शनिवार, 6 जून 2026

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती – २

 

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती – २

 

आदरणीय बड़े लेखक जी,

प्रणाम स्वीकारें !

 

कहनाम यह है कि हमलोग आपका बहुत नाम सुने हैं । कितना तो किताब आप लिख दिए हैं । अखबार में भी खबर पढ़ते रहते है कि आप आज यहाँ भाषण दिए, तो आज वहाँ परचा पढ़े । कभी-कभी फोटो-उटो के साथ भी रहता है । अब हमको साहित्य को जाँचने वाली कुञ्जी प्राप्त नहीं है, इसलिए हम सुनिए-सुन के जान पाते हैं कि कौन लेखक कितना बड़ा है । अब ये बात भी है कि “ जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है” ! तो कुछ ऐसी-वैसी बात भी कान में पड़ जाती है कभी-कभी । आप तो जानते ही हैं सच्ची प्रतिभा से सबको जलन होती है ।

         आप आजकल एक अच्छा काम कर रहे हैं । अपनी किताबों के बारे में फेसबुक पर खुद ही चर्चा कर दे रहे हैं । कम-से-कम मिलावट का खतरा तो नहीं रहेगा न । फिर वही जलन वाली बात भी, दूसरे लोग यदि चर्चा करेंगे तो उनका राग-द्वेष भी उसमें घुस ही जाएगा ।

आपको एक दिन एक फंक्शन में देखे । चेहरा से तो नहीं जानते थे आपको, लेकिन आपका भाव और आपकी भाव-भंगिमा देखकर कोई भी समझ जाता कि आप बड़े लेखक जी ही हैं । आपकी ग्रीवा तनी हुई थी, उन्नत भाल और आँखें गर्व-दीप्‍त । कुछ सच्चे और कुछ टुच्चे लेखक आपको घेर कर बैठे हुए थे । आपके चेहरे पर अधखिली कली-सी मुस्कान थी । इस मुस्कान के कम-से-कम दो अर्थ निकाले जा सकते थे – “हम हैं तो खुदा भी है” वाला और “ दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँवाला ।

हमको बड़ा अफ्सोस हुआ । नहीं, गलत मत समझिए । एक लेखक का समय लेखक-समयहोता है । उसका इस तरह से बे-भाव का खर्च हो जाना हमको ठीक नहीं लग रहा था । कितनी अनमोल अनूठी पंक्तियाँ दिमाग के गलियारे से बिना थमे पार कर गई होंगी । आपके पास तो और बहुत-सी पंक्तियाँ आ जाएँगी, नुकसान तो जनता का हो गया । और यदि आपको बुला ही लिए थे लोग, तो आपसे किसी का सम्मान ही करवा लेते । आपको कोई सम्मान ही दे देते । खैर !

आपके पास हर लेखक की करतूतों का कच्चा चिट्ठा है । कोई आपसे ज्यादा उड़ नहीं सकता है । आप तो यदि सिर्फ चुगलियों को जमा कर दें, तो एक बेस्ट सेलर किताब बन जाए ! आप सब जानते-समझते हैं , लेकिन फिर भी आप सबके कार्यक्रमों में चले जाते हैं । तारीफ कर आते हैं । लेखक भी अंतत: एक सामाजिक प्राणी ही तो है । समाज में थोड़ा दायाँ-बायाँ , ऊँचा-नीचा तो चल जाता है ।

उस दिन एक आदमी थोड़ा कम प्रतिबद्धता वाला निकल गया । कैसा झाड़ लगाए आप उसको ! बताइए, उसको पता तक नहीं ! लेखकिया विचारों के लिहाज से एक भारत श्रेष्ठ भारततो अलगे चीज है ! और फिर लेखन में लोकतंत्र का हिमायती होना और लेखक का आचारण में भी वैसा होना अनिवार्य अनिवार्यता तो है नहीं । विचार मतलब एक विचार। मंच मतलब एक मंच । ठेकुआ छाप कविता और कवि का जमाना है । वही, एक ठो साँचा बना लीजिए, फिर एक के बाद एक कविता पटकते जाइए । वही जानल-बूझल शकल और स्वाद वाला ! वही एक भारत, श्रेष्ठभारत ! सहस्र मुखों से एक ही बात, एक ही तरह की बात...!

