रविवार, 6 सितंबर 2026

पाठकीय : सपनों के ढाई घर


 

   पाठकीय :  

सपनों के ढाई घर

 

 

मुक्तिबोध ने लिखा है –“ आलोचना की दृष्‍टि से जो बात सबसे पहले सामने आती है, कवि-कर्म और रचना-प्रक्रिया की दृष्‍टि से वह सबसे अन्‍तिम है” । आलोचना की दृष्टि के बजाय पाठक की दृष्टि और कवि के स्थान पर लेखक किया जा सकता है । मुक्तिबोध ने अन्यत्र कहा है कि “ मेरा तजुर्बा यह है कि रचनाकार के मन में सौन्‍दर्य का कोई नमूना, कोई डिजाइन, कोई पैटर्न होता जरूर है” । यहाँ भी रचनाकार के साथ पाठक को जोड़ा जा सकता है । रश्मि शर्मा के दूसरे कहानी संग्रह सपनों के ढाई घरके विषय में कुछ बातें कह रहा हूँ । मुक्तिबोध की उपर्युक्त दोनों बातों से पूर्ण सहमित के साथ ।

सबसे पहले संग्रह के शीर्षक ने ही ध्यान खींचा है । ढाई घर की बात आते ही शतरंज के घोड़े की याद आ जाती है । हम जानते ही हैं कि शतरंज का घोड़ा एक बार में ढाई घर चलता है । और यह एक दिशा में नहीं चलता । चलने को तो वह चारों दिशाओं में चलता है, लेकिन दो घर चलने के बाद दायें या बायें,नब्बे डिग्री पर मुड़ जाता है । इस संग्रह की कहानियों को पढ़ते समय बार-बार यह लगा कि कोई भी कहानी एकरेखीय गति में नहीं चलती । एक तो कहानियों में फ्लैश बैकका बहुत खूबसूरत इस्तेमाल हुआ है, जिसके कारण वर्तमान और भूत में आवाजाही होती रहती है ।  दूसरे यह कि कहानियों के मुख्य पात्रों की इच्छाओं या भावनाओं की गति भी एकदम सीधी-सपाट-सी नहीं है । साथ ही, संग्रह के शीर्षक से बरबस गिरिराज किशोर के उपन्यास ढाई घरका नाम भी याद आया ।

कहानियों के आकार के हिसाब से यह संग्रह मँझोले आकार की नौ कहानियों का संग्रह है । १० पेज से २४ पेज तक की कहानियाँ हैं । नौ में सात कहानियों की मुख्य पात्र स्त्री है । इन कहानियों में स्त्री- मन, उनके परिवेश, उनकी स्थितियों का सधा हुआ चित्रण है । एक और कहानी तीज का चाँद और पेट में उड़ती तितलियाँ में भी परोक्ष रूप से स्त्री पात्र रेनी ही मुख्य पात्र है । पूरी कहानी का ताना-बाना ही कथा की नायिका  'रेनी ' को लेकर बुना गया है । सारी काहानियों में हर स्त्री पात्र अपने तईं  खुदमुख्तार, सेल्फ डिपेंडेंट है । यह खुदमुख्तारी उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के कारण है, भले ही उनकी आय का स्तर जो भी हो । यहाँ तक कि स्टूलमें नानी भी पति के जाने बाद मिलने वाली फैमिली पेंशन के कारण ही उतनी बुलंदी से रहती हैं ।

इन सातों कहानियों में स्त्री के स्वतंत्र पहचान की तलाश, उसकी कसक, उस स्वतंत्रता को पाने की इच्छा का चित्रण हुआ है । इनका हर पात्र आर्थिक रूप से स्वावलंबी है । मन के घेरेकी कृतिकाजरूर अपने पैरों पर खड़ी नहीं है, पर उसकी कसक उसके अंदर है । हालाँकि उसके पति के हवाले से इसका जस्टिफिकेशन दिया गया है । लेकिन कृतिकाके मन में उठते हुए विचारों को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि इस जस्टिफिकेशन ने जस्टीफाइ करने में सफलता पाई है । इस कहानी में भी विधवा माँ का पात्र है जो इंस्पेक्टर है , यानी कमाने वाले हाथों वाली । इन स्त्री-पात्रों की आर्थिक स्वतंत्रता और उनका भावनात्मक रूप से स्वावलंबी होना या होने की चाह रखना, आज की स्त्रियों के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है । स्त्रियों के मन में चलने वाली एक सहज प्रतिस्पर्धी आवाज भी इन कहानियों में सुनी जा सकती है  । जैसे स्टूलमें मामी और कथावाचक, ‘रिंगटोनमें आद्या और सोनी के बीच होने वाले संवाद, या उनके मन में उठने वाले विचार  । साथ ही कहानियों में सच्चे प्रेम की तलाश भी प्रमुखता से उभर कर आई है । यह भी संभवतः स्त्री -स्वतंत्रता का एक पहलू है । हालाँकि इन कहानियों में यह एक खो चुके अवसर, या कहिए एक रिग्रेट के रूप में भी है । यह रिग्रेट कभी-कभी प्रतिहिंसा तो कभी, आत्मघाती न भी कहें, तो खुद को कष्ट में रखने वाली ज़िद के रूप में भी आता है ( राहतें और भी हैं’, ‘सपनो के ढाई घर)।  एक और कॉमन बात जो मुझे लगती है कि इन कहानियों की नायिकाएँ सिर्फ प्रेम की नहीं, अपने पति, प्रेमी या साथी से सम्मान पाने की भी आकांक्षी हैं । सम्मान की चाह कहानियों का केंद्रीय भाव है । मोटिफकहानी में पार्वती भी अपनी माँ द्वारा दूसरों से मदद, जिसे वह यानी पार्वती, भीख कहती है, स्वीकार करने से खुश नहीं होती ।  इन कहानियों में  स्त्री-मन के व्यावहारिक पक्ष को भी लेखिका ने बारीकी के साथ पकड़ा है ।

संग्रह की कहानियों के पात्रों में गुजरे हुए कल के पात्रों ( स्टूल की नानी) से लेकर आधुनिक ( सपनों के ढाई घर की पूर्णिमा ) सोच वाले पात्र मौजूद हैं । यानी पात्रों के व्यक्तित्व में वैविध्य है । रुदनी है, तो श्रेया भी है । कृतिका है,तो सहोदरी भी है । मेहरबान भूत भी है तो समीर और रेनी भी हैं । आद्या और सोनी भी ।

कबीरा खड़ा बाजार कहानी में धर्म के मुद्दे को बहुत संवेदनशीलता के साथ उठाया गया है। बहुत नफ़ीस और सधे हुए हाथों से विषय को बरता गया है । कहानियों में माहौल बहुत अच्छी तरह से पकड़ा गया है । स्थान, समय और व्यक्ति, इनसे ही मिलकर यह माहौल तैयार होता है । कहानियों में दर्ज समय थोड़ा पीछे का भी है और अभी का आधुनिक समय भी । बाकी बातों के साथ भाषा भी इस माहौल का बोध कराती है । फटफटिया भी है, लाल गोल चबूतरा भी, अफगान क्रीम भी, सोहराय पेटिंग भी, घी के कनस्तर, गुड़ की भेली तो दूसरी तरफ जी आई टैग, अमेजन- ऑनलाइन शॉपिंग, पान मसाला और कैंसर, आईवीएफ, मैनीक्योर-पेडिक्योर  जैसे विषयों का समावेश भी । कबिरा खड़ा बाजार में और बहुत हद तक रिंगटोन’, और मोटिफमें भी --  इनको छोड़ कर बाकी कहानियाँ मध्य, उच्च मध्यवर्ग की हैं। इन कहानियों में लेखिका दृष्टि बहुत ही महीन है – मन भात-सा खदकता है, मन में कुछ खदबदाता भी है । वीआरएस की चर्चा भी है, सोहराय पेंटिंग बनाने की प्रक्रिया भी तो आईवीएफ जैसी तकनीकी प्रक्रिया का विवरण भी । लैंडलाइन फोन भी है, तो अठारह मिस्ड कॉल भी ।  

मेहरबान भूत कहानी का अंदाजे-बयाँ सबसे आनंददायक है । इस कहानी का मिज़ाज बाकी कहानियों की तुलना में अलग है ।  

जैसा कि ऊपर कहा  भी है कि संग्रह का शीर्षक पढ़ते ही गिरिराज किशोर के उपन्यास ढाई घर का ध्यान आया । यह उपन्यास और इस संग्रह में कोई साम्य खोजने की कोशिश नहीं है । संयोग से उपन्यास उपलब्ध था । उत्सुकतावश उपन्यास के कुछ पन्ने पलटा । दूसरे ही पृष्ठ पर कुछ पंक्तियाँ दिखीं, जो कहीं न कहीं इस संग्रह की कहानियों के भाव से भी मेल खाती हैं । पंक्तियाँ ऐसी हैं – “पर ध्यान ध्यान ही होता है, लगाव लगाव । लगाव तो अब रहा नहीं । उसी तरह गायब हो गया जैसे आजकल के गोंद से चिपचिपाहट । या तो चिपकता नहीं और चिपकता है तो बहुत कम । हाँ, ' ग़म ' जरूर चिपकता है” । ये पंक्तियाँ एक बाप की हैं, अपने बेटे के लिए । यह उपन्यास 1991 में आया था । संयुक्त परिवार की व्यवस्था टूट ही चली थी । उपन्यास की ये पंक्तियाँ उसके आगे की टूटन को दिखा रही हैं । अब बाप-बेटे में भी लगाव नहीं बचा । यह हमारे समय का सच हो चुका है कि अब संतान भी माँ-बाप के साथ नहीं रह पाती । साथ रहना तो बहुत दूर की बात है , जरूरत के समय साथ खड़ी भी नहीं हो पाती । उपन्यास की इन पंक्तियों को पढ़कर इस संग्रह की कहानियों के बीच भी एक तार बँधा हुआ दिखने लगा । संयुक्त परिवार टूटा, संतान दूर हो गई माता-पिता से लेकिन तब भी यह कह कर संतोष कर लेते हैं लोग कि बस दो जने ही होते हैं एक-दूसरे का खयाल रखने के लिए । संग्रह की कहानियाँ शायद एक और भयावह भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं । इसकी शुरुआत तो शायद हो भी चुकी है । वह बात है पति-पत्नी या स्त्री-पुरुष के बीच का ट्रस्ट डेफिसिट। आप पूर्णिमा की बात कीजिए, सोनी की बात कीजिए, सहोदरी की बात कीजिए, कृतिका की बात कीजिए, श्रेया की बात कीजिए , स्त्री और पुरुष के बीच भरोसे की घोर कमी या एक बिट्रेयलया विश्वासघात की बात नजर आएगी । पुरुषों द्वारा स्त्रियों के साथ । अन्ना केरेनिना उपन्यास की पहली पंक्ति है “ Happy families are all alike; every unhappy family is unhappy in its own way” . इस संग्रह की कहानियों की नायिकाओं के सुखी होने का, मेरी समझ से, एक ही आधार है – प्रेम और आत्मसम्मान । लेकिन यह उनके स्वावलंबी होने में कतई बाधा नहीं डाल सकता । आद्या या श्रेया जैसी स्त्रियाँ ऊपर से भले ही खुश और संतुष्ट दिखें, अंदर ही अंदर अपने हालात से वे असंतुष्ट हैं । हर एक का अपना दुख और उस दुख के अपने कारण । बच्चन जी ने लिखा है –  

           

                        दिवस में सबके लिए बस एक जग है

                        रात में  हर एक  की  दुनिया अलग है

 

यह ठीक है कि आर्थिक स्वतंत्रता एक बड़ा कारण है लेकिन यह  एक पहलू मात्र है । स्त्रियों को किसी भी रूप में पराश्रित बनाए रखा जाना स्वीकार्य नहीं है । यह सही है कि  आर्थिक रूप से पराश्रित होने पर बात कुछ ज्यादा खलती है, कुछ ज्यादा तीखी लगती है । जैसे आद्या के मन में सोनी द्वारा खरीदे गए महँगे मोबाइल को देख कर उठने वाले विचार । इसी का क्रूर रूप है मन के घेरेमें शलभ द्वारा कृतिका को यह कहा जाना कि “ तुम्हारे मायके से नहीं आए हैं पैसे” । कृतिका और शलभ का प्रेम विवाह हुआ है, लेकिन स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि शलभ की बीमारी की आशंका में कृतिका अनहोनीके घट जाने और उसके बाद अकले रह लेने के लिए भी खुद को तैयार कर लेती है । भले ही यह एक आवेग-सा क्षण आ कर गुजर जाता है, लेकिन हालत कहाँ तक बिगड़ चुकी है, यह तो दिख ही जाता  है । इस वाकये ने ग़ालिब के इस शेर का एक और अर्थ मेरे सामने खोल दिया है --  

 

                        मुनहसिर मरने पर हो जिसकी उमीद

                        ना-उमीदी उसकी देखा चाहिए

·       मुनहसिर – निर्भर

 

जरा सोचिए तुलसी ने कब कहा था !—

 

            कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहू सुखु नाहीं ।

 

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि तुलसी ने यह कथन पार्वती जी के विवाह के समय उनकी माता से कहलवाया है । जब देवी-देवताओं के संबंध में भी यह बात कही जा सकती है तब आमजन का कहना ही क्या !   रामचरितमानस के साढ़े चार सौ साल बाद भी हम इन कहानियों के जरिए वैसे ही हालात से रूबरू हो रहे हैं । बहुत संभव है कि कई लोग इन कहानियों को कल्पना-मात्र मान कर संतोष कर लें । लेकिन कहानियाँ एकदम जानी-पहचानी- सी  हैं। बल्कि इतनी जानी-पहचानी-सी कि कभी-कभी पाठक उनमें व्यक्त होने वाली सच्चाई से एकबारगी मुँह मोड़ना चाहे , जैसे, ‘मन के घेरेमें । ढाई घरउपन्यास की पंक्ति है कि “ बिना घटित हुए साहित्य में कुछ नहीं आता । भले ही हम उसे कल्पना मानकर नकार दें” ।

कहानियाँ सुनी-सुनाईं- सी लगती हैं, यह ठीक है । लेकिन दूसरी तरफ वे उतनी ही पठनीय भी हैं । आप किसी कहानी को बीच में छोड़ नहीं सकते । लगभग हर कहानी में नाटकीयता के तत्त्व और उनकी दृश्यात्मकता कहानियों पर फिल्म बनाए जाने की संभावना जगाती है । खास तौर पर मन के घेरेऔर रिंगटोनपर तो फिल्म बनाई ही जा सकती है । वैसे मोटिफमें ऑस्ट्रेलिया जाने वाले प्रसंग से चक देफिल्म का महिला हॉकी टीम का ऑस्ट्रेलिया जाने वाला प्रसंग याद आ गया । इसी तरह तीज का चाँद और पेट में उड़ती तितलियाँमें जब समीर रेनी को अपना प्रेम-पुरजादेता है, तब रेनी यह कह्ते हुए कि “ पागल हो गए हो क्या?” पुरजे को फाड़ कर फेंक देती है । अगर आपने शाहरुख खान की डरदेखी हो, तो फिल्म के अंत का वह दृश्य याद कीजिए जब जूही चावला शाहरुख खान के लिए सनी देओल से कहती है –“ किल हिम !” । इस संवाद के बाद शाहरुख खान के चेहरे का वह एक्सप्रेशन जिसमें हठात् सबकुछ खो देने का भाव है, समीर के भाव से मेल खाता हुआ पाएँगे ।

 

हर कहानी का अपना वजूद होता है और वह अपने साथ अपना फॉर्मैट खुद ही लेकर आती है । अलग-अलग पढ़ने पर शायद कुछ बातों पर ध्यान न जाए, संग्रह में कहानियों को एक साथ पढ़ने पर कुछ चीजें दिख जाती हैं  । इसमें सही-गलत जैसी कोई बात नहीं होती, हाँ,अलग बात जरूर हो सकती है  । एक पाठक अपनी सीमित समझ के साथ कुछ महसूस करता है, समझता है । संग्रह की ऐसी ही कुछ बातें जिन पर ध्यान चला जाता है   

कहानियों को पढ़ते समय एक बात यह लगती है कि कहानियों के अंत पर शायद और काम किया जा सकता था । अक्सर लगता है कि अंत में आकर कहनियों को समेटा जा रहा है ।

मेहरबान भूतको छोड़ दिया जाए तो बाकी कहानियाँ एकबग्गी, एक सुर में बात करने वाली भी लग सकती हैं । यह कोई कमजोरी नहीं, इस संग्रह का फ्लेवरहै । कभी-कभी यह भी लग सकता है कि स्त्रियों के पक्ष में पुरुषों के खिलाफ ex parte फैसला-सा सुनाया जा रहा है । मनोहर और मोहित जैसे पात्र भी हैं, लेकिन माइनॉरिटी में हैं और साइलेंट-से भी !

कहानियों में झारखण्ड का भूगोल भी उपस्थित है । जगहों के नाम हैं, लेकिन शायद उनमें उतनी जान नहीं है, जितनी कि हो सकती थी । कम-से-कम, मोटिफमें उल्लेख किए गए इस्कोगुफा की और बेहतर तरीके से पहचान कराई जा सकती थी ।    

कहानियों में कोटेबल कोट्सजैसे वाक्य कुछ और होते तो ज्यादा आनंद की बात होती ।

 

इस किताब को पढ़ना भी ढाई घर वाली चाल में ही हुआ है । सबसे पहले अंतिम यानी संग्रह के शीर्षक वाली कहानी।  फिर दूसरी कहानी से आठवीं कहानी तक और अंत में पहली कहानी यानी स्टूल

 

