ज़िन्दगी जंग नहीं है भाई !
Times of India से साभार
Are we at war ?
“ज़िन्दगी
हर कदम एक नई जंग है” – यह गीत छात्रों के लिए तो हो ही नहीं सकता । जिन्दगी जंग नहीं, खेल है । खेलना जरुरी है, सिर्फ हारना-जीतना नहीं । खेल
की भावना होनी चाहिए । जीत और हार बहुत हद तक नजरिए की बात है । वैसे भी जीवन इतना
बड़ा है कि हँसते-खेलते ही बिताया जा सकता है । रोते-धोते नहीं । कठिन-से-कठिन समय में
भी खेलते यानी चलते रहने का जज्बा ही बेड़ा पार लगा सकता है ।
ऊमस भरे दिन के बाद कल शाम बादल बरस गए
थे । बादलों का बरसना थमने के कुछ देर बाद यूँही सैर के लिए निकल गया । थोड़ा घूम कर
जब मुख्य सड़क तक पहुँचा, तो थोड़ी दूर से डीजे की आवाज आती सुनाई दी । थोड़ी ही
देर में आवाज पास आ गई, या यों कहें कि मैं आवाज के पास पहुँच
गया । यह एक कोचिंग संस्थान का ‘विजय-जुलूस’ था । आगे-आगे डीजे, पीछे रस्सी के घेरे में कोचिंग की
यूनिफॉर्म में थिरकते हुए बच्चे । कुछ कोचिंग में पढ़ानेवाले शिक्षक भी रहे होंगे ।
साथ में भीड़-नियंत्रण के लिए दो-एक सिपाही । कल मेडिकल प्रवेश-परीक्षा का परिणाम घोषित
हुआ है । कोचिंग सफलता का विज्ञापन कर रहा है । दिखना और बिकना जरूरी है । जो दिखेगा
नहीं, वो बिकेगा नहीं । जो बिकेगा नहीं, वो टिकेगा नहीं । कुछ महीने पहले ऐसा ही एक जुलूस किसी दूसरे कोचिंग संस्थान
ने भी निकाला था। इंजीनियरिंग प्रवेश-परीक्षा के परिणामों के घोषित होने के बाद । हर
चीज एक उत्पाद में बदल रही है । हम किसी चमत्कार के घटित हो जाने का इंतजार करते रहते
हैं । क्या पता कोचिंगों में ऐसी शक्ति हो ही ! और यदि हो भी, तो इतना विज्ञापन, इतना प्रचार, इतना शोर !! सपनों को ‘प्रीमियम’ पर बेचा जा रहा है ।
कुछ दिनों पहले एक स्कूल के एक ‘ओरियेंटेशन प्रोग्राम’ में बैठने का मौका मिला । प्रोग्राम
दसवीं के छात्रों व अभिभावकों के लिए था । छात्र अगले साल बोर्ड की परीक्षा देंगे ।
बोर्ड की परीक्षा में अंकों का कितना महत्त्व है, हम सब जानते
हैं । स्कूल और शिक्षक यह बता देना चाहते हैं कि उन्होंने सही तरीके से पूरी कोशिश
कर दी है ; कुछ जिम्मेवारी बच्चों और अभिभावकों की भी बनती है
। अभिभावक यह सोचते हैं कि हमने अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई का बच्चों के भविष्य के लिए
उनकी पढ़ाई में निवेश कर दिया है । इसके आगे देखना स्कूल का काम है कि कैसे मैनेज करे
। म्यूचुअल फंड वाले हमारा फंड मैनेज करते हैं न, हम तो सिर्फ
अपना फंड लगाते हैं । बच्चों से कोई नहीं पूछता । बच्चों से क्या ही पूछा जाए ?
प्रोग्राम में रस्मी तौर पर पूछ लिया गया । किसी बच्चे ने कह दिया कि
खेलने का समय ज्यादा मिलना चाहिए । ‘प्वाइंट नोटेड’ हो गया । कुछ शिक्षक और अभिभावक ‘सर्विस प्रोवाइडर’
एवं ‘कस्टमर’ की तरह सवाल-जवाब
करते रहे । ज्यादातर लोग अटेंडेंस रजिस्टर पर दस्तखत कर जल्द-से-जल्द निकल जाने के
इंतजार में रहे ।
बच्चा किताबों से लड़ता, माता-पिता से भिड़ता और शिक्षकों से डरता है । बच्चा पढ़ता कब है, यह न पूछिए। खेलता कब है, यह न देखिए ।
हम बच्चों को समझा रहे हैं कि अच्छे से
पढ़ाई करोगे तो बोर्ड्स में अच्छे नम्बर आएँगे । अच्छे नम्बर आएँगे तो ‘प्लस टू’ में अच्छा स्कूल मिल जाएगा । अच्छा स्कूल मिल
जाएगा, तो प्लस टू के आगे की पढ़ाई अच्छी जगह से करने का रास्ता
खुल जाएगा । बच्चों के सामने विकल्प रख रहे हैं । सीधे नहीं तो घुमाकर समझा रहे हैं
कि कौन-सा विकल्प उनके लिए अच्छा है । पन्द्रह-सत्रह साल के बच्चे से हम मैच्योरिटी
की अपेक्षा कर रहे हैं । हम ही नहीं, हमारे परिचित भी उनको समझा
रहे हैं । सर्कस का शेर चाबुक से भी डर जाता है, सर्कस का हाथी
रस्सी से भी बँध जाता है । दुनिया सर्कस बनती जा रही है ।
बच्चों को समझा रहे हैं कि भाई, जरा जोर लगाकर । बोर्ड का एग्जाम कोई खेल नहीं है । युद्धस्तर पर तैयारी हो।
जो यह जंग जीत गया, समझो जग जीत गया । फिर बाद में हम यह बताने
लगते हैं कि एक धक्का और । प्लस टू के बाद कहीं भी घुस जाओ – मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ, बीबीए... मतलब
कुछ भी ऐसा जो नौकरी पक्का कर दे । बस फिर क्या, उसके बाद अच्छे
से नौकरी करो, कमाओ-खाओ, जीवन सुख से व्यतीत
करो । लेकिन याद रखो, यह जंग जीत लेनी है । कभी-कभी तो यह भी
समझाने लग जाते हैं कि ‘एवरी थिंग इज़ फ़ेयर इन लव एण्ड वॉर’
!
अक्सर यह होता है कि जब हम ज्ञान देने
की मुद्रा में होते हैं तो हम आदर्श स्थितियों के हिसाब से बात करते हैं। जैसे गाड़ियों
का विज्ञापित माइलेज । हमारा देश तो ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’
वाला वैसे ही है ।
उस दिन ‘ओरियेंटेशन प्रोग्राम’ के हॉल में कोई भी व्यक्ति यह
समझ सकता था कि ‘ओरियेंटेशन’ से एक ‘टेंशन’ का माहौल ही बन रहा है । शिक्षक बनाम अभिभावक,
शिक्षक बनाम छात्र, छात्र बनाम अभिभावक । सबको
सही सिद्ध होना था । वे यह जानते ही नहीं शायद कि गलत तो कोई भी नहीं, न पूरा सही ही ।
‘आनंद’ फिल्म में एक संवाद था “ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी
नहीं” । उसी तर्ज पर सबको यह समझना होगा कि “जिन्दगी (पढ़ाई)
प्यारी होनी चाहिए, भारी नहीं”!
और फिर यह बताइए कि स्कूल-कॉलेजों की मार्कशीट
भला किसको याद रह जाती है ? हम शायद याद भी रख लें , बाकी
लोगों के लिए भला उसका क्या माने ? यही हाल नौकरियों का भी है
। व्यक्ति अपने होने, अपने गुणों अथवा दुर्गुणों के कारण ही याद
रह जाता है । ऊपर प्रसिद्ध फुटबॉलर मेस्सी के कथन का स्क्रीनशॉट देखा ही होगा आपने।
वे अच्छा आदमी बनने की फिक्र में हैं , और हम शायद ‘बड़ा आदमी’ बनने-बनाने की जुगत में ।
आज का अभिभावक भरा-भरा रहता है । जरा-सा
छेड़कर देखिए । बच्चों के भविष्य की चिंता की अजस्र धारा है उसके अन्दर । उसका वश चले
तो वह सबकुछ एकदम ठीक कर दे, खुद अपने हाथों से । जिगर मुरादाबादी
का एक शेर है –
हाए-री मजबूरियाँ तर्क-ए-मोहब्बत के लिए
मुझको समझाते हैं वो और उन
को समझाता हूँ मैं
अभिभावकों
के दिल का यही हाल है ।
हर पीढ़ी अपनी चिंताओं, अपने डरों, अपनी सफलताओं की अपनी परिभाषा गढ़ लेती है
। उनसे उनकी भाषा में बात करनी होगी । जैसे-जैसे सुविधाएँ बढ़ती जाती हैं, अभिभावक भी शायद उतने ही ज्यादा प्रोटेक्टिव होने लगते हैं। ठीक है कि जीना
कठिन-से कठिनतर होता जा रहा है । लेकिन हमने सुना तो है “ When the going gets tough, the tough get going” ।
क्रिकेट के उदाहरण से देखें तो ‘टेस्ट मैच’ के युग में किसी ने सोचा भी होगा कि ‘टी ट्वेंटी’
में भी दो-दो सौ रन बना लेगी कोई टीम ! शतक ठोक देगा कोई बल्लेबाज !
