साधो-माधो-बतकही : ४
गुरु जी गिर गए !
अरे माधो, सुने ?
क्या? गुरु जी वाला ?
हाँ, वही । गुरु जी तो गिर गए ।
अरे तो क्या हुआ ? कहीं गिरकर कहीं उठेंगे ।
लेकिन, थोड़ा अच्छा नहीं लग रहा है ।
तुम इस मिडिल क्लास वाला थिंकिंग से कब निकलेगा जी ? गुरु जी राष्ट्रहित में गिरे हैं , सुने नहीं क्या उनका भाषण ? अपना छोटा बुद्धि को बड़ा करो, न तो रह जाओगे घास छीलते । चार हजार एक सौ तेईस विधानसभा क्षेत्र में से एक ठो सीट के लिए इतना व्यथित मत हो भाई । बड़ा सोचो । राष्ट्र का सोचो ।
मने, बात का कोई बखत ही नहीं है ?
बढ़ता हुआ पानी रास्ता बदलता है, बढ़ता हुआ ज्ञानी बात । और सात घर होता तो आदमी फिर भी सोचता । यहाँ तो चौदह घर है न जी । गुरु जी किधर से गिनती शुरू करते ? मूड मत खराब करो । बैठो, आज मूड आया है, तुमको कुछ सुनाते हैं । बैठो, खंजड़ी निकाल कर लाते हैं । और सुनो, गुरु जी का हम भी बहुत इज्जत करते हैं । लेकिन गुरु जी हैं, क्या कहें ?
गुरु से गुरुतर
धन है बढ़कर
तुम ज्यादा सर न खपाओ
जो बिका नहीं
वह टिका नहीं
तुम अपना दाम बताओ
इतने झूठे
टूटे-फूटे
तुम थोड़ा तो शरमाओ
वे सर्वेसर्वा
वे कर्ताधर्ता
तुम चलके हाथ बँटाओ
हो चरित चलित
तो गणित फलित
कुछ गुणा-भाग करवाओ
गुरु जी गिरते
ऐसे गिरते
तुम थाह पकड़ न पाओ

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