मंगलवार, 14 जुलाई 2026

‘मित्रो मरजानी’: स्त्री का सत

 

मित्रो मरजानी: स्त्री का सत

 

कृष्णा सोबती का बहुचर्चित उपन्यास मित्रो मरजानी के प्रकाशन के  साठ वर्ष हो गए हैं। आज भी यह उपन्यास उतना ही चर्चित है । मित्रो यानी समित्रावन्‍ती इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र है । मरजानी पंजाबी भाषा में बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला शब्द है । इससे नटखट या बदमाश लड़की का अर्थ लिया जाता है। दूसरा अर्थ किताब के अंग्रेजी अनुवाद के शीर्षक के रूप में ले सकते हैं । 2007 में प्रकाशित गीता राजन और राजी नरसिम्हन द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद का शीर्षक है— 'To Hell with you, Mitro' । असल में मरजानी संबोधन पूरी किताब में एक ही बार आता है, वह भी जब मित्रो खुद को मित्रो मरजानी कहती है ।

उसी जमाने की फिल्म 'वक़्त' का मशहूर संवाद है " चिनॉय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते” । बिना कहे ही मित्रो बार-बार यह संवाद लोगों को सुना जाती है । मित्रो मरजानी की चर्चा मित्रो के किरदार की बोल्डनेस के कारण ज्यादा हुई । उसके पीछे भी कारण यही है कि बोल्डनेस को हमने स्त्रियों के स्वभाव का हिस्सा नहीं माना, स्त्रियों का गहना तो लज्जा है । हम यह भूल जाते हैं कि सच की तरह लज्जा भी व्यक्ति-सापेक्ष है । मित्रो के स्वभाव की जड़ें उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में दर्शाई गई हैं । यह साठ साल पहले की बात है । आज की फिल्मों और वेब सीरीज में ऐसे कई पात्र मिल जाते हैं जो मित्रो की तुलना में कहीं ज्यादा बोल्ड हैं । बिना किसी लागलपेट, बिना किसी अपराध बोध के या बिना कोई सफाई दिए। 

आज से साठ वर्ष पहले मित्रो अपनी बातों को डट कर कह रही है, बिना किसी संकोच, सबके सामने । मित्रो के विषय में अन्य पात्रों ने कहा है कि मित्रो कभी स्याह, कभी सफेद है । असल में मित्रो लोगों का मुँह देख कर नहीं,परिस्थितियों के अनुसार बात कर रही है ।  'साँच को आँच नहीं ' की तर्ज पर ।  पारिवारिक व सामाजिक आदर्शों में  पुरुष की अनुगामिनी होना ही स्त्रियोचित व्यवहार माना जाता था, जबकि मित्रो सहगामिनी बनने का हक चाहती है । अपनी बोली, चरित्र और स्वभाव पर उठाए जाने वाले प्रश्नों को नजरअंदाज करते हुए मित्रो अपने पति की आर्थिक समस्या को हल करने के लिए बेझिझक अपने गहने निकाल कर दे देती है । उसे अपने पति का साथ चाहिए । उसे अपने तरीके से अपने पति का साथ चाहिए ।

मित्रो के स्वभाव का सबसे मृदुल पक्ष जेठानी के साथ उसके व्यवहार में दिखाई पड़ता है ।  मित्रो प्रेमपूर्ण और निष्कपट व्यवहार को पहचानती है । मित्रो गलत के साथ खड़ी हुई नहीं दिखती । अपनी सास से शिकायतों के बावजूद देवरानी के कुबोलों और  बदतमीजी का जवाब देने उठ खड़ी होती है । देवरानी के भाइयों के चले आने और उनके रूखे-कड़े व्यवहार का प्रतिकार भी मित्रो ही कर सकती थी । इसको इस तरह से देखा जाना चाहिए कि कर्तव्यों के निर्वाह में मित्रो पीछे नहीं हटती, लेकिन बात जब व्यक्ति-स्वतंत्रता की आती है, तब भी वह चुप नहीं बैठ सकती । बल्कि वह आक्रामक हो उठती है। स्त्री अपनी इच्छाओं को लेकर दबी-सहमी सी ही क्यों रहा करेसदाचार और आदर्श व्यवहार के कितने पाठ पढ़ती जाएजिस जमाने की मित्रो है, उस जमाने में जहाँ पुरुष  बराबरी का,या ज्यादा बड़ा भी,भागीदार हो, वहाँ भी सारा दोष स्त्री के सर ही मढ़ दिया जाता था । आज यह स्थिति पूरी तरह बदल गई हो, यह भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते । मित्रो इस अन्याय के खिलाफ एक बेलाग आवाज है ।

प्रसिद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने मित्रो मरजानी के संबंध में कुछ इस तरह से लिखा है -- " रघुवीर सहाय की पंक्ति है -- जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी ? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है ।... मित्रो इसलिए भी अभूतपूर्व है कि बहुत सहज है। यह अभूतपूर्वता असामान्यता नहीं, वास्तविकता से उपजी है" ।  मित्रो की यही सहजता, पाठक को असहज करती है । उसे सोचने और चीजों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए बाध्य करती है । यह तो हम जानते ही हैं कि सहजता का अर्थ सिर्फ सरलता या सुकुमारता ही नहीं होता ।

उपन्यास में मित्रो की देवरानी का पात्र भी मुँहजोर है । लेखिका ने बड़ी बारीकी से दोनों की मुँहजोरी का फर्क बता दिया है । अपनी प्रसिद्ध कहानी 'ठेस' में मुख्य पात्र सिरचन से रेणु जी ने यह संवाद कहलवाया है -- "सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं" । मित्रो के विषय में यही कहा जा सकता है । उसकी देवरानी के विषय में नहीं ।

किसी की बोली और उसका व्यवहार कई बार उसके चरित्र का सही पता नहीं देते हैं । एक शेर की पंक्ति है - " सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है " । निदा फ़ाज़ली ने भी कहा है - " हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना " । स्त्रियों के संबंध में बहुत सारे  बने-बनाए 'टैगबहुतायत में उपलब्ध हैं ,जिसे हर आदमी अपनी सुविधा के अनुसार स्त्रियों पर लगाता चलता है । इस पर तुर्रा तो ये कि स्त्रियाँ भी सर झुकाए स्वीकार करते चलती हैं । मित्रो के व्यवहार, उसकी बोली और लहजे  के आवरणों को हटा कर देखें, तब उसके चरित्र का खरापन सामने आता है ।  मित्रो स्थिति के अनुसार सबसे उचित व्यवहार करती है। न पूर्वाग्रह, न पक्षपात । कभी-कभी आदमी किसी खास सोच के साथ काम करता चला जाता है । फिर कभी अचानक ही बिजली-सी कौंधती है और उस प्रकाश में उसके सामने हर बात स्पष्ट हो जाती है । तब वह अपने पैर वापस खींच लेने में भी नहीं हिचकता। मित्रो के साथ भी ऐसा ही होता है । वह भी अपने चुने हुए रास्ते से एक झटके में वापस आ जाती है । खुद को नई रोशनी में देख अपने पति से कहती है " कहीं मेरे साहब जी को नज़र न लग जाए इस मित्रो मरजानी की !"  यह खुद को ही झिड़क देना मित्रो के उसी स्वभाव की तस्दीक करता है जो सही को सही और गलत को गलत कहने में झिझकता नहीं ।

दरअसल, संसार में जितने भी तरह के नजरिए की हम बात करते हैं, वे सभी किसी न किसी रंग में रँगे हुए होते हैं । स्त्री और पुरुष नजरिए भी । स्त्री और पुरुष क्या मूल रूप से एक ही नहीं? शारीरिक,आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, पारिस्थितिक -- इन सारे आवरणों को यदि हम हटा कर देख पाएँ तो हर जगह एक ही व्यक्ति दिखेग । आवरणों के बदलने से व्यक्ति का व्यवहार भी बदलेगा । स्त्री या पुरुष होना उतना मायने नहीं रखता । हर तरह के चरित्र हर जगह पाए जा सकते हैं। कोई दिखाना क्या चाहता है, हम देखना क्या चाहते हैं, सब इसी पर निर्भर है ।

'सती' होने की प्रथा भले ही आज खत्म हो चुकी हो, अपने लाक्षणिक रूप में तो यह अभी भी मौजूद है । स्त्रियों अपने व्यक्तित्व को, अपने वजूद को दूसरे की इच्छाओं की वेदी पर झोंक देने का काम अभी भी किया जा रहा है । स्त्री का सत यह नहीं । यही मित्रो का मत है, उसकी आवाज है । स्त्री का सत जितना कर्तव्य है, उतना ही उसका अधिकार भी । और इस अर्थ में स्त्री और पुरुष के सत में कोई अंतर नहीं । 

न्यूटन का गति का पहला नियम बताता है कि यदि कोई वस्तु स्थिर है, तो वह स्थिर ही रहेगी, और यदि गतिमान है, तो वह एकसमान गति से सीधी रेखा में चलती रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाहरी असंतुलित बल न लगाया जाए। इसे 'जड़त्व का नियम' भी कहते हैं, क्योंकि यह वस्तु की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।  यथास्थिति को बदलना या अपने कम्फर्ट जोन से निकलना हमेशा ही बहुत कठिन कार्य होता है । और जीवन को जीने योग्य बनाए रखने के लिए यह करना हमेशा ही जरूरी भी रहा है । यहाँ पर ध्यान देने वाली बाते हैं – बाह्य बल और असंतुलित ( यानी की मौजूदा बल से ज्यादा ) बल । मित्रो का व्यवहार यही बल है ।

मित्रो यथास्थिति के विरुद्ध एक मजबूत हस्तक्षेप है। हमें अपने कम्फर्ट जोन से निकल कर देखना ही होगा । मित्रो जैसी मजबूत स्त्री के द्वारा लगाई जा रही ताकत को संसार बहुत देर तक नहीं सह सकता, उसे बदलना ही पड़ता है, रास्ता देना ही पड़ता है । मित्रो की आवाज भले ही साठ वर्ष पुरानी हो, उसकी बुलंदी में कमी नहीं आई है । जुर्म, ज़िद और अधिकारों की माँग में फर्क होता है । जिन्होंने गलत तरीकों से और जरूरत से ज्यादा जगह छेकी हुई हो, उन्हें अपने पैर समेटने ही होंगे, जगह खाली करनी ही होगी ।






 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें