शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

ढीठ

 

ढीठ

 

कम से कम कपड़े अश्‍लील नहीं

अश्‍लील है जरूरत से ज्यादा कपड़े

                                                अरुण कमल

 

कम-से-कम नहीं

ज्यादा-से-ज्यादा । हर सू जीवन—  बस तलब, बस तगादा ।

आमों के मौसम में बेतहाशा आम । चिकेन-मटन की घर में बहार सुबहो-शाम । चाय-कॉफी-ठंडा, इनकी तो गिनती ही नहीं । कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पलें भी सब गिनती की हद से बाहर । एसी, फ्रिज, टीवी, माइक्रो, वाशिंगमशीन साधन आदि इत्यादि ।

घर में काम करने आती लड़की । झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन और खाना पकाना । देश-जहान की बातें उससे, किस्से महँगी चीजों के । उसका हँसना, उनका हँसना । कहीं जमीन, कहीं आसमाँ । चाय-नाश्‍ता-खाना-पानी, मिठाई-मलाई के भोग सरासर सामने उसके । पूछना तक नहीं कभी । रोज-रोज की तो छोड़ ही दें अभी । वे  ढीठ बने रहते हैं, आँख मिलाए बिना ।  


1 टिप्पणी: