शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

प्रेम की बोली-बानी

 

             प्रेम की बोली-बानी 

 

हृदय की प्रकृति

 

पौ फटने

दिन चढ़ने

शाम ढलने

रात के घिरने का

कोई विज्ञापन नहीं होता

न डुगडुगी ही पीटी जाती है

 

सुबह कितनी सुंदर है

दिन कितना तेज है

शाम कितनी सुहानी है

और कितनी सम्मोहक है रात

यह

किसी के बताने से

समझ नहीं आता

 

प्रकृति प्रेम की भी यही है

और हृदय की प्रकृति है प्रेम

यह भी

खुद ही समझना होता है  

 

पुस्तक मेले में प्रेम

   

उधर

खड़े थे

एक सज्जन

वृद्ध

अपटूडेट सूटेड-बूटेड

 

इधर

एक महिला

उमर की ढलान पर

सुगढ़-सुरुचिपूर्ण परिधान में

 

बीच में

किताबों से भरा स्टॉल

 

उधर

वे थे

इधर

ये थीं

बीच में

थीं किताबें

 

संवाद

यह हुआ –

ये पीयूष मिश्रा

“गुलाल” वाले ही हैं न?

“आरम्भ है प्रचण्ड” वाले

 

उन्होंने खोल रखी थी

कोई किताब शायद,

सुनाया-

“एक बगल में चाँद होगा

एक बगल में रोटियाँ”

और

बड़े करीने से

रख दी किताब वापस

 

चश्मों के पीछे से

आँखें चार हुईं

दो होंठ

दो अलग पाटों पर

मिल कर मुस्कुराए

कदम बढ़ चले

आखिरी सिरे तक

जहाँ

मिला जा सके

अपने पाटों को छोड़

 

पुस्तक मेला

उमर की ढलान

किताबें

कविता, जो प्रेम की न हो

न हाथों में हाथ

 

संगत नहीं बैठेगी

न ढल पाएगा किसी

साँचे-खाँचे-ढाँचे में

 

प्रेम

खुद ही

संगत बिठाता है

ढल जाता है

खुद ही

 

देह-गेह से परे

किसी वय से,

लय से परे

किसी तुमसे

मैंसे परे !

 

प्रेम-घट रीतता नहीं

कितना जोड़ूँ

रुपया–पैसा

कि मन अघा जाए

 

और जब  

प्रेम में पगा जाए

तो ऐसा कि जिसमें

सारी दुनिया ही समा जाए

 

प्रेम-घट रीतता नहीं है

उलीचते रहो

सींचते रहो

जीवन के विटप को !

 

प्रमेय प्रेम का

बद्ध नहीं

मन से

मन में

बिद्ध है

प्रमेय प्रेम का

स्वयं ही

सिद्ध है

मान मौसम के

भले बदलते रहें

. .

 .   प्रेम है

 

 .

.  . बराबर है दोनों तरफ़

 

 

 

प्रेम में होना

दूर होना

दूर नहीं होना भी होता है

 

साथ होना,

नहीं साथ होना

 

लेकिन

प्रेम में होना

होता है

सिर्फ

प्रेम ही में होना 

 

जीवन के

समीकरण में

बाकी सबकुछ

चर है

सिवा

इसके...!

 

प्रेम क्या कुछ

पद

पैसा

प्रेम...

 

पद, पद की बात

सुनता-समझता है

पैसा पैसे की

प्रेम सब की

 

पद की पद से

बराबरी

पैसे की पैसे से

प्रेम

बराबरी नहीं कर पाता

 

पद कृपा करता है

पैसा भी

प्रेम

कृतज्ञ होता है

 

पद

खींचता है

पैसा भी

प्रेम

सींचता है

 

लेकिन

पद पद है

पैसा पैसा

प्रेम कुछ भी नहीं      

या फिर

प्रेम सबकुछ !! 

 

अन्यथा नहीं प्रेम  

   ( 1 )

व्यवहारिकता की

संबंधों की

जरूरतों,

मजबूरियों की

परतें हटा कर देखो

 

एकतरफा ही

की जा सकती है

दुआ

एकतरफा ही

दिया जा सकता है

आशीर्वाद

एकतरफा ही

किया जा सकता है

प्रेम

अन्यथा नहीं !

 

       ( 2 )

 

प्रेम

व्यवहारिकता की

चक्की में

पीसा जा कर

बन जाता है

मसाला

कथा-कहानियों के लिए

 

कितनी अजीब बात है

प्रेम के चक्कों पर ही

चलती है दुनिया

ऐसा कहते हैं

मगर...              

 

   (3)

कितना अदना है

आदमी

कितना...!

 

त्राण नहीं

प्रेम

और प्रार्थना के बिना

 

निभा ले जाता है प्रेम

बचा ले जाती है प्रार्थना

 

प्रेम और प्रार्थना ही

आदमी को

बना सकते हैं आदमी ! 

 

हिसाब प्रेम का

प्रेम में

जब

हिसाब होता है

दु:ख

बेहिसाब होता है

 

हर तरफ

बही-खाते

बिखर रहे

रिश्ते-नाते

लेकिन

उससे क्या होता है

जो मूरख है

बस वो रोता है !  

 

चलो प्यार करें

आओ

कि चलो प्यार करें

बाहें खोलें

गले मिलें

 

सूर्य तपे

धरती गरमाए

पत्ते झरें, निकलें

फूल खिलें

 

नीम के गाल

सहलाए हवा

हौले

पत्तियाँ हिलें

 

ताले वाले बक्सों में

पुरानी चिट्ठियाँ मिलें

 

प्रेम

अपनी राह चले

कार्ड छापती रहें मिलें

 

वसंत आया

अब गाया करेंगी

रोज़ कोयलें

 

मौसम है

धड़क जाता है दिल

आँखें मिलें

न मिलें

 

छलक ही जाता है

कुछ-न-कुछ

जाम

हिलें, न हिलें

 

अनपेक्षित

कर्त्तव्य की तरह
निभाया गया
जताया गया
एहसान की तरह
गिनाया गया
दाम की तरह

प्रेम
उसी तरह हुआ
जिस तरह
नहीं होना था कतई  !

 

प्रतीति प्रेम की

राधा की आँखों में नशा -सा
कान्हा भी नशे में जैसे
कौन किसकी परछाहीं है !!

प्रेम
प्रतीति है...

किसकी है
किसपर है
क्या मतलब
क्या जाने !!       
 
 

निर्विकल्प

सामने
उपस्थित हुए विकल्प
तुमने चुन लिया
था व्यावहारिक यही

विकल्पहीन होता है प्रेम
यह बात
मैंने कही
मन ही मन  !


वगरना क्या ?

सबकी

जानी हुई

सुनी-सुनाई

बात

फिर से

सुनना चाहें

जैसे

कि हो

पहली दफ़ा

कुछ नायाब-सा...

 

मुहब्बत ही तो है

वगरना क्या ?

 

इम्तहान

खुद से

भागते हैं

तो

पहुँच जाते हैं

तुम तक

 

अब

और मुहब्बत का

इम्तहान न लो !

बच्चे की

जान न लो !

 

 

      हद-बेहद  

एक हद तक ही

चाह सकता हूँ

कि तुम भी मुझे चाहो

 

उसके बाद

जैसा तुम चाहो

 

बाकी मैं हूँ

और मेरी मुहब्बत तो है ही !!  

 

अरुचि

रुचि ही
नहीं बची है
किसी को
किसी में

चिंता-ख़याल
मान-इज़्ज़त
प्यार-मुहब्बत
बहुत बाद की बातें हैं !

 

 दिल तो...

प्यार का झुनझुना

छोड़ता ही नहीं

दिल तो बच्चा है जी

 

चाँद

अब तक

पकाता है पूए

हैं अब तलक बैठे हुए

तसव्वुरे-जानां किए हुए

जो है ही नहीं कहीं

 

ख़यालों में

ख़यालों में

 

निकल आओ भाई

ज़िंदगी की रसमलाई

है तुम्हारे इंतज़ार में

 

नज़रे-इनायत हो जाए...!!  

 

प्रेम का मतलब

1.

 

बस,

सुन कर ही

खो जाना

किसी को

देखने भर से

मन-आँगन भर जाना

दो बात कर लेना

मन ही मन

चुन लेना

कुछ सपने बुन लेना

सपनों की खातिर फिर

दुनिया से लड़ लेना ...

 

सीधा-सा मतलब है

इन सारी बातों का

 

प्यार में होने का

मतलब होता है

अच्छा आदमी बनना, बस !

 

   2

 

क्या बताएँ

प्यार की परिभाषा

हमने तो

जो जाना-समझा है

वो है 

इतना ज़रा -सा --

 

प्यार में होने का

मतलब होता है

अच्छा आदमी बनना, बस !

