायलॉग सुनने के आदी थे । फिल्मों में तो दृश्य का भी अपना अलग असर होता है, यहाँ
उन्हें अपने पिता की कविताओं का पाठ करना था और इस तरह करना था कि श्रोता के हृदय
तक कविता अपने सही भावों और अर्थों के साथ पहुँच जाए । भवानी प्रसाद मिश्र ने अपने
एक साक्षात्कार में कहा था "गद्य आपको सुनते ही याद नहीं हो जाता, जबकि
कविता हो सकती है यानी कविता वक्त पर काम आती है... छन्दहीन
कविता की सबसे बड़ी खराबी यही है कि उसकी कोटेबिलिटी अर्थात उद्धृत करने की भी
योग्यता कम हो जाती है।" ऐसे में एक ऐसे कवि की बिना छन्द वाली कविताओं का
पाठ,
जो अपने मंच के गायन/पाठ के लिए प्रसिद्ध रहा हो, चुनौतीपूर्ण
था । दूसरी चुनौती यह थी कि यह कविता पाठ एक ऐसे अभिनेता के द्वारा किया जाना था
जिसकी छवि "एंग्री यंगमैन" की थी । इस अलबम में छोटी-बड़ी चौदह कविताएँ
हैं । पार्श्वसंगीत या इंटरल्यूड के रूप में मुरलीमनोहर स्वरूप का संगीत है ।
मुकेश के द्वारा गाए हुए रामचरितमानस के संगीतकार भी मुरलीमनोहर स्वरूप ही हैं । चौदह
कविताओं में ‘अग्निपथ’, ‘जीवन की
आपाधापी में कब वक्त मिला’, ‘मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़’, ‘कोयल
कैक्टस और कवि’, ‘बुद्ध और नाच घर’ जैसी
कविताएँ हैं ।
इन कविताओं को सुनते वक्त आप आसानी से महसूस कर सकते हैं
कि अमिताभ बच्चन ने कविताओं को कविता के लिए उचित ठहराव के साथ पढ़ा है । ऊपर जिस तन्मयता-एकात्मता
की बात की गई है, उसी में आगे बच्चन जी कहते हैं कि इन कविताओं के साथ
उनकी तन्मयता-एकात्मता है जो पिता-पुत्र के आजन्म संपर्क-संस्कार से उन्हें मिली
है । ‘अग्निपथ’ कविता
को बहुत संभव था कि अमिताभ अपनी लोकप्रिय सिने-छवि के अनुरूप एंग्री यंगमैन के
अंदाज़ में पढ़ जाते । इस कविता को उन्होंने एकदम ठहर कर पढ़ा है । पूरी कविता किसी
गुस्से में नहीं, बल्कि स्थिति को जानने व स्वीकार करने के भाव के साथ
पढ़ी गई है । ‘जीवन
की आपाधापी’
में एक ऐसी कविता है जिसे अमिताभ ने कई मौकों पर पढ़ा- सुनाया है । यह अपेक्षाकृत
एक लम्बी कविता है । यह कविता जब आप पढ़ते हैं तो उसमें भावों का एक तेज प्रवाह
अनुभव कर सकते हैं । इस कविता के पाठ की भी यह विशेषता है कि यह भावों के सारे
प्रवाह का अनुभव आपको कराती है, बिना किसी शब्द के उच्चारण को कम या ज्यादा महत्त्व दिए ।
बहुत संभव था कि प्रवाह के लोभ में संप्रेषणीयता दरकिनार हो जाती । उसी तरह जब आप ‘मैं हूँ
उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़’ सुनते हैं तो आप खुद उस भावलोक में पहुँच जाते हैं जहाँ
आप भी कहें कि “ मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़” । ‘बुद्ध और
नाचघर’
इस संकलन की सबसे लम्बी कविता है, जिसमें अमिताभ अपनी आवाज की लोच का बखूबी इस्तेमाल करते
हैं । ‘कोयल
कैक्टस और कवि’
में जब आप ये पंक्तियाँ सुनते हैं कि "किसी विवशता से खिलता हूँ / खिलने की
साध तो नहीं है, जग
में अनजाना रह जाना / कोई अपराध तो नहीं है" तो आप एक जीवन-दर्शन पाते हैं और
पंक्तियाँ एक सूक्ति की तरह आपको याद हो जाती हैं । एक साक्षात्कार में हिन्दी
फिल्मों के प्रसिद्ध डायरेक्टर राजकुमार हिरानी ने अमिताभ की विशेषता के बारे में
बोलते हुए कहा है कि अमिताभ बच्चन जिस तरह संवाद अदायगी में स्वर के आरोह-अवरोह का
नियंत्रण रखते हैं वो एक साधारण से संवाद को भी रोचक और महत्त्वपूर्ण बना देता है ।
यह बात नोट करने लायक है । अब चूँकि छन्द कविता से बाहर है, तो गाया
जाना संभव नहीं । गाई हुई कविता याद आसानी से होती ही है । तो अब ऐसे में आप कविता
की अदायगी कैसे करते हैं वह बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है । बल्कि यों कहें कि
कविता में अभिनय कला का समावेश सम्प्रेषण के लिए जरूरी हो गया है, तो बात
गलत नहीं होगी । कविता में अब संवाद अदायगी की अदा उसको ग्राह्य बनाती है । यह ‘बच्चन के
स्वर में बच्चन’
ने दिखा दिया था । बाद में कैफ़ी साहब की आवाज में ‘कैफियत’ और नीरज
की आवाज में उनके कविता संकलन ने भी । मनीष गुप्ता के द्वारा बनाए गए वीडियो में, जो
यू-ट्यूब पर उपलब्ध है, पुष्पा भरती द्वारा कनुप्रिया का पाठ भी सुन कर देखिए ।
