गुरुवार, 28 मई 2026

साधो-माधो-बतकही २

बिहार में कहीं...

 

साधो-माधो-बतकही

 

साधो भाई, ई परीक्षा सब जो कैंसिल कर देता है, कितना बुरा करता है ?

अपना दिन भूल गया माधो । तीन साल के कोर्स का पाँच साल में भी पूरा होने का ठिकाना नहीं रहता था ।

लेकिन वो तो स्टेट लेवल की बात थी न , अब तो नेशनल लेवल पर खेला हो रहा है ।

स्टेट से बात बढ़ेगी तो नेशनल लेवल तक पहुँचेगी ही न । और बोल तो रहे हैं मंत्री जी और हाकिम लोग कि किसी को बकसा नहीं जाएगा । बख्शा, बख्शा !

माने कि पढ़ना-लिखना सब बेकार बात है । इससे अच्छा तो लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर होना ही है ।

हाँ । और ऊ सुने कि नहीं –  कॉपी जाँच में भी गड़बड़ी फैला दिए हैं भाई लोग ?

हाँ, विद्यार्थी होना ही पाप है भाई !

अरे भाई, समय तो कह रहा है कि कोशिश कर के नौवाँ, सतवाँ पास बने रहिए । कुछ न कुछ हो जाएगा ।

हाँ, लेकिन सबके पिताजी लोग का नाम ही तो सेम नहीं है न !! 

बुधवार, 27 मई 2026

बुरलेल जी की पाती

बुरलेल जी की पाती १


 आदरणीय एस पी साहब,

प्रणाम स्वीकारें ।

कहनाम यह है सर कि आपका रोल हमको बहुत अच्छा लगता है । वर्दी - उर्दी पहनकर जब आप निकलते हैं तो हमारे जैसे कितने ही लोग मुँह बाए खड़े रह जाते हैं । कभी श्रदा में, कभी आश्चर्य में और ज्यादातर एक भय में । पुलिस का भय से कोई न कोई संबंध है तो जरूर । भय को लोग इज्जत बोलकर इज्जत बचा देते हैं ! सर, वैसे भी देश के दूसरे और दुनिया के तीसरे सबसे भारी एग्जाम को पास करके आप लोग यहाँ तक पहुँचते हैं । कभी कभी तो देश के सबसे भारी और दुनिया के दूसरे सबसे भारी एग्जाम को पास कर के, चार साल में पढ़- लिख के आपलोग फिर तीसरे सबसे भारी एग्जाम को भी पास कर लेते हैं । ऐसी बात जब - जब हम पढ़ते - सुनते हैं , तब - तब हमको लगता है कि ज्ञानी लोग ठीक ही कहते हैं कि हमारे देश की सभ्यता पाँच हजार साल पुरानी है । 


सर ,आपलोग तो ऐसे ही एकदम स्मार्ट लगते हैं । उस पर से गाड़ी, बॉडीगार्ड, बंदूक,सायरन -- ये सब आपके स्मार्टनेस को और बढ़ा देते हैं । आपको शायद अंदाजा नहीं होगा कि लोग आपसे कितना मिलना चाहते हैं । चाय - नाश्ता करने के लिए नहीं सर, अपने काम के लिए, किसी जरूरत के लिए । किसी परेशानी में ही आप की याद आती है हमें । लेकिन सर आपसे मिलने की प्रक्रिया कठिन है । यह भी सही है कि आप भी कितने लोगों से मिल पाएँगे।  लेकिन सर एक बात कहनी है -- आप तो खुद ही इतने ऊँचे पद पर आसीन हैं , आपको खुद को बड़ा जताने की कितनी जरूरत है । अभी उसी दिन एक वृद्ध प्रोफेसर आपसे मिलने आए थे । आपके स्टाफ ने उनका टिपटिपिया फोन बाहर रखवा लिया । सुरक्षा के कारणों से सही ही होगा । लेकिन अंदर आपके बड़े से कमरे में, आपकी उमर के दोगुने से भी ज्यादा उमर के प्रोफेसर हाथ जोड़े खड़े निवेदन करते रहे । आप समझ नहीं पा रहे थे कैसे रिएक्ट करें ।आप वैसे ही बैठे रह गए, वे वैसे ही करबद्ध खड़े । हम आपको दोष नहीं दे रहे हैं । हो सके तो आप भी सोचिएगा कि ऐसी स्थिति के जिम्मेदार कौन हैं । प्रजा तो है ही, विधायिका और कार्यपालिका भी है । जनता हमेशा नत - विनत ही खड़ी रह जाती है । आप या और भी साहब लोग ठीक से बात भी कर लेते हैं तो हम धन्य - धन्य हो जाते हैं । चौराहे की लालबत्ती को हाकिमों की गाड़ी न काटे, या उनके लिए सिग्नल न बदला जाए तो जनता वैसे हाकिमों को बड़ेदिलवाला मान लेती है। जनता की इतनी निरीहता अच्छी है क्या ? आप तो जैसे- जैसे ऊपर बढ़ेंगे, जनता और जमीन से दूर होकर कागजों - फाइलों के नजदीक होते जाएँगे। आप लोग देश के मौर - मुकुट हैं । आपको हम बड़ी अपेक्षा के साथ देखते हैं । इन दिनों समाज के हर तबके के चाल - चरित्र में गिरावट आई है ,जिसका एक बड़ा कारण है भ्रष्टाचार। आपका महकमा भी अछूता नहीं रह गया है । हमारी हैसियत तो नहीं है कि हम कुछ सीख दे सकें । वैसे भी जब सारे लोग भ्रष्ट हो जाएँ तो फिर कोई भी भ्रष्ट नहीं माना जाता । जानते हैं ,यह हमारा निराशावादी स्वर है । लेकिन अब यही है सर !


आप बोलिएगा भी कि हम क्या बोले जा रहे हैं । बात यह है सर कि देश के एक वृद्ध प्रोफेसर को देश के सबसे योग्यतम अधिकारियों में से एक से मिलने के लिए चिरौरी करनी पड़े, इंतजार करना पड़े और जब मिलने का मौका आए तो इतना झुक के अपनी बात रखनी पड़े कि लगे रीढ़ की हड्डी ही नहीं है शरीर में , तब बड़ी निराशा- सी होने लगती है । मन डूबने लगता है।  जानते हैं कि हर तरफ यही हाल है। हम कोशिश करेंगे कि सबको चिट्ठी लिखें । बचपन से वर्दी और बाघ - छाप बैच लगाने का बड़ा शौक रहा है, इसलिए पहली पाती एक वर्दी वाले को ! 


एक फिल्म के एक गीत के ही दो वर्जन याद आ रहे । सुनिए --


हर तरफ जुर्म है बेबसी है

सहमा सहमा सा हर आदमी है


इसी गीत के दूसरे version की ये पंक्तियाँ--


हम न सोचें हमें क्या मिला है,

हम ये सोचें किया क्या है अर्पण

फूल खुशियों के बांटें सभी को, 

सबका जीवन ही बन जाए मधुवन


बाकी सब कुशल - मंगल । 


शेष फिर,


आपका अपना

सिद्ध - प्रसिद्ध 

उर्फ बुरलेल जी


***
मैथिली में 'बुरलेल' आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो मूर्ख, नासमझ, बुद्धिहीन, या बेवकूफ हो। कभी-कभी इसे बहुत सीधे-साधे या मंदबुद्धि व्यक्ति के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है

शुक्रवार, 22 मई 2026

कुछ छंद में - ५ : यादें

 कुछ छंद में - ५ 

      यादें

कुछ  ऐसी  बातें   होती  हैं
पलकें  मूँदे  जो   सोती  हैं
यादों के गलियारे में

इक नाम  कहीं से आता है
हल्के  से  छूके   जाता   है
लौ जगती अँधियारे में

दिन जीवन के बढ़  जाते हैं
जब फूल कहीं कढ़ जाते हैं
यादों के उजियारे में

हँसती है  कभी बिगड़ती है
समझोऐसे ही  करती  है
किस्मत बात इशारे में

***


बचपन की यादें हैं
हमको सहलाती हैं
इस मुश्किल जीवन में
हमको बहलाती हैं

तुम अपने रस्ते पर
हम अपने रस्ते पर
यादें आकर फिर से
हमको मिलवाती हैं

हम अच्छे बच्चे थे
हम अब भी अच्छे हैं
जब भी आती हैं ये
हमको बतलाती हैं

यह झूठी दुनिया है
यह सच है बिल्कुल सच
यादों में आँखें हैं
सच को झुठलाती हैं

अब भी कर सकते हैं
हम ही कर सकते हैं
दुनिया हम बदलेंगे
सपने दिखलाती हैं

मन के घर- आँगन की
खिड़की खुल जाती है
बचपन की गलियों में
यादें बलखाती हैं   

                          छंद -५

मंगलवार, 19 मई 2026

माँ !

 

माँ !

माँ

बचपन की भूख-प्यास 

जरूरत हर आम, खास 

पहचानती है 

माँ सब जानती है

होती है हर क्षण की खबर 

कहे, न कहे कुछ भी अगर 

भले ही हम कितने बड़े हो गए हों 

मगर फिर भी 

हर खुशी, हर आघात 

छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी हर एक बात 

बोली से, नज़रों से हमारी 

छानती है 

माँ सब जानती है ।

 

घर आया मैं

माँ कहती है

दो-चार दिनों को भी आ जाया करो

अच्छा लगेगा पापा को भी

 

और साहब हमने तो नौकरी की है

फुर्सत ही नहीं मिलती

इस बार जोड़-जाड़ के हिसाब छुट्टियों का, काम का

कि कुछ हर्ज ना हो

आया हूँ घर बड़ी देर में

 

चमक उठी हैं माँ की आँखें

तरावट आ गई है पापा के चेहरे पर

और किया नहीं है कुछ खास इन दो दिनों में

बस आराम ही हुआ है

भरपूर...

 

निकलते वक्त कहा माँ ने

आया करो

जो कहा नहीं, पर जो दिखा एकदम साफ-

अच्छा लगा! बहुत अच्छा लगा।

और अपना हाल

गूँगा क्या बताए गुड़ का स्वाद !                  

 

माँ की हँसी

माँ

तुम कब हँसी थी

खुलकर पिछली बार ?

 

कब

गुनगुनाया था कुछ

कब

बनाए थे ढेरों पकवान ?

कब बुलाए थे

घर भर मेहमान

कब मनाई थी -

होली-दिवाली

तीज-त्योहार

कब उत्सव हुआ था पिछली बार ?

 

माँ

तुमने

कब की थी आशा

हमसे पिछली बार...?

 

बेटे चाँद को बुखार आया है

आधा मुँह ढके

मुरझाया पड़ा

चाँद

 

हवा

गुमसुम

उदास

 

रात

परेशान

जगी-जगी

 

बेटे चाँद को

बुखार आया है

माँ रात क्या करे ! 

 

माँ ही कर सकती है  

माँ

बच्चों की

तारीफ़ नहीं करती बहुत

कहीं टोक न लग जाए !

मन-ही-मन

करती रहती है दुआ

और

शिकन भर भी कहीं

दिख जाए, तो

मानने लगती है मन्नतें

 

बच्चों की ही तरफ़

हमेशा

होती है खड़ी

अपने सुख-दुख

गिले-शिकवे

भूल कर सब

 

माँ

सब समझ सकती है

उपस्थिति मात्र से ही

दुख हर सकती है

और

ज़रूरत पड़े

तो

भीतर ही भीतर

कट सकती है

मर सकती है

 

माँ

जो कर सकती है

वह

बस माँ ही कर सकती है !

 

माँ का गुस्सा

क्या कह दिया है

गुस्सा दिला दिया है

माँ ने

जैसे झाड़ू उठा लिया है

सब झाड़ दिए जाएँगे !

 

क्या करते रहते हो दिन भर

पढ़ते तक नहीं ढंग से

एक काम नहीं होता तुमसे

 

हर मौके पर डटी हूँ

रात-दिन रहती हूँ खटती

मरती-खपती !

 

सब जाओ

चले जाओ

 

क्या बात हो गई है

पूछना चाहा पिता ने

 

आप चुप करें

बस अखबार ही पढ़ें

दुनिया भर को देखें

एक घर के सिवा !

 

चलता रहा एकालाप

माँ का -

 

घर, बाहर

दिन, रात

सब्जी, दूध

रोटी, भात

माता,पिता

कुल,परिवार

अच्छा,बुरा

खोटा, खरा

हिसाब-किताब

सब करो,सब करो

करते रहो, करते रहो

 

एक आवाज़

किस-किस की बात !

 

नदी में

आती है बाढ़

कुपित होती हैं

देवी कभी

 

मगर

जीवनदायिनी कौन !

शक्तिदायिनी कौन !

दया की वाहिनी कौन !

 

माता सम बस माता !

माता सम बस माता !

 

हालचाल

माँ

बीमार है
या दुखी है
मुश्किल है पता करना

उसे
कहने की
नहीं आदत
हमें पूछने की,
सुनने की !!          

***

माँ को

कुछ होता है
किसी को कुछ पता नहीं होता

एक
माँ ही होती है
जिसे
सबकुछ पता होता है   

धुरी

माँ

धुरी होती है

बाकी-
परिधि
त्रिज्या
व्यास
परिमाप ;
बहुत हुआ
तो बल
'
सेंट्रीपीटल'
या 'सेंट्रीफ्यूगल' !! 

घर के भाग !

माँ का हँसना

जरूरी है

जीवन के
जीवंत होने के लिए

सब
झिक-झिक
चिक-चिक
अपनी जगह

हँसती है माँ
तो घर हँसता है
हँसते हैं
घर के भाग !! 

संस्कृति

 माँ

बेटियों से
कर लेती है
सुख-दु:ख साझा

पीढ़ियों से
चली आ रही बात
बढ़ जाती है
इस तरह

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
बनती है
संस्कृति       

धूप दिखाती माँ  

 धूप दिखाती हुई माँ

भोर जगाती हुई माँ

तिरते हुए मद्धम स्वर

शुद्ध हो जाता है घर

 

गुनगुनाती हुई सुबह को

मैथिली में

गुनगुनाती हुई माँ