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शनिवार, 20 जून 2026

‘दर-ब-दर’: प्रसंग कविता का


 

दर-ब-दर’: प्रसंग कविता का

 

 

पहले एक कविता पढ़ी जाए, उसके बाद आगे की बात –

 

          दर-ब-दर

 

            आँखों में

            तेरे आँसू लेकर

            हम हँसते रहे

            कल

            रात भर

 

            दिल

            दर-ब-दर

            तेरे

            प्यार में

 

            खुद को खोकर भी

            तुमको गर पा लें

            तो भी हर्ज नहीं

            लाख सितम हों

            इश्क में तेरे

            पर

            हमको तो

            दर्द नहीं

 

            कब के चले

            तेरी तरफ, फिर भी

            वहीं के वहीं हैं

            किया क्या-क्या तेरे लिए

            खबर ही नहीं है

            तुझको

            हम

            मरते रहे

            तेरी खातिर

            देखा न तूने

            आँख भर

 

            दिल

            दर-ब-दर

            तेरे

            प्यार में

 

 

पाठक यह तो समझ ही गए होंगे कि यह आम बोलचाल के शब्दों और लहजे का इस्तेमाल करते हुए लिखी गई एक प्रेम कविता है । प्रेम कविताओं के लिखे जाने की संभावना जितनी ही ज्यादा होती है, उतनी ही कम संभावना एक अच्छी प्रेम-कविता के प्राप्‍त होने की ।

जरा-सा ध्यान देकर पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कविता निम्न-मध्यवर्ग के प्रेम की कविता है । प्रेमी साधनविहीन है । तभी तो वह अथक प्रयास कर रहा है, फिर भी उसे निराशा ही हाथ लग रही है –“ देखा न तूने आँख भर”। प्रेम के पथ में साध्य यानी प्रियतम को प्राप्त करने के लिए प्रेमी कुछ भी करने को तैयार है । वह खुद का सर्वस्व निछावर कर देने की उत्कंठा भी रखता है । बस, उसे प्रियतम का सान्निध्य ही प्रेय है । संभवत: प्रेमिका भी उसी विपन्न वर्ग की है, जिस वर्ग का उसका प्रेमी है । उम्मीदों के पूरा न हो पाने की कसक दोनों के दिलों में है । प्रेमी प्रेमिका के हर कष्ट को हँसते-हँसते सह जाने के लिए प्रस्तुत है  -- “ आँखों में तेरे आँसू लेकर” ।

देखा जा सकता है कि कविता का मूल स्वर आशावादी  और यथास्थिति के जड़त्व के विरुद्ध है । तभी तो वह शुरू से ही दु:ख को बाँट लेने, हँसते हुए बाँट लेने की बात कर रहा है । उसे प्रेमिका का साथ चाहिए ही, प्रेम की राह में मिलने वाले दर्द उसको डिगा नहीं सकते । अंतिम बंद में वह प्रेमिका को यह भान भी कराना चाहता है वह उसकी उपेक्षा का भागी नहीं है । इकबाल ने भी एक शेर में कहा है –“ तू मिरा शौक देख, मिरा इंतज़ार देख” ।

मध्यवर्ग का जीवन छोटी-छोटी उपलब्धियों को प्राप्त करने के प्रयासों में ही बीत जाता है । बस एक फोन को खरीद भर पाना ही जीवन का लक्ष्य बन सकता है । अभी पिछले दिनों देश में आई-फोन को खरीदने के लिए उमड़ी भीड़  उसी मानसिकता का प्रदर्शन है । या शायद लोग इतने आत्मविश्वासहीन हो गए हैं कि सारा जीवन आई-फोन या उस जैसी चीजों के संग्रहण पर ही जा कर टिक गया है । यह कविता निम्न-मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, संघर्षों और उसकी विवशताओं की कविता भी है । “ लाख सितम हों इश्क में तेरे, पर हमको तो दर्द नहीं” – सबकुछ सह कर भी एक सुकून भरी जिंदगी पाने की चाह । यह चाह भी प्राय: एक मृगतृष्णा बन कर ही रह जाती है । इस तरह से इस कविता में अर्थ की कई परतें देखी का सकती हैं । कहीं पढ़ा था कि हर कविता के कम-से-कम दो पाठ तो होते ही हैं ।

एक सवाल यह भी उठ सकता है कि क्या इस यथार्थ-आक्रांत समय में प्रेम-कविताओं की उपयोगिता बची हुई है ? उसमें भी सीधे -सरल शब्दों में उतारी गई प्रेम-कविता की । सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा है कि “समकालीन हिंदी कविता में कवि मन छीज रहा है । वह निरा भाषायी अभ्यास और बौद्धिक कसरत बनती जा रही है । उसमें जीवनानुभव कम है । विचार ही विचार है । उसकी बौद्धिकता सरस बौद्धिकता नहीं है” । कविता के इसी बढ़ते हुए परिमाण के परिणाम पर सोचते हुए ही शायद बेनीपुरी जी ने कहीं कहा है कि “ हम सुखाड़ से नहीं बाढ़ से डरते हैं” ।

छीजते हुए मन के लिए एक अच्छी प्रेम-कविता नखलिस्तान की तरह है – कवि के लिए भी और पाठक के लिए भी ।  यहाँ यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रेम का स्वभाव है कि वह जड़त्व के विरूद्ध चलता है । यथा-स्थिति में पिसते रह जाना उसे स्वीकार नहीं होता । प्रेम-कथाओं में प्रतिरोध की अंतर्धारा छुपी होती है ।

 

अच्छे काव्य-पाठ का एक प्रमुख अंग है कवि द्वारा कविता की कुछ पंक्तियों को दुहराना । पंक्तियों के दुहराए जाने से पाठक/श्रोता को कविता की लय से संगत बैठाने में आसानी होती है । याद करने में भी । पंक्तियों का दुहराना वैसा ही कुछ है जैसा किताब पढ़ते समय कुछ पंक्तियों का अंडरलाइन किया जाना । इस प्रसंग में राजेश जोशी जी की यह बात भी याद की जानी चाहिए कि “ हिंदी में अच्छा काव्य-पाठ करने वाले कवियों के उदाहरण शायद कम हैं”। ऊपर उद्धृत की गई कविता में यदि पहले अंतरे के बाद आने वाली पंक्तियों को इस तरीके से दुहराया जाए, तो निश्चय ही कविता का असर थोड़ा बढ़ जाएगा –