 

        3

 

एक ज़रा-सी

बात कर लेना

हर लेता है

सारी उदासी

हो जाता है

आदमी, कुछ

नया-नया ही

 

कुछ नहीं बचता 

पुराना,

जस का तस

 

प्यार में होने का 

मतलब होता है

अच्छा आदमी बनना, बस !   

 

( पंकज त्रिपाठी का इंटरव्यू लल्लनटॉप पर देख कर )

 

 जीवन चलता है प्यार से

ना जीत से ना हार से

जीवन चलता है प्यार से

जीत की चर्चा क्या ही करें

हार का सदमा क्या मानें

असली किस्सा जो है सो

तुम जानो और हम जानें

आपस में क्यों ठनती रहे

कि आओ मिल के हम ठानें

कि आओ मिल के एक करें

बाँटे हुए जितने खाने

ढीले पड़े इस तंबू को

मिल के सभी कस के तानें    

 

 

प्यार तो हरगिज़ नहीं

बाँधा गया है जो

साधा गया है जो

और कुछ भी हो, वो

प्यार तो हरगिज़ नहीं

 

मापा गया है जो

छापा गया है जो

और कुछ भी हो, वो

प्यार तो हरगिज़ नहीं

 

छाना गया है जो

साना गया है जो

और कुछ भी हो, वो

प्यार तो हरगिज़ नहीं

 

तोला गया है जो

खोला गया है जो

और कुछ भी हो, वो

प्यार तो हरगिज़ नहीं      

 

     खूबरू चेहरा

 

          [१]

इतना हसीन चेहरा और मेरे इतने करीब 

या खुदा, मैं होश में तो हूँ!

 

एक खूबरू चेहरा है 

मेरे रूबरू है 

मगर अपने ही खयालों में गुम....!

 

ये धड़कनों का सुकूत, ये निगाहों का ख्वाबीदापन 

इन आँखों में कई ख्वाब जगाए जाता है-

कि अब से कुछ देर पहले 

न ये चेहरा मेरे लिए था, न मेरी आँखें इस चेहरे के लिए 

और अब 

जब कुछ देर बाद राहें फिर से जुदा होंगी 

एक याद-सी साथ होगी 

अजनबी ही सही, मगर अपनी 

निहायत अपनी !

 

        [२]

ये अंधेरी रात का सफ़र

और ये पुर-रौशन लम्हे, जिनमें

एक चेहरा है जो चाँद-सा खिला जाता है

 

और वो चेहरा है और चंद आंखें हैं,

 कि जिनके लिए

सफ़र तमाम होता है, वक़्त रुका जाता है

 

और जो आंखें हैं वो इस कदर बेगाना-ए-माहौल हैं

कि उनके लिए कुछ भी नहीं

न सफ़र, न हमसफ़र, न ये रात, न कोई बात

और यह भी तय है

कि न कोई अर्ज़े-तमन्ना है, न वादा-ए-इस्बात, फिर भी

जो चेहरा है वो खिला जाता है

और वक़्त रुका जाता है!

 

वजूद

 

ये मौसम है 

ये मैं हूँ, ये तू है 

बस और कुछ भी तो नहीं 

मौसम का तो खैर कुछ वजूद ही नहीं 

ये जो 'मैं' है, वो 'तू' के रहमो-करम पर है 

और ये जो 'तू' है-

खुदा से भी किसी ने पूछा है 

कि वो क्या है, क्यूँ है ?!

 

सब कुछ कितना असहज है

 

सबकुछ कितना सहज रूप से असहज है! 

मिलते अब भी हैं, मगर डरते-डरते 

बात अब भी होती है, पर दायरों में बँध के 

रिश्ते के नाम पर तकल्लुफ महज है 

सब कुछ कितना असहज है!

