रविवार, 14 जून 2026

सुशांत [1986-2020]




सुशांत सिंह राजपूत

(21.01.1986 – 14.06.2020)

 

 

जैसे

मुरझा गए सपने

जैसे

दिन खो गए अपने

जैसे

उम्मीदें झर गईं सारी ...

 

ज़िंदगी... !!

 

खाली

इतनी खाली

इतनी खाली...

कभी नहीं लगी ... !!!

 

जवान सपनों का मर जाना

शुभ संकेत नहीं

 

तुम जो गए...

तुम क्यों गए ?

 

=== 

 

जो

नहीं कहा गया

जो

नहीं किया गया

बस

वही रह जाएगा

कसक बन के...

 

और

रह जाएगा

सिर्फ़ और सिर्फ़

अफ़सोस... !!

 

=== 

 

अरे लड़का !!

क्या कर लिए तुम !!

 

सारी बहस

सारे तमाशे

सबके दुख

सारे दिलासे...

 

चाहनेवाले तुम्हारे

लोग तुम्हें कैसे बताते

प्यार के क़ाबिल थे तुम !

 

अनुपस्थिति

दर्ज़ कर रही है

उपस्थिति !!

तुम

रुक तो जाते

ज़मीं को

कर लेते रौशन

फिर जाते

बन जाते सितारे

आसमान के !

 

अरे लड़का !

थी चमक कितनी

कितनी थी धमक तुम्हारी

तुम देखते तो

रुकते तो

तुम रुक तो जाते...

वो एक पल

गुजर तो जाने देते

उसके पार तो नहीं जाते   

 

बहुत कुछ था

इस तरफ़

रे लड़का... !!!

 

===

 

तुम तो

चले गए

 

जो रह गए

जानते जा रहे हैं

तुमको

 

मरते जा रहे हैं

तुम पर...

 

===

 

किसी-किसी के

बारे में

जानते जाना

दु:ख को

बड़ा करते जाता है

चले जाने का

उसके...

 

===

 

मर कर

अमर होना

हर बार नहीं होता

 

होता है, इस क़दर,

प्यार

हर बार नहीं होता

 

जा कर भी नहीं जाते हैं

मन में रह जाते हैं

कुछ लोग

अच्छे होते हैं इतने

ज्यादा रह नहीं पाते हैं

रुक नहीं पाते है ...!!    (20.06.2020 – 27.06.2020) 

गुरुवार, 11 जून 2026

साहित्य-वृत्त [ साहित्य पर कुछ गैरशास्त्रीय टिप्पणियाँ ]

 

साहित्य-वृत्त

[ साहित्य पर कुछ गैरशास्त्रीय टिप्पणियाँ ]

 

 

साहित्य क्या, साहित्य क्यों ?

 

साहित्य की शास्त्रीय परिभाषा जो भी हो, समझने के लिए हम कह सकते हैं कि जिसे पढ़ने में मन लगे वह साहित्य है । मन लगाना पड़े, ऐसा नहीं । इसीलिए पाठ्य पुस्तकें साहित्य नहीं कही जाएँगी ! भाषा एवं साहित्यविषय की पढ़ाई में तो खैर साहित्य की पढ़ाई होगी ही । जहाँ तक पढ़ने में मन लगने का सवाल है, वह तो कई तरह के लेखन में लग सकता है । विभिन्न तरह के साहित्य के स्तरों पर बात की जा सकती है ।  एक बात तो यह भी माननी चाहिए कि जो पढ़ने वाले को रत्ती-भर भी बेहतर व्यक्ति बना सके वह अच्छा साहित्य है । यह अच्छा बनाना, हो सकता है बहुत थोड़ी देर के लिए ही हो । यह भी हो सकता है जब तक पढ़ रहे हैं, तभी तक असर हो ।

साहित्य क्यों? इस प्रश्न पर दो तरह से विचार किया जा सकता है ।  एक तो लेखक की ओर से और दूसरे, पाठक की ओर से। किसी लेखक को साहित्य रचने की जरूरत क्यों महसूस हुई होगी ? मूल रूप से अभिव्यक्ति की उत्कंठा , और लोगों द्वारा उस अभिव्यक्ति को स्वीकारे और सराहे जाने की इच्छा के कारण ही लेखक साहित्य रचने की प्रवृत्त होता है।

साहित्य मनुष्य का सहचर भी है। एक पाठक इस बात को जरूर समझता है। साहित्य के मार्फत पाठक अपनी भावनाओं, अपने दुख-सुख को साझा कर पाता है। कहते भी हैं कि किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं !

 

 

साहित्य का दरवाजा

 

दरवाजों का उपयोग प्रवेश या निकास के लिए होता है । किसी-किसी स्थिति में किसी के मुँह पर दरवाजा बंद भी कर दिया जाता है ! साहित्य एक ऐसा घर है जिसमें प्रवेश कर पाना ही व्यक्ति को कुछ विशिष्ट बना देता है । हमारे आसपास की दुनिया में साहित्य के अनेक दरवाजे बने हुए हैं। कौन-सा दरवाजा कब, कहाँ और कैसे खुलेगा, किसी को इसका पता नहीं होता । किसी की नकल में, किसी की प्रेरणा से, किसी के दबाव में -- बहुत से कारण हैं जिनकी वजह से कोई पाठक पाठक बनने के रास्ते पर चलने लगता है । या कोई लेखक लेखक बन जाता है ।

दरवाजा कोई भी हो, उससे प्रवेश के बाद सामने साहित्य का विशाल मैदान/ प्रदेश सामने उपस्थित होता है । कोई धीरे- धीरे इस विशाल मैदान में विचरण करता है, कोई थोड़ा तेजकदम चाल से।

 

पाठक के लिए साहित्य के दरवाजे का खुलना आसान है । बतौर लेखक यह दरवाजा थोड़ी मुश्किल से खुलता है । बल्कि दरवाजे का खुल जाना तो फिर भी आसान महसूस हो सकता है , दरवाजा खुलने के बाद पैठना आसान नहीं।

 

साहित्य : कितना सच, कितना झूठ

 

साहित्य में सच और झूठ का मिश्रण होता है । यदि सिर्फ सच ही सच लिख दिया जाए तो शायद उसमें वह रस पैदा न हो पाए कि पाठकों/ श्रोताओं को बाँध सके । यदि साहित्य में सिर्फ झूठ ही झूठ होना पकड़ा जाए तो साहित्य का आकर्षण ही न रहे ।

शायद हम उतना ही सच चाहते हैं जो बर्दाश्त हो सके। उतना ही झूठ कि बात झूठ न लगे । उतना ही सच कि बात अपने जीवन की भी, अपनी भी लगे । उतना ही झूठ कि सिर्फ अपनी ही सच्चाई न लगे । उतना ही सच कि पढ़ने वाला अपना सच भी देख सके । उतना ही झूठ कि पढ़ने वाला खुद की नजरों में ही न गिर जाए ।

साहित्य सत्य की प्रतीति है। पूर्ण सत्य नहीं । साहित्य २२ कैरेट सच ही हो सकता है, २४ कैरेट नहीं ।

साहित्य सच से मुख मोड़ने के लिए शरणस्थली नहीं, सच का सामना कर पाने का उपाय है । गाढ़े सच में झूठ का थोड़ा पानी सच को गले उतरने लायक बना देता है ।

 

साहित्य के दिग्दर्शक

 

बहुत प्राचीन काल में, जब पहलेपहल साहित्य रचा गया होगा, तब निश्चित तौर पर उसके कोई नियम, कोई नीति - निर्देशक तत्त्व नहीं रहे होंगे । वह तो लंबे समय तक और विपुल मात्रा में साहित्य रचे जाने के बाद नियम, नीति, मानदंड आदि विकसित हुए होंगे ।

जीवन के हर क्षेत्र में कुछ लोग होते हैं जो बाकियों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं । साहित्य के क्षेत्र में भी रोल मॉडल होते हैं। कुछ लोग ऐसे भी उभर कर सामने आते हैं जो लोगों को बताने लगते हैं कि वे क्या लिखें और क्या पढ़ें । इन्हें हम दिग्दर्शक कह सकते हैं । दिग्दर्शक अपने अध्ययन,अनुभव, प्रतिभा और दृष्टि के कारण अपनी पोजिशन बना पाते हैं। दिग्दर्शक लेखकों और पाठकों की रुचियों को प्रभावित करते हैं, उन्हें एक आकार देने की स्थिति में होते हैं । हर छोटी-बड़ी जगह पर ऐसे व्यक्ति पहचाने जा सकते हैं, जो साहित्य के दिग्दर्शक की भूमिका में होते हैं । दिग्दर्शकों की संख्या एकाधिक हो सकती है, बल्कि होती है ।

 

 

साहित्य का परदा

 

परदे को लेकर कितनी ही अभिव्यक्तियाँ हैं -- आँखों पर परदा पड़ा होना, परदे के पीछे के खेल, परदा गिर जाना, परदा डालना, बेपर्दा होना या करना । साहित्य के संबंध में भी ये सारे मुहावरे लागू किए जा सकते हैं ।

साहित्य को यदि एक मकान माना जाए तो इसके दरवाजों-खिड़कियों पर कई तरह के परदों की कल्पना कर सकते हैं । इन परदों की वजह से मकान की खूबसूरती और प्रतिष्ठा बनी रहती है । कभी-कभी तेज हवा या बवंडर में परदे अपने स्थानों से हट जाया करते हैं और सच्चाई अपने नग्न रूप में दिख जाती है । ऐसे में कइयों के मोह भंग होते हैं, कई मूर्तियाँ खंडित हो जाती हैं। परदे व्यवस्थित किए जाते हैं, परदे बदले जाते हैं, फिर नया चक्र शुरू होता है, नई खूबसूरती गढ़ी जाती है, नए आदर्श स्थापित किए जाते हैं ।

 

 

साहित्य के प्रशंसक और चीयर लीडर

 

