शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

बा-खबर हो

 

बा-खबर हो

 

दर्द  अपना  ही   यहाँ

बस जानता है आदमी

दूसरों  का  दर्द   देखो

जान  के  डर  जाओगे

 

कल वहीं है, जो  जहाँ था

क्यों खींचना उसे आज पर

आज को बाँहों में भर लो

जो कर सको तर जाओगे

 

अपनी ज़िद में  आदमी

कुछ देख पाता ही नहीं

यूँ   करोगे   अपनी  ही

आँख से गिर जाओगे

 

तुम  तो  दरिया  हो अगर

चलते रहे तुम एक सिम्त

एक दिन जा कर, समंदर

से  गले   मिल  जाओगे

 

जो मिला है  उसको तो

पहले सँभालो तुम यहाँ

उम्र    छोटी   है   बहुत

क्या-क्या भला कर पाओगे

 

इस  कदर  खीजे रहोगे

कुछ न फिर हो जाएगा

उम्र   भर   रोते   रहोगे

एक  दिन  मर  जाओगे

 

दर्द    की   रेखा   अगर

मिटती नहीं है, फिर सुनो

दाग  माथे  का  बना लो

चाँद- सा खिल जाओगे

 

खैरियत  भी  चाहते  हो

तँग  भी  करते  हो   तुम

इस  तरह  तो  क्या  पता

किसका भला कर पाओगे   छंद-७


शनिवार, 18 जुलाई 2026

ज़िन्‍दगी जंग नहीं है भाई !

 

ज़िन्‍दगी जंग नहीं है भाई !


Times of India  से साभार 


Are we at war ?

“ज़िन्‍दगी हर कदम एक नई जंग है” – यह गीत छात्रों के लिए तो हो ही नहीं सकता । जिन्‍दगी जंग नहीं, खेल है । खेलना जरुरी है, सिर्फ हारना-जीतना नहीं । खेल की भावना होनी चाहिए । जीत और हार बहुत हद तक नजरिए की बात है । वैसे भी जीवन इतना बड़ा है कि हँसते-खेलते ही बिताया जा सकता है । रोते-धोते नहीं । कठिन-से-कठिन समय में भी खेलते यानी चलते रहने का जज्बा ही बेड़ा पार लगा सकता है ।

            ऊमस भरे दिन के बाद कल शाम बादल बरस गए थे । बादलों का बरसना थमने के कुछ देर बाद यूँही सैर के लिए निकल गया । थोड़ा घूम कर जब मुख्य सड़क तक पहुँचा, तो थोड़ी दूर से डीजे की आवाज आती सुनाई दी । थोड़ी ही देर में आवाज पास आ गई, या यों कहें कि मैं आवाज के पास पहुँच गया । यह एक कोचिंग संस्थान का विजय-जुलूसथा । आगे-आगे डीजे, पीछे रस्सी के घेरे में कोचिंग की यूनिफॉर्म में थिरकते हुए बच्चे । कुछ कोचिंग में पढ़ानेवाले शिक्षक भी रहे होंगे । साथ में भीड़-नियंत्रण के लिए दो-एक सिपाही । कल मेडिकल प्रवेश-परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ है । कोचिंग सफलता का विज्ञापन कर रहा है । दिखना और बिकना जरूरी है । जो दिखेगा नहीं, वो बिकेगा नहीं । जो बिकेगा नहीं, वो टिकेगा नहीं । कुछ महीने पहले ऐसा ही एक जुलूस किसी दूसरे कोचिंग संस्थान ने भी निकाला था। इंजीनियरिंग प्रवेश-परीक्षा के परिणामों के घोषित होने के बाद । हर चीज एक उत्पाद में बदल रही है । हम किसी चमत्कार के घटित हो जाने का इंतजार करते रहते हैं । क्या पता कोचिंगों में ऐसी शक्ति हो ही ! और यदि हो भी, तो इतना विज्ञापन, इतना प्रचार, इतना शोर !! सपनों को प्रीमियमपर बेचा जा रहा है ।

