गब्बर
सिंह को अगर अपने नववर्ष के बारे में पूछना होता तो कुछ ऐसा ही पूछता जैसा इस
निबंध का शीर्षक है । वैसे, आप बिना गूगल किए बताइए कि भारतीय नववर्ष कब शुरू होता
है ; मैं तो कर चुका
! थोड़ा और स्पष्ट कर दूँ – आधिकारिक भारतीय नववर्ष ! गब्बर ने यदि इस साल मुझसे पूछा
होता कि होली कब है, तो मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला होता – 4
मार्च को ! आप क्या बोलते ?
भारतीय कैलेण्डर
को पञ्चाङ्ग कहते हैं । ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें पाँच बातों की जानकारी दी
जाती है – (१) तिथि, दिनांक या तारीख, (२) वार – सोमवार,
मंगलवार आदि ,(३) नक्षत्र , यह बताने के लिए कि चंद्रमा तारों के किस समूह में है, (४) योग, जो बताता है कि सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों
का योग क्या है, एवं (५) करण , जो तिथि
का आधा होता है । अब तो आम तौर पर कैलेण्डर का इस्तेमाल वार एवं आधिकारिक अवकाशों को
देखने के लिए ही होता है । दूध, धोबी और अखबार का हिसाब रखने
के लिए भी – यदि रखा जाता हो तो !
बात यह है
कि सन् 1952 में भारत सरकार की संस्था CSIR ने एक कैलेण्डर
सुधार समिति ( Calendar Reform Committee) का गठन किया था । समिति
के अध्यक्ष मेघनाद साहा थे । इनके अलावा समिति में पाँच अन्य सदस्य और एक सचिव थे ।
इस्लामिक एवं क्रिश्चन कैलेंडरों के अलावा भारत में तीस से भी अधिक कैलेण्डर प्रचलन
में थे, जो सम्भवत: अभी भी प्रचलन में हैं । इन तीस से भी अधिक
कैलेंडरों में एकरूपता नहीं थी । इसी समस्या के निदान हेतु एक भारतीय राष्ट्रीय कैलेण्डर
के निर्माण के लिए कैलेण्डर सुधार समिति क गाठन किया गया जिसका उद्देश्य इन प्रचलित
कैलेण्डरों का अध्ययन करके एक संशोधित राष्ट्रीय
कैलेण्डर का प्रस्ताव प्रस्तुत करना था । समिति ने सन् 1955 में अपनी रिपोर्ट दी ,
और सन् 1957 में राष्ट्रीय कैलेण्डर को लागू कर दिया गया । यह कैलेण्डर
सरकारी कैलेंडरों, सरकारी डायरियों और ठाकुर प्रसाद पञ्चाङ्ग
जैसे कुछ प्राइवेट व्यावसायिक कैलेंडरों में दिखाई पड़ सकता है ।
तो, सन् 1957 की 22 मार्च से हमारा राष्ट्रीय कैलेण्डर प्रचलन में आया । विडम्बना
देखिए, अभी भी मैं ग्रेगैरियन कैलेण्डर की तारीखों में ही बात
कर रहा हूँ ! भारत सरकार ने भारत में सन् 78 से प्रचलित शक संवत् पञ्चाङ्ग को आधार
बनाकर निर्मित राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग यानी कैलेण्डर
को अपनाया । इस तरह से शक संवत् 1879 की चैत्र की प्रथम तिथि से भारत का राष्ट्रीय
कैलेण्डर लागू हुआ । यह कैलेण्डर, अँग्रेजी यानी ग्रेगेरियन कैलेण्डर
के साथ भारत का आधिकारिक कैलेण्डर बना ।
राष्ट्रीय
कैलेण्डर के महीनों के नाम भारतीय पञ्चाङ्गों में प्रचलित नामों के आधार पर ही रखे
गए – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद,अश्विन,कार्तिक,
मार्गशीर्ष (अग्रहायण), पौष, माघ और फाल्गुन । यह एक सौर कैलेण्डर
है और इसमें महीनों के शुरू होने की तिथियाँ अँग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निश्चित (
फिक्स्ड) हैं । वर्ष का आरंभ वसंत विषुव यानी vernal eqinox के अगले दिन होता है , अर्थात् अँग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार 22 मार्च को । इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा
नव वर्ष अँग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार 22 मार्च को शुरू होता है, जिसकी भारतीय तिथि चैत्र १ है । एक संयोग की बात है कि बिहार दिवस भी 22 मार्च
को ही मनाया जाता है । वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण एवं भाद्रपद 31 दिन के और शेष मास 30 दिन
के । लीप ईयर में चैत्र भी 31 दिनों का होगा । लीप ईयर में भारतीय नव वर्ष 21 मार्च
को शुरू होगा और सामान्य वर्षों में 22 मार्च
को । चूँकि राष्ट्रीय कैलेण्डर सौर कैलेण्डर है, इसमें चन्द्र-कैलेण्डर
की तरह शुक्ल और कृष्ण पक्ष नहीं दर्शाए जाते । हालाँकि अलग से, त्योहारों की तिथि के लिए चन्द्र-कैलेण्डरों के अनुसार भी तिथियाँ दर्शाई
जाती हैं ।
ऋतुओं का
बदलना सूर्य की गति पर निर्भर है । राष्ट्रीय कैलेण्डर के अनुसार भी भारत में छह ऋतुएँ
ही हैं ,लेकिन ऋतुओं के शुरू होने के आम प्रचलित मासों से एक
मास अग्रिम, उनका आगमन माना गया है । राष्ट्रीय कैलेण्डर कहता
है कि फाल्गुन-चैत्र में वसंत, वैशाख-ज्येष्ठ में ग्रीष्म,
आषाढ़-श्रावण में वर्षा, भाद्र-अश्विन में शरत्,
कर्तिक-अग्रहायण में हेमंत तथा पौष-माघ में शिशिर ऋतु होती है । हालाँकि, ऋतुओं का तो यह हाल है कि सारे मौसम से एक जैसे हुए जा रहे हैं । हाँ,
कोयल का बोलना अभी कल ही सुनाई पड़ा है – विक्रम संवत् २०८३ की चैत्र
शुक्ल प्रतिपदा को । क्या वसंत अभी शुरू हो रहा है ?
ऊपर भारतीय
नववर्ष दिवस की बात की गई है । भारतीय कैलेण्डर कितने नववर्ष दिवसों की बात करता है
? India Meteorological
Department ( भारत का मौसम विभाग) प्रति वर्ष
The Indian Astronomical Ephemeris ( भारतीय खगोलीय पञ्चाङ्ग) प्रकाशित करता है । 2026 के लिए
प्रकाशित पञ्चाङ्ग में सात नववर्ष दिवसों ( New Yead Days) को दर्शाया गया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं – सिंधी नववर्ष, तेलगु नववर्ष,
भारतीय नववर्ष, तमिल नववर्ष, पारसी नववर्ष, ज्यूइश नववर्ष और क्रिश्चन नववर्ष । इसके साथ भारतीय कैलेण्डर/ संवत् ( Era) के अलवा तेईस अन्य कैलेंडरों/ संवतों की सूची भी दी गई है । तीन कैलेण्डरों
– भारतीय, कलि एवं ग्रेगेरियन -- का महीने की तिथियों के उल्लेख
में उपयोग किया गया है । Kali Era यानी कलियुग । गणना के अनुसार, कलियुग की शुरुआत 3102
वर्ष ईसा पूर्व में,
17-18 फरवरी को हुई थी । इस पंञ्चाङ्ग में भारत के कुछ नववर्षों और कैलेण्डरों के उल्लेख
छूट भी रहे हैं । दो - एक तो मुझे भी याद आए हैं।
मुन्ना भाई
एमबीबीएस फिल्म का डायलॉग याद आ गया है, शायद आपको भी याद
आ रहा होगा – “ये बॉडी के अंदर इतना सामान फिट किएला रहता है, याद भी नहीं रहता । तेरे को मालूम है, 206 टाइप का सिर्फ
हड्डी है” !
बताइए, कितने तरह के कैलेण्डर, कितने नववर्ष ! हम हैं कि फूले-फूले
फिरते रहते हैं कि “हम हैं तो खुदा भी है...!” ऊपर से मजा ये कि सूर्य का विषुव बिंदु (equinoctial point ) हर वर्ष 50” पश्चिम की ओर खिसक जाता
है ।। बच्चन जी की पंक्तियाँ याद आती हैं –
मैं जहाँ खड़ा था कल, उस थल पर आज नहीं
कल इसी जगह पर पाना मुझको
मुश्किल है
भारत में
पञ्चाङ्गों का महत्त्व एक और कारण से भी है । मुहूर्त्त, शुभाशुभ का फालाफल आदि ज्ञात करने के लिए । भारतीय ज्योतिष के तीन अंग हैं
– तन्त्र या गणित स्कन्ध, संहिता स्कन्ध और होरा स्कन्ध ।
होरा स्कन्ध मनुष्य की भाग्य-गणना से संबंधित है । गणित स्कन्ध के अंतर्गत अंकगणित,
बीजगणित आदि विद्याएँ आती हैं , तो संहिता स्कन्ध
के अंतर्गत प्राकृतिक घटनाओं के कारणों को जानने का प्रयास । सर्वविदित है कि होरा
स्कन्ध को ही ज्यादा लोकप्रियता प्राप्त है ।
मुझे अक्सर
लगता है कि भले ही ज्ञान की कोई सीमा हो, अज्ञान की कोई सीमा
नहीं होती । जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है अपनी कूपमंडूकता उजागर होती जाती है । अब तो कूप
भी नहीं, बात कठौत तक आ पहुँची है – कठौतमंडूकता !
हम लगे रहते
हैं ‘हैप्पी न्यू ईयर’, ‘हैप्पी होली’
, ‘हैप्पी ईद’ ‘हैप्पी ये’, ‘हैप्पी वो’ में
! हमने तो छठ जैसे सात्विक, सादगीपूर्ण एवं आडम्बररहित पर्व को भी ‘हैप्पी छठ’ के रास्ते पर ठेल दिया है । ‘छठ’ वही पर्व,जो अक्टूबर-नवंबर में आता है ! राइट !
(२)
भारतीय कैलेण्डर
के बारे में सोचते हुए यह खयाल भी मन में आ गया कि क्या हम भारतीय चीजों पर गर्व करते
हैं ? गर्व कर सकते हैं ? क्या हमें
अपने भारतीय होने पर गर्व है ? क्या हम भारतीय राष्ट्रीय प्रतीकों/ चिह्नों , स्मारकों
आदि के प्रति उचित सम्मान-भाव रखते हैं ? हम शायद दुनिया के साथ कदमताल करने में मशगूल हो
गए हैं । दुनिया की बेहतर चीजों को जरूर सम्मान दें, लेकिन हम
अपनी चीजों को नजरअंदाज भी तो न करें ! भारतीय
कैलेण्डर को ही लीजिए । हम कितने-कितने न्यू ईयर, नव वर्ष,
दिवसों को उत्साह के साथ मनाते रहते हैं । बाजे-गाजे, शोर-शराबे के साथ मनाते हैं। लेकिन भारतीय नववर्ष की याद किसी को नहीं आती
। सरकार तक को नहीं ! सरकार तो भारतीय कैलेण्डर और उसके अनुसार डायरी छ्पवाती है ।
सरकार को भी याद नहीं ! यह जीवित विस्मृति है !
कैलेण्डर
के साथ भी ‘राजभाषा’ वाला हादसा हो गया है
शायद । जो बात थोपी हुई लग जाए, उसको कौन अपनाए ? ऐसा क्यों है कि विक्रम संवत् या और भी अन्य भारतीय संवत्, जिन्हें कोई भी सरकारी सहयोग या किसी प्रकार का राज्याश्रय प्राप्त नहीं है,
भारत के लोक में व्यापे हुए हैं । ऐसा क्यों है कि ‘हिन्दी’ स्कूलों और कॉलेजों में तो फेल हो जाती है,
लेकिन सड़कों पर ठेलों-खोमचों पर चल पड़ती है । प्रेम और प्रोत्साहन की
जगह आदेश और शासन नहीं चल सकते। हमारे साथ दिक्कत है न ! – हम देना नहीं जानते,
सुनना नहीं जानते , मानना नहीं जानते । लेना जानते
हैं, सुनाना जानते हैं, मनवाना जानते हैं
।
‘त्रि-भाषा’
फार्मूले की तर्ज पर यह ‘त्रि-पञ्चाङ्ग’
फार्मूला ही तो है । और इन दोनों फार्मूलों में एक ही बात है,
जबरन लाद दिए जाने के प्रयास निष्फल हो गए हैं । समय आकाशवाणियों/ राजाज्ञाओं
का नहीं, संवाद का है, बल-प्रयोग का नहीं, सहयोग का है ।
यह समय विस्मृतियों
का तो है ही । हमको किसी का फोन नम्बर याद नहीं रहता, किसी का जन्मदिन याद नहीं रहता ,
अपने पारम्परिक कैलेण्डर के हिसाब से तिथियाँ याद नहीं रहतीं,
अपनी भाषा हम भूलते जा रहे हैं, राष्ट्रीय कैलेण्डर
तो, खैर, किसी की याद में ही नहीं आया
(तो भूलने का कहाँ सवाल !) – ये सारे लक्षण असामाजिक
और व्यक्ति-(आत्म)-केंद्रित होते जाने के तो हैं ही, शायद कृतघ्न
हो जाने के भी हैं ।
कैलेण्डर
विज्ञान और परम्पराओं, दोनों पर आधारित होते हैं । भारतीय राष्ट्रीय कैलेण्डर
के निर्माण में विज्ञान के साथ परम्परओं को भी उचित स्थान दिया गया है । कोई भी कैलेण्डर
अपने-आप में सम्पूर्ण या परफेक्ट नहीं हो सकता । विश्व भर में अपनाए गए अँग्रेजी (
ग्रेगेरियन) कैलेण्डर में भी कमियाँ हैं । पारम्परिक भारतीय कैलेण्डरों की गणनाएँ भी
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हिली हुई नजर आ सकती हैं । फिर यह भी तो है कि समय तो
स्वयं ही सापेक्ष है । कहीं पढ़ा था कि “ According to Relativity, every moving particle has its
own time.” अब बताइए, क्या करेगा कैलेण्डर और क्या करेगा मुहूर्त्त !
‘3 इडियट्स’
के रणछोड़दास चाँचड़ की सीख याद आ रही है – “ आल इज वेल” । ... इससे प्रॉब्लम
सॉल्व नहीं होगी, लेकिन उसको झेलने की हिम्मत आ जाती है” ।
मन ! मन को
ही मनाइए ।
काम करने
से ही काम होता है । पहला कदम उठाने से ही मंजिल तक पहुँचा जा सकता है । परिपाटी बनाने
के लिए भी पहली बार तो करना ही होता है—
भारतीय नववर्ष
शक १९४८ की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएँ !