शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

कुछ छन्द में - १८,१९,२०

    

     कुछ छन्द में - १८,१९,२०       

          यह मंथन हो  

धन ही धन हो 

धन दन-दन हो


सुख का दीपक

धन ईंधन हो


हो सुख सबको 

यह मंथन हो


धन तब धन हो

जब मन धन हो


रहे सीकरी

क्या सन्तन को 

                            छन्द -१८



               सच को सच कर कहते हैं 


जो कहते हैं "सच कहते हैं"

वे कितना बचकर कहते हैं 


थोड़ा शायद पता हो, किन्तु 

बाकी तो रचकर कहते हैं


सच कहनेवाले होते हैं

वो सच को सच कर कहते हैं


कुछ बाघों को भी देखा है

वे कितना लचकर कहते हैं

 

यही दूरियाँ ही हासिल हैं 

सपने अब खच कर कहते हैं

                                                छन्द -१९


                     बातों क्यों ग़लीज़ हो


बातों क्यों ग़लीज़ हो

आप कहाँ मरीज़ हो


बचा रहे कुछ लिहाज़

बाक़ी कुछ तमीज़ हो


उसका क्या करें जिसे

सड़ा-गला लज़ीज़ हो


शोरोगुल क्यों आख़िर 

कुछ सज़ा तज्वीज़ हो


फटी भले रहे मगर

धुली हुई क़मीज़ हो


जो नज़र से गिर गया

किसका वो अज़ीज़ हो


है ग़लत तो है ग़लत 

भले सुख़नहफ़ीज़ हो

                                       छन्द -२०



                 



बुधवार, 4 नवंबर 2026

खुदा खैर करे...!


 

खुदा खैर करे...!

 

 

“ एक बार जब मैंने एक जरूरतमंद स्त्री को कुछ राशि देकर यौन क्रिया की तो मुझे बहुत ग्लानि हुई, अपने को धिक्कारा और लम्बे समय तक मेरे मन और शरीर पर उसके दुष्परिणाम रहे। यानी भोगना भोगना ही पड़ता है। लेकिन अकसर ऐसा नहीं होता। पाप ही फलता है। इस पर धार्मिक लोग कहेंगे कि इसका फल उसे अगले जनम में मिलेगा ।”

 

“ इसलिए छोटे छोटे सम्बंध तो कई बने । लेकिन लम्बा चलने वाला प्रेम कोई न बना। शायद मैं प्रेम करने लायक न था। मुझमें स्वार्थ अधिक है। रिश्तेदारी में कई जगह एक एक दो दो दिन या रात के रिश्ते बने। एक जगह वह मेरे साथ चलना चाहती थी। अभी हाल में एक स्त्री ने कहा, तुममें सामाजिक साहस का अभाव है। उसने सही कहा। और इसकी कमी का एक कारण मुझमें प्रेम करने वाले धैर्य और शक्ति की कमी है। जो इंतजार नहीं कर सकता वह प्रेम भी नहीं कर सकता। प्रेम जैसे दशरथ मांझी ने किया। जबकि मैं तत्काल सब कुछ चाहता रहा। इस बार मेरा खिंचाव घर में काम करने वाली एक दाई की तरफ हो गया। एक दिन जब मैं उसकी बांह पकड़े उसे खींच रहा था वह पीछे हटती जा रही थी हंसती हुई। मेरी मुट्ठी नीचे खिसकती जा रही थी। और वह खिलखिला कर भागी। और मेरी चुटकी में उसकी बांह के नीचे कुहनी के ऊपर वाले गड्ढे से छूट कर देह की मैल रह गयी। ऐसी वितृष्णा पहले कभी न हुई। तो इसी मैल के लिए मैं इन देहों के पीछे भाग रहा हूं ।”

 

उपर्युक्त पंक्तियाँ आलोकधन्‍वा की नहीं हैं । इसीलिए नजरों में नहीं आई होंगी, चर्चा में तो खैर बिल्कुल ही नहीं । मुझे ‘दीवार’ का डायलॉग सुनाई पड़ने लगा है – “ दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे खुद के पाप कम नहीं हो जाते ।” वैसे , ये पंक्तियाँ एक बड़े कवि के संस्मरण का भाग हैं, जो एक लब्धप्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित है । लब्धप्रतिष्ठित पत्रिका पब्लिक स्पेस की चीज है , यानी उसका देखा जाना प्रतिबन्‍धित नहीं है ।

क्या आपने आलोकधन्‍वा की कोई फेसबुक-पोस्ट देखी है? क्या आप उनकी पोस्ट देख सकते हैं ? उनकी पोस्ट वही देख सकते हैं, जो उनकी ‘फ्रेंड लिस्ट’ में हों । उनकी फ्रेंड लिस्ट बड़ी है, लेकिन फिर भी है तो एक ‘क्लोज़्ड सर्किल’ या प्रतिबन्‍धित क्षेत्र ही । उस लिस्ट में बने रहना क्या बाध्यकारी है ? यह तो उनके ‘मित्रगण’ ही बता पाएँगे ।

इसमें कोई शक नहीं है कि आलोकधन्‍वा का मन कुंठित हो चुका है । इसीलिए लुंठित भी है । तो क्या इस वजह से उसे लुंचित भी कर दिया जाना चाहिए ?

यदि किसी घर का कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था के कारण अपने कपड़े नहीं पहनता है, या पोर्नोग्राफी देखने के पीछे पड़ा रहता है, तो घर वाले क्या करेंग़े? पकड़-धकड़ कर कपड़े पहनाएँगे, मोबाइल-लैपटॉप छीन लेंगे, इंटरनेट बन्‍द करवा देंगे, घर से निकलना बन्‍द कर देंगे, एक कमरे में बन्‍द कर देंगे । साथ ही साथ किसी डॉक्टर से इलाज की व्यवस्था भी करेंगे । या कि वे गली में खड़े हो कर हर आने-जाने वाले को रोक-रोक कर बताते फिरेंगे कि घर के बुजुर्गवर कैसे अशिष्ट और अश्‍लील हो गए हैं । खुद भी गरियाएँगे और आने-जाने वालों को भी गरियाने को कहेंगे । घर की ऐसी बातें वैसे भी लोग किसी को बताने से कतराते हैं, फिर ऐसे लोगों को तो बिल्कुल ही नहीं, जो घर के बारे में जानते ही नहीं, किसी को पहचानते ही नहीं । अगर हर उपाय निष्फल हो जाए तो फिर छोड़ देंगे उसे अपने हाल पर मर-खप जाने के लिए !

मानसिकता, नैतिकता, अपराध और बीमारी – सबको एक जैसा तो नहीं मान सकते । ये चारों पकड़ में आएँ, तभी उनके प्रभाव का पता चलता है । चारों को आँकने के लिए मापदण्ड भी होते हैं । मानसिकता और नैतिकता के लिए अमूमन एक अलिखित आचार-संहिता काम करती है । अक्सर, जो लोक में मान्य नहीं है, वह अनैतिक है ।  लोक में मान्य या अमान्य होने की बात तभी उठेगी जब वह किसी को पता चले, या जब कोई उसे बताए । फिर इसमें हर व्यक्ति का अपना फिल्टर काम करता रहता है । किसी का छिद्र छोटा, किसी का बड़ा । किसी का रंग लाल, किसी का हरा ।

क्यों न एक आचार-संहिता बना दी जाए ? चूँकि ‘लेखक’ को शुद्ध करना अभीष्ट है, लेखकों के सम्बन्‍ध में इन बिन्‍दुओं पर भी विचार किया जा सकता है –

 

·      शराबखोरी को दुराचार माना जाए या नहीं? नशे में धुत्त होकर जो लेखकगण ‘लीलाएँ’ करते हैं, उन्हें स्वीकारा जाए या नहीं?

·      मेडिकली भी जिन वस्तुओं का सेवन जानलेवा माना जाता है, यथा- तम्बाकू, उनका सेवन करने वालों का बहिष्कार किया जाए या नहीं ?

·      सहमति और बिना सहमति, तथा इरादतन और गैरइरादतन कब माना जाएगा और कब नहीं ?