            कुछ दिनों पहले एक स्कूल के एक ओरियेंटेशन प्रोग्राममें बैठने का मौका मिला । प्रोग्राम दसवीं के छात्रों व अभिभावकों के लिए था । छात्र अगले साल बोर्ड की परीक्षा देंगे । बोर्ड की परीक्षा में अंकों का कितना महत्त्व है, हम सब जानते हैं । स्कूल और शिक्षक यह बता देना चाहते हैं कि उन्होंने सही तरीके से पूरी कोशिश कर दी है ; कुछ जिम्मेवारी बच्चों और अभिभावकों की भी बनती है । अभिभावक यह सोचते हैं कि हमने अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई का बच्चों के भविष्य के लिए उनकी पढ़ाई में निवेश कर दिया है । इसके आगे देखना स्कूल का काम है कि कैसे मैनेज करे । म्यूचुअल फंड वाले हमारा फंड मैनेज करते हैं न, हम तो सिर्फ अपना फंड लगाते हैं । बच्चों से कोई नहीं पूछता । बच्चों से क्या ही पूछा जाए ? प्रोग्राम में रस्मी तौर पर पूछ लिया गया । किसी बच्चे ने कह दिया कि खेलने का समय ज्यादा मिलना चाहिए । प्वाइंट नोटेडहो गया । कुछ शिक्षक और अभिभावक सर्विस प्रोवाइडरएवं कस्टमरकी तरह सवाल-जवाब करते रहे । ज्यादातर लोग अटेंडेंस रजिस्टर पर दस्तखत कर जल्द-से-जल्द निकल जाने के इंतजार में रहे ।

            बच्चा किताबों से लड़ता, माता-पिता से भिड़ता और शिक्षकों से डरता है । बच्चा पढ़ता कब है, यह न पूछिए। खेलता कब है, यह न देखिए ।

            हम बच्चों को समझा रहे हैं कि अच्छे से पढ़ाई करोगे तो बोर्ड्स में अच्छे नम्बर आएँगे । अच्छे नम्बर आएँगे तो प्लस टूमें अच्छा स्कूल मिल जाएगा । अच्छा स्कूल मिल जाएगा, तो प्लस टू के आगे की पढ़ाई अच्छी जगह से करने का रास्ता खुल जाएगा । बच्चों के सामने विकल्प रख रहे हैं । सीधे नहीं तो घुमाकर समझा रहे हैं कि कौन-सा विकल्प उनके लिए अच्छा है । पन्‍द्रह-सत्रह साल के बच्चे से हम मैच्योरिटी की अपेक्षा कर रहे हैं । हम ही नहीं, हमारे परिचित भी उनको समझा रहे हैं । सर्कस का शेर चाबुक से भी डर जाता है, सर्कस का हाथी रस्सी से भी बँध जाता है । दुनिया सर्कस बनती जा रही है ।

            बच्चों को समझा रहे हैं कि भाई, जरा जोर लगाकर । बोर्ड का एग्जाम कोई खेल नहीं है । युद्धस्तर पर तैयारी हो। जो यह जंग जीत गया, समझो जग जीत गया । फिर बाद में हम यह बताने लगते हैं कि एक धक्का और । प्लस टू के बाद कहीं भी घुस जाओ – मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ, बीबीए... मतलब कुछ भी ऐसा जो नौकरी पक्का कर दे । बस फिर क्या, उसके बाद अच्छे से नौकरी करो, कमाओ-खाओ, जीवन सुख से व्यतीत करो । लेकिन याद रखो, यह जंग जीत लेनी है । कभी-कभी तो यह भी समझाने लग जाते हैं कि एवरी थिंग इज़ फ़ेयर इन लव एण्ड वॉर’ !

            अक्सर यह होता है कि जब हम ज्ञान देने की मुद्रा में होते हैं तो हम आदर्श स्थितियों के हिसाब से बात करते हैं। जैसे गाड़ियों का विज्ञापित माइलेज । हमारा देश तो पर उपदेश कुशल बहुतेरेवाला वैसे ही है ।

            उस दिन ओरियेंटेशन प्रोग्रामके हॉल में कोई भी व्यक्ति यह समझ सकता था कि ओरियेंटेशनसे एक टेंशनका माहौल ही बन रहा है । शिक्षक बनाम अभिभावक, शिक्षक बनाम छात्र, छात्र बनाम अभिभावक । सबको सही सिद्ध होना था । वे यह जानते ही नहीं शायद कि गलत तो कोई भी नहीं, न पूरा सही ही ।

            आनंदफिल्म में एक संवाद था “ज़िन्‍दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं” । उसी तर्ज पर सबको यह समझना होगा कि जिन्‍दगी (पढ़ाई) प्यारी होनी चाहिए, भारी नहीं”!