बच्चन जी की कविताओं के दोनों रेकॉर्ड 'मधुशाला' और 'बच्चन के
स्वर में बच्चन' आज
भी प्रसिद्ध हैं । इन रेकॉर्ड्स के बाद और भी ऐसे प्रयास हुए हैं । नीरज की आवाज़
में उनकी कविताओं का रेकॉर्ड और कैफी साहब की आवाज़ में उनकी नज्मों और ग़ज़लों के
रेकॉर्ड भी लोकप्रिय और संग्रहणीय हैं । हमारे देश का साहित्य हमारी धरोहर है। आज
जबकि लोग साहित्य से दूर होते जा रहे हैं, और कविता
से तो खासकर और भी, इस तरह के प्रयासों की आवश्यकता बढ़ गई है । मनीष गुप्ता
हिन्दी और उर्दू कविता को अलग-अलग लोगों के द्वारा प्रस्तुत करवा कर उसके
प्रचार-प्रसार में लगे हैं तो कवि कुमार विश्वास और नीलेश मिश्र भी कवि और कविताओं
पर लगातार चर्चा कर रहे हैं । आज कविता का अर्थ हो गया है येन-केन-प्रकारेण छप
जाना, कुछ
चर्चा करवा लेना और प्रतिष्ठित (!) हो जाना । कविता किताबों में ही बन्द हो कर रह
गई है या फिर परिचितों, मित्रों तक सिमट कर रह गई है । एक कारण तो शायद यह है कि
छन्द के हट जाने से कविता में रस की थोड़ी कमी आ गई है । रही-रही कसर कवियों की
बौद्धिकता से अतिशय प्रेम के कारण कविता के भारी हो जाने ने पूरी कर दी है । कविता
कवियों के बाहर जा ही नही रही । ‘तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ’ चल रहा
है बस । सारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में काव्यशास्त्र, छन्दशास्त्र
की पढ़ाई होती है । पर उसकी उपयोगिता कविता के विकास में क्या रह गई है? जो वस्तु
कविता में निषिद्ध कर दी गई उस पर छात्रों और शिक्षकों की वर्षों की मेहनत क्यों
लगायी जाए? स्कूल
के स्तर तक तो शायद कविता पाठ या कविता लेखन जैसे क्रिया-कलाप होते हैं, महाविद्यालयों-
विश्वविद्यालयों से इसका लोप क्यों हो गया है? क्या
सिर्फ गोष्ठियों, चर्चाओं, समीक्षाओं से भविष्य सुरक्षित रह सकेगा ?
इन बातों को ध्यान में रखते हुए सोचें तो अमिताभ बच्चन
के द्वारा बच्चन जी की कविताओं का पाठ और उसका रेकॉर्ड निकाला जाना एक बहुत
महत्वपूर्ण घटना है । ऐसा ही कुछ उन लोगों काम भी है जो कविता को सोशल मीडिया के
द्वारा बढ़ावा दे रहे हैं । विद्यालयों,
महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं के बीच
भी हिन्दी कविता को ग्राह्य और लोकप्रिय बनाने के लिए निरन्तर प्रयास किए जाने
चाहिए । हमारी कविता की थाती बहुत समृद्ध है और कविता का भविष्य भी नई पीढ़ी के
उद्गारों में है । बच्चन जी की लोकप्रियता और अभी भी अमिताभ बच्चन द्वारा अलग-अलग
मंचों-अवसरों पर उनकी कविताओं का पाठ इस बात का संकेत है कि सुनाना आए तो कविता सुनी
भी जाएगी, गुनी
भी जाएगी और फिर बुनी भी जाएगी ।
बच्चन जी द्वारा अमिताभ बच्चन के कविता-पाठ पर की गई टिप्पणी
जो रेकॉर्ड के कवर पर उपलब्ध है –
मेरी कुछ कविताएएँ तो ऐसी हैं जो गेय हैं, अर्थात्
जिन्हें राग-ताल में गाया जा सकता है;
और कुछ ऐसी हैं जिन्हें भावानुरूप स्वरों
के उतार-चढ़ाव के साथ पड़ा जा सकता है ।
इस रेकार्ड के द्वारा मेरी कुछ ऐसी कविताएँ प्रस्तुत की
जा रही हैं जो पढ़ी जाने के लिए हैं ।
कविता लिखना कला है तो कविता पढ़ना भी कला है । अच्छी
कविता यदि अच्छी तरह पढ़ी भी जाए,
यानी कलापूर्ण ढंग से, तो
निश्चय वह अधिक प्रभावकारी सिद्ध होगी । इसके विपरीत यदि वह बुरी तरह पढ़ी जाए तो
उसका प्रभाव क्षीण भी हो सकता है।
इन कविताओं को प्रस्तुत कर रहे हैं अमिताभ बच्चन - मेरे
सुपुत्र, जो सिने-संसार के चोटी के अभिनेता हैं, और जिनकी
विशिष्टता उनकी आवाज़ में मानी गई है।
कविताओं के प्रति न्याय करने के लिए, आवाज़ के
साथ जो वे उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण गुण लाए हैं वह है इन कविताओं के भावों के
साथ उनकी तन्मयता-एकात्मता, जो पिता-पुत्र के आजन्म संपर्क-संस्कार से उन्हें मिली
है।
इससे अधिक और में क्या कह सकता हूँ कि इन कविताओं को
अमिताभ बच्चन ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे वे उनकी लिखी भी हों- उनकी
जीवनानुभूतियों से उद्भूत ।
'हाथ कंगन
को आरसी क्या है-'
यू ट्यूब
पर यह रेकॉर्ड उपलब्ध है –


