सादर
शिक्षक - दिवस पर
एक ऐसा ऋण
जिससे उऋण
होना नहीं चाहें
उम्र भर
दिन बीते लेकिन
अब भी हर दिन
हैं हाथ हमारे
सर पर
'टीचर' !
'दी','मिस', कभी 'सर' !
जीवन में जो
जिस मुकाम पर
नींव में मिट्टी
वही मगर
सब सिंचित हैं
मन पादप-पुष्प
सब संचित है
मन के अंदर
मात-पिता गुरु जीवन में
बस केवल उनके मन में
उठते रहते हैं ये स्वर
"बच्चे हों हमसे बढ़कर !"
जीवन में हर पल हर क्षण
आप्लावित होता रहे मन
भरकर गुरु मात-पिता के प्रति
आदर आदर आदर आदर