बडे लेखक जी, आप सबको कहते हैं कि आप भेद-भाव से ऊपर उठ चुके हैं । ऊपर नहीं भी उठे हैं, तो साइड तो हो ही गए हैं । लेकिन हमको लगता है कि भेद-भाव की एक सरस्वतीबह रही है आपके अंदर । प्रत्यक्षत: दिखती नहीं है, लेकिन है जरूर । कभी-कभी तो आपको भी नहीं दिखती होगी, लेकिन हाथ इतना सेट हो गया है कि आपरूपी गाड़ी उधर मुड़ ही जाती होगी ।

यह आप अच्छा करते हैं कि आपकी महती रचनाओं से परिपूरित पुस्तकें, आप अपने हाथों से किसी ऐरे-गैरे को देने की गलती नहीं करते । आप पदानुक्रम का खूब खयाल रखते हैं । जैसे उस रोज, आपके पास उस वेटर को देने के लिए आपकी किताब की प्रति नहीं थी । वही वेटर, जो बड़े उत्साह से आपको और आपके गेस्ट को सर्व कर रहा था । वही, जो आपकी किताब का सही-सही नाम नोट कर रहा था । उसके पास उस मंच से आपकी तारीफों के पुल बाँधने की सलाहियत भी तो नहीं थी । और अगर होती भी तो – कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली ! बड़ा अच्छा किया आपने, जो उसे किताब नहीं दी । काम करने वाले लोग काम ही किया करें ।

सेटिंग-गेटिंग-बेटिंग, नेटवर्किंग, जुगाड़, जोड़-तोड़, तिकड़म, पहुँच, पैरवी – इन सबका एक लेखक के लिए भी कितना महत्त्व होता है, यह आप जानते हैं । हर लेखक के लिए नीचे रह जाने के, पीछे छूट जाने के कारण अलग-अलग हो सकते हैं । लेकिन ऊपर पहुँचने का रास्ता, सबका लगभग एक जैसा ही होता है ।

लेखक जी, आपकी रचनाओं में अश्‍लील और अवांछित बातें भी आकर शृंगार और अर्थ-गाम्भीर्य से भर जाती हैं । उनमें प्रतिरोध, प्रतिबद्धता ,दार्शनिकता और अध्यात्म तक की छौंक लग जाती है । ऐसा सुधी आलोचक-समीक्षक जन कह देते हैं । पाठक, वह भी साधारण, तो सुधी नहीं ही होता है । उसकी बात को मत सुना जाए । लेकिन,एक बात है कि प्लास्टर के मजबूत होने के लिए सीमेंट और बालू का अनुपात सही होना चाहिए । नहीं तो, समय हिसाब कर देता है । कुछ लोग कहते हैं कि लेखन का हिसाब भी समय अपने-आप करता है । हो सकता है । लेकिन आजकल लोग का भी हिसाब बहुत तेज हो गया है । हमारी विनती रहेगी कि आप एक अच्छा कैलकुलेटर अपने कब्जा में रखें । वक्त-जरूरत काम ही आ जाए !

बाकी सब कुशल - मंगल । 

शेष फिर ।

आपका अपना,

सिद्धप्रसिद्ध 

उर्फ बुरलेल जी


शुक्रवार, 5 जून 2026

बालमुकुन फिर सोच में है !

 

 

बालमुकुन फिर सोच में है !

 

बालमुकुन साहित्य की बाउण्ड्री के बहुत बाहर है । लेकिन कभी-कभार टाइम-पास करने के लिए पत्रिकाओं को उलत-पुलट लेता है । ऐसे में ही एक बार एक पत्रिका में उसने देखा  कि समकालीन साहित्य में गाँव की अनुपस्थितिपर गहन विचार-विमर्श हुआ है और भारी चिन्‍ता प्रकट की गई है । गाँवों के देशभारत के साहित्य से गाँव की बेदखली । उसकी उत्सुकता जगी । पूरी परिचर्चा पढ़ गया । और पढ़ने के बाद बालमुकुन फिर सोच में है ! अब क्या कहूँ दोस्तो, उसका तो स्वभाव ही कुछ ऐसा है ।