क्रिकेट के उदाहरण से समझें तो साहित्य के क्षेत्र में भी प्रशंसक और चीयर लीडर, दोनों ही पाए जाते हैं ।

क्रिकेट में चीयर लीडर  'टी ट्वेंटी' प्रारूप की देन हैं । खेल अपने 'तुरन्ता' रूप में है , इतना कि ' वन डे ' भी लंबा लगने लगा है । खेल के स्टेडियम में मैच के दौरान बड़ी संख्या में प्रशंसक रहते हैं । खिलाड़ियों और प्रशंसकों का मनोबल बढ़ाने के लिए चीयर लीडर होते हैं । प्रशंसक अपना पैसा और समय लगाकर मैच देखने आते हैं । चीयर लीडर के लिए मैच एक अनुबंध की तरह है । चीयर लीडर की सेवाएँ बिक्री के लिए उपलब्ध होती हैं, और दाम चुकाए जाने पर खरीदार को प्राप्त हो जाती हैं ।

साहित्य में भी प्रशंसक और चीयर लीडर होते हैं । इस चीयर लीडर को पहचानना थोड़ा मुश्किल जरूर है । ऐसा इसलिए कि श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए चीयर लीडर एक सच्चे प्रशंसक के रूप में दिखाए-बताए जाते हैं । सच्चाई यह है कि सही दाम चुकाए जाने पर चीयर लीडर सिर्फ चीयर करना जानते हैं । साहित्य उनके सरोकार की चीज नहीं होती। यदि होती भी हो, तो वे उस सरोकार का दाम वसूल कर रहे होते हैं । दाम कैश या काइंड किसी भी रूप में चुकाया जा सकता है ।

 

 

साहित्य में न्योता-पुराई

 

हमारे सामाजिक जीवन में न्योता-पुराई एक सहज स्वीकार्य और अपेक्षित व्यवहार है । अपने किसी आयोजन में मैंने आपको बुलाया, फिर अपने किसी आयोजन में आपने मुझे । मैंने यथाशक्ति पत्रं पुष्पं अर्पित किए । आपने भी ।

साहित्य में यह न्योता-पुराई आयोजनों में भागीदारी और परस्पर प्रशंसा के रूप में विद्यमान  है । इसमें प्रॉक्सी भी चल सकती है । यानी किसी एक ने किसी दूसरे के यहाँ न्योता-पुराई की । उस दूसरे ने पहले को जानने वाले किसी तीसरे के यहाँ कर दी । साहित्य का संसार इतना बड़ा है कि कोई पीछे ही पड़ जाए, तभी ऐसे अन्योनाश्रय संबंधों को देख और पकड़ सकेगा ।

कभी कभी यह न्योता-पुराई ' डार्क ' भी हो सकती है । तब इसमें प्रशंसा की जगह बुराइयों को खोद खोद कर निकालने के समीकरण बनाए जाने लगते हैं ।

 

 

साहित्य : लेखक, संपादक, पाठक, आलोचक

 

किसी रचना के जीवन में विभिन्न व्यक्ति आते हैं । उनके आने का क्रम इसी प्रकार है -- लेखक, संपादक, पाठक और आलोचक । पाठक और आलोचक के क्रम आपस में जरूर बदल सकते हैं ।

लेखक ने कोई रचना रच ली । इसका एक फल तो यह है कि वह स्वांतःसुखाय होगी — "निज कवित्त केहि लाग न नीका"। लेकिन इतने से काम तो चलेगा नहीं । रचना का प्रसार भी उतना ही जरूरी है । इस प्रसार के लिए संपादक अगली कड़ी है । रचना का प्रकाशन या तो पत्रिका में होगा, या फिर पुस्तकाकर । दोनों ही सूरतों में रचना संपादक की नजरों से गुजरेगी । आजकल तो सोशल मीडिया का जमाना है । रचनाएँ सीधे भी पाठक तक पहुँचाईं जा सकती हैं । बहरहाल, संपादक की नजरों से गुजर कर ही रचना दुरुस्त होती है । कोई भी संपादक पत्रिका या प्रकाशन संस्थान की नीतियों को ध्यान में रखते हुए रचनाओं का आकलन करता है । कोई भी प्रकाशक अपने व्यावसायिक पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर सकता । अतः संपादक को यह भी ध्यान रखना होता है कि रचना व्यावसायिक रूप से सफल हो सकती है या नहीं । संपादक का एक काम यह भी होता है कि जरूरत होने पर रचनाओं को थोड़ा इस तरह कसा जाए कि वह निखर उठे । जरा-सी हेर-फेर से कई बार रचनाएँ चमक उठती हैं । जिस तरह खुद के लिखे हुए की प्रूफ रीडिंग करना बहुत कठिन है, खुद के लिखे का संपादन भी कठिन है । अपनी रचना के प्रति लेखक का मोह स्वाभाविक है। संपादक जब किसी रचना को प्रकाशन के लिए चुन रहा होता है, तो वह एक जोखिम भी उठा रहा होता है । रचना कितनी सफल या असफल होगी इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता । अर्थशास्त्र में जोखिम उठाने के पुरस्कार को ही लाभ कहते हैं । प्रकाशन में भी जोखिम है, और उसी हिसाब से लाभ या हानि ।

