शनिवार, 20 जून 2026

‘दर-ब-दर’: प्रसंग कविता का


 

दर-ब-दर’: प्रसंग कविता का

 

 

पहले एक कविता पढ़ी जाए, उसके बाद आगे की बात –

 

          दर-ब-दर

 

            आँखों में

            तेरे आँसू लेकर

            हम हँसते रहे

            कल

            रात भर

 

            दिल

            दर-ब-दर

            तेरे

            प्यार में

 

            खुद को खोकर भी

            तुमको गर पा लें

            तो भी हर्ज नहीं

            लाख सितम हों

            इश्क में तेरे

            पर

            हमको तो

            दर्द नहीं

 

            कब के चले

            तेरी तरफ, फिर भी

            वहीं के वहीं हैं

            किया क्या-क्या तेरे लिए

            खबर ही नहीं है

            तुझको

            हम

            मरते रहे

            तेरी खातिर

            देखा न तूने

            आँख भर

 

            दिल

            दर-ब-दर

            तेरे

            प्यार में

 

 

पाठक यह तो समझ ही गए होंगे कि यह आम बोलचाल के शब्दों और लहजे का इस्तेमाल करते हुए लिखी गई एक प्रेम कविता है । प्रेम कविताओं के लिखे जाने की संभावना जितनी ही ज्यादा होती है, उतनी ही कम संभावना एक अच्छी प्रेम-कविता के प्राप्‍त होने की ।

जरा-सा ध्यान देकर पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कविता निम्न-मध्यवर्ग के प्रेम की कविता है । प्रेमी साधनविहीन है । तभी तो वह अथक प्रयास कर रहा है, फिर भी उसे निराशा ही हाथ लग रही है –“ देखा न तूने आँख भर”। प्रेम के पथ में साध्य यानी प्रियतम को प्राप्त करने के लिए प्रेमी कुछ भी करने को तैयार है । वह खुद का सर्वस्व निछावर कर देने की उत्कंठा भी रखता है । बस, उसे प्रियतम का सान्निध्य ही प्रेय है । संभवत: प्रेमिका भी उसी विपन्न वर्ग की है, जिस वर्ग का उसका प्रेमी है । उम्मीदों के पूरा न हो पाने की कसक दोनों के दिलों में है । प्रेमी प्रेमिका के हर कष्ट को हँसते-हँसते सह जाने के लिए प्रस्तुत है  -- “ आँखों में तेरे आँसू लेकर” ।

देखा जा सकता है कि कविता का मूल स्वर आशावादी  और यथास्थिति के जड़त्व के विरुद्ध है । तभी तो वह शुरू से ही दु:ख को बाँट लेने, हँसते हुए बाँट लेने की बात कर रहा है । उसे प्रेमिका का साथ चाहिए ही, प्रेम की राह में मिलने वाले दर्द उसको डिगा नहीं सकते । अंतिम बंद में वह प्रेमिका को यह भान भी कराना चाहता है वह उसकी उपेक्षा का भागी नहीं है । इकबाल ने भी एक शेर में कहा है –“ तू मिरा शौक देख, मिरा इंतज़ार देख” ।

मध्यवर्ग का जीवन छोटी-छोटी उपलब्धियों को प्राप्त करने के प्रयासों में ही बीत जाता है । बस एक फोन को खरीद भर पाना ही जीवन का लक्ष्य बन सकता है । अभी पिछले दिनों देश में आई-फोन को खरीदने के लिए उमड़ी भीड़  उसी मानसिकता का प्रदर्शन है । या शायद लोग इतने आत्मविश्वासहीन हो गए हैं कि सारा जीवन आई-फोन या उस जैसी चीजों के संग्रहण पर ही जा कर टिक गया है । यह कविता निम्न-मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, संघर्षों और उसकी विवशताओं की कविता भी है । “ लाख सितम हों इश्क में तेरे, पर हमको तो दर्द नहीं” – सबकुछ सह कर भी एक सुकून भरी जिंदगी पाने की चाह । यह चाह भी प्राय: एक मृगतृष्णा बन कर ही रह जाती है । इस तरह से इस कविता में अर्थ की कई परतें देखी का सकती हैं । कहीं पढ़ा था कि हर कविता के कम-से-कम दो पाठ तो होते ही हैं ।

एक सवाल यह भी उठ सकता है कि क्या इस यथार्थ-आक्रांत समय में प्रेम-कविताओं की उपयोगिता बची हुई है ? उसमें भी सीधे -सरल शब्दों में उतारी गई प्रेम-कविता की । सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा है कि “समकालीन हिंदी कविता में कवि मन छीज रहा है । वह निरा भाषायी अभ्यास और बौद्धिक कसरत बनती जा रही है । उसमें जीवनानुभव कम है । विचार ही विचार है । उसकी बौद्धिकता सरस बौद्धिकता नहीं है” । कविता के इसी बढ़ते हुए परिमाण के परिणाम पर सोचते हुए ही शायद बेनीपुरी जी ने कहीं कहा है कि “ हम सुखाड़ से नहीं बाढ़ से डरते हैं” ।

छीजते हुए मन के लिए एक अच्छी प्रेम-कविता नखलिस्तान की तरह है – कवि के लिए भी और पाठक के लिए भी ।  यहाँ यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रेम का स्वभाव है कि वह जड़त्व के विरूद्ध चलता है । यथा-स्थिति में पिसते रह जाना उसे स्वीकार नहीं होता । प्रेम-कथाओं में प्रतिरोध की अंतर्धारा छुपी होती है ।

 

अच्छे काव्य-पाठ का एक प्रमुख अंग है कवि द्वारा कविता की कुछ पंक्तियों को दुहराना । पंक्तियों के दुहराए जाने से पाठक/श्रोता को कविता की लय से संगत बैठाने में आसानी होती है । याद करने में भी । पंक्तियों का दुहराना वैसा ही कुछ है जैसा किताब पढ़ते समय कुछ पंक्तियों का अंडरलाइन किया जाना । इस प्रसंग में राजेश जोशी जी की यह बात भी याद की जानी चाहिए कि “ हिंदी में अच्छा काव्य-पाठ करने वाले कवियों के उदाहरण शायद कम हैं”। ऊपर उद्धृत की गई कविता में यदि पहले अंतरे के बाद आने वाली पंक्तियों को इस तरीके से दुहराया जाए, तो निश्चय ही कविता का असर थोड़ा बढ़ जाएगा –

“ दिल

   दर-ब-दर

  दिल

  दर-ब-दर

  दिल दर-ब-दर

   तेरे प्यार में”

और इस खण्ड को यदि इसी तरह दो बार पढ़ या गा दिया जाए, तो क्या कविता ज्यादा असरदार महसूस नहीं होगी ? इसी तरह दूसरे अंतरे की पहली तीन पंक्तियों और तीसरे अंतरे की पहली तीन पंक्तियों को दुहराने से भी कविता कुछ और खूबसूरत हो उठेगी । हालाँकि दुहराने की यह क्रिया हर व्यक्ति के मिजाज के अनुसार अलग-अलग पंक्तियों को दुहराने की भी हो सकती है । आचार्य रामचन्‍द्र शुक्ल ने कविता की  पंक्तियों को दुहराने के संबंध में लिखा है “ कविता सुननेवाला किसी भाव में मग्न रहता है और कभी-कभी बार-बार एक ही पद्य सुनना चाह्ता हैकविता सुननेवाला कहता है “ जरा फिर तो कहिए” ।” 

 

कविता में बोधगम्यता या सरलता और दुरूहता या कठिनता को लेकर भी चर्चा हुआ करती है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है “ साहित्य में सहज ( मैं सरल नहीं कहता) भी मौलिकता का श्रेष्ठ प्रतिमान है ”।  वैसे भी, सरल होने का अर्थ बात का हल्का हो जाना नहीं है । उसी तरह कविता के दुरूह या कठिन होने का अर्थ उसका गंभीर या श्रेष्ठ होना नहीं है । प्रेय और श्रेय के बीच का रास्ता ही कविता को दूर तक ले जा सकता है । कविता के सफल होने का पता तो कवि के जाने के बहुत सालों बाद ही पता चल सकता है । तुलसी हों, कबीर हों, खुसरो हों, मीर हों , गालिब हों, निराला हों— कोई भी कवि अपने जाने के वर्षों बाद भी अपनी कविताओं के जरिए याद रह जाता है , तभी हम कह सकते हैं कि कविता या साहित्य के इतिहास में उसका कोई स्थान है । कॉपीराइट के कानून में लेखक की मृत्यु के साठ  वर्षों बाद उसका लेखन कॉपीराइट से मुक्त होता है । इसके पीछे शायद यही भावना रही हो कि इस अरसे में लेखन स्व-जनित आवेग प्राप्त कर लेगा और रचनाएँ फिर अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी ही गति से चलती रहेंगी। मैल्कम ग्लैडवेल अपनी किताब टिपिंग प्वाइंट में ऐसी ही बात कहते हैं –  “किसी भी वस्तु या विचार के जीवन में एक ऐसा बिंदु आता है जिसके बाद उसका प्रचार-प्रसार स्वत:स्फूर्त, अपने बलबूते पर होने लगता है” । ऐसा ही साहित्य दीर्घजीवी होता है । संक्रामक बीमारियों को बेअसर करने वाली हर्ड इम्यूनिटीकी बात भी कुछ ऐसी ही है ।

            किसी कविता में सरल शब्दों में कही गई बात कम महत्त्व की इसलिए नहीं हो जाती कि वह सरल शब्दों में कही गई है । न ही कोई कविता इसलिए महत्त्पूर्ण हो सकती है क्योंकि उसे कठिन या दुरूह बनाया गया है । दर-ब-दरकविता में सरल शब्दों का सहारा लेकर बात की गई है । किसी व्यक्तिगत रुचि के आधार पर इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए, ना ही अपनाया जाना चाहिए ।  

            भारतीय हिंदी फिल्में अपने गीत-संगीत के लिए भी जानी जाती हैं । हिंदी साहित्य की वर्ण-व्यवस्था ऐसी बना ली गई है कि फिल्मों से जुड़ा हुआ कुछ भी साहित्य के द्वार में प्रवेश का पात्र नहीं माना जाता । जबकि हम-आप, सभी फिल्मों के गाने गुनगुनाए बिना रह नहीं सकते । यह बात मानी जा सकती है कि फिल्मों के चुने हुए गीत ही विचार किए जाने योग्य पाए जाएँगे । यही बात तो आज मनों नहीं टनोंके हिसाब से लिखी और प्रकाशित की जा रही कविताओं के बारे में भी कही जा सकती है । आलोचना मुँह-देखीवाली बात हो गई है शायद । फिल्मों के गीतों से क्या दिक्कत है ? यह कि वे फिल्मों में इस्तेमाल किए जाते हैं, उनका व्यावसायिक उपयोग होता है या फिर उन्हें वैसे लोग गाते या अभिनीत करते हैं जो साहित्य के पैमाने से “डिज़र्विंगनहीं होते ? क्या कविता अपने पाठकों या श्रोताओं के समूह को नियंत्रित कर सकती है कि कौन उसे पढ़ने या सुनने का हकदार है या नहीं ? हमारे सामने ऐसे उदाहरण भी तो रहे ही हैं कि कवि या उसका कोई कृत्य सामाजिक नजरिए से उतना डिज़र्विंगनहीं रहा, फिर भी उसकी रचनाएँ पढ़ी और सराही जाती हैं । कविता या आलोचना क्या अपने आभिजात्य की मारी हुई नहीं हो गई हैं कि उन्हें फिल्मों के गीतों का मुँह देखना तक बर्दाश्त नहीं ?

            फिल्मों के गीत अपनी याद रह जाने की शक्ति के कारण भी शायद कविता या आलोचना वालों को खटकते होंगे । यह ठीक है कि ट्यूनके कंधों पर सवार होकर ही गीत स्मरणीय बन पाता है । लेकिन देखा जाए तो हर कविता, बल्कि हर संवाद में एक धुन, एक ट्यूननिहित होती है । गीतों में यह ज्यादा स्पष्ट होती है । कविता में तो पहले ही एक वर्ग-विभेद किया हुआ है – कविता अलग, गीत अलग । और, कविता यानी श्रेष्‍ठतर, श्रेयस्कर ! यह तो वही बात हुई कि ब्लैक टीपीने वाले श्रेष्ठ जन और दूध-चीनी वाली चाय पीने वाले सड़क के आदमी। हो सकता है यह विभेद छंद और तुकों के उपयोग की अतिसे जन्मी निरर्थकता के कारण हुआ हो । लेकिन यह भी तो है, कि कविता उल्टी दिशा में भी अतिकी स्थिति को प्राप्त हो रही है । कविता को श्रेष्ठ बताने के लिए गीतों और खासकर फिल्मों के गीतों को दोयम दर्जे का बताना क्या उचित है ? कवि राजेश जोशी ने भी लिखा है “ कविता का विमर्श कुछ ऐसा हो गया है कि एक कवि के महत्त्व को रेखांकित करने के लिए दूसरे की हत्या आवश्यक मान ली गई है” ।  श्रेष्ठता-बोध मनुष्य के लिए घातक है । हर युद्ध के पीछे कारण श्रेष्ठता-बोधही होता है । अर्थशास्त्र में बाजार के संबंध में एक शब्द उपयोग में लाया जाता है कार्टल। इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ शक्तियाँ ( कंपनियाँ) मिलकर पूरे बाजार पर कब्जा जमा लेती हैं । दूसरी कंपनियों के लिए जगह ही नहीं छोड़ी जाती । फिल्मों के गीतों को बाहर रखकर क्या साहित्य में भी कार्टलनहीं बना लिया गया है ?

            शैलेन्‍द्र के लिखे गीत की पंक्ति “ जिंदगी है, भूलकर ही राह मिलती है” , साहिर के गीत की पंक्ति “ उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे”, पं. नरेन्‍द्र शर्मा का गीत सत्यम् शिवम् सुन्‍दरम्’, मजरूह सुल्तानपुरी की पंक्ति “ होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी” , वर्मा मलिक का गीत बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई’ – फिल्मों के ऐसे असंख्य गीत हैं जो सुननेवाले के मन को भाते तो हैं ही, भारतीय दर्शन और संस्कृति की छटा को भी अपने में समेटे हुए होते हैं । अकारण नहीं है कि ऐसे गीत वर्षों-वर्षों तक याद किए जाते हैं । हिंदी फिल्मों के गीत भारतीय मानस के अंतर्भूत तत्त्व हैं । यह सही है कि आज के दौर में फिल्मों में भी गीत कम हुए हैं, लेकिन उनका महत्त्व कम हुआ हो, ऐसा नहीं है । यह कहा जा सकता है कि फिल्मों के गीत ज्यादातर व्यक्तिगत दुख-सुख से जुड़े होते हैं, उनका फलक शायद उतना विस्तृत नहीं होता । कविता में भी मैंका समावेश तो होता ही है । देश और समाज मैंसे ही तो बनते हैं ।  व्यष्टि को सँभाले बिना समष्टि की फिक्र क्या ही की जाएगी ? जो है उसे देखने-परखने की जगह जो नहीं है उस पर ध्यान केंद्रित करना भी तो उचित नहीं ।

            कृत्रिम रूप से न तो किसी भी चीज को स्वीकार किया जाना चाहिए और ना ही जिलाबदर । हिंदी फिल्मों के गीतों जो भी ग्रहण-योग्य है, उसकी उपेक्षा से कम-से-कम साहित्य का तो फायदा नहीं हो रहा । हमें यह समझना चाहिए कि साहित्य की दीवारें रंध्रयुक्त हैं , सिर्फ दरवाजों को बंद किए रहने से काम नहीं चलेगा । विक्टर ह्यूगो की यह पंक्ति याद आती है “ No force on earth can stop an idea whose time has come, शायद अभी फिल्मों के गीतों को साहित्य माने जाने का सही समय नहीं आया है । साहित्य में वैसे भी धैर्य का बहुत महत्त्व होता है ।