“ दिल

   दर-ब-दर

  दिल

  दर-ब-दर

  दिल दर-ब-दर

   तेरे प्यार में”

और इस खण्ड को यदि इसी तरह दो बार पढ़ या गा दिया जाए, तो क्या कविता ज्यादा असरदार महसूस नहीं होगी ? इसी तरह दूसरे अंतरे की पहली तीन पंक्तियों और तीसरे अंतरे की पहली तीन पंक्तियों को दुहराने से भी कविता कुछ और खूबसूरत हो उठेगी । हालाँकि दुहराने की यह क्रिया हर व्यक्ति के मिजाज के अनुसार अलग-अलग पंक्तियों को दुहराने की भी हो सकती है । आचार्य रामचन्‍द्र शुक्ल ने कविता की  पंक्तियों को दुहराने के संबंध में लिखा है “ कविता सुननेवाला किसी भाव में मग्न रहता है और कभी-कभी बार-बार एक ही पद्य सुनना चाह्ता हैकविता सुननेवाला कहता है “ जरा फिर तो कहिए” ।” 

 

कविता में बोधगम्यता या सरलता और दुरूहता या कठिनता को लेकर भी चर्चा हुआ करती है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है “ साहित्य में सहज ( मैं सरल नहीं कहता) भी मौलिकता का श्रेष्ठ प्रतिमान है ”।  वैसे भी, सरल होने का अर्थ बात का हल्का हो जाना नहीं है । उसी तरह कविता के दुरूह या कठिन होने का अर्थ उसका गंभीर या श्रेष्ठ होना नहीं है । प्रेय और श्रेय के बीच का रास्ता ही कविता को दूर तक ले जा सकता है । कविता के सफल होने का पता तो कवि के जाने के बहुत सालों बाद ही पता चल सकता है । तुलसी हों, कबीर हों, खुसरो हों, मीर हों , गालिब हों, निराला हों— कोई भी कवि अपने जाने के वर्षों बाद भी अपनी कविताओं के जरिए याद रह जाता है , तभी हम कह सकते हैं कि कविता या साहित्य के इतिहास में उसका कोई स्थान है । कॉपीराइट के कानून में लेखक की मृत्यु के साठ  वर्षों बाद उसका लेखन कॉपीराइट से मुक्त होता है । इसके पीछे शायद यही भावना रही हो कि इस अरसे में लेखन स्व-जनित आवेग प्राप्त कर लेगा और रचनाएँ फिर अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी ही गति से चलती रहेंगी। मैल्कम ग्लैडवेल अपनी किताब टिपिंग प्वाइंट में ऐसी ही बात कहते हैं –  “किसी भी वस्तु या विचार के जीवन में एक ऐसा बिंदु आता है जिसके बाद उसका प्रचार-प्रसार स्वत:स्फूर्त, अपने बलबूते पर होने लगता है” । ऐसा ही साहित्य दीर्घजीवी होता है । संक्रामक बीमारियों को बेअसर करने वाली हर्ड इम्यूनिटीकी बात भी कुछ ऐसी ही है ।

            किसी कविता में सरल शब्दों में कही गई बात कम महत्त्व की इसलिए नहीं हो जाती कि वह सरल शब्दों में कही गई है । न ही कोई कविता इसलिए महत्त्पूर्ण हो सकती है क्योंकि उसे कठिन या दुरूह बनाया गया है । दर-ब-दरकविता में सरल शब्दों का सहारा लेकर बात की गई है । किसी व्यक्तिगत रुचि के आधार पर इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए, ना ही अपनाया जाना चाहिए ।  

            भारतीय हिंदी फिल्में अपने गीत-संगीत के लिए भी जानी जाती हैं । हिंदी साहित्य की वर्ण-व्यवस्था ऐसी बना ली गई है कि फिल्मों से जुड़ा हुआ कुछ भी साहित्य के द्वार में प्रवेश का पात्र नहीं माना जाता । जबकि हम-आप, सभी फिल्मों के गाने गुनगुनाए बिना रह नहीं सकते । यह बात मानी जा सकती है कि फिल्मों के चुने हुए गीत ही विचार किए जाने योग्य पाए जाएँगे । यही बात तो आज मनों नहीं टनोंके हिसाब से लिखी और प्रकाशित की जा रही कविताओं के बारे में भी कही जा सकती है । आलोचना मुँह-देखीवाली बात हो गई है शायद । फिल्मों के गीतों से क्या दिक्कत है ? यह कि वे फिल्मों में इस्तेमाल किए जाते हैं, उनका व्यावसायिक उपयोग होता है या फिर उन्हें वैसे लोग गाते या अभिनीत करते हैं जो साहित्य के पैमाने से “डिज़र्विंगनहीं होते ? क्या कविता अपने पाठकों या श्रोताओं के समूह को नियंत्रित कर सकती है कि कौन उसे पढ़ने या सुनने का हकदार है या नहीं ? हमारे सामने ऐसे उदाहरण भी तो रहे ही हैं कि कवि या उसका कोई कृत्य सामाजिक नजरिए से उतना डिज़र्विंगनहीं रहा, फिर भी उसकी रचनाएँ पढ़ी और सराही जाती हैं । कविता या आलोचना क्या अपने आभिजात्य की मारी हुई नहीं हो गई हैं कि उन्हें फिल्मों के गीतों का मुँह देखना तक बर्दाश्त नहीं ?

            फिल्मों के गीत अपनी याद रह जाने की शक्ति के कारण भी शायद कविता या आलोचना वालों को खटकते होंगे । यह ठीक है कि ट्यूनके कंधों पर सवार होकर ही गीत स्मरणीय बन पाता है । लेकिन देखा जाए तो हर कविता, बल्कि हर संवाद में एक धुन, एक ट्यूननिहित होती है । गीतों में यह ज्यादा स्पष्ट होती है । कविता में तो पहले ही एक वर्ग-विभेद किया हुआ है – कविता अलग, गीत अलग । और, कविता यानी श्रेष्‍ठतर, श्रेयस्कर ! यह तो वही बात हुई कि ब्लैक टीपीने वाले श्रेष्ठ जन और दूध-चीनी वाली चाय पीने वाले सड़क के आदमी। हो सकता है यह विभेद छंद और तुकों के उपयोग की अतिसे जन्मी निरर्थकता के कारण हुआ हो । लेकिन यह भी तो है, कि कविता उल्टी दिशा में भी अतिकी स्थिति को प्राप्त हो रही है । कविता को श्रेष्ठ बताने के लिए गीतों और खासकर फिल्मों के गीतों को दोयम दर्जे का बताना क्या उचित है ? कवि राजेश जोशी ने भी लिखा है “ कविता का विमर्श कुछ ऐसा हो गया है कि एक कवि के महत्त्व को रेखांकित करने के लिए दूसरे की हत्या आवश्यक मान ली गई है” ।  श्रेष्ठता-बोध मनुष्य के लिए घातक है । हर युद्ध के पीछे कारण श्रेष्ठता-बोधही होता है । अर्थशास्त्र में बाजार के संबंध में एक शब्द उपयोग में लाया जाता है कार्टल। इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ शक्तियाँ ( कंपनियाँ) मिलकर पूरे बाजार पर कब्जा जमा लेती हैं । दूसरी कंपनियों के लिए जगह ही नहीं छोड़ी जाती । फिल्मों के गीतों को बाहर रखकर क्या साहित्य में भी कार्टलनहीं बना लिया गया है ?

            शैलेन्‍द्र के लिखे गीत की पंक्ति “ जिंदगी है, भूलकर ही राह मिलती है” , साहिर के गीत की पंक्ति “ उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे”, पं. नरेन्‍द्र शर्मा का गीत सत्यम् शिवम् सुन्‍दरम्’, मजरूह सुल्तानपुरी की पंक्ति “ होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी” , वर्मा मलिक का गीत बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई’ – फिल्मों के ऐसे असंख्य गीत हैं जो सुननेवाले के मन को भाते तो हैं ही, भारतीय दर्शन और संस्कृति की छटा को भी अपने में समेटे हुए होते हैं । अकारण नहीं है कि ऐसे गीत वर्षों-वर्षों तक याद किए जाते हैं । हिंदी फिल्मों के गीत भारतीय मानस के अंतर्भूत तत्त्व हैं । यह सही है कि आज के दौर में फिल्मों में भी गीत कम हुए हैं, लेकिन उनका महत्त्व कम हुआ हो, ऐसा नहीं है । यह कहा जा सकता है कि फिल्मों के गीत ज्यादातर व्यक्तिगत दुख-सुख से जुड़े होते हैं, उनका फलक शायद उतना विस्तृत नहीं होता । कविता में भी मैंका समावेश तो होता ही है । देश और समाज मैंसे ही तो बनते हैं ।  व्यष्टि को सँभाले बिना समष्टि की फिक्र क्या ही की जाएगी ? जो है उसे देखने-परखने की जगह जो नहीं है उस पर ध्यान केंद्रित करना भी तो उचित नहीं ।

            कृत्रिम रूप से न तो किसी भी चीज को स्वीकार किया जाना चाहिए और ना ही जिलाबदर । हिंदी फिल्मों के गीतों जो भी ग्रहण-योग्य है, उसकी उपेक्षा से कम-से-कम साहित्य का तो फायदा नहीं हो रहा । हमें यह समझना चाहिए कि साहित्य की दीवारें रंध्रयुक्त हैं , सिर्फ दरवाजों को बंद किए रहने से काम नहीं चलेगा । विक्टर ह्यूगो की यह पंक्ति याद आती है “ No force on earth can stop an idea whose time has come, शायद अभी फिल्मों के गीतों को साहित्य माने जाने का सही समय नहीं आया है । साहित्य में वैसे भी धैर्य का बहुत महत्त्व होता है ।

 

       अंत में यह खुलासा कि निबंध के आरंभ में उद्‍धृत की गई कविता, दरअसल फिल्म इत्तु सी बातका गीतकार राज शेखर का लिखा हुआ एक गीत है, बस उसके कुछ शब्दों/ पंक्तियों को अलग क्रम में सजा दिया गया है । जुबिन नौटियाल की आवाज में यह गीत यूट्यूब पर उपलब्ध है

 

( https://youtu.be/J7Uok7TBlIA?si=LgHicAh_oo9qtjU7 )

 

जैसे कुछ कविताएँ होशो-हवास पर छा जाती हैं, वैसे ही फिल्मों के कुछ गीतों में भी सम्मोहकता होती है ।

 

            अब सवाल यह कि क्या कविता किसी खास फॉर्मेटमें लिखी जाए, तभी कविता कहलाने की हकदार होगी? यदि आप ऊपर दिए लिंक पर गीत सुनेंगे तो पाएँगे कि धुन, लय, तुक, संगीत और गायकी से सुरीलेपन और सरसता का  एक  चँदोवा ताना गया है । यह तो माना ही जाता है कि हर कविता की अपनी एक लय होती है । तुकों के सशक्त प्रयोग का उदाहरण धूमिलकी कविता के रूप में हमारे सामने है । क्या धुन और लय को तोड़े और तुकों को बिगाड़े बिना गीत को कविता नहीं माना जा सकता? यहाँ यह दुहरा देना ठीक रहेगा कि अभी बस दरवाजा खोल देने की बात हो रही है, पीढ़ा देने या तय कर देने की नहीं ।

            यह मानने में भी किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए कि फिल्मों के वही गीत हमारे मन को छू पाते हैं जो गहरे पैठ कर तैयार किए गए होते हैं ।  ऐसे गीत बहुतायत में हैं, यह भी मानना चाहिए ।

            वेब सीरीज काठमांडू कनेक्शन  के लिए राज शेखर के ही लिखे एक और गीत स्याही स्याहीगीत को सुनकर देखा जा सकता है कि स्याह और स्याही शब्दों को केंद्र में रखते हुए कैसे पूरा गीत रचा गया है । क्या कवि की प्रयोगधर्मिता की तारीफ नहीं की जानी चाहिए ? उदाहरण के तौर पर गीत की ये पंक्तियाँ देखिए –

 

            रंग सब जब मिल गए हैं

            क्या अँधेरे क्या उजाले

            उजली उम्मीदों के चेहरे

            पड़ गए हैं दाग़ काले

            स्याही से पुता हुआ आईना भी...

( https://youtu.be/ZB9qnLC3os8?si=eR-zjVQKaf4r49to )

 

एक साहित्यप्रेमी, पाठक, समीक्षक और आलोचक के तौर पर हमें भी अपनी सीमाओं का विस्तार करते रहना चाहिए, अपने कैनवास को बड़ा करना चाहिए । ऊपर कुछ गीतों के ही उदाहरण दिए गए हैं, बाकी सबकी अपनी-अपनी खोज!  अपनी अन्‍वेषण-प्रवृत्ति की लौ जलाए रखना जरूरी है । साहित्य को कुआँ नहीं सागर होना चाहिए ।

 

            अंत में श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी की पंक्तियाँ जो उन्होंने कविता और गीत के संबंध में कही थीं । हिंदी फिल्मों के गीतों के लिए भी इन्हें अंशत: ( अधिकांशत: )  सही माना ही जा सकता है –

 

            “ गीत क्या है ? यह क्यों लोगों के मन में इस तरह गड़ जाता है ? प्रारम्भ में गीत था, तब कविता आई ! आज कविता ने गीत को दबा दिया है; किन्‍तु, फिर भी, गीत गीत है ! क्योंकि यह मानव-भावना को प्रकट करने का प्रथम उद्‍गार था । गीत फूटे थे हृदय से; कविता का स्रोत मस्तिष्क बना” ।

 

 

 

 

 

 


शनिवार, 29 मार्च 2025

इश्क के तीन सीजन : 'ऐसे क्यूँ...'

 

इश्क के तीन सीजन : 'ऐसे क्यूँ...'



कहते हैं फिल्मों की कहानियाँ दो ही होती हैं बदले की या प्रेम की। और इनमें भी प्रेम की कहानी तो हर कहानी में गुँथी हुई होती है। प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए भला गीत से बेहतर क्या हो सकता है! हिन्दी फिल्मों में प्रेम के कितने ही अनमोल गीत भरे पड़े हैं। प्रेम के हर आयाम को पकड़ता, मन के हर भाव को पकड़ता हुआ कोई न कोई गीत आपके ध्यान में आ ही जाता है। प्रेम जीवन की अंतः सलिला धारा है और हिंदी फिल्मों के गीत प्रेम के लिए अंतः सलिला हैं। हिंदी फिल्मों एक से एक दिग्गज गीतकार हुए हैं। आज भी अनेक गीतकार बेहतरीन गीत लिख रहे हैं। बहरहाल, बात फिल्मों की कहानियों में प्रेम और उस प्रेम को उद्‌गार देते हिंदी फिल्मों के गीतों की हो रही है। एक ही गीत या धुन का इस्तेमाल या विकास अलग-अलग फिल्मों में दिखे, ऐसा कम ही होता है। हमने ऐसा देखा है कि राज कपूर की कुछ फिल्मों में बजने वाला पार्श्व संगीत, उनकी बाद की फिल्मों में किसी गीत की धुन बना। आजकल फ्रेंचाइजी / सीक्वेल वाली फिल्में बन रही हैं, तो उनमें किसी गीत के एक फिल्म से दूसरी या बाद की फिल्मों तक भी सफर करना संभव हो गया है। हाल ही में आई फिल्म 'भूल-भुलैया-3' के 'मोरे ढोलना' गीत को याद किया जा सकता है। लेकिन उस गीत में प्रेम की बात नहीं है। प्रेम की बात है 'ऐसे क्यूँ में। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई वेब सीरीज़ 'मिस मैच्ड' के तीन सीज़न आ चुके हैं। उनमें यह गाना पहले से दूसरे और फिर तीसरे सीजन तक चलता आ रहा है। विशुद्ध तकनीकी रूप से आँकेंगे तो शायद तीसरे सीजन के गीत को आप अलग रखना चाहें, लेकिन अगर भाव और अर्थ के विस्तार के हिसाब से देखेंगे तो एक ही गीत का विकास होता हुआ पाएँगे।


यह गीत 'ऐसे क्यूँ', पहले दोनों सीजन में इसी नाम से है। तीसरे सीजन का गीत है 'इश्क है'। संगीतकार हैं अनुराग सैकिया और गीतकार हैं राज शेखर। पहला सीजन 2020 में आया था। उसमें जो 'ऐसे क्यूँ' गीत है, उसकी धुन थोड़ी ट्रेंडी किस्म की है। पहला सीजन है, प्यार की कोंपलें अभी फूट ही रही हैं। गीत की शुरुआती पंक्तियाँ कुछ ऐसी हैं -


"ज़रा ज़रा अभी बात शुरू हुई 

मगर खुश हूँ मैं आजकल 

अभी तलक मेरी शाम तो ऐसी न थी 

जैसी हल्की है आजकल "


प्रेम जीवन को हल्का कर देता है। जीवन भारी नहीं लगता। प्रेम की पुलक व्यक्ति को जिजीविषा से भर देती है। उसके लिए दुनिया के रंग बदलने लगते हैं। उसका मन आशा और अपेक्षा से भर जाता है। तभी तो वह किसी से पूछना चाहता है -


"एक दिन हौले से

तुमसे है ये पूछना

रातें तेरी भी थोड़ी फ़िरोज़ी

फ़िरोज़ी सी हैं भी क्या"


हिंदी फिल्मों के गीतकार को बहुत सारी बंदिशों के साथ गीत लिखना होता है। लेकिन इसके बावजूद उसके लिखे में उसका अपना व्यक्तित्व, फिल्मी गीतों की परंपरा और उसका समय तो बोलता ही है। ऊपर की पंक्तियों में फ़िरोज़ी रंगा का जिक्र आते ही क्या वहीदा रहमान की याद नहीं आ जाती, "आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है" गाते हुए? क्या वही उल्लास, वही उन्मुक्तता 'ऐसे क्यूँ' की इन पंक्तियों में नहीं झलकती। प्रेम व्यक्ति को स्वतंत्र करता है, स्वतंत्र होने की प्रेरणा देता है। हौले से पूछता है और मन को उल्लसित कर जाता है। इसी उल्लास और उन्मुक्तता को 'ऐसे क्यूँ' पकड़ता है बखूबी।