प्रकाशन के बाद रचना पाठक के द्वारा पढ़े जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है । रचना के असली भाग्यविधाता पाठक ही हैं । रचना को जीवित पाठक ही रख सकते हैं । आलोचक भी किसी रचना के जीवन के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं । आलोचक किसी रचना की महत्ता को सिद्ध या स्थापित कर सकते हैं । लेकिन ऐसा कर के वे किसी पाठक को मजबूर नहीं कर सकते उस रचना को पढ़ने और सराहने के लिए ।

आलोचक का काम एक बड़े परिप्रेक्ष्य में रचना का अवलोकन और आकलन करना है । आलोचक में नीर-क्षीर विवेक का होना अपेक्षित है । आलोचक का दृष्टिसंपन्न होना भी आवश्यक है । आलोचक का ही उत्तरदायित्व है कि वह किसी रचना या रचनाकार का साहित्य में उचित स्थान तय करे । ऐसा करने के क्रम में वह पाठकों की रुचियों का भी परिष्कार करता चलता है । आलोचना के काम में भी जोखिम है । आलोचक ने जिस रचना पर अपना जो मंतव्य दिया है, वह गलत भी साबित हो सकता है । ऐसी स्थिति में आलोचक की रेपुटेशन खतरे में रहती है । लेकिन अगर उसने रचना या रचनाकार की सही पहचान की है, तो रचना के सफल होने पर आलोचकीय दृष्टि की सफलता भी चर्चा में आ जाती है।

 

संपादक और आलोचक किसी रचना को दो दिशाओं से देखते हैं । जहाँ संपादक का काम किसी रचना को पठनीय बनाने का है, वहीं आलोचक का काम यह बताने का कि कोई रचना पठनीय है या नहीं । यदि पठनीय है तो क्यों है, पठनीय नहीं है, तो क्यों नहीं है ?

अंत में, यह भी कि किसी रचना के विषय में हम कितने समय, कितने कालखंड तक आकलन का हिसाब रख सकते हैं? हर रचना अपने साथ अपनी जीवनरेखा भी लेकर आती है ।

 

 

साहित्य का बाजार, बाजार का साहित्य

 

जैसे इस दुनिया में हर वस्तु का बाजार है, साहित्य का भी अपना बाजार है । मुद्रा या पैसा ही हर उत्पाद के हस्तांतरण का मूल आधार है। इस बात को इस तरह भी कह सकते हैं कि जिस भी वस्तु को हम पैसे देकर प्राप्त कर सकते हैं, वह एक उत्पाद है ।  इस तरह साहित्य भी  एक उत्पाद है । साहित्य का उत्पाद होना कतई बुरा नहीं है । यदि ऐसा न हो, तो साहित्य बहुत सारे लोगों तक पहुँच भी नहीं पाएगा । यह बाजार हर तरह के साहित्य के लिए मौजूद है । अलबत्ता,बाजार की सफलता साहित्य की अमरता का आधार नहीं होती । इन दिनों 'बेस्ट सेलर' किताबों की सूची प्रकाशित होती रहती है।  इस सूची में स्थान पाना किताबों के कालजयी होने की गारंटी तो नहीं है । हाँ, ये सूचियाँ एक प्रवृत्ति, एक चलन या फैशन की ओर इशारा करती हैं । सम्भवतः यहीं से बाजार का साहित्य रचे जाने की शुरुआत होती है । बाजार का साहित्य, यानी बाजार की माँग के अनुसार साहित्य का उत्पादन । हालाँकि इस चलन में भी कुछ अच्छा साहित्य रचा ही जा सकता है । साहित्य की माँग और साहित्य की आपूर्ति दोनों ही शक्तियाँ साहित्य के रचे ( साहित्य के उत्पादन) और पढ़े जाने ( साहित्य के आस्वादन) को प्रभावित करती हैं । बाजार का साहित्य के साथ बिक्री का आरोपित दबाव चलता है । इस कारण फिर तरह-तरह के हथकंडे भी जगह बनाने लगते हैं । साहित्य के बाजार को ऑर्गेनिक और बाजार के साहित्य को उर्वरक-आधारित कहा जा सकता है ।

 

साहित्य के रक्षक और संरक्षक

 

कई बार ऐसा लगता है कि आनेवाले समय में साहित्य की जरूरत ही नहीं रह जाएगी । और बार-बार यह शंका निर्मूल भी सिद्ध होती रही है । साहित्य की जरूरत हमेशा बनी रही है । समय के साथ-साथ साहित्य ने अपना चोला जरूर बदला है । मौखिक से लिखित और अब लिखित से डिजिटल, साहित्य ने माध्यम-भर बदला है ।

जहाँ तक साहित्य की रक्षा का सवाल है, तो मूल रूप से लेखक और पाठक ही साहित्य की रक्षा करते आए हैं। इसमें संपादक और आलोचक को भी जोड़ा जा सकता है, लेकिन उसमें बहुत से 'अगर-मगर' जुड़ जाने की संभावना होती है।

रक्षक साहित्य से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं । इनके अलावा कुछ लोग साहित्य के संरक्षक ( custodian) के रूप में भी काम करते हैं । इनका काम साहित्य को सुरक्षित रखना और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते रहना है । बहुत सारे पुस्तकालयों, ‘सभाओं’, ‘सम्मेलनों’, संस्थानों आदि को हम साहित्य के संरक्षक कह सकते हैं । संरक्षक स्वयं साहित्य नहीं रचते, या जरूरी नहीं कि वे स्वयं पाठक भी हों, पर वे साहित्य को सुरक्षित रख सबके लिए उपलब्ध करवाते रहते हैं ।

 

 

साहित्य : साधना या कौशल ?

 

साहित्य को हमने ऊँची पद्‍वी दे रखी है । साहित्य हमारे लिए साधना के समान है । जीवन के बहुत से उच्चतर कार्यों में साहित्य-साधना भी एक है —  यह धारणा बहुत हद तक सही भी है ।  साहित्य आदमी के मन को छूता है और उसे सूखने से बचाता है । इस लिहाज से साहित्य साधना तो है ही । किसी के मन को छू जाने वाली बात कहने के लिए रचनाकार को साधना तो करनी ही पड़ेगी । साधना साध लेने का ही तो नाम है ।

आज के समय में एक ही साथ बहुत से लेखक सृजनरत हैं ।  समय की छन्नी से छनकर कितने बचेंगे, इसका सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता । कुछ लेखकों ने साहित्य को एक कौशल की तरह सीख लिया है । कौशल में हाथ की सफाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती है । ऐसे लेखक लिख तो रहे हैं, पर क्या वे रच भी रहे हैं ? ऐसे लेखन में आपके ध्यान, आपके चित्त का काम उतना नहीं रह जाता । कविता में छंद से विमुखता का एक कारण शायद छंद को एक कौशल के रूप में साध लिया जाना भी रहा ।

कभी-कभी साहित्य को अपना हित साधने के औजार के रूप में साध लिया जाता है । प्रशंसा रामबाण होती है, साहित्य वह रामबाण बन जाता है । कभी-कभी यह बाण उल्टा भी चलता है, यानी ध्वंसकारी भी हो जाता है । ध्वंसकारी न भी हो , तो चुगलखोरी में तो रत हो ही जाता है । ऐसे में हम कह सकते हैं कि साहित्य में राजनीति का प्रवेश हो गया है ।

लोकभारती बृहत् प्रामाणिक हिंदी कोश में राजनीति के तीन अर्थ दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं -- १. राज्य की वह नीति जिसके अनुसार प्रजा का शासन और पालन तथा दूसरे राज्यों से व्यवहार होता है ।  २.किसी दल द्वारा सत्ता प्राप्ति या सत्ता बनाए रखने के उद्देश्य से अपनाई हुई पद्धति जो राष्ट्रहित की दृष्टि से अनुकूल न हो । ३. कुटिल नीति ( व्यंग्य) ।

साहित्य पर राजनीति के उपर्युक्त तीनों अर्थ लागू होते हैं ।

 

साहित्य को क्या महान बनाता है ?


 यह सवाल अनुत्तरित है , क्योंकि इसका कोई सही-सही जवाब नहीं हो सकता, और इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता । फिर भी, कुछ बातें तो की ही जा सकती हैं ।

यह कहा जा सकता है कि किसी भी तर्क से किसी रचना को महान बताए जाने के मूल आधारों के तौर पर रचना के 'कंटेंट' और उसके 'इंटेंट' को ही रखा जा सकता है । लोगों के तर्कों के रंग जरूर अलग-अलग हो सकते हैं ।

'कंटेंट' से हमें रचनाकार की तैयारी और 'इंटेंट' से उसकी निश्छलता का अर्थ लेना चाहिए । यही वे अवयव हैं जो किसी रचना को बचाए रख सकते हैं ।


शनिवार, 6 जून 2026

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती – २

 

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती – २

 

आदरणीय बड़े लेखक जी,

प्रणाम स्वीकारें !

 

कहनाम यह है कि हमलोग आपका बहुत नाम सुने हैं । कितना तो किताब आप लिख दिए हैं । अखबार में भी खबर पढ़ते रहते है कि आप आज यहाँ भाषण दिए, तो आज वहाँ परचा पढ़े । कभी-कभी फोटो-उटो के साथ भी रहता है । अब हमको साहित्य को जाँचने वाली कुञ्जी प्राप्त नहीं है, इसलिए हम सुनिए-सुन के जान पाते हैं कि कौन लेखक कितना बड़ा है । अब ये बात भी है कि “ जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है” ! तो कुछ ऐसी-वैसी बात भी कान में पड़ जाती है कभी-कभी । आप तो जानते ही हैं सच्ची प्रतिभा से सबको जलन होती है ।

         आप आजकल एक अच्छा काम कर रहे हैं । अपनी किताबों के बारे में फेसबुक पर खुद ही चर्चा कर दे रहे हैं । कम-से-कम मिलावट का खतरा तो नहीं रहेगा न । फिर वही जलन वाली बात भी, दूसरे लोग यदि चर्चा करेंगे तो उनका राग-द्वेष भी उसमें घुस ही जाएगा ।

आपको एक दिन एक फंक्शन में देखे । चेहरा से तो नहीं जानते थे आपको, लेकिन आपका भाव और आपकी भाव-भंगिमा देखकर कोई भी समझ जाता कि आप बड़े लेखक जी ही हैं । आपकी ग्रीवा तनी हुई थी, उन्नत भाल और आँखें गर्व-दीप्‍त । कुछ सच्चे और कुछ टुच्चे लेखक आपको घेर कर बैठे हुए थे । आपके चेहरे पर अधखिली कली-सी मुस्कान थी । इस मुस्कान के कम-से-कम दो अर्थ निकाले जा सकते थे – “हम हैं तो खुदा भी है” वाला और “ दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँवाला ।

हमको बड़ा अफ्सोस हुआ । नहीं, गलत मत समझिए । एक लेखक का समय लेखक-समयहोता है । उसका इस तरह से बे-भाव का खर्च हो जाना हमको ठीक नहीं लग रहा था । कितनी अनमोल अनूठी पंक्तियाँ दिमाग के गलियारे से बिना थमे पार कर गई होंगी । आपके पास तो और बहुत-सी पंक्तियाँ आ जाएँगी, नुकसान तो जनता का हो गया । और यदि आपको बुला ही लिए थे लोग, तो आपसे किसी का सम्मान ही करवा लेते । आपको कोई सम्मान ही दे देते । खैर !

आपके पास हर लेखक की करतूतों का कच्चा चिट्ठा है । कोई आपसे ज्यादा उड़ नहीं सकता है । आप तो यदि सिर्फ चुगलियों को जमा कर दें, तो एक बेस्ट सेलर किताब बन जाए ! आप सब जानते-समझते हैं , लेकिन फिर भी आप सबके कार्यक्रमों में चले जाते हैं । तारीफ कर आते हैं । लेखक भी अंतत: एक सामाजिक प्राणी ही तो है । समाज में थोड़ा दायाँ-बायाँ , ऊँचा-नीचा तो चल जाता है ।

उस दिन एक आदमी थोड़ा कम प्रतिबद्धता वाला निकल गया । कैसा झाड़ लगाए आप उसको ! बताइए, उसको पता तक नहीं ! लेखकिया विचारों के लिहाज से एक भारत श्रेष्ठ भारततो अलगे चीज है ! और फिर लेखन में लोकतंत्र का हिमायती होना और लेखक का आचारण में भी वैसा होना अनिवार्य अनिवार्यता तो है नहीं । विचार मतलब एक विचार। मंच मतलब एक मंच । ठेकुआ छाप कविता और कवि का जमाना है । वही, एक ठो साँचा बना लीजिए, फिर एक के बाद एक कविता पटकते जाइए । वही जानल-बूझल शकल और स्वाद वाला ! वही एक भारत, श्रेष्ठभारत ! सहस्र मुखों से एक ही बात, एक ही तरह की बात...!

बडे लेखक जी, आप सबको कहते हैं कि आप भेद-भाव से ऊपर उठ चुके हैं । ऊपर नहीं भी उठे हैं, तो साइड तो हो ही गए हैं । लेकिन हमको लगता है कि भेद-भाव की एक सरस्वतीबह रही है आपके अंदर । प्रत्यक्षत: दिखती नहीं है, लेकिन है जरूर । कभी-कभी तो आपको भी नहीं दिखती होगी, लेकिन हाथ इतना सेट हो गया है कि आपरूपी गाड़ी उधर मुड़ ही जाती होगी ।

यह आप अच्छा करते हैं कि आपकी महती रचनाओं से परिपूरित पुस्तकें, आप अपने हाथों से किसी ऐरे-गैरे को देने की गलती नहीं करते । आप पदानुक्रम का खूब खयाल रखते हैं । जैसे उस रोज, आपके पास उस वेटर को देने के लिए आपकी किताब की प्रति नहीं थी । वही वेटर, जो बड़े उत्साह से आपको और आपके गेस्ट को सर्व कर रहा था । वही, जो आपकी किताब का सही-सही नाम नोट कर रहा था । उसके पास उस मंच से आपकी तारीफों के पुल बाँधने की सलाहियत भी तो नहीं थी । और अगर होती भी तो – कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली ! बड़ा अच्छा किया आपने, जो उसे किताब नहीं दी । काम करने वाले लोग काम ही किया करें ।