·      कवि-लेखक-आलोचक होने के बावजूद जो जाति आदि खेमेबाजियों में लिप्त रहते हैं और जानते-बूझते प्रतिभाओं की अनदेखी करते हैं, उन्हें किस श्रेणी में रखा जाए ?

·      प्रतिष्ठित लेखकगण लेखिकाओं के विषय में पीठ पीछे और कभी-कभी तो भरी महफिल में भी,जो अशोभनीय टिप्पणियाँ कर जाते हैं, उनका क्या हो ?

·      विज्ञापन के लोभ में पत्रिका में पृष्ठ उपलब्ध कराने वाले सम्पादक और लाभार्थी लेखकों की मान्यता रद्द की जाए या नहीं ? इसमें मुँह देखकर समीक्षा/प्रशंसा करने वालों को भी रखा जाए या नहीं ?

·      पैसे का लेन-देन कर किताबें छ्पवाने वाले प्रकाशकों-लेखकों को क्या हर तरह के पुरस्कार की पात्रता से बाहर कर दिया जाए ? और वैसे लेखक जो पद, पैसे और पहुँच का उपयोग कर किताबें बाँट-बाँट कर समीक्षाएँ लिखवाते हैं और कार्यक्रम करवाते हैं, उनका क्या किया जाए?

·      साहित्य के कर्ता-धर्ता जो अपने रसूख के बल पर अपने नाकाबिल नाते-रिश्तेदारों-यारों को विभिन्न पदों पर स्थापित करते हैं, उनको ब्लैक लिस्ट किया जाए या नहीं?

 

कोई भी सत्य परम् सत्य नहीं होता । कोई भी बात निरपेक्ष नहीं होती । क्रिया-प्रतिक्रिया स्वत:स्फूर्त है या देखादेखी अथवा किसी के उकसाने का नतीजा, यह भी तय कर पाना आसान नहीं । स्वान्‍त:सुखाय जैसी बात भी शायद निरर्थक हो गई है । हो सकता है पीड़क पीड़ित निकले , और जिसे हम पीड़ित समझ रहे हों , वह कोई शातिर पीड़क । किसी कलाकार- साहित्यकार या किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी सजा उसके प्रति दिखाई गई उदासीनता है । वैसे भी किसी की किसी बात पर प्रतिक्रिया देना उस बात या व्यक्ति के महत्त्व को ही दिखाता है । यदि उसने साजिश के तहत वह बात कही है , तो उस बात पर होने वाली प्रतिक्रियाओं से उसका ध्येय पूरा होता है । यदि उसे इस बात का होश ही नहीं कि वह क्या कह-कर रहा है, फिर उसका नोटिस ही क्या लेना । दोनों ही स्थितियों में इग्नोर किया जाना ही श्रेयस्कर है ।

हो सकता है आलोकधन्‍वा आपको पतित और निकृष्ट व्यक्ति लग रहे हों । आप पर कोई बाध्यता तो है नहीं, उनकी पहुँच से बाहर निकल जाइए ।  हो सकता है, उनके साथ कभी फोटो खिंचवा कर आपने उनसे अपनी नजदीकी साबित की हो । ऐसी तस्वीरें, हो सकता है, आज आपके कष्ट का कारण हों । जला डालिए उनको । उनकी किताबों को कचरे के डब्बे में फेंक दीजिए । वे समाज के लिए खतरा (!) बन चुके हैं , तो उन्हें अकेला कर दीजिए, अकेला छोड़ दीजिए । कमजोर और निष्कवच व्यक्ति प्रत्युत्तर भी नहीं देता, नहीं दे सकता ।  हर व्यक्ति को मृत्यु तक पहुँचना होता है, वे भी पहुँच जाएँगे ।

कवि ऐतिहासिक व्यक्ति हो, जरूरी नहीं । उसकी कविता ऐतिहासिक होती है, यदि उसमें दम है । सौ-दो सौ-तीन सौ साल पहले के कितने कवियों के व्यक्तिगत जीवन के विषय में हम जानते हैं, और कितना ? आज से सौ साल बाद किस कवि की कौन-सी कविता बची रहेगी, यह भी कहा नहीं जा सकता ।

निदा फ़ाज़ली का एक शेर है –

 