अगर गावस्कर का युग था, तो अब अभिषेक शर्मा और वैभव सूर्यवंशी
भी तो आ रहे हैं ।
आज के बच्चे अगर नम्बरों के पीछे भाग रहे
हैं, टेंशन में जी रहे हैं तो इसमें पिछली पीढ़ी का भी कुछ
हाथ है । जीवन में ‘रामबाण’ या ‘रामराज’ जैसा सच में कुछ नहीं होता । ये मिथकीय अवधारणाएँ हैं जो हमें आदर्श स्थितियों
की ओर अग्रसर करती हैं । जीवन किसी एक अवलम्ब के सहारे खड़ा नहीं रह सकता ।
ऊपर खेल-भावना की बात की गई है । हारने
वाली टीम खेलना नहीं छोड़ देती, जीतने वाली टीम भी सीखना और प्रक्टिस
करना बंद नहीं कर देती ।
बार- बार उस ‘ओरियेंटेशन प्रेग्राम’ के माहौल का खयाल हो उठता है ।
तनाव और डर से भरी हुई खामोश हवा । दुनिया चाहे जैसी भी हो, आनेवाला
समय चाहे जिसका भी हो, बच्चों के चेहरे पर डर या तनाव अच्छा नहीं लगता ।
यह नया समय है । नई पीढ़ी ऐसे ही नहीं मान
लेती कुछ भी । वह सवाल पूछती है । लिहाज के कारण जवाबदेही में छूट नहीं दी जाती । प्रश्न
किए जाते रहेंगे, और यह बढ़ता ही जाएगा । प्रश्नों के उत्तर देने का
दायित्व पुरानी पीढ़ी का बनता है । ‘लीड फ्रॉम द फ्रण्ट’ का जमाना है । करो तो सिखाओ । वैसे
भी कहते हैं कि बच्चे देखकर ज्यादा सीखते हैं। और समय आने पर वे भी बहुत कुछ खुद ही
देख-समझ लेंगे । नए खून की गरमी और पुराने सोच का कड़ापन अक्सर साथ नहीं बैठ पाते ।
दोनों को ग़ालिब का यह शेर याद करना चाहिए –
बहरा हूँ मैं तो चाहिए
दूना हो इल्तिफ़ात
सुनता नहीं हूँ
बात
मुकर्रर कहे बग़ैर
जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे हल
नहीं किया जा सकता, बस समय के साथ चलते रहना होता है –
वक़्त के साथ गुज़र जाने
दो
कुछ मसले हल करने के नहीं
होते
जीवन से बढ़कर कोई भी सफलता या असफलता नहीं
होती । नीम खून साफ करता है, लेकिन कड़वा होता है। सुनी,
न सुनी गई बात कुछ नहीं, सब समय होता है । खील
निकलने के बाद घाव भरता है । बारिश के ठीक पहले ऊमस बढ़ जाती है । भोर के पहले घना अँधेरा
होता है । इंतजार का फल मीठा होता है । हर आदमी के अन्दर एक बच्चा होता है । जगह बदलने
से दृश्य बदल सकता है । दृश्य बदलने से नजरिया । नजरिया बदलने से जीवन । बीज के लिए
मिट्टी, हवा, पानी, खाद का इंतजाम किया जा सकता है । रोज-रोज मिट्टी खोद कर प्रगति का जायजा नहीं
ले सकते । सिर्फ बीता हुआ समय सुनहरा नहीं
होता । पुराना होने का मतलब सख्त हो जाना नहीं होता । हँसी-ठट्ठे का मतलब अशिष्ट होना
भी नहीं होता । किसी के पैर छू लेने भर से वह आदर का पात्र नहीं बन जाता । सफलता का
अर्थ सिर्फ पाना नहीं, छोड़ना भी हो सकता है । विज्ञान कहता है
कि कार्य के सम्पन्न होने के लिए दूरी तय करना जरूरी है । जीवन सिर्फ विज्ञान नहीं
है । प्रेम अभिव्यक्ति का मोहताज नहीं, खुशी प्रदर्शन की । प्रेम
और अविश्वास सहयात्री नहीं हो सकते । सहज होना सरल नहीं भी हो सकता है और न सरल होना
सहज ।
बात कहाँ से चलती है, कहाँ पहुँच जाती है
मन से उठती हैं दुआएँ. कहीं बरस आती हैं
यत् भावो
तत् भवति !
Believe it to have it !