सिद्धप्रसिद्ध
बुरलेल जी की पाती – २
आदरणीय बड़े
लेखक जी,
प्रणाम स्वीकारें
!
कहनाम यह
है कि हमलोग आपका बहुत नाम सुने हैं । कितना तो किताब आप लिख दिए हैं । अखबार में भी
खबर पढ़ते रहते है कि आप आज यहाँ भाषण दिए, तो आज वहाँ परचा पढ़े
। कभी-कभी फोटो-उटो के साथ भी रहता है । अब हमको साहित्य को जाँचने वाली कुञ्जी प्राप्त
नहीं है, इसलिए हम सुनिए-सुन के जान पाते हैं कि कौन लेखक कितना
बड़ा है । अब ये बात भी है कि “ जो है नाम वाला, वही तो बदनाम
है” ! तो कुछ ऐसी-वैसी बात भी कान में पड़ जाती है कभी-कभी । आप तो जानते ही हैं सच्ची
प्रतिभा से सबको जलन होती है ।
आपको
एक दिन एक फंक्शन में देखे । चेहरा से तो नहीं जानते थे आपको, लेकिन आपका भाव और आपकी भाव-भंगिमा देखकर कोई भी समझ जाता कि आप बड़े लेखक जी
ही हैं । आपकी ग्रीवा तनी हुई थी, उन्नत भाल और आँखें गर्व-दीप्त
। कुछ सच्चे और कुछ टुच्चे लेखक आपको घेर कर बैठे हुए थे । आपके चेहरे पर अधखिली कली-सी
मुस्कान थी । इस मुस्कान के कम-से-कम दो अर्थ निकाले जा सकते थे – “हम हैं तो खुदा
भी है” वाला और “ दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ” वाला ।
हमको
बड़ा अफ्सोस हुआ । नहीं, गलत मत समझिए । एक लेखक का समय ‘लेखक-समय’ होता है । उसका इस तरह से बे-भाव का खर्च हो
जाना हमको ठीक नहीं लग रहा था । कितनी अनमोल अनूठी पंक्तियाँ दिमाग के गलियारे से बिना
थमे पार कर गई होंगी । आपके पास तो और बहुत-सी पंक्तियाँ आ जाएँगी, नुकसान तो जनता का हो गया । और यदि आपको बुला ही लिए थे लोग, तो आपसे किसी का सम्मान ही करवा लेते । आपको कोई सम्मान ही दे देते । खैर
!
आपके
पास हर लेखक की करतूतों का कच्चा चिट्ठा है । कोई आपसे ज्यादा उड़ नहीं सकता है । आप
तो यदि सिर्फ चुगलियों को जमा कर दें, तो एक बेस्ट सेलर
किताब बन जाए ! आप सब जानते-समझते हैं , लेकिन फिर भी आप सबके
कार्यक्रमों में चले जाते हैं । तारीफ कर आते हैं । लेखक भी अंतत: एक सामाजिक प्राणी
ही तो है । समाज में थोड़ा दायाँ-बायाँ , ऊँचा-नीचा तो चल जाता
है ।
उस
दिन एक आदमी थोड़ा कम प्रतिबद्धता वाला निकल गया । कैसा झाड़ लगाए आप उसको ! बताइए, उसको पता तक नहीं ! लेखकिया विचारों के लिहाज से ‘एक
भारत श्रेष्ठ भारत’ तो अलगे चीज है ! और फिर लेखन में लोकतंत्र
का हिमायती होना और लेखक का आचारण में भी वैसा होना अनिवार्य अनिवार्यता तो है नहीं
। विचार मतलब एक विचार। मंच मतलब एक मंच । ‘ठेकुआ छाप’ कविता और कवि का जमाना है । वही, एक ठो साँचा बना लीजिए,
फिर एक के बाद एक कविता पटकते जाइए । वही जानल-बूझल शकल और स्वाद वाला
! वही ‘एक भारत, श्रेष्ठ’ भारत ! सहस्र मुखों से एक ही बात, एक ही तरह की बात...!
बडे
लेखक जी, आप सबको कहते हैं कि आप भेद-भाव से ऊपर उठ चुके हैं
। ऊपर नहीं भी उठे हैं, तो साइड तो हो ही गए हैं । लेकिन हमको
लगता है कि भेद-भाव की एक ‘सरस्वती’ बह
रही है आपके अंदर । प्रत्यक्षत: दिखती नहीं है, लेकिन है जरूर
। कभी-कभी तो आपको भी नहीं दिखती होगी, लेकिन हाथ इतना सेट हो
गया है कि आपरूपी गाड़ी उधर मुड़ ही जाती होगी ।
यह
आप अच्छा करते हैं कि आपकी महती रचनाओं से परिपूरित पुस्तकें, आप अपने हाथों से किसी ऐरे-गैरे को देने की गलती नहीं करते । आप पदानुक्रम
का खूब खयाल रखते हैं । जैसे उस रोज, आपके पास उस वेटर को देने
के लिए आपकी किताब की प्रति नहीं थी । वही वेटर, जो बड़े उत्साह
से आपको और आपके गेस्ट को सर्व कर रहा था । वही, जो आपकी किताब
का सही-सही नाम नोट कर रहा था । उसके पास उस मंच से आपकी तारीफों के पुल बाँधने की
सलाहियत भी तो नहीं थी । और अगर होती भी तो – कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली ! बड़ा अच्छा किया आपने, जो उसे किताब
नहीं दी । काम करने वाले लोग काम ही किया करें ।
सेटिंग-गेटिंग-बेटिंग, नेटवर्किंग, जुगाड़, जोड़-तोड़,
तिकड़म, पहुँच, पैरवी – इन
सबका एक लेखक के लिए भी कितना महत्त्व होता है, यह आप जानते हैं
। हर लेखक के लिए नीचे रह जाने के, पीछे छूट जाने के कारण अलग-अलग
हो सकते हैं । लेकिन ऊपर पहुँचने का रास्ता, सबका लगभग एक जैसा
ही होता है ।
लेखक
जी, आपकी रचनाओं में अश्लील और अवांछित बातें भी आकर शृंगार
और अर्थ-गाम्भीर्य से भर जाती हैं । उनमें प्रतिरोध, प्रतिबद्धता
,दार्शनिकता और अध्यात्म तक की छौंक लग जाती है । ऐसा सुधी आलोचक-समीक्षक
जन कह देते हैं । पाठक, वह भी साधारण, तो
सुधी नहीं ही होता है । उसकी बात को मत सुना जाए । लेकिन,एक बात
है कि प्लास्टर के मजबूत होने के लिए सीमेंट और बालू का अनुपात सही होना चाहिए । नहीं
तो, समय हिसाब कर देता है । कुछ लोग कहते हैं कि लेखन का हिसाब
भी समय अपने-आप करता है । हो सकता है । लेकिन आजकल लोग का भी हिसाब बहुत तेज हो गया
है । हमारी विनती रहेगी कि आप एक अच्छा कैलकुलेटर अपने कब्जा में रखें । वक्त-जरूरत
काम ही आ जाए !
बाकी सब कुशल - मंगल ।
शेष फिर ।
आपका अपना,
सिद्धप्रसिद्ध
उर्फ
बुरलेल जी
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