 

 

 

तुम्हारी याद

 

कभी कुछ नहीं लिखा 

तुम्हारी आँखों पर 

तुम्हारी मुस्कुराहट पर, तुम्हारे लहजे पर 

तुमको देखने, तुमसे मिलने की खुशी पर 

क्योंकि

एक डर-सा लगता है मुझको 

कि लिख देने से इन बातों को 

मन उमड़ के आ जाएगा पन्नों पर 

फिर

महीने-दो महीने, साल भर में 

बँध जाएगा रद्दी के बंडल में 

और मैं चाहता हूँ 

मुझको तरोताज़ा करती तुम रहो मेरी यादों में 

बरसों, बरसों तक....।

 

शिकायत

 

कभी तुम ज़िद करो 

लड़ लो, झगड़ लो मुझसे 

कि चाहिए मुझे ये चीजें

ये सामान 

बाँह पकड़ के खींच ले चलो बाजार 

और दुकानों पे जाकर 

पसंद करो अपने हिसाब से चीजें 

कभी मेरी जेब से 

निकाल ले जाओ कुछ पैसे बिना पूछे 

और ले आओ 

आइसक्रीम का एक डब्बा

'थम्स अप' की एक बोतल 

कभी बेधड़क मना कर दो 

कि नहीं, अब और नहीं 

कुछ खा लो, फिर मिलेगी चाय 

कभी तो भूल जाया करो 

लिहाज़ो-तकल्लुफ़ 

कभी तो लगे 

कि कुछ तुमको भी एतबार है मुझ पर 

कुछ इख्तियार है मुझ पर तुम्हारा भी 

वरना हर घड़ी

मेरे रुख को देख कर बातें करना 

मेरी परेशानी का सोच कर चुप हो जाना 

मेरी दिक्कतों का ही खयाल करते जाना 

तुम्हीं कहो ये कहाँ तक ठीक है?

 

        एहसास

 

ये डूबता लाल सूरज तो 

वहाँ भी ऐसा ही होगा 

जहाँ-जहाँ मेरे लोग रहते हैं

ये गहराती हुई शाम भी तो 

ऐसी ही होगी -- 

हल्की उदास-सी 

कुछ पंछी

ऐसे ही लौटते हुए होंगे अपने ठिकानों की तरफ 

चाँद इसी तरह 

धीमे से निकलता होगा वहाँ भी 

सप्तर्षि तारामण्डल 

उसी तरफ होगा, जिस तरफ यहाँ है 

सीसम के कुछ पेड़ ऐसे ही होंगे, मालती के फूलों की लतरें 

ऐसी ही होंगी 

'टाइम्स ऑफ इण्डिया' के 

एडिटोरियल पन्ने पर 

वही चीजें छपती होंगी, वैसे ही

वही 'थॉट फॉर टुडे', वही 'सेक्रेड स्पेस

जाने कितनी चीज़ों से जुड़ गया हूँ 

जब से छूटा हूँ अपनी जड़ों से

जब से 

एहसास बढ़ गया है 

अपनों से दूर होने का 

देखिए तो जरा !

 

उदासी

 

आधा-अधूरा चाँद

कुम्हलाया हुआ

दिखता है

किले की दीवार से सर टिकाए हुए -- 

ये कोई आईना है

जिसमें मेरा अक्स दिखता है

या ये कोई पाती है

कि जिसमें तुम्हारी खबर आती है !



आज फागुन चढ़ गया है

 

आज फागुन चढ़ गया है! 

कुछ उमंगें, कुछ उम्मीदें, कुछ तुम्हारे बिंब प्यारे 

अंतःकरण में जैसे कोई आज आकर मढ़ गया है।

 

तन तरंगित, मन तरंगित, बदला हुआ वातावरण है 

मन का मिलन है पूर्ण, अपितु उस पर विरह का आवरण है 

मूक हैं शब्द, मन मुखर है, भाव सारे संचरित हैं 

लगता है मनोभाव सारे ऋतुराज जैसे पढ़ गया है।

 

तुम्हारे लिए

 

सँभालता हूँ चीजों को 

सजाता हूँ घर को भी 

खींचता हूँ

उतरती हुई शाम की तस्वीरें 

बाँधता हूँ मंसूबे 

यहाँ-वहाँ जाने के 

बनाता हूँ फेहरिस्त 

कि क्या-क्या लेना है सामान.... 

गैरहाजिरी में तुम्हारी 

करता हूँ वो सब 

जो करना था तुम्हारे साथ 

तुम्हारे लिए ।

 

प्यार... आखिरकार

 

गुस्से को

गुज़र जाने दो

जीतेगा प्यार...

आखिरकार ।

 

जन्मदिन पर

 

तुमको हमारी उमर लग जाए

उमर का क्या,

जाने कब, कहाँ चुक जाए

चाँद-सितारे दुपट्टे पर तुम्हारे

टॅंक तो जाएँ, पर

ये ख्वाहिशें किताबी हैं

किताबों से बाहर तो आएँ

 

फूल, खुशबू तोहफे, रॅंगीनियाँ

कीमत है क्या, इनका जीवन कहाँ

 

अब क्या उपाय?