***

हाल ही में 30 अगस्त गुजरा है । 30 अगस्त गीतकार शैलेन्द्र का जन्मदिन है । इस संग्रह की कहानियों और शैलेन्‍द्र के गीतों पर सोचते हुए कुछ कड़ियाँ जुड़ती हुई दिखीं । इस संग्रह में जो स्त्री पात्र हैं वे तीन तरह की स्थितियों से गुजर रही हैं । बल्कि बात स्त्री-पुरुष की भी नहीं, बात व्यक्ति-मात्र की है । पहली स्थिति में व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के वश में होता है । झखता-कुढ़ता, दु:खी । वह शायद अपने हालात बदलना चाहता भी है, पर मुश्किलों में घिर कर,उनसे दब कर  रह जाता है । कबिरा खड़ा बाजार मेंकी सहोदरी, ‘मन के घेरेकी कृतिका और मोटिफकी रुदनी की स्थिति कुछ ऐसी ही है । शैलेन्‍द्र ने सीमाफिल्म के लिए एक गीत लिखा है  तू प्यार का सागर है । इस गीत का यह अंतरा क्या ऐसे ही दुखी व्यक्तियों के बारे में नहीं बता रहा ?

 

                        घायल मन का पागल पंछी, उड़ने को बेकरार

                        पंख हैं कोमल, रात है धुंधली, जाना है सागर पार

                        अब तू ही इसे समझा, राह भूले थे कहाँ से हम

 

दूसरी तरह के व्यक्ति वे हैं, जो किसी से कृपा-स्वरूप कुछ पा कर खुश हो जाते हैं । संतुष्ट हो जाते हैं । बल्कि धीरे-धीरे उनकी आदत ही हो जाती है कि हर खुशी ही प्रदत्तहोने लगती है । पाने वाले की नहीं , देने वाले की मर्जी असली बात होती है । काला बाजारके गीत सच हुए सपने तेरेमें शैलेन्‍द्र ने लिखा है –

 

                        मन की पायल छम छम बोले हर एक साँस तराना

                        धीरे धीरे सीख लिया अँखियों ने मुस्काना

                        हो गए दूर अँधेरे

 

ऐसे व्यक्ति अपनी खुशी के लिए दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं । रिंगटोनकी आद्या और कुछ हद तक स्टूलमें नानी का पात्र कुछ ऐसा ही है । अपनी खुशियों के लिए  आद्या अपने पति की आय, तो नानी पति के जाने के बाद उसके नाम मिलने वाली फैमिली पेंशन पर ही तो आश्रित है । और आम तौर पर खुश भी ।

तीसरी तरह के व्यक्ति स्वतंत्र चित्त के व्यक्ति होते हैं । परिस्थितियाँ उनको जकड़ नहीं पातीं । वे अपने को जड़-बंधनों से मुक्त कर लेते हैं । बीती बातों को भूल, आगे की ओर देखने लगते हैं ।  याद कीजिए गाइडका गीत आज फिर जीने की तमन्ना हैऔर उसका यह अंतरा –

 

                        कल के अँधेरों से निकल के

                        देखा है आँखें मलते-मलते

                        फूल ही फूल जिंदगी बहार है

                        तय कर लिया

 

यही तय कर लेनाआदामी को आदमी बनाता है । रिंगटोनकी सोनी, ‘राहतें और भी हैंकी श्रेया, ‘मोटिफकी पार्वती या कुछ हद तक कबिरा खड़ा बाजार मेंकी सहोदरी । चाहें तो इसमें सपनों के ढाई घरकी पूर्णिमा का नाम भी जोड़ लीजिए । इनका मिजाज भी तय कर लियावाला ही है !

                                    

***

 

रश्मि शर्मा के इस संग्रह  सपनों के ढाई घरको पढ़ने के बाद उनके अगले संग्रह की प्रतीक्षा की जा सकती है । संग्रह पढ़ने के बाद अगले संग्रह की प्रतीक्षा शुरु होती लगे तो यह शुभ संकेत है ।

 

अस्तु !


शनिवार, 5 सितंबर 2026

सादर

 

 सादर

शिक्षक - दिवस पर


एक ऐसा ऋण

जिससे उऋण

होना नहीं चाहें

उम्र भर


दिन बीते लेकिन

अब भी हर दिन

हैं हाथ हमारे

सर पर 


'टीचर' !

'दी','मिस', कभी 'सर' !


जीवन में जो

जिस मुकाम पर

नींव में मिट्टी

वही मगर


सब सिंचित हैं

मन पादप-पुष्प

सब संचित है 

मन के अंदर


मात-पिता गुरु जीवन में

बस केवल उनके मन में

उठते रहते हैं ये स्वर

"बच्चे हों हमसे बढ़कर !"


जीवन में हर पल हर क्षण

आप्लावित होता रहे मन

भरकर गुरु मात-पिता के प्रति

आदर आदर आदर आदर

रविवार, 30 अगस्त 2026

व्यक्ति- स्वतंत्रता के तीन स्टेज शैलेन्द्र के तीन गीत

 व्यक्ति- स्वतंत्रता के तीन स्टेज

शैलेन्द्र के तीन गीत 


तू प्यार का सागर है :

https://youtu.be/hbHUz29sVnw?si=94iQ8r_VW7NvfNMs

सच हुए सपने तेरे :

https://youtu.be/1-G5gNMeW0I?si=4iwaa8NppQ_sEmEH


आज फिर जीने की तमन्ना है :

https://youtu.be/lqBCgkBKlDc?si=0ghu7VV4LGzxrsBx


कई बार ऐसा लगता है कि एक ही समय पर कई अलग-अलग समय उपस्थित होते हैं । कि समय नहीं गुजरता, हम समयों से गुजर रहे होते हैं । उदाहरण के तौर पर कहें तो एक समय ऐसा हो सकता है जब आदमी जेनरल या स्लीपर बोगी में ही सफर कर सकता है । फिर ऐसा समय भी आता है जब एसी से नीचे बात नहीं बनती । जेनरल या स्लीपर बोगी में अभी यात्राएँ हो रही हैं । पहले से ज्यादा लोग सफर कर रहे हैं। यह एक समय है । वह आदमी इस समय से निकल कर आगे बढ़ चुका है।

     आज यानी 30 अगस्त को शैलेन्द्र का जन्म-दिवस है। आज उनके जन्म के एक सौ तीन वर्ष हुए । आदमी अपने जीवन में अलग-अलग अनुभवों, मुकामों से गुजरता है । इधर शैलेन्द्र के तीन गीतों पर ध्यान गया है। तीनों में नायिका प्रधान है। बल्कि यह नायक या नायिका का सवाल नहीं, यह व्यक्ति -मात्र की बात है । व्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है । तीनों गीतों में व्यक्ति-स्वतंत्रता के अलग-अलग समयों या अलग-अलग स्टेज को दिखाया गया है । एक ऐसा समय हो सकता है जब व्यक्ति पूरी तरह परिस्थितियों के वश में होता है । वह अपने हालात बदलना चाहता तो है, पर मुश्किलों में घिर कर रह जाता है । इस मन:स्थिति को दर्शाती हुई फिल्म ' सीमा ' के इस गीत का यह अंतरा देखिए -


                घायल मन का पागल पंछी उड़ने को बेकरार

                पंख हैं कोमल रात है धुंधली जाना है सागर पार

                अब तू ही इसे समझा राह भूले थे कहाँ से हम


फिर वह स्टेज आता है जब आदमी किसी से कुछ पा लेने पर ही खुश हो जाता है । पाने वाले की नहीं, देने वाले की मर्जी असली बात होती है । खुशियाँ अर्जित नहीं प्रदत्त होती हैं । फिर धीरे-धीरे आदमी उसी ढब में ढल जाता है। उसे वही जीवन-शैली भाने लगती है । ' काला बाजार ' के गीत ' सच हुए सपने तेरे ' की ये पंक्तियाँ ऐसी ही बात कह रही हैं --


                 मन की पायल छम छम बोले हर एक साँस तराना

                  धीरे धीरे सीख लिया अखियों ने मुसकाना

                  हो गये दूर अंधेरे झूम ले ओ मन मेरे


लेकिन आदमी एक दिन आखिर आजिज आ ही जाता है। वह अपने चारों ओर कसे हुए मकड़जाल को काट कर फेंक देता है। वह खुली हवा में साँस लेने लगता है । वह बीती बातों को भूल, आगे की ओर देखने लगता है। ' गाइड ' का ' आज फिर जीने की तमन्ना है ' भला कौन भूल सकता है --


                 कल के अंधेरों से निकल के

                 देखा है आँखें मलते मलते

                 फूल ही फूल ज़िंदगी बहार है

                 तय कर लिया


यही ' तय कर लेना ' तो आदमी को आदमी बनाता है । इस गीत की पहली ही पंक्ति है "काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" ।

       पहले गीत में जहाँ दु:ख, याचना और छटपटाहट के भाव हैं, वहीं दूसरा गीत अनायास मिली हुई खुशी से भरा हुआ है। यह खुशी किसी और के निर्णयों या कामों पर आश्रित है। तीसरा गीत उल्लास से भरा हुआ गीत है। यह गीत उन्मुक्तता का गीत है। व्यक्ति की परम अभिव्यक्ति संभवतः यही स्वतंत्रता है जो उसने अपने बलबूते अर्जित की है ।

         तीनों ही गीतों में संगीत एवं अभिनय ने रस-वृद्धि की है। पहले गीत के संगीतकार शंकर-जयकिशन और अभिनेता बलराज साहनी एवं नूतन हैं। दूसरे और तीसरे गीतों की टीम एक ही है - संगीतकार सचिन देव बर्मन,निर्देशक विजय आनंद तथा अभिनेता वहीदा रहमान और देव आनंद। मुझे ऐसा लगता है कि सचिन देव बर्मन के साथ काम करते वक्त शैलेन्द्र थोड़ा ज्यादा दार्शनिक हो जाते हैं, जो सचिन देव बर्मन के लिए लिखे उनके गीतों में झलकता भी है।

         ' सीमा ' 1955, ' काला बाजार ' 1960, और ' गाइड ' 1966 में रिलीज हुई थी। शैलेन्द्र द्वारा निर्मित ' तीसरी कसम ' भी 1966 में ही रिलीज हुई थी । 1966 में ही 14 दिसंबर को शैलेन्द्र इस दुनिया को छोड़ कर चले गए।


                  

सोमवार, 24 अगस्त 2026

कुछ छंद में - १२,१३,१४

 

कुछ छंद में - १२,१३,१४

आत्मकेंद्रित इस दुनिया  में

मन को और ठौर ले  जाओ

अपना मन ही साथी केवल 

मन को जाकर वहीं रमाओ

छंद-१२


**


बज्जर मूरख से बचिए लोग

ज्यादा  चतुराई  भी  है  रोग


सीधे  रस्ते  बस   चलते  चलें 

बाकी अब जिसके जैसे जोग


जनता प्रेम की भूखी है जी

काहे करते हैं  बल-परयोग


देख-दाख लिया चाहे जितना

कुछ तो है कहें जिसे  संजोग


तुम राजपथ वाले बन जाओ

मुझको  रहने  दो   मेरे  दोग

छंद-१३


**


जब   लोग   बड़े   हो  जाते  हैं

क्यों  दिल  छोटा  हो  जाता  है

क्यों  बात   कसैली    होती   है 

क्यों  मन   तितुआ हो जाता  है


क्यों  कुटिल  हँसी  हो जाती है 

क्यों  शरम-हया खो  जाती  है

नजरें   दुश्मन   हो    जाती   हैं

दिल  जहर-भरा  हो   जाता  है


अपने    सारे    पाप     भूलकर

और   पाप  की  छाप   भूलकर

पाठ   पढ़ाने   लगते    हैं ,  यह 

हद   से   ज्यादा  हो   जाता  है


जबतक  हित  है  आदर भी  है

लेकिन  बाहर-बाहर    ही    है

अंदर   कितनी   मैल   भरी  है

जाहिर   सारा   हो    जाता  है


हैं   बड़े  लोग,  दुनिया   उनकी 

हम  ही  ठहरे   पागल   सनकी

उनकी  दुनिया, अपनी  दुनिया

पथ अलग  यहाँ  हो   जाता  है

छंद-१४


मंगलवार, 18 अगस्त 2026

चलिए कोई बात नहीं है

 

चलिए कोई बात नहीं है

 

कुछ करने  को बात नहीं है

चलिए  कोई  बात  नहीं है      

 

मन में जाने क्या- क्या तो है

कहने को  कोई बात नहीं है

 

मुझसे कोई काम नहीं है

मुझसे कोई बात नहीं है

 

उनसे मिलना कैसे होगा

देने  को  सौगात नहीं है

 

झूठ- दिखावे  की  दुनिया है

अपनी कुछ औकात नहीं है

 

बच्चा भी समझा  जाता है

अपने बस की बात नहीं है

 

मन थोड़ा-थोड़ा दुखता है

वैसे  कोई  बात   नहीं  है

 

बादल  छाए  हैं  छाने  दो

लेकिन दिन है रात नहीं है

                                        छंद-११  

शनिवार, 15 अगस्त 2026

जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं : २

जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं : २ 


पहली बात

फिर रेल का सफर है । बगल वाले भाई जी ने भेज खाना मँगवाया है। खाना देने वाले से पूछा है मांस, मछली, अंडा से टचमेंट नहीं न है । स्टाफ ने जवाब दिया है - नहीं । बात सब ने समझ ली । आपने भी समझ ली होगी । बताइए, लोग हैं कि लगे रहते हैं , शुद्ध भाषा, शुद्ध उच्चारण । शुद्ध संस्कार !!

