मंगलवार, 30 जून 2026

दूसरा पक्ष : कुरेदते हो जो अब राख...



 

                                             दूसरा पक्ष :

कुरेदते हो जो अब राख...

[ सन्‍दर्भ : सबलोग’,जुलाई,2026 में प्रकाशित लेख गाँधी, प्रेमचन्‍द और हमारी भाषा-नीति]

 

 

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा

कुरेदते  हो  जो  अब  राख  जुस्तुजू  क्या  है

                                                            मिर्ज़ा ग़ालिब

 

मशहूर फिल्म-लेखक, गीतकार एवं शायर जावेद अख्तर ने किसी इंटरव्यू में कहा है कि ग़ालिब सिर्फ और सिर्फ हिन्‍दुस्तान में ही हो सकते थे । बहरहाल ।

सतहत्तर साल हो गए । गंगाजी में कितना पानी बह गया होगा ।

संविधान सभा में हिन्‍दीपर हुई बहस ( जो कि अँग्रेजी में हुई थी ) में नेहेरू जी के ये विचार देखिए –

 Nevertheless, when you are on the threshold of a new age, to talk always of the past and the past, is not a good preparation for entering that portal. Language is one of these issues, there are many others.

Now may I say a word or two about this business of Hindustani and Urdu and Hindi. We have accepted in this amendment the word ‘Hindi’, I have no objection to the word ‘Hindi’. I like it. I was a little afraid that it might signify some constricted and restricted meaning to the others. I was afraid about this. I thought the word ‘Hindi’, which I like, might appeal to others also.

Let us keep in touch with the people. That is a good practice. If you do that, then you will keep all the other avenues open. Then the language develops. Without any sense of pressure from anybody, without any sense of coercion, it takes shape in the, minds of millions of people. They gradually mould it and give it shape.

 

हमें कितना सुदूर अतीत में देखना चाहिए ? और कितना दूर सुदूर होता है?  1949 में संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिन्‍दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया । तब से आज तक हिन्‍दी का निरंतर विकास हो रहा है, यह मानने में दिक्कत तो नहीं होनी चाहिए । कुछ राजनीतिक या निजी स्वार्थ के कारणों को छोड़ दें, तो निश्‍चित ही हिन्‍दी का पूरे विश्व में स्वागत और विकास हुआ है ।

आज सतहत्तर वर्षों बाद यह उचित नहीं जान पड़ता कि इस बात पर बहस की जाए या इसका शोक मनाया जाए कि भारत की राजभाषा का नाम हिंदुस्तानीक्यों नहीं रखा गया ? गाँधी जी या प्रेमचन्‍द जिस भाषा की वकालत कर रहे थे, उसे एक ऐसी भाषा होना था जो आम जनता के लिए भी सरल और सुबोध हो । हिन्‍दी वैसी ही भाषा है – समावेशी और विकासशील । गाँधी जी या प्रेमचन्‍द के लेखों/भाषणों को पढ़कर यह  लक्षित किया जा सकता है कि  आमजन केलिए जिस आम भाषा की बात वे करते हैं, दरअसल वह हिन्‍दी ही है । ऐसा लगता है कि कठिन या संस्कृतनिष्ठ हिन्‍दी के लिए कोई अलग नाम न दे सकने की स्थिति में उसे हिन्‍दी कहा गया और जो हिन्‍दी थी उसे हिन्‍दुस्तानी । उन्होंने कई बार यह  कहा है कि हिन्‍दी और उर्दू एक ही भाषा हैं, फर्क बस लिपियों का है । हिन्‍दी वही काम कर रही है, जो प्रेमचन्‍द या गाँधी जी चाहते थे कि राष्ट्र की भाषा करे ।   

भारत के संविधान में संघ का नाम भारत, अर्थात् इंडिया’ ( India, that is Bharat) लिखा गया है । हिन्‍द और हिन्‍दुस्तान दोनों फारसी के शब्द हैं और दोनों का ही अर्थ भारत है । इस लहजे से भी हिन्‍दी और हिन्‍दुस्तानी का मतलब एक ही है । कई बार यह लगता है कि भारत एक भावनाप्रधान देश है । हर बात को हम भावनाओं से ही तौलते हैं । भावनाएँ जब उभार पर आ जाती हैं तो अहं भी सर उठाने लगता है । हिंदुस्तानी का मसला भी शायद कुछ ऐसा ही है। सबके अहं सहला दिए जाएँ, भावनाएँ आहत नहीं हो, तो बीच का एक रास्ता निकालिए । भले ही वह कृत्रिम हो। हिन्‍दुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरसता का बोध होता है, उस तरह हिन्‍दी कहने से नहीं” – यह कथन भी भावनाप्रधानही है । जय हिन्‍दसुनते ही हर भारतवासी के मन में जिस उत्साह और गर्व का संचार होता है, क्या उसकी व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरसता के स्तर को दूसरा कोई  उद्‍घोष या संबोधन छू भी सकता है ?

