प्रज्ञा गुप्ता
अपने मुहल्ले की ही हैं !
[ प्रज्ञा
गुप्ता के काव्य-संग्रह ‘काँस के फूलों ने कहा जोहार !’
की एक निजी
व्याख्या ]
आपने सेमल के फूल के पेड़ से गिरने की आवाज
तो सुनी ही होगी – धपाक् ! मैंने भी सुनी है, लेकिन अब बरसों बीत चुके हैं सेमल
के उतने करीब गए और वहाँ कुछ देर रुके । घर की छत से सेमल का एक पेड़ दिखता जरूर है
। सेमल के फूल के गिरने की आवाज टनकती या खनकती हुई नहीं होती, बस जज़्ब हो जाती है धरती में जैसे । मेरे भीतर भी यह आवाज जज़्ब हो चुकी है । ‘काँस के फूलों ने कहा जोहार!’ की बहुत सारी कविताओं की
तासीर भी वैसी ही है, आपके भीतर जज़्ब हो जाने वाली । वैसे जिक्र
तो पलाश का भी है किताब में । लेकिन पलाश के साथ एक तो आग-अंगार जुड़ गया है और दूसरे
यह कि उसकी इतनी चर्चा हुई है ! वह राज्यों का राजकीय फूल भी
घोषित हो चुका है । पलाश का ओहदा ऊँचा हो चुका है । सो, वह थोड़ा
पहुँच के बाहर हो गया-सा लगता है । सेमल तो सबकी पहुँच में है। इसके फूलों में अंगारे
नहीं दहकते हैं, इससे जंगल में आग नहीं लगती है । इसके फूलों
में फागुन की पिचकारी से छूटे ताजा, चमकते रंगों के फव्वारे हैं
। खिले-खिले सेमल के फूल लाल-लाल, टह-टह खूब लाल-लाल ! प्रज्ञा गुप्ता
यही ‘खिलना’ अपनी कविताओं में लेकर आईं
हैं । कास के फूल
भी ‘केतकी, गुलाब, जूही , चम्पा, चमेली’ नहीं हैं ! उनका उजलापन जादुई-सा होता है । देखें, तो देखते ही जाएँ ! मन न अघाए । अच्छी कविताओं से भी मन नहीं अघाता।
अनुनासिकता लाड़-दुलार, मनुहार
और किसी को मानने का द्योतक है । अनुनासिकता
शब्दों को एक मुलायमियत, एक सहज अपनेपन से भर देती है । माँ में
चन्द्रबिन्दु आखिर क्यों है ? लिखने को ‘कास’ भी लिखा जा सकता है, लेकिन
इसमें वो बात कहाँ ! कितनी अजीब बात है कि हम हिन्दी से अनुनासिक ( चन्द्रबिन्दु) को हटाने
पर तुले हुए हैं !
जीवन में हर चीज एक लय में , एक रिदम
में है । कविता या गीत हमें इसलिए इतना भा जाते हैं क्योंकि उनके अन्दर भी एक लय होती
है, और वह लय जीवन की लय से मेल खाती है । कविता में यह लय आ
कैसे सकती है ? जो कवि जीवन से जुड़ कर चलेगा, वही इसे संभव कर पाएगा । पोथी पढ़ने से यह नहीं सध सकता । इस संग्रह की कविताओं
में जीवन वही लय विद्यमान है, जो कविता को कविता बना देती है । यह लय है सहजता की
। कविताएँ आरोपित या प्रत्यारोपित नहीं लगतीं । दूसरी खास बात जो कविता में होती है,
वह यह कि वह पढ़ने वाले को आईना दिखा देती है । साहित्य समाज का दर्पण
होगा, पर वह पाठक के लिए भी एक दर्पण है और वह भी आदमकद । पाठक
नजरें बचा नहीं सकता । दरअसल, हम हर रचना में लेखक या अपने किसी जाननेवाले या किसी
जानेमाने व्यक्ति के जीवन की घटनाओं या परिस्थितियों को ढूँढ़ने लगते हैं । उसका एक
कारण यह भी है, कि हम चाहते हैं कि कोई मिल जाए तो हम खुद को
तसल्ली दे सकें कि यह हम नहीं ! हम अपने करतूतों की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं ।
लेकिन इस संग्रह की कुछ कविताएँ बहुत तीक्ष्ण दृष्टि के साथ पाठक के चेहरे पर सवालिया
निगाह डालती हैं, खासकर यदि पाठक पुल्लिंग है ! हूबहू घटनाएँ
या संवाद हों न हों, पाठक अपने जीवन की बहुत-सी बातों को तुरंत याद कर जाता है और एक अपराधबोध या ग्लानिबोध उस पर तारी जरूर होता
है । अपनी माँ, बहन, चाची, भाभी के सामने उसने कभी खाने की थाली
फेंकी हो या नहीं, उनके हँसने के तरीके पर कभी टोका हो या नहीं,
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उन्हें कभी औड़म-बौड़म कहा हो या नहीं, वह जानता है कि ऐसी ही कोई न कोई बात तो वह कर चुका है या कभी भी कर सकता है
! ‘मेल-ईगो’ किसी से दबाया जा सका है कभी
! दो-एक साल पहले एक फिल्म आई थी ‘डॉक्टर G’
।
इस फिल्म में, परिस्थितियों के फेर से, फिल्म का नायक मेडिकल कॉलेज
में गायनाकोलॉजी की पढ़ाई करने आता है । फिल्म के नायक का विभाग बदल नहीं पा रहा,
और उसका मन इस विभाग में लग नहीं रहा । ऐसे में एक दिन उसकी प्रोफेसर
उससे कुछ ऐसा कहती है “ अपने अंदर से ‘मेल टच’ को निकालो और ‘डॉक्टर-टच’ को लाओ,
तभी तुम स्त्रियों के डॉक्टर यानी गायनाकोलॉजिस्ट बन सकते हो” । एक भाई
या पिता के रूप में हमारी सशंकित निगाहें बहनों-बेटियों के साथ रास्ते में कुछ दूर
तक जाती हैं । एक बच्ची अपनी माँ से हिम्मत माँगती है कि वह बड़ी होकर अकेली बस स्टॉप
से घर आ सके । यह सारा मसला ‘मेल-टच’ और
‘मेल-गेज़’ का है । पति, पिता, भाई -- कोई भी इसलिए निश्चिंत नहीं हो पाता कि
वह भी अपने भीतर के ‘मेल टच’ और ‘मेल-गेज़’ की करतूतों को बखूबी जानता है । ‘मेल-ईगो’, मेल-टच’ और ‘मेल-गेज़’ की त्रयी जीवन को सहज-सरल नहीं रहने दे रही
। और सुधरना उसे आता नहीं ! स्त्रियों को हमने
‘रोज एक खबर’ में बदल कर रख दिया है । पुरुष
के अंदर का पशु क्या सचमुच नहीं मर सकता ?
भारत का लगभग हर व्यक्ति ही विस्थापित
है । वह गाँव से निकला हुआ व्यक्ति है । यदि वह खुद नहीं तो उसके एक पीढ़ी ऊपर के लोग
गाँव से ही निकल कर आए हुए हैं । वह गाँव से निकल तो आता है, गाँव उससे
निकल नहीं पाता। लेकिन वह गाँव कभी लौट भी नहीं पाता । एक कवि के लिए राजेश जोशी इसे ही कवि का ‘दोहरी नागरिकता’ का होना कहते हैं । साहिर लुधियानवी
ने एक शेर में कहा है “ मैं और तुमसे तर्क-ए-मुहब्बत की आरज़ू/ दीवाना कर दिया है ग़मे-रोज़गार
ने” । हमारी स्मृतियों की चीजें गायब होती चली जा रही हैं । विस्थापन तो हो ही रहा है, प्रतिस्थापन भी हो रहा है । कोई पन्द्रह वर्ष पहले की बात है, साइकिल पर ले जाए जाते हुए कोयले को दिखाकर अपने बेटे को बताया था कि देखो
कोयला यही होता है । कुछ परिवर्तन जीवन में अवश्यम्भावी होते हैं ! ‘मँझली मौसी’, ‘सँझली मौसी’, ‘बड़के
चाचा’, ‘बड़की भौजी’—हो सकता है आने वाले
दिनों में इन सम्बोधनों के अर्थ समझने-समझाने वाले ही न बचें । भइया और भाई के या दीदी
और बहन के अन्तर को समझाने के लिए उदाहरण कम पड़ जाएँ । मौसेरे, ममेरे, चचेरे, फूफेरे – ये सारे
रिश्ते ही ‘कज़न’ में समाहित हो जाएँ ।
भारतीय संस्कृति में सबसे छोटी इकाई परिवार है । इसका भी अस्तित्व खतरे में है । परिवार
यानी कुटुम्ब । कुटुम्ब या तो अब ‘कुटुम्ब न्यायालय’ के सन्दर्भ में याद आता है, या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को जपने में ! गाँव तो छोड़िए,शहरों में मुहल्ले अपना अर्थ खो चुके हैं । लोग अपने-अपने मकानों, फ्लैटों में सिमट कर रह गए हैं । बात अब तो मकानों के अलग-अलग कमरों और उसमें
भी मोबाइल के स्क्रीनों तक सिमटती जा रही है ।
‘काँस के फूलों ने कहा जोहार!’
की कविताओं में परिवार बार-बार , अलग-अलग बहाने
से आता है । भाँति-भाँति से, अपनी तरह से परिवार को बचाने के
प्रयास में भी हैं ये कविताएँ । इन कविताओं में पारिवारिक-सामाजिक ताना-बाना अपने सौन्दर्य
के साथ उपस्थित है । ‘उड़द की बड़ियाँ’ हैं, तो उसके साथ-साथ प्लास्टिक पर धूप में सूखने के लिए रखे हुए आलू-चिप्स की छवियाँ भी आँखों
में उतर आती हैं । बोइयामों में रखे अचारों की याद मुँह में पानी ले आती है । बहन
के हाथ के बुने स्वेटर के बहाने आप अपने बक्से से माँ या नानी का बुना कोई स्वेटर निकाल
कर धूप में डाल आते हैं, इन सर्दियों में पहने जाने के लिए ।
‘वेजिटेरियन मटन’
कटहल की सब्जी बहुत जोरों से याद आने लगती है । नेनुआ के फूल खिले दिखने
लगते हैं । मालती की भीनी खुशबू नासिका-रन्ध्रों में जाने कहाँ से भर जाती है । ओस
की छुअन की याद आनंद से भर देती है मन को । एक कविता संग्रह से आप क्या-क्या चाहेंगे
भाई !
इस संग्रह की कविताओं को पढ़कर एक लड़की
के जीवन का पूरा ‘आर्क’ आपके सामने खिंच जाता है । बस जरा-सा ध्यान से
आप ‘कनेक्टिंग द डॉट्स’ करते चलें । जीवन
का स्त्री-पक्ष जीवन की तरलता है, हृदय की नमी है, आँखों का पानी है । उस जीवन की कल्पना भी कितनी भयावह है जब कवि को कहना पड़े
“ सोचती हूँ वह अंतिम पुरुष कौन होगा/ जिसका रोना सुनने के लिए नहीं बचेगी कोई
स्त्री” । स्त्रियों के शाप से तो देवता भी नहीं बच सके।
साहित्य की हर अच्छी रचना का एक काम यह
भी है कि वह अपने लोक के शब्दों का स्मरण कराए, उनका संरक्षण करे । इस संग्रह में
ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं । मेर मन अटक रहा है संग्रह में आए शब्दों – सूप, करइत, बइर, खोइंछा, गाछ – पर और ‘नेनुआ के फूल’ पर । आपका मन कहीं और अटकेगा !
कभी-कभी हम वैसी बातों का कहना जरूरी समझते
हैं , जिसे कहने से हमारी उपस्थिति खास मौकों या स्थानों पर दर्ज हो सके । हो सकता
है ऐसी बातें बहुत लोग बहुत बार कर भी चुके हों, फिर भी हम कह
देने का एक नैतिक दबाव महसूस करने लगते हैं । जितनी ‘तानाशाह’ दिल्ली है, उससे कम पटना या राँची भी नहीं । बल्कि हमारे
आसपास, घर-परिवार, जान-पहचान, दफ्तर-वफ्तर हर जगह तानाशाही के किस्से
हैं । कहीं प्रकट, कहीं अप्रकट । और बहुत सारी जगहों पर,
बहुत सारी बातों में हम खुद को ‘तानाशाहों’
की जी-हुजूरी करते, उनकी लल्लो-चप्पो करते हुए
पा सकते हैं। इसे स्वीकार कर पाना एक अलग बात है ।
कोई आइडिया, कोई विचार,
कोई आन्दोलन एकबारगी उठ खड़ा नहीं होता । कोई एक बात यहाँ, दो बातें वहाँ इस तरह कर-करके बात आगे बढ़ती है । फिर एक ऐसा समय आता है जब
वह बात अपने ‘टिपिंग प्वाइंट’ पर पहुँच
जाती है । फिर वही बात हमें चारों तरफ होती हुई दिखने लगती है । इस संग्रह की कविताओं
में ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जो जिस दिन अपने ‘टिपिंग प्वाइंट’ पर पहुँचेंगी, चारों ओर दिखने लगेंगी । चाहे वो बातें पर्यावरण संबंधी हों, चाहे गाँव-घर-परिवार संबंधी हों, चाहे एक लड़की के सम्मान
और अधिकार संबंधी हों ।
‘मैं अपनी बेटी से ककहरा सीख रही हूँ’ ,‘मेरी बेटी इन
दिनों मेरी दोस्त है’ और ‘स्पर्श’
सरीखी कविताएँ बताती हैं कि माँ-बेटी के संबन्ध एक अलग ही धरातल पर होते
हैं । ये कविताएँ इस तरह से मन में उतरती हैं कि उजास भर जाता है मन में । एक बच्ची
की नन्हीं हथेलियों के कोमल स्पर्श को महसूस करने लगते हैं आप अपने चेहरे पर । वहीं ‘बचा हुआ है वह मुझमें’
कविता का दर्द, सब खो देने का भाव, अवशता और एक मौन आर्तनाद पाठक के हृदय को स्तब्ध कर जाता है। वह जड़वत् बैठा
रह जाता है कुछ क्षण ।
ये कविताएँ मन के इतने करीब, हमारे इतने
आसपास की हैं । यह लगता ही नहीं कि कवि और हमारी ज़िंदगियाँ अलग-अलग हैं । कविता को
यही बात तो खास बना देती है । मुझे तो यह लगता है कि प्रज्ञा गुप्ता अपने मुहल्ले
की ही हैं । वे देख-समझ रही हैं हमारा सारा
हाल । और मेरा विश्वास है कि हर पाठक को यही लगेगा । हाँ, आलोचकों
की बात मैं नहीं जानता ।
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