शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

रंग-दुरंगी

 

रंग-दुरंगी

 

जब भी गुस्साए हैं

पीछे  पछताए   हैं

 

गुस्सा कर निकल गए हैं

फिर, फिर  कर  आए  हैं

 

अपना पराया कोई नहीं

खुद   को   समझाए  हैं

 

हैं साहब के पीछे

जैसे हम साए  हैं

 

उनकी तो बात न पूछो

हम  जा कर  आए  हैं

 

क्या बस में इतना ही,

खाली  फुसलाए हैं ?

 

क्या किसके हिस्से में

क्या-क्या  गटकाए हैं

 

        ॥॥॥

 

हमसे वो गुस्साए हैं

हम ही  बमकाए  हैं

 

जब इतना कोंचे हैं

तब तो  गरमाए  हैं

 

वो हम पर हँसते  हैं

हम भी भकुआए हैं


अब हमको देख यहाँ

सब मुँह ठिसुआए  हैं

 

हम चलनी चाले हैं

सूपे    फटकाए   हैं

                              छंद-८ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें