सुशांत
सिंह राजपूत
(21.01.1986
– 14.06.2020)
जैसे
मुरझा गए सपने
जैसे
दिन खो गए अपने
जैसे
उम्मीदें झर गईं सारी ...
ज़िंदगी... !!
खाली
इतनी खाली
इतनी खाली...
कभी नहीं लगी ... !!!
जवान सपनों का मर जाना
शुभ संकेत नहीं
तुम जो गए...
तुम क्यों गए ?
===
जो
नहीं कहा गया
जो
नहीं किया गया
बस
वही रह जाएगा
कसक बन के...
और
रह जाएगा
सिर्फ़ और सिर्फ़
अफ़सोस... !!
===
अरे लड़का !!
क्या कर लिए तुम !!
सारी बहस
सारे तमाशे
सबके दुख
सारे दिलासे...
चाहनेवाले तुम्हारे
लोग तुम्हें कैसे बताते
प्यार के क़ाबिल थे तुम !
अनुपस्थिति
दर्ज़ कर रही है
उपस्थिति !!
तुम
रुक तो जाते
ज़मीं को
कर लेते रौशन
फिर जाते
बन जाते सितारे
आसमान के !
अरे लड़का !
थी चमक कितनी
कितनी थी धमक तुम्हारी
तुम देखते तो
रुकते तो
तुम रुक तो जाते...
वो एक पल
गुजर तो जाने देते
उसके पार तो नहीं जाते
बहुत कुछ था
इस तरफ़
रे लड़का... !!!
===
तुम तो
चले गए
जो रह गए
जानते जा रहे हैं
तुमको
मरते जा रहे हैं
तुम पर...
===
किसी-किसी के
बारे में
जानते जाना
दु:ख को
बड़ा करते जाता है
चले जाने का
उसके...
===
मर कर
अमर होना
हर बार नहीं होता
होता है, इस क़दर,
प्यार
हर बार नहीं होता
जा कर भी नहीं जाते हैं
मन में रह जाते हैं
कुछ लोग
अच्छे होते हैं इतने
ज्यादा रह नहीं पाते हैं

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