बालमुकुन ठहरा साहित्य के बाहर का आदमी । वह समझ नहीं पाया कि साहित्य में शहर और गाँव की विभाजन रेखा क्यों जरूरी है ? उसने पढ़ा " गाँव के लोगों के पास भी अब विष है "। उसने सोचा— कब नहीं था ? क्या शहरों में सिर्फ ' विषधर ' रहते हैं संवेदना और सरोकार की बात हर जगह होती है, कहने का तरीका अलग हो सकता है । फिर उसको अज्ञेय की साँपकविता का ध्यान हो आया; हो न हो गाँव के लोगों के पास अब भी विष है’ – यह बात इसी कविता को संदर्भ में रखकर लिखी गई है । विक्की बाबूको मुंशी जीने कहा था कि बात में वजन लाओ । यही बात याद आ गई होगी शायद । बालमुकुन ने मन-ही-मन वह दुहराया जो बचपन से दुहराता आ रहा है,कभी रात में साँप का खयाल भी आ जाए तो – साँप, सुइया, डोरा !  

बालमुकुन सोच रहा है कि गाँव से शहर की ओर जाना कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं । आजादी के बाद से ही औद्योगिकीकरण के कारण जनसंख्या शहरों की ओर गई है । भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण नहीं भी होते, तो भी शहरीकरण बढ़ता ही । आदमी गाँव से शहर जा रहा है, सो साहित्य भी । ऐसा क्यों है कि गाँवों से ( खासकर आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों, यथा- बिहार) निकलने को पलायनकहते हैं ।  कृषि - कर्म या गाँव से निकलना भागना ( पलायन) क्यों कहा जाए ? व्यक्ति, समाज या देश के ये अलग - अलग स्टेज ( चरण ) हैं । भारत की आबादी का जितना बड़ा हिस्सा कृषि और संबंधित कार्यों पर आधारित है, उसके अनुसार उत्पादन नहीं है । ऐसा उत्पादन संभव भी नहीं है । ' छिपी हुई बेरोजगारिता ' से बेहतर है कि विकल्पों की तलाश की जाए, नए - नए विकल्प बनाए जाएँ । बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश गए तो वह सम्मानजनक इमिग्रेशनहो जाता है । किसान और किसानी बहुत समय से हाशिए पर हैं, यह कोई नई बात नहीं है । ' उत्तम खेती,मद्धम बान ' बहुत पुरानी बात हो चुकी । समस्या यह है कि किसानों के हाशिए पर रह जाने की बातें होती हैं, उसके वहाँ निकल सकने की सूरत नहीं निकाली जाती । उनके लिए किसानी के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार नहीं किया जाता । रोजगार के अन्य कारगर विकल्पों की बात नहीं सोची जाती ।  हाँ, बात से बात बनाने के लिए परिचर्चाएँ  अत्यंत उपयोगी शगल हैं ।

पाठकों की कमी पर चर्चा पढ़ते-पढ़ते बालमुकुन मन-ही-मन बातों को काटने भी लगा था – पुस्तकों को सिर्फ मनोरंजन के साधन के रूप में देखना कहाँ तक ठीक है ? पाठक नहीं मिल रहे हैं तो लेखन - प्रकाशन की गुणवत्ता और उसके प्रचार - प्रसार पर भी विचार किया जाना चाहिए । जब टीवी , मोबाइल नहीं थे तो सिनेमा भी एक विकल्प था ही, भले ही इतने व्यापक स्तर पर नहीं । अभी पाठकीयता का सही अंदाजा लगाने के लिए, ई बुक्स, ऑडियो बुक्स और साहित्यिक सामग्री उपलब्ध कराने वाली तमाम वेबसाइट्स के उपयोग का आकलन भी करना चाहिए । अरे भाई, पाठक कम हो रहे हैं, वह इसलिए कि सब के सब लेखक हो गए हैं । कस्टमर कोई नहीं, सब के सब सप्लायर ! कभी किसी बड़े अथवा छोटे लेखक से उसके सिवा किसी और लेखक की बात छेड़ कर देखिएगा । निप इन द बडअँग्रेजी कहावत का अर्थ समझ में आ जाएगा, एकदम प्रैक्टिकल में ।

