शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

बा-खबर हो

 

बा-खबर हो

 

दर्द  अपना  ही   यहाँ

बस जानता है आदमी

दूसरों  का  दर्द   देखो

जान  के  डर  जाओगे

 

कल वहीं है, जो  जहाँ था

क्यों खींचना उसे आज पर

आज को बाँहों में भर लो

जो कर सको तर जाओगे

 

अपनी ज़िद में  आदमी

कुछ देख पाता ही नहीं

यूँ   करोगे   अपनी  ही

आँख से गिर जाओगे

 

तुम  तो  दरिया  हो अगर

चलते रहे तुम एक सिम्त

एक दिन जा कर, समंदर

से  गले   मिल  जाओगे

 

जो मिला है  उसको तो

पहले सँभालो तुम यहाँ

उम्र    छोटी   है   बहुत

क्या-क्या भला कर पाओगे

 

इस  कदर  खीजे रहोगे

कुछ न फिर हो जाएगा

उम्र   भर   रोते   रहोगे

एक  दिन  मर  जाओगे

 

दर्द    की   रेखा   अगर

मिटती नहीं है, फिर सुनो

दाग  माथे  का  बना लो

चाँद- सा खिल जाओगे

 

खैरियत  भी  चाहते  हो

तँग  भी  करते  हो   तुम

इस  तरह  तो  क्या  पता

किसका भला कर पाओगे   छंद-७


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