गीत का अंतिम अंतरा नायिका की तरफ से है। वह कहती है "कुछ तो लिखती हूँ, लिख के मिटाती हूँ"। प्रेम यह बताता है कि बेवजह की जाने वाली बातें भी जीवन को अर्थपूर्ण बना जाती हैं कई बार। वैसे भी कविता या गीत सिर्फ अर्थ नहीं, उनमें सिर्फ कार्यकारण संबंध नहीं होता। उसी अंतरे की अगली पंक्तियों में एक प्रश्न है, जिसे हम नायिक की घोषणा भी समझ सकते हैं-


 "दिल को यूँ खोलना 

   सबकुछ कहकर ही

   सबको बताना ज़रूरी है क्या"


यह बात प्रेम के संबंध में कितनी सटीक है! और खासकर हमारे समाज में एक लड़की ओर से सोचें, तब तो और भी। जब लोग बात का बतंगड़ बनाने को तैयार बैठे हों, तब कहाँ-कहाँ सफाई दी जाएगी। मेंहदी हसन की गाई एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ तो याद होंगी ही -


" किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम 

   तू मुझसे खफा है तो ज़माने के लिए आ"


बात वही है कि कुछ कहकर आफत क्यों मोल ली जाए। प्रेम का घटित होना ज्यादा जरूरी है, प्रेम के उद्घाटित होने से !


पहले सीजन का गीत इन्हीं पंक्तियों के साथ समाप्त होता है। कमाल की बात यह देखिए कि करीब दो साल बाद जब दूसरा सीजन आता है तो 'ऐसे क्यूँ' गीत की शुरुआत पहले सीजन के गीत की आखिरी पंक्तियों से ही होती है। प्यार का सफर जारी है, दो साल बाद भी। इस बार मौसम गजलनुमा है मगर ! यह पूरा गीत नायिका की तरफ से गाया गया है। गीत शुरू तो होता है उसी बात से कि " सबकुछ कहकर ही सबको बताना ज़रूरी है क्या"। लेकिन देखिए ख्वाहिश क्या है -


" उसके होठों पे

अच्छा लगता है मेरा नाम 

कुछ भी बोले वो 

मन में घुलता है ज़ाफ़रान 

गिरता है गुलमोहर 

ख़्वाबो में रात भर 

ऐसे ख़्वाबों से बाहर निकलना ज़रूरी है क्या"


प्रेम कितना विरोधाभासी होता है। एक तरफ तो यह तर्क कि सबकुछ कहकर ही कहा जाना कहाँ जरुरी है, और दूसरी तरफ यह इच्छा कि प्रियतम के होठों पर मेरा नाम आए! अगर बदनामी का अंदेशा था, तो अब कहाँ गया। और यदि बात को समझ लेने की बात है, तो दोनों पक्ष ही बात को क्यों न समझें? एक पक्ष ही क्यों बोले ? यहाँ पर गीतकार, संगीतकार और निर्देशक की चतुराई भी काम कर रही है। रेखा भारद्वाज से यह गीत गवा कर इसे नायिका का गीत होने आभास दिया गया है। आप यदि गीत को पढ़ें तो यह पाएँगे कि यह बात तो दोनों पक्षों में से कोई भी ये बातें कह सकता है। कहा ही गया है 'प्रेम गली अति साँकरी...!'


शैलेन्द्र के गीतों में अक्सर जीवन-दर्शन भी पिरोया हुआ रहता था। इस गीत के आखिरी अंतरे की पंक्तियाँ देखिए -


"बीता जो वाकया

 सोचूँ मैं क्यूँ भला

 बीती बातों से दिल को दुखाना जरूरी है क्या"


ये पंक्तियाँ सिर्फ प्रेम-संबंधों के बारे में नहीं है, बल्कि जीवन के हर पहलू में भी उतनी ही कारगर पंक्तियाँ हैं। हमें साहिर भी याद आ जाते हैं"मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया...।" हमें यह भी याद आ जाता है "बीती ताहि बिसारि के...।" और हमें राज शेखर का ही एक गीत याद आ जाता है-" मूव ऑन"।


'मिसमैच्ड' का तीसरा सीजन 2024 में आया। इसमें एक गीत है" इश्क़ है"। यह गीत एक कव्वाली की शक्ल में है। याद करें कि राज शेखर की पहली फिल्म 'तनु वेड्स मनु' का बहुचर्चित गीत 'ऐ रंगरेज़ मेरे' भी एक कव्वाली के रूप में ही था। वह गीत भी इश्क़ की एक अलग ही दास्तान था। जिसने भी वह गीत सुना हो, गीत फिर छूटता ही नहीं, बना रह जाता है। साथ ही रह जाता है, गाहे बगाहे याद आते। गीत के शीर्षक के अनुसर देखेंगे तो यह गीत 'इश्क़ है', 'ऐसे क्यूँ' से अलग गीत है। लेकिन गीत के भाव और अर्थ के विकास के अनुसार देखेंगे तो तीनों गीतों में एक तारतम्य दिखेगा। पहले गीत में प्रेम की प्रथम अनुभूति की बात है, उसे समझने, उसे छुपाने, सहेजने की बात है। दूसरे गीत में बार-बार सुनने-मिलने की इच्छा की बात है। प्रेम में नई शुरुआत की बात है, बीती हुई बातों को बिसार कर आगे बढ़ने की बात है। तीसरे गीत तक आते-आते प्रेम व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ चला है। प्रेम ही है जिसने दुनिया को रहने के लायक बनाया है। हर तरफ प्रेम ही प्रेम है। गीत की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-


" रोशनी ही रोशनी है चार सू, जो चार सू

  इश्क़ है ये इश्क़ है इश्क़ है ये इश्क़ है 

  जो छुपा है हर नज़र में हर तरफ़ जो रू-बरू 

  इश्क़ है ये इश्क़ है इश्क़ है ये इश्क़ है "


आगे गीत में पंक्ति आती है-


 "साया मेरा है तू और मैं तेरा

  तू दिखे या ना दिखे तेरी खुशबू कू-ब-कू"


प्रेम जब होता है तो ऐसी ही होता है। हर तरफ प्रेम ही प्रेम। प्रेम एकाकार कर देता है, मेरे व तेरे के भेद को मिटाकर। प्रेम इतना ही करता है। प्रेम बंधनमुक्त करता है। प्रेम व्यक्ति को स्वतंत्र कर देता है। प्रेम बाँधता भी है, उन्मुक्त भी करता है। गीत की पंक्तियाँ हैं-


"कोई कहता है इश्क़ हमें आबाद करता है 

कोई कहता है इश्क़ हमें बर्बाद करता है 

ज़ेहन की तंग दीवारों से उठकर मैं कहता हूँ 

इश्क़ हमें आज़ाद करता है"


हिंदी फिल्मों के दायरे में बँधकर, बहुत ही आसान शब्दों में यह गीत कितनी बड़ी घोषणा कर गया है। इश्क़ में तंगदिली के लिए कोई जगह नहीं होती। इश्क़ हमें तंगदिली से बाहर निकालता है, खुली हवा में साँस लेना सिखाता है। प्रेम हमें कृतज्ञ होना भी सिखाता है। आज के इस घोर प्रतिद्वंद्विता के समय में, जब हर व्यक्ति पूरी तरह

आत्मकेंद्रित हो गया है, प्रेम हमें दूसरों की महत्ता स्वीकार करने की सलाहियत देता है -


"तुमसे मिले तो बैठे बिठाए

 छूने लगे हैं आसमाँ

 तुमसे मिले तो छोटा-सा किस्सा

 बनने को है दास्ताँ"


गीत के शुरू में पंक्ति आती है "साया मेरा है तू और मैं तेरा"। यानी अभी ईगो के कुछ अंश बचे हुए हैं शायद। प्रेम में ईगो के लिए जगह नहीं होती। तभी तो बाद में गीत में पंक्ति आती है " सारा मेरा हो तू और मैं तेरा"। जिगर मुरादाबादी ने भी कहा है -


"तू नहीं मैं हूँ, मैं नहीं तू है 

अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे"


बिना 'स्व' को खोए प्रेम मिल ही नहीं सकता। प्रेम जब विस्तार पाता है तो पूरी दुनिया को अपना बना लेना चाहता है। पूरी दुनिया का हो जाना चाहता है। यह प्रेम का जादू है। जिगर मुरादाबादी ने ही कहा है -

"इक लफ़्ज़े-मुहब्बत का अदना ये फ़साना है

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है"


'ऐसे क्यूँ' प्रेम की सहज अभिव्यक्ति है। यह गीत तीन सीजन का सफर पूरा करता है, भले ही तीसरे सीजन में एक अलग नाम से। पहले सीजन में संशय की थोड़ी गुंजाइश है-


"क्या है ये माजरा

कुछ तो है मिल रहा

या फिर मैं ही बस

मन ही मन किस्से बनाने लगा"


लेकिन तीसरे सीजन तक आते प्रेम पर विश्वास पूर्णता प्राप्त कर लेता है -


"सारा मेरा हो तू और मैं तेरा

तू दिखे या ना दिखे तेरी खुशबू कू-ब-कू"


प्रेम चार सू है, कू-ब-कू है और हर तरफ रू-ब-रू है। यह इच्छा कि सारा मेरा हो तू और मैं तेरा, यह अगर सचमुच किसी के मन में जग जाए तो पूरी भी होगी-


" जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥"


शर्त यह है कि 'सत्य सनेहू' होना चाहिए।


राज शेखर के गीतों में प्रेम के विविध आयाम मिलते हैं। 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' के एक गीत की पंक्तियाँ देखिए -


"हो गया है प्यार तुमसे 

तुम्हीं से एक बार फिर से 

बोलो अब क्या करें?"


सुपरहिट फिल्म 'एनिमल' के एक गीत की ये पंक्तियाँ देखिए -


" पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ 

 पहली दफ़ा ही मिल के लगा"


प्रेम की कितनी अभिव्यक्तियाँ !


फरवरी फागुन का महीना है। आपके अंदर फाग के जागने का। दुपहर की धुक्कड़ का भी समय है। हल्के वॉल्यूम में 'ऐसे क्यूँ' बजाइए किसी दुपहर और महसूस कीजिए प्रेम का बरसना आसमान से, पैरों के नीचे ज़मीं का उड़ना। महसूस कीजिए 'इश्क़ में सफ़र आसमानी'। अगर इस गाने की आवाज पास वाले घर या इमारत से उठकर आप तक पहुँच रही हो, तो फिर आप यकीं मानिए कि फागुन का जादू चलकर ही रहेगा!


करीब पन्द्रह वर्षों से गीतकार के रूप में सक्रिय राज शेखर के गीतों की संख्या अभी सौ भी नहीं पहुँची है, लेकिन आप उनके गीतों को सुनेंगे तो समझेंगे, क्या असर होता है !



बुधवार, 22 सितंबर 2021

मजनू का टीला


 


मजनू के टीले पर राज शेखर

 

मजनू संज्ञा भी है, विशेषण भी है और कभी- कभी क्रिया भी !  आप भी सोचिए । चर्चा की जाएगी आगे ।

 

दिल्ली में है दिल्ली विश्‍वविद्यालय यानी कि नॉर्थ कैम्पस । उसके पास एक इलाका है जिसका सरकारी नाम रख दिया गया है न्यू अरुणा नगर लेकिन लोग जिस नाम से उसे पहचानते हैं वो है मजनू का टीला। लैला- मजनू वाले मजनू नहीं, बल्कि एक सूफ़ी संत । कहते हैं मजनू के टीले के धागे एक सूफ़ी फ़कीर, एक सिख गुरु से लेकर तिब्बती संस्कृति से बँधे हुए हैं । होने को तो मजनूँ का टीला थोडा बदनाम भी है । लेकिन यही मजनू का टीला राज शेखर, हमारे और आपके राज शेखर के लिए उम्मीद का दूसरा नाम है । वे कहते हैं मजनू का टीला हमेशा मेरे लिए एक उम्मीद का दूसरा नाम लगता है मुझे वो । जब मैं वहाँ पचास- साठ साल की किसी महिला की आँखों में देखता हूँ वो धूप जिसमें कि वो अपने संदूक से कपड़े निकाल कर सुखाती है कि शायद किसी दिन उनका देश तिब्बत आज़ाद हो जाएगा और वो वहाँ लौट जाएँगे तो मुझे उस धूप की याद आती है हमेशा मजनू का टीलासे फिल्मों के गीतकार राज शेखर अपनी बात, अपनी तरह की बात करने के लिए आ पहुँचते हैं मजनू के टीलेपर । दिल्ली वाले मजनू  के टीले पर नहीं, बल्कि इस पर, जैसा कि वो कहते हैं –

 

            ये जो कुछ भी है

              कविता

              कविता- कहानी के बीच की

              कुछ चीज़ें

              कुछ घटनाएँ

              संस्मरण

              बतकही

              इस सब को एक नाम दिया है –

              मजनू का टीला

 

मजनू का टीला एक कार्यक्रम है जिसे राज शेखर स्वरूप भात्रा के साथ मिलकर प्रस्तुत करते हैं । ज्यादातर इसमें राज शेखर की लिखी हुई कविताओं की प्रस्तुति होती है । स्वरूप इस प्रस्तुति में संगीत के स्वर भरते हैं अपने गिटार से और कभी- कभी गायन से । फिल्म निर्माण की बंदिशों के बाहर राज शेखर का कवि मन अपने इसी मजनू के टीले पर आकर आराम करता है, उडान भरता है नए क्षितिजों की तरफ़ । आज कविताएँ मनों नहीं टनों के हिसाब से लिखी जा रही हैं । उनमें अच्छी कविताओं का प्रतिशत कितना होता है, कहने की आवश्यकता नहीं । और उन कुछ अच्छी कविताओं में कितनों का पाठ,  खुद कवियों द्वारा भी, अच्छे से निभ पाता है, इसको भी अलग से कहने की जरूरत नहीं । अमिताभ बच्चन ने हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का पाठ किया है, जो एक रिकॉर्ड के रूप में आया था बच्चन की आवाज़ में बच्चन। उस बारे में हरिवंश राय बच्चन की टिप्पणी की थी - कविता लिखना कला है तो कविता पढ़ना भी कला है । अच्छी कविता यदि अच्छी तरह से पढ़ी जाए, यानी कलापूर्ण ढंग से, तो निश्‍चय वह अधिक प्रभावकारी सिद्ध होगीमजनू का टीलामें प्रस्तुत कविताएँ लिखने और पढ़ने दोनों ही कलाओं के कारण मन मोह लेती हैं । अच्छी कविता की अच्छी प्रस्तुति ।

 

राज शेखर ने कहा है कि मजनू का टीलाकविता- कहानी के बीच की भी कुछ चीज़ है । कहानी सुनाने वाला तत्त्व उनकी कविताओं में आसानी से लक्षित किया जा सकता है । और मजनू का टीला की प्रस्तुतियों में आप आसानी से इस बात को देख सकते हैं कि सिर्फ एक कहानी कहने वाला ही नहीं फिल्मों का एक निर्देशक भी वहाँ उपस्थित है । वे जिस तरह से पाठ के प्रवाह को संचालित करते हैं , जिस तरह से संगीत का इस्तेमाल किया जाता है वह आपके सामने एक पूरी पिक्चर को सामने रख देता है । उनकी कविताओं के शीर्षक भी इस बात की तस्दीक़ करते हैं । कुछ उदाहरण  - प्रेम बारिश और इन्‍क़लाब’ , ‘ Once in a Blue Moon’,  नमकीन हवा’, ‘ यक़ीन। कविता की छंदों से मुक्‍ति के बाद कविता के पाठ, उसकी अदायगी का महत्त्व बहुत बढ़ गया है । छपी हुई कविता को पढ़ते समय लय को पकड़ पाना आसान नहीं है । और यह भी तय है कि लय में भी कविता के अर्थ के कुछ हिस्से छिपे होते हैं । इसीलिए किसी कवि से उसकी कविता का पाठ सुनना एक अलग ही अनुभूति देता है । ऊपर चर्चा की गई कविता प्रेम बारिश और इन्‍क़लाबकी कुछ पंक्‍तियाँ ऐसी हैं ‌–

 

            पता है मुझे

            कविता से

            कम से कम मेरी कविता से

            न निज़ाम बदलता है

            न प्रेमिका मानती है

            न ही बादल आते हैं

 

            बहेलिया नहीं बदलता अपना मन

            कुल्हाड़े लिए हाथ नहीं रुकते

            कोई इन्‍क़लाब कहाँ आ पाता है

            इन कविताओं से ?

 

इन कविताओं को सिर्फ पढ़ते हुए जो अर्थ और भाव पकड़ में आते हैं, वही जब इसको आप यूट्यूब पर प्रस्तुत किया जाता देखते हैं तो उसका एक अलग ही असर, अलग ही रंग चढ़ता है ।

 

राज शेखर की कविताओं को देखते- सुनते और बाद में फिर गुनते हुए इस बात पर ध्यान जाता है कि वे लगातार उम्मीद की उस धूप की तलाश, उसकी उम्मीद में हैं जिसकी चर्चा वो मजनू का टीलाकी बात के साथ करते हैं । ऐसी कुछ पंक्‍तियाँ देखी जा सकती हैं – क्या पता / अगर ज़िंदा रह गया/ तो/ प्रेम बारिश और इन्‍क़लाब/ सब आ जाए किसी दिन    ताकि सूखती धोती पर / एक बाबा और पोते के बीच / बातचीत हो अपने पुरखों पर । या फिर यह पंक्ति और माँ/ जब पचफोरन से दाल छौंकती है/ तो लगता है/ सब ठीक हो जाएगा । उम्मीद की धूप बार- बार जगह- जगह राज शेखर की कविताओं में आती रहती है।

 

राज शेखर की कविताओं में संगीत के लिए खास जगह रहती है । लगता है कि राज शेखर एक निर्देशक की नज़र से अपनी कविताओं और उनकी प्रस्तुति को भी देखते हैं । इस कारण उनकी प्रस्तुति एक अपनी संपूर्णता, अपने पूरे पैकेज के साथ उपस्थित होती है । कई कविताओं में स्वरूप के गुनगुनाने के अंश होते हैं जो कविता को और भी मार्मिक बना देते हैं । Once in a Blue Moon   के अंत में बांग्ला गीत की कुछ पंक्तियों को स्वरूप द्वारा गुनगुनाना या फिर किसी लंबे सूने रस्ते पर के अंत में ओ निर्मोहीका गुनगुनाया जाना । सब ठीक हो जाएगाकविता के अंत में स्वरूप छठ के गीत की धुन गुनगुनाते हैं, यह भी इस छोटी -सी कविता को भाव-विस्तार देता है । जिस पैकेज की बात कर रहा हूँ , उसके एक शानदार उदाहरण के लिए कम से कम एक बार जंतर मंतर पर लोरीको ज़रूर सुनना चाहिए । यूट्यूब पर उपलब्ध है । उसमें भी अगर GIFLIF वाला वीडियो देखा जाए तो उस असर को ज्यादा समझा जा सकेगा जो राज शेखर की यह कविता/ गीत या कहानी बल्कि क्या नहीं, मन पर डालती है ।  कुइयां-मुइयां गीत भी इसी तरह का है । इसकी संगीतात्मकता देखने योग्य है । इसकी चार पंक्तियों को पेश करने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा –

 

                  चंदा के पंजे में

                  मेघों का छत्‍ता है

                  छत्‍ते में मम मम मम

                  महुए का पत्‍ता है

                  पत्‍ते से हरे भरे

                  टहनी वाले पेड़ हम    

 

ऊपर कहा गया है कि मजनू संज्ञा भी है, विशेषण भी और कभी- कभी क्रिया भी । बृहत् हिन्‍दी शब्दकोश बताता है कि मजनू संज्ञा है यानी प्रेमकथा लैला- मजनू का नायक । मजनू विशेषण भी है जिसका अर्थ हुआ पागल, बावला, आशिक, किसी पर मर मिटने वाला । शब्दकोश यहीं पर रुक जाता है । अब इसे हम मजनू का टीला से जोड़कर भी देखें । एक मजनू का टीलावो है जो दिल्ली में है यानी कि संज्ञा । एक मजनू का टीलाराज शेखर का जो कि अब विशेषण हो गया है । अपने हुस्नो- अंदाज़ की वजह से । अब रही बात क्रिया बनने की । मजनू होना या मजनू- सा होना/  दिखना अलग बात है लेकिन कभी- कभी आदमी मजनू बनता जाता है, मजनू बना रहता है यानी कि वह कर्म नहीं क्रिया हो जाता है । ठीक वैसे ही राज शेखर मजनू का टीलाबनाते हैं, बनते हैं , बने रहते हैं – वर्क इन प्रोग्रेस। संज्ञा या विशेषण हो जाना, रूढ़ हो जाना है जो कवि राज शेखर को पसंद नहीं । तभी तो वे कहते हैं –

           

            मैं प्रतिक्रिया था

            अब संज्ञा हूँ

            मेरा विशेषण बन जाना

            मेरी उपलब्धि होगी

            पर मुझे विशेषण नहीं बनना

            क्रिया होना है

            क्योंकि वो मेरी संभावना है

            और

            हम सब में

            ये संभावनाएँ हैं !

 

इसी संभावना, इसी धूप की याद उन्हें मजनू का टीलासे आती है और हमें उनके मजनू के टीले से।

 

पुराने कवियों के बारे में सुनता था कि फक्कड़पन और मस्ती उनका स्वभाव होता था। राज शेखर ने भी क्या वही स्वभाव पा लिया है? न कविताओं को सामने लाने की तत्परता , न उन्हें सँजोने की सजगता । इनका जो मजनू का टीला है या और भी जो कविताएँ हैं वो ऐसे ही बिखरी पड़ी हैं , यूट्यूब पर , ट्विटर पर, फेसबुक पर । ऐसी ही एक बहुत खूबसूरत कविता छठपर है । उसे ढूँढ कर सुनिएगा । क्या ऐसी कविताओं को सँजो कर नहीं रखा जाना चाहिए ? लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि राज शेखर किसी ह्ड़बड़ी में, किसी आतुरता में आ जाएँ । वे खुद भी इस बात को भली-भाँति समझते हैं । अपनी एक कविता में अपने पाठकों, श्रोताओं, दर्शकों से वे कहते हैं – ... पर आज तुमने एक शर्त रखी/ तभी मिलेगा तुम्हारा प्यार/ तभी बना रहूँगा/ तुम्हारा कलाकार । फिर इसी कविता में आगे कहते हैं – तो मैं इन्‍कार करता हूँ/ इस एकतरफा/ मोल-भाव से, बारगेन से/ मुझे तुम्हारी शर्तें कबूल नहीं हैं । लेकिन वे अपने पाठकों के प्रति प्रतिबद्ध हैं , तभी इस कविता के अंत में वे कहते हैं –

 

            तुम जानो

            क्या रिश्ता रखना है मुझसे

            मेरी बात और है

            मैंने तो मुहब्बत की है !

 

 

किसी कवि को सँभालना पाठकों, श्रोताओं का भी काम है और प्रकाशकों का भी । यह बात समझ लेने में देर नहीं की जानी चाहिए ।

 

 Begaluru Poetry Festival, 2016 से मजनू का टीलाकी औपचारिक प्रस्तुति शुरू हुई । फिर बहुत सारी जगहों, बहुत सारे मंचों तक यह मजनू का टीला पहुँचा । कोरोना के लॉकडाउन के पहले मुम्बई के प्रतिष्‍ठित पृथ्वी थियेटर में इसकी दो हाऊसफ़ुल प्रस्तुतियाँ हुईं । उम्मीद करें कि अब स्थितियाँ बेहतर होती जाएँगी और यह भी कि कवि भले ही फक्कड़ हो जनता उसके प्रति लापरवाह नहीं होगी । उम्मीद की गवाही देती राज शेखर की इन पंक्तियों के साथ आपको छोड़ जाता हूँ ‌ -

                    यक़ीन

                  सबसे स्याह रात के पूरब से

                  आएगा सबसे लाल सूरज

                  बस, तुम्हारी उम्मीद भरी आँखों के लिए ।

 

अंत में एक डिस्क्लेमर कि कविताओं के जो उद्धरण ऊपर दिए गए हैं , उन्हें सुन कर लिखा गया है , इसलिए पंक्तियों का संयोजन इन पंक्तियों के लेखक के हिसाब से दिया गया है ।