 

चलो फिर से दिल लगाएँ'1

फिर से मुस्कुराएँ

मिल के मुस्कुराएँ

जोशे-जुनूँ जगाएँ

मुहब्बत की बारिश

जम के भीग जाएँ

मिल के बाँटें खुशियाँ

जग को जगमगाएँ ।

 

1. फैज़ की नज्म की एक पक्ति।

 

समां

 

हवा बही है

पत्ते झूमे हैं

बादल आए हैं

मौसम भीगा है

खुशबू फैली है

मन उमग आया है

 

दो आँखें शरमाई हैं

इक जाँ है, बौराई है

 

यही बात कमोबेश

हर ओर है

कि चाँद है चकोर है

और

प्रकृति का नियम है यह

नाचता तो मोर है !

 

अक्षय

ऊर्जा
कभी खत्म नहीं होती
प्रेम भी
खत्म नहीं होता
कभी भी

रंग-रूप 
बदल जाया करते हैं

कभी
मेरी बातें
बदली हुई महसूस हों
तो
तुम
अन्यथा मत लेना !                      

    उल्लास

तेरे प्यार में नाचूँ

तेरे प्यार में जागूँ

कभी कूदूँ-फाँदूँ

कभी दौड़ूँ-भागूँ

 

   बशर्ते

बशर्ते तुम आओ
बशर्ते मैं रुकूँ
बशर्ते तुम कहो
बशर्ते मैं मानूँ
बशर्ते तुम रूठो
बशर्ते मैं मना लूँ
बशर्ते तुम हाथ दो
बशर्ते मैं थाम लूँ

बशर्ते यह ख्वाब हो
बशर्ते हसीन भी हो
बशर्ते हकीकत से दो-चार हो लूँ
बशर्ते तुम साथ दो

बशर्ते कुछ नहीं होता प्यार में
बशर्ते वो प्यार हो    !

 

 स्पर्श-रेखा

दर्द की एक रेखा

अब जोड़ती है तुमसे

 

बस, परिधि से गुजरती

स्पर्श-रेखा एक

हूँ मैं...!!

 

सपन-पट

दो पट खुले

दो पट जुड़े

अंकित हुए

सपने कई

खुलते गए

सजते गए

इस जिंदगी

के, पट कई

 

 उपस्थित

 

ठीक तुम्हारे पीछे

यानी कि

मैं

यानी कि

पूरी कायनात

 

 

हर्फ़ - ब - हर्फ़   !!

दम - ब - दम  !!

 

      परिभाषा

बिना बुलाये आयें राधा

कभी गोपियों ने मिल बाँधा

राधा कृष्ण, कृष्ण ही राधा

बोलो, किसने किसको साधा  ?

 

सारे अपने नियम प्रेम के

अपनी ही सारी मर्यादा

 

अपनी-अपनी भाषा सबकी

है परिभाषा सबकी अपनी  ! 

 

सरापा इश्क़

हम

सरापा इश्क़ हैं

चाहो, आज़मा लो  !

 

 

कर गुज़रेंगे

कह कर देखो

हम न थकेंगे

जितना बोलो

जितना नाच नचा लो  !! 

 

 

दास्ताँ

 

जब

थामा

हाथों को

हाथों ने

 

थाम लिया

उम्मीदों को

एक भरोसे ने

 

आँखों ने

कर दी बयाँ

अनकही एक दास्ताँ

सबसे पुरानी

 

  मेरी बात   

दुनिया के धरम

दुनिया के भरम

दुनिया जाने

 

मैं देखता जो हूँ

मैं सोचता जो हूँ

मैं जो समझता हूँ

कोई माने, न माने

 

दुनिया मेरे पीछे है

सामने हो तुम  !

 

 झूठ – सच

तुमने कहा नहीं

तुम्हें इंतज़ार था

मैंने कहा नहीं

सब ठीक है यहाँ

 

“झूठ बोलने से अच्छा है,

 कुछ न बोलना”

 

अलग बात है लेकिन, कि

चुप ने हमारी

कर दिए हैं

राज़ सब बयां  !

 

     इंतज़ार

 जो प्रेम में पड़े होते हैं, वे

"इंतज़ार के

चौबीस घंटे

चौबीस साल से भी बड़े होते हैं"

है  कि सच यही

दिन तो वही

ज़िंदगी के, सबसे

हरे-भरे होते हैं  !