बालमुकुन पढ़ता जा रहा था, और सोचता जा रहा था –

आज के समय में कितने लेखक ऐसे होंगे जो गाँवों में ही रहते हैं ? गाँव के संपर्क में रहकर वहाँ का हालचाल जान लेना अलग बात है । यह कहना संगत नहीं कि गाँव-देहात के लेखन की कसौटी अभिजात और शहरी लेखक तय कर रहे हैं। अगर इशारा ' गुटबाजी ' की ओर है ,तो उसके कारण अलग हैं ।

बोली - बानी, आचरण, सामाजिक - सांस्कृतिक पहचान को बनाने - बचाने में व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है । भाषा के स्तर पर विद्यापति, सूर, तुलसी -- इनको तो हम हिन्दी साहित्य के अंतर्गत रखते हैं, लेकिन क्या मैथिली, ब्रजभाषा या अवधि में कोई आज लिखे तो उसे हिन्दी- लेखन माना जाएगा

ग्रामीण व्यक्ति क्या कम जागरुक होता है ? अगर पहले का ग्रामीण राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत कम जागरूक होता तो गाँधी जी का ' चम्पारण सत्याग्रह ' नहीं हुआ होता । भारत में ' वयस्क मताधिकार ' को नहीं अपनाया गया होता । 

प्रेमचंद या रेणु के समय क्या ' दलित विमर्श ', ' आदिवासी विमर्श ' या ' स्त्री विमर्श ' जैसी अवधारणाओं का चलन था? ऐसे में उनके लेखन को इन पैमानों पर परखना क्या सही होगा ? रही बात शोषित और पीड़ित की आवाज की, तो क्या इसमें उनका लेखन कमतर है

विचारधारा का 'मास स्केल ' पर यदि लोप हो गया है, तो क्या विभिन्न साहित्यिक संगठनों की भूमिका का भी ' क्रिटिकल रिव्यू ' नहीं किया जाना चाहिए संगठन का काम सिर्फ कैडर या सदस्यता बढ़ाने से ही पूरा होना मान लिया जाना चाहिए

साहित्य में नए पाठक जब तक नहीं जुड़ेंगे तब तक बात नहीं बनेगी । स्कूली छात्रों के बीच यदि लेखक - आलोचकगण जा सकें तो शायद बात बन जाए । लेकिन यह काम लेखन जैसा महान काम नहीं है, तो इसे ' आउटसोर्स ' कर देना ही ठीक माना जाता है ! किसी की जिम्मेदारी तय करना और खुद जिम्मेदारी उठाने में फर्क तो रहेगा ही।

बालमुकुन खुद खुद से ही तर्क-वितर्क किए जा रहा था । सोच में विचरना थमा तो उसने देखा कि उसकी चाय ठंढी हो चुकी है , उस पर पपड़ी-सी जम चुकी है । उसे लगा कि वह थोड़ा ज्यादा ही सीरियसली सोच गया । इतना तो पत्रिका का अभीष्‍ट भी नहीं रहा होगा । उसने खुद को टोका, फिर सोचा – विचार की मथनी ठीक नहीं । आगे से कविता-कहानी पर ही जोर आजमाया जाएगा ।

[ प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका वागर्थके अप्रैल, 2026 के अंक में प्रकाशित पृष्‍ठ 67 पर प्रकाशित परिचर्चा से इस निबंध का लेना-देना नहीं है । यदि कुछ ऐसा लगे तो महज संयोग माना जाए। ]


गुरुवार, 4 जून 2026

अपनी मुहब्बत में परेशान तो न कर

 

अपनी मुहब्बत में परेशान तो न कर

         [* फ़ैज़ साहब से क्षमाप्रार्थना के साथ ]

 

और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा*

अपनी मुहब्बत में परेशान तो न कर

 

हम देखेंगे

तुम भी देखो

कि तुम ही नहीं हो, हम भी हैं

कि हम ही नहीं हैं, तुम भी हो

 

कैसी कितनी है लाचारी

तारी है क्यों ये बेकारी

कि ज़िम्मेदार तो सब ही हैं

कि हम भी हैं और तुम भी हो

 

