हँसोतले चलीं...
काल्हे एगो कविता लिखाइल रहे
“ हँसोत लीं” । लेकिन लागऽता बात पूरा नइखे भइल । त कुछ
औरि बात कइल जाव।
आज के जुग में हँसोतला से कोनो
के फुरसते नइखे । ई सहियो बा बात । जे सौंसे दुनिया पगलाइल बा, त एक आदमी के
कहला अ चहला से का होई ? अकेला चना कब्बो भाँड़ फोड़ेला का !
रउआ देखीं कि इ दुनिया में कुछो
नइखे धरल हँसोतला के अलावा।
कवनो औफिस में जाईं । सौ में
निनानबे चांस बा कि उहे काम करावे खातिर रउआ के चढ़ावा चढ़ावल परी जेकरा खातिर उ आदमी
के वेतन मिलेला । उ कही कि उ अपने खर्चा-पानी दिहला के बाद पोस्टिंग करौले बा । पूरा
सिस्टम बनल बा। रउआ बीच में पिन ना मारीं ।
जाईं, इसकूल चल जाईं
। एक से एक फैसनेबल इसकूल । पढ़ाई के मतलब का इ रंगबिरंगा डरेस, टाई-फाई, कम- से-कम दू तरे के जुत्ता होला ? फीस के बात त छोड़िए दीं । का होखता; बच्चा अ बच्चा के
माय-बाप के सपना बेचल जाता । बिना कवनो गैरेंटी के । बात हिहवेँ नइखे रुकत । दुनिया
भर के कोचिंग खोल लेले बाड़ऽ सन । बच्चा-कलास से ले के यूपीएससी के तैयारी खातिर तक
ले । का हम नइखी जानत कि ई सब खेला खाली भावना के साथ खिलवाड़ ह । लोग के हँसोते के
बा, खलिया हँसोते के बा ! ना त बताईं , सरकार शिक्षा पर कतना खरचा करेली ! मास्टर औरि पोरफेसर लोगिन कलसवा में मन
लगा के पढ़ावत होखतें त का बच्चा लोग ना पढ़ीत ? शिक्षा व्यवस्था में जेतना गैप बन गइल बा, कोचिंग के व्यवस्था ना होखित त पूरा व्यवस्था बैठ गइल होखित । कोचिंग के सपोर्ट सिस्टम के रोल रहे, सरकारन के उदासीन रहला से पूरा सिस्टमे बन गइल बा ।अब त अइसन माहौल
बन गइल बा कि जे कोचिंग ना जाई ओकर कंफिडेन्स गड़बड़ा जाई । बच्चा त बच्चा गार्जियन लोग के भी ।
चल जाईं बैंक । हो सकेला कि सीधासाधी
लेनदेन के बात ना होखो । लेकिन एतना तरे के चीज बेचे लागिह सन – हइ इंसोरेंस, त हउ इंसोरेंस,
मुचुअल फंड, ई कार्ड त ऊ कार्ड । कतना चीज के मना
कर पाइ लोग ? वइसेहु आपन काम फँसल रहेला त लोग सही-गलत डिमांड
मान लेवेला । का बैंक के हँसोतल ना ह ई ?
हमनी खुद आपन बेवहार के तनि ठीक
से देखीं त अपनो हँसोतल दिखाई दी । सामान जमा करे के लत हमनी में नइखे का? बजार जानेला
हमनी के पाकिट से माल झारल । बड़-बड़ स्टोर में हर चीज के बड़-बड़ पैकेट दिखाई दी । देखादेखी,
बड़ आदमी दिखे के चाह में हम बिना सोचले उठा लेवेनी । ई दुतरफा हँसोतल
बा । एक तरफ त हम जरुरत से ज्यादा सामान खरीदनीं, दूसर तरफ उ
कम्पनी ज्यादा माल बेच ली । कहीं- कहीं इहो देखल जाला कि सामान सड़ जावे त सड़ जावे ,
कवनो के दिलाई ना । लोग के ई हाल हो गईल बा कि जे सब कुछ खवला पार ना
लागि त कम-से-कम जुठाइए के छोड़ल जाए ! लोग
के नजर एकदम से एकदम खाली अपना पर गड़ल बा ।
हम साहित्त के बड़ी पाक-साफ बूझत
रहनी । राजनीति के मशाल, अंतरात्मा
के अवाज । सब ढकोसला बा जादातर । इहवाँ हँसोतला के अलगे डिजाइन बा । जेतना नाम-धाम
बा, जेतना पुरस्कार-उरस्कार बा, सब कुछे
लोग के मिलल चाही । एतना ऊँचा कुरसी पर बइठ के बतियावे ला लोग कि उनका देखे ही में
गरदन दुखा जाइ । जे बोलिहऽ सन सब ‘परम सत्य’ होई , एकदम नम्बर एक ! भले ही भीतर खाली होखे, बहरि
हाउसफुल के ही बोर्ड लगावल जाला । हिन्दी में कहल जाला न ‘अनधिकार
प्रवेश निषेध’ औरि ‘प्रवेश सिर्फ आमंत्रण
द्वारा’ । एगो जिमखाना कलब के किस्सा आजकल चलतो बा !
हम त कहेनीं जल्दी-जल्दी हँसोतल
सीख लीहीं । दुनो हाथन से । मन से एकदम मान लीं कि आज के इहे रीत बा । रीत निभावल चाही
। ई में बहुत लोग सुखी रही । आजकल मन के शान्ति बड़ी जरूरी बा । ई एथिक-फेथिक, साँच-झूठ,
जुलुम-अपराध आदि इतादि किताब में पढ़ल ठीक बा, जिनगी
में उतरला से कष्ट हो जाई ।
**
[भोजपुरी
मुझे कितनी आती है, कह नहीं सकता । बचपन
में बिहार के कई जिलों में रहने का मौका मिला तो हर जगह की कुछ चीजें साथ रह गईं भोजपुरी के साथ ऐसा हुआ कि इसके बिना काम नहीं चलना
था । ऐसा कह सकते हैं कि भोजपुरी में ही मैं अपने रंग में आया । ‘बेतिया’ में गुजरे चार साल ही जीवन का आधार बने हुए हैं
। भोजपुरी उनमें से एक है । अत: भोजपुरी में अभिव्यक्ति की इच्छा स्वाभाविक है,
कितनी सधी हुई है, पता नहीं । ]