            और फिर यह बताइए कि स्कूल-कॉलेजों की मार्कशीट भला किसको याद रह जाती है ? हम शायद याद भी रख लें , बाकी लोगों के लिए भला उसका क्या माने ? यही हाल नौकरियों का भी है । व्यक्ति अपने होने, अपने गुणों अथवा दुर्गुणों के कारण ही याद रह जाता है । ऊपर प्रसिद्ध फुटबॉलर मेस्सी के कथन का स्क्रीनशॉट देखा ही होगा आपने। वे अच्छा आदमी बनने की फिक्र में हैं , और हम शायद बड़ा आदमीबनने-बनाने की जुगत में ।

            आज का अभिभावक भरा-भरा रहता है । जरा-सा छेड़कर देखिए । बच्चों के भविष्य की चिंता की अजस्र धारा है उसके अन्‍दर । उसका वश चले तो वह सबकुछ एकदम ठीक कर दे, खुद अपने हाथों से । जिगर मुरादाबादी का एक शेर है –

                        हाए-री    मजबूरियाँ   तर्क-ए-मोहब्बत   के   लिए

                        मुझको समझाते हैं वो और उन को समझाता हूँ मैं

अभिभावकों के दिल का यही हाल है ।

            हर पीढ़ी अपनी चिंताओं, अपने डरों, अपनी सफलताओं की अपनी परिभाषा गढ़ लेती है । उनसे उनकी भाषा में बात करनी होगी । जैसे-जैसे सुविधाएँ बढ़ती जाती हैं, अभिभावक भी शायद उतने ही ज्यादा प्रोटेक्टिव होने लगते हैं। ठीक है कि जीना कठिन-से कठिनतर होता जा रहा है । लेकिन हमने सुना तो है “ When the going gets tough, the tough get going” । क्रिकेट के उदाहरण से देखें तो टेस्ट मैचके युग में किसी ने सोचा भी होगा कि टी ट्वेंटीमें भी दो-दो सौ रन बना लेगी कोई टीम ! शतक ठोक देगा कोई बल्लेबाज ! अगर गावस्कर का युग था, तो अब अभिषेक शर्मा और वैभव सूर्यवंशी भी तो आ रहे हैं ।

            आज के बच्चे अगर नम्बरों के पीछे भाग रहे हैं, टेंशन में जी रहे हैं तो इसमें पिछली पीढ़ी का भी कुछ हाथ है । जीवन में रामबाणया रामराजजैसा सच में कुछ नहीं होता ।  ये मिथकीय अवधारणाएँ हैं जो हमें आदर्श स्थितियों की ओर अग्रसर करती हैं । जीवन किसी एक अवलम्ब के सहारे खड़ा नहीं रह सकता ।

            ऊपर खेल-भावना की बात की गई है । हारने वाली टीम खेलना नहीं छोड़ देती, जीतने वाली टीम भी सीखना और प्रक्टिस करना बंद नहीं कर देती ।

            बार- बार उस ओरियेंटेशन प्रेग्रामके माहौल का खयाल हो उठता है । तनाव और डर से भरी हुई खामोश हवा । दुनिया चाहे जैसी भी हो, आनेवाला समय चाहे जिसका भी हो, बच्चों के चेहरे पर डर या तनाव  अच्छा नहीं लगता ।  

            यह नया समय है । नई पीढ़ी ऐसे ही नहीं मान लेती कुछ भी । वह सवाल पूछती है । लिहाज के कारण जवाबदेही में छूट नहीं दी जाती । प्रश्‍न किए जाते रहेंगे, और यह बढ़ता ही जाएगा । प्रश्‍नों के उत्तर देने का दायित्व पुरानी पीढ़ी का  बनता है । लीड फ्रॉम द फ्रण्टका जमाना है । करो तो सिखाओ । वैसे भी कहते हैं कि बच्चे देखकर ज्यादा सीखते हैं। और समय आने पर वे भी बहुत कुछ खुद ही देख-समझ लेंगे । नए खून की गरमी और पुराने सोच का कड़ापन अक्सर साथ नहीं बैठ पाते । दोनों को ग़ालिब का यह शेर याद करना चाहिए –

                        बहरा हूँ मैं तो चाहिए दूना हो इल्तिफ़ात

                        सुनता  नहीं  हूँ  बात  मुकर्रर  कहे  बग़ैर

 

            जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे हल नहीं किया जा सकता, बस समय के साथ चलते रहना होता है –