ज़ुल्मो-सितम के बदले में

ज़ुल्म ही हो ये ठीक नहीं

ज़िम्मा अपना अपना ले लें

कुछ हम बदलें, कुछ तुम बदलो

 

चलना तो आगे बढ़ना है

बढ़ने की कोशिश करना है

जिनके हाथों में सब कुछ है

वहीं, उस जगह पर तुम भी हो

 

रोटी से बढ़कर क्या है कहो

रोज़ी से बढ़कर क्या है कहो

इज़्ज़त से जीना चाहे जो

बस हमीं नहीं हैं तुम भी हो

 

हर बात ज़रूरी होगी, पर

पहले क्या हो ये तय तो हो

उनकी भी मर्ज़ी सोचो ज़रा

मर्ज़ी से जिनकी तुम भी हो

 

ऐसा न करो कि कल को यहाँ

ऐसा हो कुछ भी याद न हो

नूरे-नज़र यही दो दिन को

सब थे यहाँ और तुम भी हो

 

मुद्दे से सब हैं भटक रहे

कि मुद्दा कोई था ही नहीं

रोटियाँ सेंकने वालों में

'गर वो भी हैं तो तुम भी हो

 

मुट्ठी भर ही बनाते हैं, देखो

मुठ्ठी भर ही मिटाते हैं, देखो

ये मुट्ठी भर हैं कौन यहाँ

देखो, समझो, तो तुम भी हो

 

आग लगा दें जी चाहे

याकि भगा दें जी चाहे

'गर एक तरफ़ हैं लोग ग़लत

तो, एक तरफ़ तो तुम भी हो

रविवार, 31 मई 2026

हँसोतले चलीं...

 

हँसोतले चलीं...

 

काल्हे एगो कविता लिखाइल रहे “ हँसोत लीं” । लेकिन लागता बात पूरा नइखे भइल । त कुछ औरि बात कइल जाव।

आज के जुग में हँसोतला से कोनो के फुरसते नइखे । ई सहियो बा बात । जे सौंसे दुनिया पगलाइल बा, त एक आदमी के कहला अ चहला से का होई ? अकेला चना कब्बो भाँड़ फोड़ेला का !

रउआ देखीं कि इ दुनिया में कुछो नइखे धरल हँसोतला के अलावा।

कवनो औफिस में जाईं । सौ में निनानबे चांस बा कि उहे काम करावे खातिर रउआ के चढ़ावा चढ़ावल परी जेकरा खातिर उ आदमी के वेतन मिलेला । उ कही कि उ अपने खर्चा-पानी दिहला के बाद पोस्टिंग करौले बा । पूरा सिस्टम बनल बा। रउआ बीच में पिन ना मारीं ।

जाईं, इसकूल चल जाईं । एक से एक फैसनेबल इसकूल । पढ़ाई के मतलब का इ रंगबिरंगा डरेस, टाई-फाई, कम- से-कम दू तरे के जुत्ता होला ? फीस के बात त छोड़िए दीं । का होखता; बच्चा अ बच्चा के माय-बाप के सपना बेचल जाता । बिना कवनो गैरेंटी के । बात हिहवेँ नइखे रुकत । दुनिया भर के कोचिंग खोल लेले बाड़ऽ सन । बच्चा-कलास से ले के यूपीएससी के तैयारी खातिर तक ले । का हम नइखी जानत कि ई सब खेला खाली भावना के साथ खिलवाड़ ह । लोग के हँसोते के बा, खलिया हँसोते के बा ! ना त बताईं , सरकार शिक्षा पर कतना खरचा करेली ! मास्टर औरि पोरफेसर लोगिन कलसवा में मन लगा के पढ़ावत होखतें त का बच्चा लोग ना पढ़ीत ? शिक्षा व्यवस्था में जेतना गैप बन गइल बा, कोचिंग के व्यवस्था ना होखित  त पूरा व्यवस्था बैठ गइल होखित । कोचिंग के सपोर्ट सिस्टम के रोल रहे, सरकारन के उदासीन रहला से पूरा सिस्टमे बन गइल बा ।अब त अइसन माहौल बन गइल बा कि जे कोचिंग ना जाई ओकर कंफिडेन्‍स गड़बड़ा जाई । बच्चा त बच्चा गार्जियन लोग के भी ।

चल जाईं बैंक । हो सकेला कि सीधासाधी लेनदेन के बात ना होखो । लेकिन एतना तरे के चीज बेचे लागिह सन – हइ इंसोरेंस, त हउ इंसोरेंस, मुचुअल फंड, ई कार्ड त ऊ कार्ड । कतना चीज के मना कर पाइ लोग ? वइसेहु आपन काम फँसल रहेला त लोग सही-गलत डिमांड मान लेवेला । का बैंक के  हँसोतल ना ह ई ?