सेटिंग-गेटिंग-बेटिंग, नेटवर्किंग, जुगाड़, जोड़-तोड़, तिकड़म, पहुँच, पैरवी – इन सबका एक लेखक के लिए भी कितना महत्त्व होता है, यह आप जानते हैं । हर लेखक के लिए नीचे रह जाने के, पीछे छूट जाने के कारण अलग-अलग हो सकते हैं । लेकिन ऊपर पहुँचने का रास्ता, सबका लगभग एक जैसा ही होता है ।

लेखक जी, आपकी रचनाओं में अश्‍लील और अवांछित बातें भी आकर शृंगार और अर्थ-गाम्भीर्य से भर जाती हैं । उनमें प्रतिरोध, प्रतिबद्धता ,दार्शनिकता और अध्यात्म तक की छौंक लग जाती है । ऐसा सुधी आलोचक-समीक्षक जन कह देते हैं । पाठक, वह भी साधारण, तो सुधी नहीं ही होता है । उसकी बात को मत सुना जाए । लेकिन,एक बात है कि प्लास्टर के मजबूत होने के लिए सीमेंट और बालू का अनुपात सही होना चाहिए । नहीं तो, समय हिसाब कर देता है । कुछ लोग कहते हैं कि लेखन का हिसाब भी समय अपने-आप करता है । हो सकता है । लेकिन आजकल लोग का भी हिसाब बहुत तेज हो गया है । हमारी विनती रहेगी कि आप एक अच्छा कैलकुलेटर अपने कब्जा में रखें । वक्त-जरूरत काम ही आ जाए !

बाकी सब कुशल - मंगल । 

शेष फिर ।

आपका अपना,

सिद्धप्रसिद्ध 

उर्फ बुरलेल जी


शुक्रवार, 5 जून 2026

बालमुकुन फिर सोच में है !

 

 

बालमुकुन फिर सोच में है !

 

बालमुकुन साहित्य की बाउण्ड्री के बहुत बाहर है । लेकिन कभी-कभार टाइम-पास करने के लिए पत्रिकाओं को उलत-पुलट लेता है । ऐसे में ही एक बार एक पत्रिका में उसने देखा  कि समकालीन साहित्य में गाँव की अनुपस्थितिपर गहन विचार-विमर्श हुआ है और भारी चिन्‍ता प्रकट की गई है । गाँवों के देशभारत के साहित्य से गाँव की बेदखली । उसकी उत्सुकता जगी । पूरी परिचर्चा पढ़ गया । और पढ़ने के बाद बालमुकुन फिर सोच में है ! अब क्या कहूँ दोस्तो, उसका तो स्वभाव ही कुछ ऐसा है ।

बालमुकुन ठहरा साहित्य के बाहर का आदमी । वह समझ नहीं पाया कि साहित्य में शहर और गाँव की विभाजन रेखा क्यों जरूरी है ? उसने पढ़ा " गाँव के लोगों के पास भी अब विष है "। उसने सोचा— कब नहीं था ? क्या शहरों में सिर्फ ' विषधर ' रहते हैं संवेदना और सरोकार की बात हर जगह होती है, कहने का तरीका अलग हो सकता है । फिर उसको अज्ञेय की साँपकविता का ध्यान हो आया; हो न हो गाँव के लोगों के पास अब भी विष है’ – यह बात इसी कविता को संदर्भ में रखकर लिखी गई है । विक्की बाबूको मुंशी जीने कहा था कि बात में वजन लाओ । यही बात याद आ गई होगी शायद । बालमुकुन ने मन-ही-मन वह दुहराया जो बचपन से दुहराता आ रहा है,कभी रात में साँप का खयाल भी आ जाए तो – साँप, सुइया, डोरा !  

बालमुकुन सोच रहा है कि गाँव से शहर की ओर जाना कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं । आजादी के बाद से ही औद्योगिकीकरण के कारण जनसंख्या शहरों की ओर गई है । भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण नहीं भी होते, तो भी शहरीकरण बढ़ता ही । आदमी गाँव से शहर जा रहा है, सो साहित्य भी । ऐसा क्यों है कि गाँवों से ( खासकर आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों, यथा- बिहार) निकलने को पलायनकहते हैं ।  कृषि - कर्म या गाँव से निकलना भागना ( पलायन) क्यों कहा जाए ? व्यक्ति, समाज या देश के ये अलग - अलग स्टेज ( चरण ) हैं । भारत की आबादी का जितना बड़ा हिस्सा कृषि और संबंधित कार्यों पर आधारित है, उसके अनुसार उत्पादन नहीं है । ऐसा उत्पादन संभव भी नहीं है । ' छिपी हुई बेरोजगारिता ' से बेहतर है कि विकल्पों की तलाश की जाए, नए - नए विकल्प बनाए जाएँ । बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश गए तो वह सम्मानजनक इमिग्रेशनहो जाता है । किसान और किसानी बहुत समय से हाशिए पर हैं, यह कोई नई बात नहीं है । ' उत्तम खेती,मद्धम बान ' बहुत पुरानी बात हो चुकी । समस्या यह है कि किसानों के हाशिए पर रह जाने की बातें होती हैं, उसके वहाँ निकल सकने की सूरत नहीं निकाली जाती । उनके लिए किसानी के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार नहीं किया जाता । रोजगार के अन्य कारगर विकल्पों की बात नहीं सोची जाती ।  हाँ, बात से बात बनाने के लिए परिचर्चाएँ  अत्यंत उपयोगी शगल हैं ।