                        वक़्त के साथ गुज़र जाने दो

                        कुछ मसले हल करने के नहीं होते

             जीवन से बढ़कर कोई भी सफलता या असफलता नहीं होती । नीम खून साफ करता है, लेकिन कड़वा होता है। सुनी, न सुनी गई बात कुछ नहीं, सब समय होता है । खील निकलने के बाद घाव भरता है । बारिश के ठीक पहले ऊमस बढ़ जाती है । भोर के पहले घना अँधेरा होता है । इंतजार का फल मीठा होता है । हर आदमी के अन्‍दर एक बच्चा होता है । जगह बदलने से दृश्य बदल सकता है । दृश्य बदलने से नजरिया । नजरिया बदलने से जीवन । बीज के लिए मिट्टी, हवा, पानी, खाद का इंतजाम किया जा सकता है । रोज-रोज मिट्टी खोद कर प्रगति का जायजा नहीं ले सकते ।  सिर्फ बीता हुआ समय सुनहरा नहीं होता । पुराना होने का मतलब सख्त हो जाना नहीं होता । हँसी-ठट्ठे का मतलब अशिष्‍ट होना भी नहीं होता । किसी के पैर छू लेने भर से वह आदर का पात्र नहीं बन जाता । सफलता का अर्थ सिर्फ पाना नहीं, छोड़ना भी हो सकता है । विज्ञान कहता है कि कार्य के सम्पन्न होने के लिए दूरी तय करना जरूरी है । जीवन सिर्फ विज्ञान नहीं है । प्रेम अभिव्यक्ति का मोहताज नहीं, खुशी प्रदर्शन की । प्रेम और अविश्‍वास सहयात्री नहीं हो सकते । सहज होना सरल नहीं भी हो सकता है और न सरल होना सहज ।

           

            बात कहाँ से चलती है, कहाँ पहुँच जाती है

            मन से उठती हैं दुआएँ. कहीं बरस आती हैं

यत् भावो तत् भवति !

Believe it to have it !

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

साधो-माधो-बतकही : ५ दू सौ एगारह


 

साधो-माधो-बतकही : ५

दू सौ एगारह


माधो सुने कि नहीं ?

क्या?

वही कॉलेज वाली बात । एक ही दिन में दू सौ एगारह,यानी कि हिन्‍दी में दो सौ ग्यारह, कॉलेज खोल दिया गया है । शिक्षा पर इतना ध्यान ! आजादी के बाद तो पहली बार ही हुआ होगा ।

हाँ, मतलब आपकी शिक्षा आपके द्वार । शिक्षा सेवा है, शिक्षा के प्रदाता हैं, शिक्षा के गाहक हैं ।

देखो कितना आसान हो जाएगा सबकुछ । स्कूल से निकले नहीं कि कॉलेज में घुस गए । और कॉलेज से निकले नहीं कि यूनिवर्सिटी में घुस गए । दो-चार साल में यूनिवर्सिटी भी खुल ही जाएगा हर जगह । शिक्षा का विकेन्‍द्रीकरण । लोकतंत्र तो यही चाहता है । कॉमन मैन के हाथों में पावर !

अब विकेन्‍द्रीकरण होगा कि विनिवेश, देखा जाएगा ।  ग्यारह सौ अठ्ठासी में दो सौ ग्यारह जोड़े तो हुआ तेरह सौ निन्यानबे। यानी इतने महाविद्यालय हो गए । भाई, पढ़ाई तो पहले से ही माशाअल्ला है । बात यह है कि ब्लॉक से आगे बढ़ने नहीं देना है। ब्लॉक में ही ब्लॉक करो । वैसे भी पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ...। जग को मुअने नहीं देना है ! अच्छा, मानो पढ़-लिख गया सबलोग, तो क्या हो जाएगा ? सबको नौकरी, रोजगार-धंधा-पानी का इंतजाम हो जाएगा?

ऊँह ! उम्मीद तो जगी रहेगी न कम-से-कम । मनोज तिवारी जी का कितना पुराना गीत है, शूल फिल्म में सुनाई पड़ा था – “ एमए में लेके एडमिशन कम्पीटीशन देता...” । वैसे भी एक चरे जा चुके प्रदेश में लोगों को ज्यादा कल्पनाशील होना पड़ता है । स्कोप निकालने से न निकलता है ! देखो, कॉलेज खुले हैं । फिर बहाली होगी । ट्रांसफर-पोस्टिंग होगी । वेतन-पेंशन बनेगा । कितना स्कोप है, देख रहे हो ! है तो यह एकदम विजनरी आइडिया ।

आइडिया तो विजनरी होता ही है । सुने हैं कि एक बार कहीं चरवाहा विद्यालय भी खोले गए थे ।

भाई, तुम बड़ा निराशावादी आदमी हो । किसके करने से दिन कब पलटी मार दे, कौन जानता है । भरोसा रखो मन में । मंदिर में दीया-बाती जारी रखो । बच्चन जी कहे हैं न “ मन का हो तो अच्छा, न हो तो और अच्छा” । दोनों तरह का लोग खुश रह सकता है इसमें ।

भइया, आपको प्रणाम है । आपसे कोई नहीं जीत सकता है । 

बुधवार, 15 जुलाई 2026

साधो-माधो-बतकही : ४ गुरु जी गिर गए !


साधो-माधो-बतकही : ४

गुरु जी गिर गए !

 

अरे माधो, सुने ?

क्या? गुरु जी वाला ?