हमनी खुद आपन बेवहार के तनि ठीक से देखीं त अपनो हँसोतल दिखाई दी । सामान जमा करे के लत हमनी में नइखे का? बजार जानेला हमनी के पाकिट से माल झारल । बड़-बड़ स्टोर में हर चीज के बड़-बड़ पैकेट दिखाई दी । देखादेखी, बड़ आदमी दिखे के चाह में हम बिना सोचले उठा लेवेनी । ई दुतरफा हँसोतल बा । एक तरफ त हम जरुरत से ज्यादा सामान खरीदनीं, दूसर तरफ उ कम्पनी ज्यादा माल बेच ली । कहीं- कहीं इहो देखल जाला कि सामान सड़ जावे त सड़ जावे , कवनो के दिलाई ना । लोग के ई हाल हो गईल बा कि जे सब कुछ खवला पार ना लागि त कम-से-कम जुठाइए के छोड़ल जाए !  लोग के नजर एकदम से एकदम खाली अपना पर गड़ल बा ।

हम साहित्‍त के बड़ी पाक-साफ बूझत रहनी । राजनीति के मशाल, अंतरात्मा के अवाज । सब ढकोसला बा जादातर । इहवाँ हँसोतला के अलगे डिजाइन बा । जेतना नाम-धाम बा, जेतना पुरस्कार-उरस्कार बा, सब कुछे लोग के मिलल चाही । एतना ऊँचा कुरसी पर बइठ के बतियावे ला लोग कि उनका देखे ही में गरदन दुखा जाइ । जे बोलिहऽ सन सब परम सत्यहोई , एकदम नम्बर एक !  भले ही भीतर खाली होखे, बहरि हाउसफुल के ही बोर्ड लगावल जाला । हिन्‍दी में कहल जाला न अनधिकार प्रवेश निषेधऔरि प्रवेश सिर्फ आमंत्रण द्वारा। एगो जिमखाना कलब के किस्सा आजकल चलतो बा !

हम त कहेनीं जल्दी-जल्दी हँसोतल सीख लीहीं । दुनो हाथन से । मन से एकदम मान लीं कि आज के इहे रीत बा । रीत निभावल चाही । ई में बहुत लोग सुखी रही । आजकल मन के शान्ति बड़ी जरूरी बा । ई एथिक-फेथिक, साँच-झूठ, जुलुम-अपराध आदि इतादि किताब में पढ़ल ठीक बा, जिनगी में उतरला से कष्‍ट हो जाई ।

**

 [भोजपुरी मुझे कितनी आती है, कह नहीं सकता । बचपन में बिहार के कई जिलों में रहने का मौका मिला तो हर जगह की कुछ चीजें साथ रह गईं  भोजपुरी के साथ ऐसा हुआ कि इसके बिना काम नहीं चलना था । ऐसा कह सकते हैं कि भोजपुरी में ही मैं अपने रंग में आया । बेतियामें गुजरे चार साल ही जीवन का आधार बने हुए हैं । भोजपुरी उनमें से एक है । अत: भोजपुरी में अभिव्यक्ति की इच्छा स्वाभाविक है, कितनी सधी हुई है, पता नहीं । ]


शनिवार, 30 मई 2026

हँसोत लीं...

 

 हँसोत लीं...

