शुक्रवार, 26 जून 2026

यह कैसा समय है ?

 



यह कैसा समय है ?

1.        नेति नेति 2. चरैवेति चरैवेति 3. यह कैसा समय है ? 4. आला कवि

                    

नेति नेति

 

पैन कार्ड कुछ ? – नहीं

वोटर कार्ड कुछ ? – नहीं

आधार कार्ड कुछ ? – नहीं

पासपोर्ट कुछ ? – नहीं

 

नेति नेति

 

सद्‍भावयुक्‍त – नहीं

समभावयुक्‍त – नहीं

कुप्रभावमुक्‍त – नहीं

काँव-काँवमुक्‍त – नहीं

 

नेति नेति

 

भ्रष्‍टाचारमुक्‍त – नहीं

कदाचारमुक्‍त – नहीं

व्यभिचारमुक्‍त – नहीं

दुष्‍प्रचारमुक्‍त – नहीं

 

नेति नेति

 

लाभ-लोभमुक्‍त – नहीं

स्वार्थबोधमुक्‍त – नहीं

अवरोधमुक्‍त – नहीं

प्रति-शोधमुक्‍त – नहीं

 

नेति नेति

 

अपराधमुक्‍त – नहीं

देश व्याधमुक्‍त – नहीं

पथ बाधमुक्‍त – नहीं

कोई साध मुक्‍त – नहीं

 

नेति नेति

 

ज्ञान मानयुक्‍त – नहीं

मान ज्ञानयुक्‍त – नहीं

कोई पापमुक्‍त – नहीं

कोई अभियुक्‍त – नहीं

 

नेति नेति

 

यह नहीं, वह भी नहीं

फिर जो बचेगा अन्‍त में

शून्य, उसी से

तय होगी नागरिकता

तुम्हारी नागरिकता ही असली

पहचान है तुम्हारी

 

पथिक, तुम कौन देस के वासी ?

**

 

चरैवेति चरैवेति

 

निशाना साधकर

साधी गई चुप्पियाँ

दिल दुखा, दुखता गया

झरती गईं आस की

सब पत्तियाँ

 

चरैवेति चरैवेति

 

क्या ज़मीं, क्या आसमाँ

एक-दूसरे के दरम्याँ

कितनी गहरी खाई

सबने है बनाई

 

चरैवेति चरैवेति

 

साध्य, साधन, साधना में

फाँक है

गलतियाँ हैं हर तरफ

और मुँदी हर आँख है

 

चरैवेति चरैवेति

 

शक्ति हो, तो संयम हो

और यही नियम हो

यह हो नहीं अपवाद

फैलता जा रहा मवाद

 

चरैवेति चरैवेति

 

चले जीवन

मगर लेकिन

न आँखें मूँद कर चलना हो

न अंधकूप में गिरना

तनी पीठ हो

उठी हों आँखें

पथ आगे का देख रही हों ...!

**

 

यह कैसा समय है ?

 

मृत्यु से

मृत्यु अलग होती है

दु:ख से दु:ख

 

परिवार से अलग

परिवार

जाति, धर्म, सम्प्रदाय

समाज, देश

सब अलग-अलग

 

हम

अपने-अपने दु:ख के

भागी हैं

हम

अपने-अपने

दु:ख भोगें

 

हम न किसी को टोकें

हम न किसी को रोकें

 

डूबता है सब

डूब जाने दें  !!

**

 

आला कवि

[To whomsoever it may concern]


आला कवि चुपचाप है

बनता तो मन का साफ है

 

ऐसे कितना रचता है

समय पड़े पर बचता है

कितना गाल बजाता है

बस आखर ही सजाता है

अपनी पीठ को खुद ही

ठोकता अपनेआप है

 

गाँव-जवार से दूर है

थोड़ा

हो गया मगरूर है

माथा थोड़ा है

चढ़ा हुआ

मन है थोड़ा

बढ़ा हुआ

बानी उसकी

जली हुई है

सोच भी कुछ

गली हुई है

 

कुछ भी लिखता है

लिखता, दिखता है

भीतर

पैर पकड़ता है

बाहर आकर वह

अकड़ता है

 

आले कवि

तुम सदर नहीं हो

कृपापात्र हो सकते हो

तुम

कवि मगर नहीं हो !!