हाँ, वही । गुरु जी तो गिर गए ।

अरे तो क्या हुआ ? कहीं गिरकर कहीं उठेंगे ।

लेकिन, थोड़ा अच्छा नहीं लग रहा है ।

तुम इस मिडिल क्लास वाला थिंकिंग से कब निकलेगा जी ? गुरु जी राष्‍ट्रहित में गिरे हैं , सुने नहीं क्या उनका भाषण ? अपना छोटा बुद्धि को बड़ा करो, न तो रह जाओगे घास छीलते । चार हजार एक सौ तेईस विधानसभा क्षेत्र में से एक ठो सीट के लिए इतना व्यथित मत हो भाई ।  बड़ा सोचो । राष्ट्र का सोचो ।

मने, बात का कोई बखत ही नहीं है ?

बढ़ता हुआ पानी रास्ता बदलता है, बढ़ता हुआ ज्ञानी बात । और सात घर होता तो आदमी फिर भी सोचता । यहाँ तो चौदह घर है न जी । गुरु जी किधर से गिनती शुरू करते ? मूड मत खराब करो । बैठो, आज मूड आया है, तुमको कुछ सुनाते हैं । बैठो, खंजड़ी निकाल कर लाते हैं । और सुनो, गुरु जी का हम भी बहुत इज्जत करते हैं । लेकिन गुरु जी हैं, क्या कहें ?

 

                        गुरु से गुरुतर

                        धन है बढ़कर

                        तुम ज्यादा सर न खपाओ

 

                        जो बिका नहीं

                        वह टिका नहीं

                        तुम अपना दाम बताओ

 

                        इतने झूठे

                        टूटे-फूटे

                        तुम थोड़ा तो शरमाओ

 

                        वे सर्वेसर्वा

                        वे कर्ताधर्ता

                        तुम चलके हाथ बँटाओ

 

                        हो चरित चलित

                        तो गणित फलित

                        कुछ गुणा-भाग करवाओ

 

                        गुरु जी गिरते

                        ऐसे गिरते

                        तुम थाह पकड़ न पाओ 

 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

‘मित्रो मरजानी’: स्त्री का सत

 

मित्रो मरजानी: स्त्री का सत

 

कृष्णा सोबती का बहुचर्चित उपन्यास मित्रो मरजानी के प्रकाशन के  साठ वर्ष हो गए हैं। आज भी यह उपन्यास उतना ही चर्चित है । मित्रो यानी समित्रावन्‍ती इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र है । मरजानी पंजाबी भाषा में बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला शब्द है । इससे नटखट या बदमाश लड़की का अर्थ लिया जाता है। दूसरा अर्थ किताब के अंग्रेजी अनुवाद के शीर्षक के रूप में ले सकते हैं । 2007 में प्रकाशित गीता राजन और राजी नरसिम्हन द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद का शीर्षक है— 'To Hell with you, Mitro' । असल में मरजानी संबोधन पूरी किताब में एक ही बार आता है, वह भी जब मित्रो खुद को मित्रो मरजानी कहती है ।

उसी जमाने की फिल्म 'वक़्त' का मशहूर संवाद है " चिनॉय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते” । बिना कहे ही मित्रो बार-बार यह संवाद लोगों को सुना जाती है । मित्रो मरजानी की चर्चा मित्रो के किरदार की बोल्डनेस के कारण ज्यादा हुई । उसके पीछे भी कारण यही है कि बोल्डनेस को हमने स्त्रियों के स्वभाव का हिस्सा नहीं माना, स्त्रियों का गहना तो लज्जा है । हम यह भूल जाते हैं कि सच की तरह लज्जा भी व्यक्ति-सापेक्ष है । मित्रो के स्वभाव की जड़ें उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में दर्शाई गई हैं । यह साठ साल पहले की बात है । आज की फिल्मों और वेब सीरीज में ऐसे कई पात्र मिल जाते हैं जो मित्रो की तुलना में कहीं ज्यादा बोल्ड हैं । बिना किसी लागलपेट, बिना किसी अपराध बोध के या बिना कोई सफाई दिए। 

आज से साठ वर्ष पहले मित्रो अपनी बातों को डट कर कह रही है, बिना किसी संकोच, सबके सामने । मित्रो के विषय में अन्य पात्रों ने कहा है कि मित्रो कभी स्याह, कभी सफेद है । असल में मित्रो लोगों का मुँह देख कर नहीं,परिस्थितियों के अनुसार बात कर रही है ।  'साँच को आँच नहीं ' की तर्ज पर ।  पारिवारिक व सामाजिक आदर्शों में  पुरुष की अनुगामिनी होना ही स्त्रियोचित व्यवहार माना जाता था, जबकि मित्रो सहगामिनी बनने का हक चाहती है । अपनी बोली, चरित्र और स्वभाव पर उठाए जाने वाले प्रश्नों को नजरअंदाज करते हुए मित्रो अपने पति की आर्थिक समस्या को हल करने के लिए बेझिझक अपने गहने निकाल कर दे देती है । उसे अपने पति का साथ चाहिए । उसे अपने तरीके से अपने पति का साथ चाहिए ।