 

हँसोत  लीं,  हँसोत  लीं

भर  जिनगी  हँसोत  लीं

 

करल-धरल,   होई  का

लरल-भिरल,  होई  का

थरिया बा भरल  रखल

भकोस लीं, भकोस लीं

 

रउआ   के    सोहें   जें

रउआ   के    मोहें   जें 

उनका   ना,  बाकी  के

बकोट लीं, बकोट  लीं

 

सब  जे  बा   रउए   के

होखी    जे    रउए   के

अँधार  सब  जहान  के

रउआ  सब  इजोत  लीं

 

आपन  लाभ- लोभ  से

डिगीं  तनिक न छोभ से

 मन  के सुनीं औरि न

मन  में  तनि कचोट लीं

 

बाँटल  बा   बात   बुरा

सवारथ    तेज   छुरा

छुरवे    के    तेजी    से

खसोट लीं,  खसोट लीं

 

हाँ, सीधा  जन  के मुँह

चाटेला     कुत्तवो    नु

सीधापन   के   जल  में

खुद के खुद न  बोथ लीं


गुरुवार, 28 मई 2026

साधो-माधो-बतकही २

बिहार में कहीं...

 

साधो-माधो-बतकही

 

साधो भाई, ई परीक्षा सब जो कैंसिल कर देता है, कितना बुरा करता है ?

अपना दिन भूल गया माधो । तीन साल के कोर्स का पाँच साल में भी पूरा होने का ठिकाना नहीं रहता था ।

लेकिन वो तो स्टेट लेवल की बात थी न , अब तो नेशनल लेवल पर खेला हो रहा है ।

स्टेट से बात बढ़ेगी तो नेशनल लेवल तक पहुँचेगी ही न । और बोल तो रहे हैं मंत्री जी और हाकिम लोग कि किसी को बकसा नहीं जाएगा । बख्शा, बख्शा !

माने कि पढ़ना-लिखना सब बेकार बात है । इससे अच्छा तो लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर होना ही है ।

हाँ । और ऊ सुने कि नहीं –  कॉपी जाँच में भी गड़बड़ी फैला दिए हैं भाई लोग ?

हाँ, विद्यार्थी होना ही पाप है भाई !

अरे भाई, समय तो कह रहा है कि कोशिश कर के नौवाँ, सतवाँ पास बने रहिए । कुछ न कुछ हो जाएगा ।

हाँ, लेकिन सबके पिताजी लोग का नाम ही तो सेम नहीं है न !! 

बुधवार, 27 मई 2026

सिद्धप्रसिद्ध उर्फ बुरलेल जी की पाती

सिद्धप्रसिद्ध उर्फ बुरलेल जी की पाती १


 आदरणीय एस पी साहब,

प्रणाम स्वीकारें ।

कहनाम यह है सर कि आपका रोल हमको बहुत अच्छा लगता है । वर्दी - उर्दी पहनकर जब आप निकलते हैं तो हमारे जैसे कितने ही लोग मुँह बाए खड़े रह जाते हैं । कभी श्रदा में, कभी आश्चर्य में और ज्यादातर एक भय में । पुलिस का भय से कोई न कोई संबंध है तो जरूर । भय को लोग इज्जत बोलकर इज्जत बचा देते हैं ! सर, वैसे भी देश के दूसरे और दुनिया के तीसरे सबसे भारी एग्जाम को पास करके आप लोग यहाँ तक पहुँचते हैं । कभी कभी तो देश के सबसे भारी और दुनिया के दूसरे सबसे भारी एग्जाम को पास कर के, चार साल में पढ़- लिख के आपलोग फिर तीसरे सबसे भारी एग्जाम को भी पास कर लेते हैं । ऐसी बात जब - जब हम पढ़ते - सुनते हैं , तब - तब हमको लगता है कि ज्ञानी लोग ठीक ही कहते हैं कि हमारे देश की सभ्यता पाँच हजार साल पुरानी है । 


सर ,आपलोग तो ऐसे ही एकदम स्मार्ट लगते हैं । उस पर से गाड़ी, बॉडीगार्ड, बंदूक,सायरन -- ये सब आपके स्मार्टनेस को और बढ़ा देते हैं । आपको शायद अंदाजा नहीं होगा कि लोग आपसे कितना मिलना चाहते हैं । चाय - नाश्ता करने के लिए नहीं सर, अपने काम के लिए, किसी जरूरत के लिए । किसी परेशानी में ही आप की याद आती है हमें । लेकिन सर आपसे मिलने की प्रक्रिया कठिन है । यह भी सही है कि आप भी कितने लोगों से मिल पाएँगे।  लेकिन सर एक बात कहनी है -- आप तो खुद ही इतने ऊँचे पद पर आसीन हैं , आपको खुद को बड़ा जताने की कितनी जरूरत है । अभी उसी दिन एक वृद्ध प्रोफेसर आपसे मिलने आए थे । आपके स्टाफ ने उनका टिपटिपिया फोन बाहर रखवा लिया । सुरक्षा के कारणों से सही ही होगा । लेकिन अंदर आपके बड़े से कमरे में, आपकी उमर के दोगुने से भी ज्यादा उमर के प्रोफेसर हाथ जोड़े खड़े निवेदन करते रहे । आप समझ नहीं पा रहे थे कैसे रिएक्ट करें ।आप वैसे ही बैठे रह गए, वे वैसे ही करबद्ध खड़े । हम आपको दोष नहीं दे रहे हैं । हो सके तो आप भी सोचिएगा कि ऐसी स्थिति के जिम्मेदार कौन हैं । प्रजा तो है ही, विधायिका और कार्यपालिका भी है । जनता हमेशा नत - विनत ही खड़ी रह जाती है । आप या और भी साहब लोग ठीक से बात भी कर लेते हैं तो हम धन्य - धन्य हो जाते हैं । चौराहे की लालबत्ती को हाकिमों की गाड़ी न काटे, या उनके लिए सिग्नल न बदला जाए तो जनता वैसे हाकिमों को बड़ेदिलवाला मान लेती है। जनता की इतनी निरीहता अच्छी है क्या ? आप तो जैसे- जैसे ऊपर बढ़ेंगे, जनता और जमीन से दूर होकर कागजों - फाइलों के नजदीक होते जाएँगे। आप लोग देश के मौर - मुकुट हैं । आपको हम बड़ी अपेक्षा के साथ देखते हैं । इन दिनों समाज के हर तबके के चाल - चरित्र में गिरावट आई है ,जिसका एक बड़ा कारण है भ्रष्टाचार। आपका महकमा भी अछूता नहीं रह गया है । हमारी हैसियत तो नहीं है कि हम कुछ सीख दे सकें । वैसे भी जब सारे लोग भ्रष्ट हो जाएँ तो फिर कोई भी भ्रष्ट नहीं माना जाता । जानते हैं ,यह हमारा निराशावादी स्वर है । लेकिन अब यही है सर !


आप बोलिएगा भी कि हम क्या बोले जा रहे हैं । बात यह है सर कि देश के एक वृद्ध प्रोफेसर को देश के सबसे योग्यतम अधिकारियों में से एक से मिलने के लिए चिरौरी करनी पड़े, इंतजार करना पड़े और जब मिलने का मौका आए तो इतना झुक के अपनी बात रखनी पड़े कि लगे रीढ़ की हड्डी ही नहीं है शरीर में , तब बड़ी निराशा- सी होने लगती है । मन डूबने लगता है।  जानते हैं कि हर तरफ यही हाल है। हम कोशिश करेंगे कि सबको चिट्ठी लिखें । बचपन से वर्दी और बाघ - छाप बैच लगाने का बड़ा शौक रहा है, इसलिए पहली पाती एक वर्दी वाले को ! 


एक फिल्म के एक गीत के ही दो वर्जन याद आ रहे । सुनिए --


हर तरफ जुर्म है बेबसी है

सहमा सहमा सा हर आदमी है


इसी गीत के दूसरे version की ये पंक्तियाँ--


हम न सोचें हमें क्या मिला है,

हम ये सोचें किया क्या है अर्पण

फूल खुशियों के बांटें सभी को, 

सबका जीवन ही बन जाए मधुवन


बाकी सब कुशल - मंगल । 


शेष फिर,


आपका अपना

सिद्धप्रसिद्ध 

उर्फ बुरलेल जी


***
मैथिली में 'बुरलेल' आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो मूर्ख, नासमझ, बुद्धिहीन, या बेवकूफ हो। कभी-कभी इसे बहुत सीधे-साधे या मंदबुद्धि व्यक्ति के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है