 

       अंत में यह खुलासा कि निबंध के आरंभ में उद्‍धृत की गई कविता, दरअसल फिल्मों इत्तु सी बातका गीतकार राज शेखर का लिखा हुआ एक गीत है, बस उसके कुछ शब्दों/ पंक्तियों को अलग क्रम में सजा दिया गया है । जुबिन नौटियाल की आवाज में यह गीत यूट्यूब पर उपलब्ध है

 

( https://youtu.be/J7Uok7TBlIA?si=LgHicAh_oo9qtjU7 )

 

जैसे कुछ कविताएँ होशो-हवास पर छा जाती हैं, वैसे ही फिल्मों के कुछ गीतों में भी सम्मोहकता होती है ।

 

            अब सवाल यह कि क्या कविता किसी खास फॉर्मेटमें लिखी जाए, तभी कविता कहलाने की हकदार होगी? यदि आप ऊपर दिए लिंक पर गीत सुनेंगे तो पाएँगे कि धुन, लय, तुक, संगीत और गायकी से सुरीलेपन और सरसता का  एक  चँदोवा ताना गया है । यह तो माना ही जाता है कि हर कविता की अपनी एक लय होती है । तुकों के सशक्त प्रयोग का उदाहरण धूमिलकी कविता के रूप में हमारे सामने है । क्या धुन और लय को तोड़े और तुकों को बिगाड़े बिना गीत को कविता नहीं माना जा सकता? यहाँ यह दुहरा देना ठीक रहेगा कि अभी बस दरवाजा खोल देने की बात हो रही है, पीढ़ा देने या तय कर देने की नहीं ।

            यह मानने में भी किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए कि फिल्मों के वही गीत हमारे मन को छू पाते हैं जो गहरे पैठ कर तैयार किए गए होते हैं ।  ऐसे गीत बहुतायत में हैं, यह भी मानना चाहिए ।

            वेब सीरीज काठमांडू कनेक्शन  के लिए राज शेखर के ही लिखे एक और गीत स्याही स्याहीगीत को सुनकर देखा जा सकता है कि स्याह और स्याही शब्दों को केंद्र में रखते हुए कैसे पूरा गीत रचा गया है । क्या कवि की प्रयोगधर्मिता की तारीफ नहीं की जानी चाहिए ? उदाहरण के तौर पर गीत की ये पंक्तियाँ देखिए –

 

            रंग सब जब मिल गए हैं

            क्या अँधेरे क्या उजाले

            उजली उम्मीदों के चेहरे

            पड़ गए हैं दाग़ काले

            स्याही से पुता हुआ आईना भी...

( https://youtu.be/ZB9qnLC3os8?si=eR-zjVQKaf4r49to )

 

एक साहित्यप्रेमी, पाठक, समीक्षक और आलोचक के तौर पर हमें भी अपनी सीमाओं का विस्तार करते रहना चाहिए, अपने कैनवास को बड़ा करना चाहिए । ऊपर कुछ गीतों के ही उदाहरण दिए गए हैं, बाकी सबकी अपनी-अपनी खोज!  अपनी अन्‍वेषण-प्रवृत्ति की लौ जलाए रखना जरूरी है । साहित्य को कुआँ नहीं सागर होना चाहिए ।

 

            अंत में श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी की पंक्तियाँ जो उन्होंने कविता और गीत के संबंध में कही थीं । हिंदी फिल्मों के गीतों के लिए भी इन्हें अंशत: ( अधिकांशत: )  सही माना ही जा सकता है –

 

            “ गीत क्या है ? यह क्यों लोगों के मन में इस तरह गड़ जाता है ? प्रारम्भ में गीत था, तब कविता आई ! आज कविता ने गीत को दबा दिया है; किन्‍तु, फिर भी, गीत गीत है ! क्योंकि यह मानव-भावना को प्रकट करने का प्रथम उद्‍गार था । गीत फूटे थे हृदय से; कविता का स्रोत मस्तिष्क बना” ।

 

 

 

 

 

 


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