                        हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

                        जिसको भी देखना हो कई बार देखना

 

बुरे की आलोचना और विरोध करना धर्म है । लेकिन ‘बुरा’ और उसकी ‘बुराई’ की परिभाषा मुखापेक्षी भी हो सकती है । किसी ‘अपने आदमी’ के विषय में बात करते हुए लोग ‘लिबरल’ होने लगते हैं । यदि सामने वाला कुछ बिगाड़ सकने की स्थिति में हो, या कोई उचित-अनुचित लाभ पहुँचाने की स्थिति में हो, तो लोगों की वाणी मुलायम हो जा सकती है ।

            हम एक विचित्र समय में जी रहे हैं । रेल के डब्बों/ प्लेटफॉर्मों लिखी चेतावनी ‘ यात्री अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें’ और सिनेमा में दिखाई जाने वाली सलाह कि ‘ दर्शक अपने विवेक का इस्तेमाल करें’ की जरूरत बढ़ती ही जाती है । जाँ निसार अख़्तर की लिखी और कब्बन मिर्ज़ा की गाई हुई  ‘रज़िया सुल्तान’ फिल्म की गजल के दो शेर याद आ रहे हैं –

 

                                    आई ज़ंजीर की झनकार, ख़ुदा ख़ैर करे

दिल हुआ किसका गिरफ्तार, ख़ुदा ख़ैर करे

 

लम्हा लम्हा मेरी आँखों में खिंची जाती है

एक चमकती हुई तलवार, ख़ुदा ख़ैर करे

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

सच है मतलब की दुनिया है

 

सच है मतलब की दुनिया है


पहला पत्थर वही उठाए

अब सवाल यह किसे सताए


अपने भीतर झाँको यारो

फिर कहना क्या करें उपाय


सही गलत की परिभाषा भी

सब जानें क्यों बदली जाए


कहाँ-कहाँ पर क्या-क्या कुछ है 

जो जो चाहे वही उठाए


काॅंधों लिए जिसे फिरते थे 

वही न फूटी आँख सुहाए


दिन उनके थे, वे सबके थे

जिसे देखिए वही बुलाए


आँखों में आँखें, गलबहियाँ 

सट के फोटो सब खिंचवाए


रस जब सारा सोख चुके हैं

तब कहते हैं स्वाद न आए


लुंठित को लुंचित करते हैं

जो देखे, पर  काट  न पाए


दे  दो  चाहे   लाख   मिसालें

आखिर में कुछ काम न आए


कमल खिले पर करता है जो

हरसिंगार झड़कर कर जाए


जो जैसे हमला करता है

सिंह भेड़िया समझ में आए


सच है मतलब की दुनिया है

बिन ठोकर यह समझ न आए           ०३.११.२०२६   

                                        छन्द - १७

           


सोमवार, 2 नवंबर 2026

प्रेमेर खेला के बुझते पारे

 

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


प्रेमेर खेला के बुझते पारे

बोझोना रे मन ठोरे ठारे *


प्रेम का खेला कौन समझा रे 

समझो रे मन तुम समझो इशारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे

बोझोना रे मन ठोरे ठारे 


देखो दैव-कृपा तो हुए बिना  

सब सामने हो फिर भी दिखे ना 

हो व्याकुलता, फिर आरे-पारे 

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


चाहे चलो-रुको तुम  रुको-चलो

बस बात से तुम अपनी मत टलो 

कोई किसी को नहीं है तारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


है अन्दर-अन्दर जितना उतरे

मुँह दुनिया का है उतना सँवरे 

आँख मुॅंदी और भरे उजियारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे


मुँह से कहे ना आँख से देखे

फिरे हैं कितने अपने सरीखे

बोझोना रे मन ठोरे ठारे

प्रेमेर खेला के बुझते पारे

                              छंद -१६


* ये दोनों पंक्तियाँ 'श्री श्री रामकृष्ण कथामृत' में अलग-अलग प्रसंगों में आई हैं ।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

स्मृतिर गन्‍धो, गन्‍धेर स्मृति


 

स्मृतिर गन्‍धो, गन्‍धेर स्मृति

 

आप कहेंगे कि स्मृति की भी कोई गन्‍ध होती है ? गन्‍ध की स्मृति तो होती है न ?

