माँ !
माँ
बचपन की भूख-प्यास
जरूरत हर आम, खास
पहचानती है
माँ सब जानती है
होती है हर क्षण की
खबर
कहे, न कहे कुछ
भी अगर
भले ही हम कितने बड़े
हो गए हों
मगर फिर भी
हर खुशी, हर आघात
छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी
हर एक बात
बोली से, नज़रों से
हमारी
छानती है
माँ सब जानती है ।
घर आया मैं
माँ कहती है
दो-चार दिनों को भी आ जाया करो
अच्छा लगेगा पापा को भी
और साहब हमने तो नौकरी की है
फुर्सत ही नहीं मिलती
इस बार जोड़-जाड़ के हिसाब छुट्टियों का, काम
का
कि कुछ हर्ज ना हो
आया हूँ घर बड़ी देर में
चमक उठी हैं माँ की आँखें
तरावट आ गई है पापा के चेहरे पर
और किया नहीं है कुछ खास इन दो दिनों में
बस आराम ही हुआ है
भरपूर...
निकलते वक्त कहा माँ ने
आया करो
जो कहा नहीं, पर जो दिखा एकदम साफ-
अच्छा लगा! बहुत अच्छा लगा।
और अपना हाल
गूँगा क्या बताए गुड़ का स्वाद !
माँ की हँसी
माँ
तुम कब हँसी थी
खुलकर पिछली बार ?
कब
गुनगुनाया था कुछ
कब
बनाए थे ढेरों पकवान ?
कब बुलाए थे
घर भर मेहमान
कब मनाई थी -
होली-दिवाली
तीज-त्योहार
कब उत्सव हुआ था पिछली बार ?
माँ
तुमने
कब की थी आशा
हमसे पिछली बार...?
बेटे चाँद को बुखार आया है
आधा मुँह ढके
मुरझाया पड़ा
चाँद
हवा
गुमसुम
उदास
रात
परेशान
जगी-जगी
बेटे चाँद को
बुखार आया है
माँ रात क्या करे !
माँ
ही कर सकती है
माँ
बच्चों की
तारीफ़ नहीं करती बहुत
कहीं टोक न लग जाए !
मन-ही-मन
करती रहती है दुआ
और
शिकन भर भी कहीं
दिख जाए, तो
मानने लगती है मन्नतें
बच्चों की ही तरफ़
हमेशा
होती है खड़ी
अपने सुख-दुख
गिले-शिकवे
भूल कर सब
माँ
सब समझ सकती है
उपस्थिति मात्र से ही
दुख हर सकती है
और
ज़रूरत पड़े
तो
भीतर ही भीतर
कट सकती है
मर सकती है
माँ
जो कर सकती है
वह
बस माँ ही कर सकती है !
माँ
का गुस्सा
क्या कह दिया है
गुस्सा दिला दिया है
माँ ने
जैसे झाड़ू उठा लिया है
सब झाड़ दिए जाएँगे !
क्या करते रहते हो दिन भर
पढ़ते तक नहीं ढंग से
एक काम नहीं होता तुमसे
हर मौके पर डटी हूँ
रात-दिन रहती हूँ खटती
मरती-खपती !
सब जाओ
चले जाओ
क्या बात हो गई है
पूछना चाहा पिता ने
आप चुप करें
बस अखबार ही पढ़ें
दुनिया भर को देखें
एक घर के सिवा !
चलता रहा एकालाप
माँ का -
घर, बाहर
दिन, रात
सब्जी, दूध
रोटी, भात
माता,पिता
कुल,परिवार
अच्छा,बुरा
खोटा, खरा
हिसाब-किताब
सब करो,सब करो
करते रहो, करते रहो
एक आवाज़
किस-किस की बात !
नदी में
आती है बाढ़
कुपित होती हैं
देवी कभी
मगर
जीवनदायिनी कौन !
शक्तिदायिनी कौन !
दया की वाहिनी कौन !
माता सम बस माता !
माता सम बस माता !
हालचाल
माँ
बीमार है
या दुखी है
मुश्किल है पता करना
उसे
कहने की
नहीं आदत
हमें पूछने की,
सुनने की !!
***
माँ को
कुछ होता है
किसी को कुछ पता नहीं होता
एक
माँ ही होती है
जिसे
सबकुछ पता होता है
धुरी
माँ
धुरी होती है
बाकी-
परिधि
त्रिज्या
व्यास
परिमाप ;
बहुत हुआ
तो बल
'सेंट्रीपीटल'
या 'सेंट्रीफ्यूगल' !!
घर के
भाग !
माँ का हँसना
जरूरी है
जीवन के
जीवंत होने के लिए
सब
झिक-झिक
चिक-चिक
अपनी जगह
हँसती है माँ
तो घर हँसता है
हँसते हैं
घर के भाग !!
संस्कृति
बेटियों से
कर लेती है
सुख-दु:ख साझा
पीढ़ियों से
चली आ रही बात
बढ़ जाती है
इस तरह
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
बनती है
संस्कृति
धूप
दिखाती माँ
भोर जगाती हुई माँ
तिरते हुए मद्धम स्वर
शुद्ध हो जाता है घर
गुनगुनाती हुई सुबह को
मैथिली में
गुनगुनाती हुई माँ