ढिठाई
कम से कम
कपड़े अश्लील नहीं
अश्लील
है जरूरत से ज्यादा कपड़े
अरुण
कमल
कम-से-कम
नहीं
ज्यादा-से-ज्यादा
। हर सू जीवन— बस तलब, बस तगादा ।
आमों के
मौसम में बेतहाशा आम । चिकेन-मटन की घर में बहार सुबहो-शाम । चाय-कॉफी-ठंडा, इनकी तो गिनती ही नहीं । कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पलें भी
सब गिनती की हद से बाहर । एसी, फ्रिज, टीवी,
माइक्रो, वाशिंगमशीन साधन आदि इत्यादि ।
घर में
काम करने आती लड़की । झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन और खाना पकाना ।
देश-जहान की बातें उससे, किस्से महँगी चीजों के । उसका हँसना,
उनका हँसना । कहीं जमीन, कहीं आसमाँ ।
चाय-नाश्ता-खाना-पानी, मिठाई-मलाई के
भोग सरासर सामने उसके । पूछना तक नहीं कभी । रोज-रोज की तो छोड़ ही दें अभी ।
वे ढीठ बने रहते हैं, आँख मिलाए बिना ।
भगवान के
घर दान और चढ़ावा । आने-जाने का खर्चा अलग । पेट काटकर लोग कौड़ी-कौड़ी जोड़ते हैं, मन्नतें मानते हैं, द्वार पर मत्था टेकने जाते हैं ।
जो किसी भी तरह समर्थ नहीं, पथराई आँखों से तकते हैं आसमान को
। लड्डू-पेड़े-पनतोवे जिनको पाना है, वे पाते हैं ।
भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और साधन आवागमन के , जैसे सब एक ही पलड़े में
रखे हैं । स्कूलों में यूनिफॉर्म है, भारी-भरकम फीस है और किताबें
महँगी हैं । शिक्षा जरूर समान अवसर मुहैय्या कराती है । बस, सबको
समान शिक्षा का समान अवसर नहीं मिलता । निजी अस्पताल हैं कारोबारी और सरकारी सरकारी
हैं । दुनिया में बराबरी एक दिवास्वप्न है
। चिंतित है, दुखी-पीड़ित है , लाचार-विवश
है , मगर आँकड़ों में सब चकाचक है, मस्त-मगन
है । कोई टैक्स नाम की चीज है, कोई रिश्वत जैसी बात है । जिससे
जैसा बन पड़ता है, बचा लेता है, या फिर योगदान
दे देता है ।
मुखर लोगों
को, चापलूसों को, पद या फिर कद वालों
को मिल जाती है सारी सहूलियत और मदद । चुप रहने वाले चुपचाप काम किए जाते हैं,
गरदन झुका जिए जाते हैं । उत्पाती लोगों की माँगें पूरी कर दी जाती हैं
। मौके पर हाँ में हाँ मिला दे जो, उसको कार्योत्तर समर्थन,
उसकी मंजूर सब बकवास । समर्पण सफलता का गलियारा बन जाता है और गिरना
बड़े होने का पर्याय ।
ज्यादा-से-ज्यादा
अपनी चिंता, अपने स्वार्थ की सिद्धि , अपनी
भरी तिजोरी, सारे सुख-चैन, ऐशो-आराम । यानी
कम-से-कम होना इन्सान ।
ज्यादा-से-ज्यादा
सब अपना , कम-से-कम सब औरों का । इतनी है ढिठाई...!
सही 👍
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