बालमुकुन
फिर सोच में है !
बालमुकुन
साहित्य की बाउण्ड्री के बहुत बाहर है । लेकिन कभी-कभार टाइम-पास करने के लिए पत्रिकाओं
को उलत-पुलट लेता है । ऐसे में ही एक बार एक पत्रिका में उसने देखा कि ‘समकालीन साहित्य में
गाँव की अनुपस्थिति’ पर गहन विचार-विमर्श हुआ है और भारी चिन्ता
प्रकट की गई है । ‘गाँवों के देश’ भारत
के साहित्य से गाँव की बेदखली । उसकी उत्सुकता जगी । पूरी परिचर्चा पढ़ गया । और पढ़ने
के बाद बालमुकुन फिर सोच में है ! अब क्या कहूँ दोस्तो, उसका
तो स्वभाव ही कुछ ऐसा है ।
बालमुकुन
ठहरा साहित्य के बाहर का आदमी । वह समझ नहीं पाया कि साहित्य में शहर और गाँव की
विभाजन रेखा क्यों जरूरी है ? उसने पढ़ा " गाँव के लोगों के पास भी अब विष है "। उसने सोचा— कब नहीं था ?
क्या शहरों में सिर्फ ' विषधर ' रहते हैं ? संवेदना और सरोकार की बात हर जगह
होती है, कहने का तरीका अलग हो सकता है । फिर उसको अज्ञेय की
‘साँप’ कविता का ध्यान हो आया; हो न हो ‘गाँव के लोगों के पास अब भी विष है’
– यह बात इसी कविता को संदर्भ में रखकर लिखी गई है । ‘विक्की बाबू’ को ‘मुंशी जी’
ने कहा था कि बात में वजन लाओ । यही बात याद आ गई होगी शायद । बालमुकुन
ने मन-ही-मन वह दुहराया जो बचपन से दुहराता आ रहा है,कभी रात
में साँप का खयाल भी आ जाए तो – साँप, सुइया, डोरा !
बालमुकुन
सोच रहा है कि गाँव से शहर की ओर जाना कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं । आजादी के बाद
से ही औद्योगिकीकरण के कारण जनसंख्या शहरों की ओर गई है । भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण
नहीं भी होते, तो भी शहरीकरण बढ़ता ही । आदमी गाँव से शहर जा रहा
है, सो साहित्य भी । ऐसा क्यों है कि गाँवों से ( खासकर आर्थिक
रूप से पिछड़े राज्यों, यथा- बिहार) निकलने को ‘पलायन’ कहते हैं । कृषि - कर्म या गाँव से निकलना भागना ( पलायन)
क्यों कहा जाए ? व्यक्ति, समाज या देश
के ये अलग - अलग स्टेज ( चरण ) हैं । भारत की आबादी का जितना बड़ा हिस्सा कृषि और
संबंधित कार्यों पर आधारित है, उसके अनुसार उत्पादन नहीं है
। ऐसा उत्पादन संभव भी नहीं है । ' छिपी हुई बेरोजगारिता '
से बेहतर है कि विकल्पों की तलाश की जाए, नए -
नए विकल्प बनाए जाएँ । बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश गए तो वह सम्मानजनक ‘इमिग्रेशन’ हो जाता है । किसान और किसानी बहुत समय
से हाशिए पर हैं, यह कोई नई बात नहीं है । ' उत्तम खेती,मद्धम बान ' बहुत
पुरानी बात हो चुकी । समस्या यह है कि किसानों के हाशिए पर रह जाने की बातें होती
हैं, उसके वहाँ निकल सकने की सूरत नहीं निकाली जाती । उनके
लिए किसानी के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार नहीं किया जाता । रोजगार के अन्य
कारगर विकल्पों की बात नहीं सोची जाती । हाँ, बात से बात बनाने के लिए परिचर्चाएँ अत्यंत उपयोगी शगल हैं ।
पाठकों
की कमी पर चर्चा पढ़ते-पढ़ते बालमुकुन मन-ही-मन बातों को काटने भी लगा था – पुस्तकों
को सिर्फ मनोरंजन के साधन के रूप में देखना कहाँ तक ठीक है ? पाठक नहीं मिल रहे हैं तो लेखन - प्रकाशन की गुणवत्ता और उसके प्रचार -
प्रसार पर भी विचार किया जाना चाहिए । जब टीवी , मोबाइल नहीं
थे तो सिनेमा भी एक विकल्प था ही, भले ही इतने व्यापक स्तर
पर नहीं । अभी पाठकीयता का सही अंदाजा लगाने के लिए, ई बुक्स,
ऑडियो बुक्स और साहित्यिक सामग्री उपलब्ध कराने वाली तमाम वेबसाइट्स
के उपयोग का आकलन भी करना चाहिए । अरे भाई, पाठक कम हो रहे हैं, वह इसलिए कि सब के सब लेखक हो गए
हैं । कस्टमर कोई नहीं, सब के सब सप्लायर ! कभी किसी बड़े अथवा
छोटे लेखक से उसके सिवा किसी और लेखक की बात छेड़ कर देखिएगा । ‘निप इन द बड’ अँग्रेजी कहावत का अर्थ समझ में आ जाएगा,
एकदम प्रैक्टिकल में ।
बालमुकुन पढ़ता जा रहा था, और सोचता जा रहा था –
आज
के समय में कितने लेखक ऐसे होंगे जो गाँवों में ही रहते हैं ? गाँव के संपर्क में रहकर वहाँ का हालचाल जान लेना अलग बात है । यह कहना
संगत नहीं कि गाँव-देहात के लेखन की कसौटी अभिजात और शहरी लेखक तय कर रहे हैं। अगर
इशारा ' गुटबाजी ' की ओर है ,तो उसके कारण अलग हैं ।
बोली
- बानी, आचरण, सामाजिक - सांस्कृतिक
पहचान को बनाने - बचाने में व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है । भाषा
के स्तर पर विद्यापति, सूर, तुलसी --
इनको तो हम हिन्दी साहित्य के अंतर्गत रखते हैं, लेकिन क्या
मैथिली, ब्रजभाषा या अवधि में कोई आज लिखे तो उसे हिन्दी-
लेखन माना जाएगा ?
ग्रामीण
व्यक्ति क्या कम जागरुक होता है ? अगर पहले का ग्रामीण राजनीतिक
रूप से अपेक्षाकृत कम जागरूक होता तो गाँधी जी का ' चम्पारण
सत्याग्रह ' नहीं हुआ होता । भारत में ' वयस्क मताधिकार ' को नहीं अपनाया गया होता ।
प्रेमचंद
या रेणु के समय क्या ' दलित विमर्श ', ' आदिवासी
विमर्श ' या ' स्त्री विमर्श ' जैसी अवधारणाओं का चलन था? ऐसे में उनके लेखन को इन
पैमानों पर परखना क्या सही होगा ? रही बात शोषित और पीड़ित
की आवाज की, तो क्या इसमें उनका लेखन कमतर है ?
विचारधारा
का 'मास स्केल ' पर यदि लोप हो
गया है, तो क्या विभिन्न साहित्यिक संगठनों की भूमिका का भी '
क्रिटिकल रिव्यू ' नहीं किया जाना चाहिए ?
संगठन का काम सिर्फ कैडर या सदस्यता बढ़ाने से ही पूरा होना मान
लिया जाना चाहिए ?
साहित्य
में नए पाठक जब तक नहीं जुड़ेंगे तब तक बात नहीं बनेगी । स्कूली छात्रों के बीच
यदि लेखक - आलोचकगण जा सकें तो शायद बात बन जाए । लेकिन यह काम लेखन जैसा महान काम
नहीं है, तो इसे ' आउटसोर्स ' कर देना ही ठीक माना जाता है ! किसी की जिम्मेदारी तय करना और खुद
जिम्मेदारी उठाने में फर्क तो रहेगा ही।
बालमुकुन
खुद खुद से ही तर्क-वितर्क किए जा रहा था । सोच में विचरना थमा तो उसने देखा कि उसकी
चाय ठंढी हो चुकी है , उस पर पपड़ी-सी जम चुकी है । उसे लगा कि वह थोड़ा ज्यादा
ही सीरियसली सोच गया । इतना तो पत्रिका का अभीष्ट भी नहीं रहा होगा । उसने खुद को
टोका, फिर सोचा – विचार की मथनी ठीक नहीं । आगे से कविता-कहानी
पर ही जोर आजमाया जाएगा ।
[ प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका ‘वागर्थ’ के अप्रैल, 2026 के अंक में प्रकाशित पृष्ठ 67 पर प्रकाशित परिचर्चा से इस निबंध का लेना-देना नहीं है । यदि कुछ ऐसा लगे तो महज संयोग माना जाए। ]
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