क्या अंग्रेजी विदेशी मूल की भाषा रह गई है ?

दूसरी बात 

कमजोर आदमी को गुस्सा ज्यादा आता है । कमजोर चाहे देह से हो, पोजीशन से हो, पावर से हो । उससे गुस्सा कंट्रोल नहीं हो पाता । वह मौका तलाशते रहता है गुस्से की निकासी का । इस चक्कर में वह कभी - कभी एक्टिविस्ट, कभी सत्य के रखवाले, कभी व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने का दबाव बनाने वाला बन जाता है, शिकायतकर्ता बन बैठता है वह । थोड़ा भी ' अपर हैंड ' हुआ नहीं कि उसके भीतर का शेर जाग जाता है ।

गुस्सा अच्छी चीज नहीं है । गुस्से की शुरुआत शिकायत से होती है । शिकायत अच्छी चीज नहीं है। मानता कौन है लेकिन ?

तीसरी बात 

एक समय आता है जब आदमी की नजर कमजोर होने लगती है । नजदीक की चीजें साफ नजर नहीं आतीं । दूर - दूर की दिखती है, दूर - दूर की सूझती है ।

एक समय ऐसा आता है जब सुनने की क्षमता भी कम होने लगती है । किसी - किसी को ज्यादा दिक्कत हो जाती है । लेकिन वैसे लोग भी कुछ खास तरह की बातों को अच्छी-खासी दूरी से और धीमी आवाज में कहे जाने के बाद भी सुन लेते हैं और दूसरे लोगों को चकित कर देते हैं।

एक उम्र आती है जब आदमी के सोच की लोच समाप्तप्राय हो जाती है। जैसे पुराने पेड़ की शाखाएँ। कमाल यह है कि व्यक्ति हर हाल में अपनी ही बात को सही माने बैठा रहता है। जिसको माना तो माना, नहीं माना तो नहीं माना । उसके लिए सच में बीच का रास्ता नहीं होता !

जब आसपास के लोगों में ऐसे लक्षण दिखने लगते हैं, तो कष्ट होता है । मेडिकल कारण तो फिर भी सहे जा सकते हैं, किसी का मन यदि ' टिल्टेड' दिखने लगे तब मुश्किल होती है ।

अपने-अपने सत्य से लोगों को मोह होता है । 

चौथी बात 

आदमी अपनी नजर में हीरो बने रहना चाहता है । होरो बनना सफल होने पर निर्भर करता है । सफल होने के लिए कभी-कभी वह कार्येतर कार्यों को भी कर जाता है । उसके बाद वह चाह कर भी हीरो नहीं बन पाता । पब्लिक चाहे जो समझे ।

पाँचवीं बात

आप अपने दोस्तों से प्रेम करना चाहते हैं । आपके दोस्त आपसे प्रेम करना चाहते हैं । आप अपने दोस्तों के लिए प्रेम जतलाते हैं । आपके दोस्त आपके लिए प्रेम जतलाते हैं । 

दोस्ती और लोकतंत्र की राजनीति में बड़ा साम्य है । 

होता सब है, पर होता कुछ भी नहीं ।

बीच में व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टा, एक्स के कई रेगिस्तान हैं। रेगिस्तान में कभी-कभी नखलिस्तान भी दिख जाते हैं । 

आदमी कठजीव है । जी जाता है ।

छठी बात

हाथी के दो दाँत होते हैं । आदमी के दो स्वभाव। बशीर बद्र साहब ने शायद इसीलिए अपने एक शेर में कहा " परखना मत " ।

ज्यादा देखना । ज्यादा गौर से देखना । ज्यादा गौर करना । आपसी संबंधों के लिए ठीक नहीं । ' यात्री केवल अपने सामान की सुरक्षा के लिए जिम्मेवार हैं ' ! 

सातवीं बात 

मेरे शुभचिंतक मुझे कम मेहनत करने, कम ईमानदारी बरतने, दूसरों के बारे में कम सोचने, कम प्रश्न पूछने आदि के सुझाव देते रहते हैं । वे मुझे समझते हैं और मुझे समझाते हैं कि मुझसे हो नहीं पाएगा।

उनकी बात और है । वे तो बेस्ट हैं । एकदम बेस्टम बेस्ट !