पाठकों की कमी पर चर्चा पढ़ते-पढ़ते बालमुकुन मन-ही-मन बातों को काटने भी लगा था – पुस्तकों को सिर्फ मनोरंजन के साधन के रूप में देखना कहाँ तक ठीक है ? पाठक नहीं मिल रहे हैं तो लेखन - प्रकाशन की गुणवत्ता और उसके प्रचार - प्रसार पर भी विचार किया जाना चाहिए । जब टीवी , मोबाइल नहीं थे तो सिनेमा भी एक विकल्प था ही, भले ही इतने व्यापक स्तर पर नहीं । अभी पाठकीयता का सही अंदाजा लगाने के लिए, ई बुक्स, ऑडियो बुक्स और साहित्यिक सामग्री उपलब्ध कराने वाली तमाम वेबसाइट्स के उपयोग का आकलन भी करना चाहिए । अरे भाई, पाठक कम हो रहे हैं, वह इसलिए कि सब के सब लेखक हो गए हैं । कस्टमर कोई नहीं, सब के सब सप्लायर ! कभी किसी बड़े अथवा छोटे लेखक से उसके सिवा किसी और लेखक की बात छेड़ कर देखिएगा । निप इन द बडअँग्रेजी कहावत का अर्थ समझ में आ जाएगा, एकदम प्रैक्टिकल में ।

बालमुकुन पढ़ता जा रहा था, और सोचता जा रहा था –

आज के समय में कितने लेखक ऐसे होंगे जो गाँवों में ही रहते हैं ? गाँव के संपर्क में रहकर वहाँ का हालचाल जान लेना अलग बात है । यह कहना संगत नहीं कि गाँव-देहात के लेखन की कसौटी अभिजात और शहरी लेखक तय कर रहे हैं। अगर इशारा ' गुटबाजी ' की ओर है ,तो उसके कारण अलग हैं ।

बोली - बानी, आचरण, सामाजिक - सांस्कृतिक पहचान को बनाने - बचाने में व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है । भाषा के स्तर पर विद्यापति, सूर, तुलसी -- इनको तो हम हिन्दी साहित्य के अंतर्गत रखते हैं, लेकिन क्या मैथिली, ब्रजभाषा या अवधि में कोई आज लिखे तो उसे हिन्दी- लेखन माना जाएगा

ग्रामीण व्यक्ति क्या कम जागरुक होता है ? अगर पहले का ग्रामीण राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत कम जागरूक होता तो गाँधी जी का ' चम्पारण सत्याग्रह ' नहीं हुआ होता । भारत में ' वयस्क मताधिकार ' को नहीं अपनाया गया होता । 

प्रेमचंद या रेणु के समय क्या ' दलित विमर्श ', ' आदिवासी विमर्श ' या ' स्त्री विमर्श ' जैसी अवधारणाओं का चलन था? ऐसे में उनके लेखन को इन पैमानों पर परखना क्या सही होगा ? रही बात शोषित और पीड़ित की आवाज की, तो क्या इसमें उनका लेखन कमतर है

विचारधारा का 'मास स्केल ' पर यदि लोप हो गया है, तो क्या विभिन्न साहित्यिक संगठनों की भूमिका का भी ' क्रिटिकल रिव्यू ' नहीं किया जाना चाहिए संगठन का काम सिर्फ कैडर या सदस्यता बढ़ाने से ही पूरा होना मान लिया जाना चाहिए

साहित्य में नए पाठक जब तक नहीं जुड़ेंगे तब तक बात नहीं बनेगी । स्कूली छात्रों के बीच यदि लेखक - आलोचकगण जा सकें तो शायद बात बन जाए । लेकिन यह काम लेखन जैसा महान काम नहीं है, तो इसे ' आउटसोर्स ' कर देना ही ठीक माना जाता है ! किसी की जिम्मेदारी तय करना और खुद जिम्मेदारी उठाने में फर्क तो रहेगा ही।

बालमुकुन खुद खुद से ही तर्क-वितर्क किए जा रहा था । सोच में विचरना थमा तो उसने देखा कि उसकी चाय ठंढी हो चुकी है , उस पर पपड़ी-सी जम चुकी है । उसे लगा कि वह थोड़ा ज्यादा ही सीरियसली सोच गया । इतना तो पत्रिका का अभीष्‍ट भी नहीं रहा होगा । उसने खुद को टोका, फिर सोचा – विचार की मथनी ठीक नहीं । आगे से कविता-कहानी पर ही जोर आजमाया जाएगा ।

[ प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका वागर्थके अप्रैल, 2026 के अंक में प्रकाशित पृष्‍ठ 67 पर प्रकाशित परिचर्चा से इस निबंध का लेना-देना नहीं है । यदि कुछ ऐसा लगे तो महज संयोग माना जाए। ]