मित्रो के स्वभाव का सबसे मृदुल पक्ष जेठानी के साथ उसके व्यवहार में दिखाई पड़ता है ।  मित्रो प्रेमपूर्ण और निष्कपट व्यवहार को पहचानती है । मित्रो गलत के साथ खड़ी हुई नहीं दिखती । अपनी सास से शिकायतों के बावजूद देवरानी के कुबोलों और  बदतमीजी का जवाब देने उठ खड़ी होती है । देवरानी के भाइयों के चले आने और उनके रूखे-कड़े व्यवहार का प्रतिकार भी मित्रो ही कर सकती थी । इसको इस तरह से देखा जाना चाहिए कि कर्तव्यों के निर्वाह में मित्रो पीछे नहीं हटती, लेकिन बात जब व्यक्ति-स्वतंत्रता की आती है, तब भी वह चुप नहीं बैठ सकती । बल्कि वह आक्रामक हो उठती है। स्त्री अपनी इच्छाओं को लेकर दबी-सहमी सी ही क्यों रहा करेसदाचार और आदर्श व्यवहार के कितने पाठ पढ़ती जाएजिस जमाने की मित्रो है, उस जमाने में जहाँ पुरुष  बराबरी का,या ज्यादा बड़ा भी,भागीदार हो, वहाँ भी सारा दोष स्त्री के सर ही मढ़ दिया जाता था । आज यह स्थिति पूरी तरह बदल गई हो, यह भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते । मित्रो इस अन्याय के खिलाफ एक बेलाग आवाज है ।

प्रसिद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने मित्रो मरजानी के संबंध में कुछ इस तरह से लिखा है -- " रघुवीर सहाय की पंक्ति है -- जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी ? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है ।... मित्रो इसलिए भी अभूतपूर्व है कि बहुत सहज है। यह अभूतपूर्वता असामान्यता नहीं, वास्तविकता से उपजी है" ।  मित्रो की यही सहजता, पाठक को असहज करती है । उसे सोचने और चीजों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए बाध्य करती है । यह तो हम जानते ही हैं कि सहजता का अर्थ सिर्फ सरलता या सुकुमारता ही नहीं होता ।

उपन्यास में मित्रो की देवरानी का पात्र भी मुँहजोर है । लेखिका ने बड़ी बारीकी से दोनों की मुँहजोरी का फर्क बता दिया है । अपनी प्रसिद्ध कहानी 'ठेस' में मुख्य पात्र सिरचन से रेणु जी ने यह संवाद कहलवाया है -- "सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं" । मित्रो के विषय में यही कहा जा सकता है । उसकी देवरानी के विषय में नहीं ।

किसी की बोली और उसका व्यवहार कई बार उसके चरित्र का सही पता नहीं देते हैं । एक शेर की पंक्ति है - " सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है " । निदा फ़ाज़ली ने भी कहा है - " हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना " । स्त्रियों के संबंध में बहुत सारे  बने-बनाए 'टैगबहुतायत में उपलब्ध हैं ,जिसे हर आदमी अपनी सुविधा के अनुसार स्त्रियों पर लगाता चलता है । इस पर तुर्रा तो ये कि स्त्रियाँ भी सर झुकाए स्वीकार करते चलती हैं । मित्रो के व्यवहार, उसकी बोली और लहजे  के आवरणों को हटा कर देखें, तब उसके चरित्र का खरापन सामने आता है ।  मित्रो स्थिति के अनुसार सबसे उचित व्यवहार करती है। न पूर्वाग्रह, न पक्षपात । कभी-कभी आदमी किसी खास सोच के साथ काम करता चला जाता है । फिर कभी अचानक ही बिजली-सी कौंधती है और उस प्रकाश में उसके सामने हर बात स्पष्ट हो जाती है । तब वह अपने पैर वापस खींच लेने में भी नहीं हिचकता। मित्रो के साथ भी ऐसा ही होता है । वह भी अपने चुने हुए रास्ते से एक झटके में वापस आ जाती है । खुद को नई रोशनी में देख अपने पति से कहती है " कहीं मेरे साहब जी को नज़र न लग जाए इस मित्रो मरजानी की !"  यह खुद को ही झिड़क देना मित्रो के उसी स्वभाव की तस्दीक करता है जो सही को सही और गलत को गलत कहने में झिझकता नहीं ।

दरअसल, संसार में जितने भी तरह के नजरिए की हम बात करते हैं, वे सभी किसी न किसी रंग में रँगे हुए होते हैं । स्त्री और पुरुष नजरिए भी । स्त्री और पुरुष क्या मूल रूप से एक ही नहीं? शारीरिक,आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, पारिस्थितिक -- इन सारे आवरणों को यदि हम हटा कर देख पाएँ तो हर जगह एक ही व्यक्ति दिखेग । आवरणों के बदलने से व्यक्ति का व्यवहार भी बदलेगा । स्त्री या पुरुष होना उतना मायने नहीं रखता । हर तरह के चरित्र हर जगह पाए जा सकते हैं। कोई दिखाना क्या चाहता है, हम देखना क्या चाहते हैं, सब इसी पर निर्भर है ।

'सती' होने की प्रथा भले ही आज खत्म हो चुकी हो, अपने लाक्षणिक रूप में तो यह अभी भी मौजूद है । स्त्रियों अपने व्यक्तित्व को, अपने वजूद को दूसरे की इच्छाओं की वेदी पर झोंक देने का काम अभी भी किया जा रहा है । स्त्री का सत यह नहीं । यही मित्रो का मत है, उसकी आवाज है । स्त्री का सत जितना कर्तव्य है, उतना ही उसका अधिकार भी । और इस अर्थ में स्त्री और पुरुष के सत में कोई अंतर नहीं । 

न्यूटन का गति का पहला नियम बताता है कि यदि कोई वस्तु स्थिर है, तो वह स्थिर ही रहेगी, और यदि गतिमान है, तो वह एकसमान गति से सीधी रेखा में चलती रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाहरी असंतुलित बल न लगाया जाए। इसे 'जड़त्व का नियम' भी कहते हैं, क्योंकि यह वस्तु की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।  यथास्थिति को बदलना या अपने कम्फर्ट जोन से निकलना हमेशा ही बहुत कठिन कार्य होता है । और जीवन को जीने योग्य बनाए रखने के लिए यह करना हमेशा ही जरूरी भी रहा है । यहाँ पर ध्यान देने वाली बाते हैं – बाह्य बल और असंतुलित ( यानी की मौजूदा बल से ज्यादा ) बल । मित्रो का व्यवहार यही बल है ।

मित्रो यथास्थिति के विरुद्ध एक मजबूत हस्तक्षेप है। हमें अपने कम्फर्ट जोन से निकल कर देखना ही होगा । मित्रो जैसी मजबूत स्त्री के द्वारा लगाई जा रही ताकत को संसार बहुत देर तक नहीं सह सकता, उसे बदलना ही पड़ता है, रास्ता देना ही पड़ता है । मित्रो की आवाज भले ही साठ वर्ष पुरानी हो, उसकी बुलंदी में कमी नहीं आई है । जुर्म, ज़िद और अधिकारों की माँग में फर्क होता है । जिन्होंने गलत तरीकों से और जरूरत से ज्यादा जगह छेकी हुई हो, उन्हें अपने पैर समेटने ही होंगे, जगह खाली करनी ही होगी ।






 


शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

ढिठाई

 

ढिठाई  

 

कम से कम कपड़े अश्‍लील नहीं

अश्‍लील है जरूरत से ज्यादा कपड़े

                                                अरुण कमल

 

कम-से-कम नहीं

ज्यादा-से-ज्यादा । हर सू जीवन—  बस तलब, बस तगादा ।

 

आमों के मौसम में बेतहाशा आम । चिकेन-मटन की घर में बहार सुबहो-शाम । चाय-कॉफी-ठंडा, इनकी तो गिनती ही नहीं । कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पलें भी सब गिनती की हद से बाहर । एसी, फ्रिज, टीवी, माइक्रो, वाशिंगमशीन साधन आदि इत्यादि ।

घर में काम करने आती लड़की । झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन और खाना पकाना । देश-जहान की बातें उससे, किस्से महँगी चीजों के । उसका हँसना, उनका हँसना । कहीं जमीन, कहीं आसमाँ । चाय-नाश्‍ता-खाना-पानी, मिठाई-मलाई के भोग सरासर सामने उसके । पूछना तक नहीं कभी । रोज-रोज की तो छोड़ ही दें अभी । वे  ढीठ बने रहते हैं, आँख मिलाए बिना ।  

भगवान के घर दान और चढ़ावा । आने-जाने का खर्चा अलग । पेट काटकर लोग कौड़ी-कौड़ी जोड़ते हैं, मन्नतें मानते हैं, द्वार पर मत्था टेकने जाते हैं । जो किसी भी तरह समर्थ नहीं, पथराई आँखों से तकते हैं आसमान को । लड्‍डू-पेड़े-पनतोवे जिनको पाना है, वे पाते हैं ।

भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और साधन आवागमन के , जैसे सब एक ही पलड़े में रखे हैं । स्कूलों में यूनिफॉर्म है, भारी-भरकम फीस है और किताबें महँगी हैं । शिक्षा जरूर समान अवसर मुहैय्या कराती है । बस, सबको समान शिक्षा का समान अवसर नहीं मिलता । निजी अस्पताल हैं कारोबारी और सरकारी सरकारी हैं ।  दुनिया में बराबरी एक दिवास्वप्न है । चिंतित है, दुखी-पीड़ित है , लाचार-विवश है , मगर आँकड़ों में सब चकाचक है, मस्त-मगन है । कोई टैक्स नाम की चीज है, कोई रिश्‍वत जैसी बात है । जिससे जैसा बन पड़ता है, बचा लेता है, या फिर योगदान दे देता है ।

मुखर लोगों को, चापलूसों को, पद या फिर कद वालों को मिल जाती है सारी सहूलियत और मदद । चुप रहने वाले चुपचाप काम किए जाते हैं, गरदन झुका जिए जाते हैं । उत्पाती लोगों की माँगें पूरी कर दी जाती हैं । मौके पर हाँ में हाँ मिला दे जो, उसको कार्योत्तर समर्थन, उसकी मंजूर सब बकवास । समर्पण सफलता का गलियारा बन जाता है और गिरना बड़े होने का पर्याय ।

 

ज्यादा-से-ज्यादा अपनी चिंता, अपने स्वार्थ की सिद्धि , अपनी भरी तिजोरी, सारे सुख-चैन, ऐशो-आराम । यानी कम-से-कम होना इन्‍सान ।

ज्यादा-से-ज्यादा सब अपना , कम-से-कम सब औरों का । इतनी है ढिठाई...! 

शनिवार, 4 जुलाई 2026

साधो-माधो-बतकही : ३ हम कौन देस के वासी ?


 

साधो-माधो-बतकही : ३

हम कौन देस के वासी ?

 

साधो, सुने कुछ ?

, कुछ हुआ है क्या, माधो ?

अरे, सरकार कह रही है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रूफ नहीं है ।

तुमहो कहीं विदेश जाना है ?

न ।

तुम्हारे पास पासपोर्ट है क्या ?

न ।

तो काहे के लिए माथा खराब कर रहे हो अपना ? मात्र नौ-साढ़े नौ करोड़ लोग के पास पासपोर्ट है इस देश में । तो बाकी लोग नागरिक नहीं हैं क्या ?

सो तो है । लेकिन डर लग जाता है न ! बोलता है लोग कि पैन कार्ड, वोटर कार्ड, आधार – कुच्छो प्रूफ नहीं है नागरिकता का।

पैन कार्ड बना हुआ तो खैर बहुत लोग का है, रिटर्न वही नौ करोड़ के आसपास लोग ही भरते हैं । वोटर कार्ड वाला केस सब तो सुन ही रहे होगे । आधार का तो बोल रहे हैं कि खाली पहचान-पत्र है । पासपोर्ट के साइट पर जाकर देखो । लिखा है , भरतीय नागरिकों को जारी किया जाने वाला ट्रैवेल डॉक्यूमेंट । वोटर कार्ड भी तो नागरिक का ही बनेगा । पैन हो सकता है, बिना नागरिक बने भी मिलता हो । कुल मिलाकर हमको तो लगता है कि बात ट्रस्ट डेफिसिटका है ।

ट्रस्ट डेफिसिट’?

अरे भाई, सब लोग जानता है कि यहाँ किसी भी चीज का कोई गारेंटी नहीं है । कुछ का कुछ बनवा लिया जा सकता है यहाँ । सेवा-शुल्क’- आधारित सेवा उपलब्ध हो जाती है । हम मेड इन इंडियाके क्वालिटी पर भरोसा ही नहीं करते। जो भी एक नम्बर चीज होता है, सब एक्स्पोर्ट हो जाता है ।

तो कैसे चलेगा ? सुने कि अपना बर्थ सर्टिफिकेट, अपने माता-पिता का बर्थ सर्टिफिकेट, अपने दादा-दादी का बर्थ सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने के लिए भी बोल सकता है ।

हाँ, अभी वोटर लिस्ट वाला केस में ऐसा हुआ कहीं-कहीं, सुने हैं । हाँ, लेकिन ठीक है । जे होगा, देखल जाएगा । पूरा देश को ही भगा नहीं देगा न ! हाँ, इस बात का डर जरूर है कि पब्लिक पर एक और सेवा-शुल्कका भार बढ़ जाएगा।

बुझा गया, गरीब को देखने वाला कोई नहीं है !