कुछ साल पहले तक बाजार में एक साबुन मिला करता था – स्वस्तिक शिकाकाई । फिर वह बाजार से गायब हो गया । कोई बरस-दो बरस पहले एक साबुन खरीद कर लाया—गोदरेज शिकाकाई । रैपर हटाने के बाद वही चिर-परिचित खुशबू मिली । नाम बदल चुका था, पर साबुन वही ! साबुन का रंग भी वही लाल । आप बाहर से किसी कमरे में आएँ, तो उस कमरे की गन्‍ध आपका स्वागत करती है । गूगल पर खोजने के बाद पता चला कि २०१० में गोदरेज ने स्वस्तिक शिकाकाई बनाने वाली कम्पनी का अधिग्रहण कर लिया था । १४-१५ वर्षों के बाद भी उस साबुन की सुगन्‍ध जस-की-तस सुरक्षित थी मेरे अन्‍दर । यह एक गन्‍ध की स्मृति थी, या यह स्मृति-गन्‍ध थी जिसने सँजो रखा था सबकुछ?

मनुष्य स्मृतियों का कोषागार ही तो है । हमारी पाँच इन्‍द्रियाँ स्मृतियों के पाँच द्वार हैं । दृश्य, आस्वाद, श्रवण, घ्राण और स्पर्श । मनुष्य-देह भी है क्या –“ छिति जल पावक गगन समीरा ।” वेदान्‍त कहता है पंचकोश । यानी गुड़िया के भीतर गुड़िया – अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश , विज्ञानमय कोश और अन्‍तत: आनन्‍दमय कोश ।  मनुष्य औरों की स्मृतियों में बस जाना चाहता है –“ मर के भी किसी को याद आएँगे” । अमर हो जाना आदमी की दिली ख्वाहिश है ।

बाकी चारों इन्‍द्रियों की स्मृतियाँ मुख्यत: वस्तुविशेष की स्मृतियाँ हैं । गन्‍ध, वस्तुविशेष से सम्बद्ध होते हुए भी भावविशेष की स्मृति बनाता है । हालाँकि हर स्मृति भावविशेष की आगोश में ही ले कर जाती है । रात की रानी, बेली के फूल, बोरोलिन, पॉण्ड्‍स, बोरोप्लस, इत्र में भींगा फाहा, यहाँ तक कि पसीने में भीगी शर्ट – ये सब किसी खास जगह या वस्तु से ज्यादा उस मन:स्थिति में हमें लेकर जाती हैं, जो वर्षों की दूरी के बावजूद तरोताजा महसूस कराती हैं । घर के पास के चौक पर स्थित मंदिर के सामने से गुजरते हुए अक्सर एक बड़ी मीठी गन्‍ध मिलती है । यह गन्‍ध बीते हुए दिनों में ले जाती है । कब की और कहाँ की, यह याद नहीं आता । वह गन्‍ध भी पहचान में नहीं आई । बाद में एक दिन चन्‍दन के एक टुकड़े से जाना कि इतनी मीठी गन्‍ध चन्‍दन की ही है ! जो गुजर चुका है, स्मृतियाँ उसी की तो बनती हैं । गुजर चुकना पूर्णता का द्योतक है । भले ही काम पूरा न हुआ हो, तो भी, उस स्थिति से निकल आना भी पूर्ण होने और अपने बचे होने का अहसास है ।

बच्चा अपनी माँ को गन्‍ध से पहचानता है । जब आँखें ठीक-ठीक देख भी न पाती हों, जब स्पर्श सम्भव न हो तब भी बच्चा माँ की ओर मुड़ जाता है । बरसों पहले पी गई लस्सी की याद आते ही उसमें डाले गए ‘एसेंस’ की गन्‍ध महसूस होने लगती है । किसी मॉल की बात उठते ही वहाँ की तैरती हुई खुशबू आसपास फैलती-सी लगने लगती है । गर्म कपड़ों के साथ फेनाइल की गोली की गन्‍ध, अस्पताल के साथ फेनाइल के पोछे की गन्‍ध तो कभी किसी व्यक्ति की याद आते ही उसके कुर्ते पर लगे इत्र की सुगन्‍ध । मन यहाँ से वहाँ !

मनुष्य के स्मृति-कोषागार में जाने कितनी ही चीजें रखी हुई हैं, कितनी ही बातें दर्ज हैं । हर स्मृति अपने साथ एक अनुभूति लेकर आती है । कुछ स्मृतियों की एक गन्‍ध होती है । यह गन्‍ध आपको महफ़ूज़ ‘फील’ कराती है । किसी केक की खुशबू, किसी कॉफी की भाप की गन्‍ध, किसी के पास से गुजर जाने की भीनी-भीनी उपस्थिति, हवन की समिधा की सुगन्‍ध, भूख जगाती पिघलते घी की गन्‍ध, दाल या दूध के बर्तन के ‘लग’ जाने ( जरा-सा जल जाने ) की गन्‍ध – कितनी चीजें आपके इर्दगिर्द मौजूद हो जाती हैं !  कई बार गन्‍ध अपने साथ स्वाद भी लेकर आ जाती है । गन्‍ध स्मृतियों का वाहक है और गन्‍ध स्मृतियों का जातक भी है । गन्‍ध से स्मृति-रेख खिंचती चलती हैं । फिर कुछ समय बाद जब हम सन्‍दर्भ-विशेष या गन्‍ध के कारकों से दूर हो जाते हैं, हमारी स्मृति उन भावों को बचा रखती है । यही स्मृतियाँ हमारा ‘बैटरी-बैकअप’ होती हैं । गन्‍ध से स्मृति, स्मृति से गन्‍ध । गन्‍ध की स्मृति, स्मृति की गन्‍ध ।  एक ‘वर्चुअस साइकिल’। मुझे तो लगता है कि सबसे ज्यादा व्यापने वाली स्मृति गन्‍ध ही है –  अन्नमय कोश से लेकर आनन्‍दमय कोश तक, हर जगह ।  स्मृतियाँ प्रेम की पोषक हैं । प्रेम जीवन का पोषक ।

“साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी” ! यह समय, यह युग हमें एकाकी बना रहा है, हम इस समय को । मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है, तुम्हारे पास मेरे लिए । हाल तो यह हो गया है कि हमारे पास खुद के लिए भी समय नहीं है । मालती के फूलों की भीनी सुगन्‍ध हम पकड़ नहीं पाते, ‘रात की रानी’ पीछे छोड़ आते हैं, बारिश में धुलते हुए पत्तों तक पहुँच नहीं पाते, सौंफ के शर्बत की याद भी नहीं आती, इलायची डालकर चाय नहीं खौलाते – इन स्मृति-गन्‍धों में घड़ी भर डूबना भी सम्भव नहीं हो पा रहा । बस, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ ...!

हम किसी चीज के लिए व्याकुल नहीं होते । नहीं, हम सही चीज के लिए व्याकुल नहीं होते । ‘श्री श्री रामकृष्ण कथामृत’ में लिखा है “ व्याकुलता के बाद ही ईश्वर दर्शन” । “ मन की तो बात है । मन से ही बद्ध, मन से ही मुक्त ।”  मन स्मृति-भण्डार है । स्मृति मन का उपचार, प्रेम आधार ।

कोई जरूरी नहीं कि किताबों में लिखे अनुसार ही बात हो तभी बात बने । कोयले के चूल्हे से उठता धुआँ हो सकता है आज स्वीकार्य न भी हो, लेकिन उसमें समाई हुई स्मृतियों से जिस आत्मीयता और सुकून का संचार होता है, उसको क्या कहेंगे ? प्रेम में थोड़ा भरोसा, थोड़ी श्रद्धा तो रखनी पड़ती है ।

गरमी की रातों में, चाँदनी रातों में, बेली के फूलों की खुशबू की बात है— क्या हुआ जो शरद-रात है !

 

“प्रेमेर खेला के बुझते पारे ?”

[ प्रेम का खेल कौन समझ सकता है ?]  

 

 


मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

एक सच


चित्र यूट्यूब से साभार 


 एक सच

अर्थात् आज फिर जीने की तमन्ना है


सात साल चार दिन पहले की बात है

फ़िरोज़ी रंग का  हो गया था असमान 

रंग आँचल का लेकर उधार

रास्ता वही था, मगर

सपने हौसले आस भरोस 

टँक गए आसमान में

तारे फ़िरोज़ी

वहीदा रहमान की आँखें 

झूठ नहीं बोलतीं -

"फूल ही फूल

ज़िन्दगी बहार है

तय कर लिया"

न हो यक़ीं 

ख़ुद देख-सुन लें आप

वहीदा रहमान की आँखें

कभी झूठ नहीं बोलतीं -

"कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना"

"सच हुए सपने तेरे झूम ले ओ मन मेरे"

"भँवरा बड़ा नादान है"

"नदी नारे न जाओ शाम"

करना पड़ता है एहतेराम !


जीवन में 

सच भरे क्षण

चाहता है मन 

राज़ बार-बार खोलतीं

कभी झूठ नहीं बोलतीं

वहीदा रहमान की आँखें !


रास्ता कोई भी हो 

तुम चलो तो सही ।

                               २७१०२०२६

***







शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती - ३

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती - ३


आदरणीय सम्पादक जी,

प्रणाम स्वीकारें ।


कहनाम यह है कि बहुत हिम्मत जुटा कर आपको लिखने का जतन कर पा रहे हैं। एक ऐसा लेखक जो डेढ़ सौ शब्द की एक टिप्पणी भी ढंग से नहीं लिख पाता, यदि सम्पादक जी को पत्र लिख बैठे तो क्या ही कहा जाए ! आप तो हमारा नाम भी नहीं सुने होंगे। कुछ कवि, लेखक, आलोचक, सम्पादक-सहायक सम्पादक आदि के हाथ-पैर जोड़ रहे हैं; किसी का दिल पसीज गया तो आप तक मेरा नाम भी पहुँचा देंगे वे । 

         आप पर जितना दबाव रहता है, आप जिस तनाव में रहते हैं, उसे दूसरा कोई भी व्यक्ति समझ नहीं सकता । उस पर आप हिन्दी के सम्पादक हैं । सारे के सारे सम्पादक अवैतनिक ! अब आदमी मठाधीशी भी न‌ करे तो‌ क्या करे‌ । खैर ।  हाल‌ तो यह है -- 'ठण्डा मतलब कोकाकोला' भले हो जाए, हिन्दी मतलब क्या, इसका सही अंदाजा तो लग ही नहीं पा रहा । पहला सवाल तो यह कि हिन्दी किसकी -- मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा जैसे कितने प्रश्न जाने कब से हवा में तैर रहे हैं । फिर यह सवाल कि लेखक कौन ? जिसको भी लिखना आए वह लेखक । जैसे, जो भी अपना नाम लिख सके वह साक्षर !! इतना लिखा जा रहा है कि अच्छा लेखन भूसे में सूई ढूँढ़ने जैसा होता जा रहा है। जब हमारे जैसा लेखक भी समझ लेता है कि 'उसका लेखन मेरे लेखन से बेहतर कैसे?' , फिर उसके बाद बचता ही क्या है ?  शायद इन्हीं कारणों से आपने सम्पादन की नैया भाग्य की पतवारों के भरोसे छोड़ दी है । वैसे भी समय कहाँ है आपके पास ? दुनिया भर के कितने तो काम होते हैं आपको। आपने 'रेफरल' सिस्टम को अपना लिया है । रेफरल यानी सिफारिश । किसी की सिफारिश के साथ रचना पहुँचे तो स्क्रूटनी के नियम शिथिल किए जा सकते हैं । अगर किसी की वजह से कोई तगड़ा विज्ञापन मिल रहा हो तो फिर बात ही क्या है ! विज्ञापन की आशा हो तो सम्बन्धित लेखक की पुस्तकों, साहित्य में उसके अवदान की प्रशंसात्मक समीक्षा छापने के उपाय स्वत: कर लिए जाते हैं ।

          हिन्दी आपकी अपनी ही भाषा है । आप जैसे चाहे इस्तेमाल करें । वर्तनी की टाँग तोड़ें, चाहे व्याकरण की बाँह मरोड़ें। हाँ, अँगरेजी या उर्दू के शब्द हों तो 'अतिथि देवो भव' करना पड़ता है । 

          आप या आपके लोग लेखकों को रचना की पावती की सूचना देना भी जरूरी नहीं समझते। वैसे ठीक ही है , लेखन की पहली शर्त ही है धीरज ।  फिर, आपको माल भी एकदम ताजा चाहिए। वह भी फ्री ऑफ कॉस्ट ! पहले कहीं छपी हुई चीज तो बिल्कुल ही नहीं । हाँ,  रेफरल सिस्टम से आया हुआ कुछ हो, या खुद रेफरी का ही कुछ हो, तब नियमों को शिथिल करने में कोई दोष नहीं लगता --  सब शुद्ध-सात्विक माना जाता है ।'मुफ्त की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते' कहावत को आपने झुठला दिया है । बदले में आप लेखक को वह चीज देते हैं, जो उसे अपने घर में भी शायद ही प्राप्त होती हो -- प्रतिष्ठा । आदमी जीता क्यों है, प्रतिष्ठा के लिए ! लेखक हो , तब तो एकदम पक्का । 

            आप अटल हैं ।आप अपनी धारणा के विपरीत नहीं जा सकते । लेखक को सेटल होना है, वह आपकी धारणा के विपरीत नहीं जा सकता। साहित्य की धारा धारणाओं के आधार पर बनती है । साहित्य बहती गंगा है, बशर्ते आपको धारा के साथ बहना आता हो । आप एक परम्परा का इसलिए विरोध कर सकते हैं कि आपको किसी दूसरी परम्परा की लीक पीटनी है । साहित्य क्या है --  कुछ बीज-शब्दों के इर्द-गिर्द  शब्दों का नृत्य ! आप लेखक बनाते हैं, लेखन को सींचकर उसे स्वयं पनपने नहीं देते -- अराजक बेलें सुन्दरता को ढॅंक ले सकती हैं । आपको साँचे में ढले लेखक पसन्द आते हैं । लेखक प्रिय हो, तो कुरुचि-सुरुचिपूर्ण जैसी भी हो, रचना श्लाघ्य हो जाती है । आप स्वयं अपने श्रीमुख से उसकी प्रशंसा करते थकते नहीं, अपने करकमलों से उसे शेयर करते ऊबते नहीं।

            आपने कठोरता को सत्य का पर्याय मान लिया है । जितनी ज्यादा कठोरता, उतनी ज्यादा सत्य की पक्षधरता । साहित्य, राजनीति, साहित्य की राजनीति, राजनीति का साहित्य -- मोटा-मोटी यही साहित्य है । इसके अलावा तो सब सिलेबस वाली पढ़ाई है ।  साहित्य दुःख भरा तालाब है, कष्टों का पहाड़ है, विरोध की रेल है । आपके जानते जीवन में जो भी सुन्दर है, स्वादु है, नफीस है -- सब विलासिता है, जो जीवन के लिए कतई आवश्यक नहीं । इसीलिए त्याज्य है । 

             इतना लिखते-लिखते हम समझ गए हैं कि इनमें से कोई भी बात आप पर लागू नहीं होती । ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कुण्ठित लेखक की आत्मा कलम पर सवार हो गई है। सम्पादक और लेखक के बीच तो प्रेम-सम्बन्ध होता है -- क्षणे तुष्टा, क्षणे रुष्टा ! छप गए तो प्यार, नहीं तो मार !


जो भी हो, धुआँ दिखे तो मानना चाहिए कि कहीं न कहीं आग भी लगी होगी...l 


बाकी सब कुशल-मंगल ।


शेष फिर ।


आपका अपना,

सिद्धप्रसिद्ध

उर्फ बुरलेल जी 


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मैथिली में 'बुरलेल' आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो मूर्ख, नासमझ, बुद्धिहीन, या बेवकूफ हो। कभी-कभी इसे बहुत सीधे-साधे या मंदबुद्धि व्यक्ति के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है