याद कोई शहर नहीं
याद कोई शहर नहीं
वह कि छूट जाए कहीं
है
याद
बहता पानी
कहीं
याद
रातरानी
कभी याद फ़िक्र किसी की
कहीं
याद
लनतरानी
ये याद एक ख़लिश है
ये याद एक कशिश है
ठंढे पड़े जहान में
ये याद एक तपिश है
यह याद चाँद- रात है
जागा हुआ प्रभात है
हरी- भरी- सी
डालियाँ
नरम- नरम- सा
पात है
कब किसकी याद आ के
जाए है दिन बना के
बड़े पस्त-त्रस्त मन को
जाए है फिर मना के
कोई
जो
ये बताए
तुम याद उसको आए
उस एक
पल को तुम भी
सर को रहो नवाए
किसे याद कौन करता
है किसपे कौन मरता
किसी को
याद आ गया
जीवन उसी का तरता
अब नाम किसका लीजै
परनाम किसको कीजै
सब मन ही जानता है
मन ही से काम लीजै
'गर याद एक शहर है
उसमें हमारा घर है!
छंद-६
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