ढीठ
कम से कम
कपड़े अश्लील नहीं
अश्लील है
जरूरत से ज्यादा कपड़े
अरुण
कमल
कम-से-कम
नहीं
ज्यादा-से-ज्यादा
। हर सू जीवन— बस तलब, बस तगादा ।
आमों के मौसम में बेतहाशा आम । चिकेन-मटन की घर में बहार सुबहो-शाम । चाय-कॉफी-ठंडा, इनकी तो गिनती ही नहीं । कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पलें भी सब गिनती की हद से बाहर । एसी, फ्रिज, टीवी, माइक्रो, वाशिंगमशीन साधन आदि इत्यादि ।
घर में काम
करने आती लड़की । झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन और खाना पकाना । देश-जहान की बातें उससे,
किस्से महँगी चीजों के । उसका हँसना, उनका हँसना
। कहीं जमीन, कहीं आसमाँ । चाय-नाश्ता-खाना-पानी, मिठाई-मलाई के भोग सरासर सामने उसके । पूछना
तक नहीं कभी । रोज-रोज की तो छोड़ ही दें अभी । वे ढीठ बने रहते हैं, आँख मिलाए
बिना ।
सही 👍
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