क्या हमारे देश की भाषा-नीति सिर्फ हिन्‍दी और उर्दू की रस्साकशी को हवा देने के लिए है ? ‘हिन्‍दुस्तानीको राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लेने से हिन्‍दी और उर्दू का झगड़ा समाप्त हो गया होता , यह थोड़ी दूर की कौड़ी है  शायद। हिन्‍दी-उर्दू के झगड़े की बात करके प्रकारान्‍तर से हिन्‍दू-मुस्लिम के झगड़े की बात उठती हुई दिखती है । प्रेमचन्‍द ने 29 दिसम्बर, 1934 को दक्षिण भारत हिन्‍दी-प्रचार सभा में दिए गए अपने भाषण राष्ट्रभाषा हिंदी और उसकी समस्याएँ में टिप्पणी की है   मज़ा यह कि हिंदी मुसलमानों का दिया हुआ नाम है और अभी पचास साल पहले तक जिसे आज उर्दू कहा जा रहा है, उसे मुसलमान भी हिंदी कहते थे । और आज हिंदीमरदूद है। क्या आपको नज़र नहीं आता कि हिंदीएक स्वाभाविक नाम है । इँगलैंड वाले इंगलिश बोलते हैं, फ्रांसवाले फ्रेंच, जर्मनीवाले जर्मन, फ़ारसवाले फ़ारसी, तुर्कीवाले तुर्की, अरबवाले अरबी, फिर हिंदवाले क्यों न हिंदी बोलें? उर्दू तो न काफ़िये में आती है, न रदीफ़ में, न बहर में, न वज़न में । हाँ, हिंदुस्तान का नाम उर्दूस्तान रखा जाय, तो बेशक यहाँ की भाषा उर्दू होगी ।  यह अभिभाषण लेखक द्वारा लेख में पृष्ठ 18 पर दिए गए उद्धरण ( जो प्रेमचन्‍द द्वारा 27 -10-1934 को बम्बई के राष्‍ट्र-भाषा-सम्मेलनमें दिए गए भाषण क़ौमी भाषा के विषय में कुछ विचारसे लिया गया है ) के दो महीने बाद का है । इन दो महीनों में उनके ( प्रेमचन्‍द) द्वारा किए गए सोच-विचार से भी यह भाषण अद्यतन हुआ होगा । लेखक ने उद्धरण में रिक्त स्थान छोड़ दिए हैं । पूरे अनुच्छेद को देखना पूरा परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करेगा –

            जैसे-जैसे सभ्यता का विकास होता जाता है, यह स्थानीय भाषाएँ किसी सूबे की भाषा में जा मिलती हैं और सूबे की भाषा सार्वदेशिक भाषा का अंग बन जाती है । हिंदी में ही ब्रजभाषा, बुन्‍देलखंडी, अवधी, मैथिली, भोजपुरी आदि भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं, लेकिन जैसे छोटी-छोटी धाराओं के मिल जाने से वह बड़ा दरिया बन जाता है, उसमें मिलकर नदियाँ अपने को खो देती हैं , उसी तरह से ये सभी प्रांतीय भाषाएँ हिंदी की मातहत हो गई हैं , और आज उत्तर भारत का एक देहाती भी हिंदी समझता है और अवसर पड़ने पर बोलता है, लेकिन हमारे मुल्की फैलाव के साथ हमें एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ गई है,  जो सारे हिंदुस्तान में समझी और बोली जाय, जिसे हम हिंदी या गुजराती या मराठी या उर्दू न कहकर हिंदुस्तानी भाषा कह सकें, जिसे हिंदुस्तान का प्रत्येक पढ़ा या बेपढ़ा आदमी उसी तरह समझे या बोले, जैसे हर एक अँगरेज या जर्मन या फ्रांसीसी फ्रेंच या जर्मन या अँगरेजी भाषा बोलता और समझता है ।

अपनी राय बनाने के पहले हमें प्रेमचन्‍द के उपर्युक्त दोनों उद्धरण साथ पढ़कर देखना चाहिए । 27-10-1934 के लेख में ही प्रेमचन्‍द ने आगे टिप्पणी की है --  हिंदी में हम उर्दू शब्दों को बिना तकल्लुफ स्थान देते हैं, लेकिन उर्दू के लेखक संस्कृत के मामूली शब्दों को भी अन्‍दर नहीं आने देते । हिन्‍दी में उर्दू की स्वीकार्यता का अंदाजा वर्तमान की साहित्यिक पत्रिकाओं के अंक पलटने से भी हो सकता है । नुक्ते को लेकर जो पतिबद्धता और तत्परता देखने को मिलती है, वह भी एक मिसाल ही है । और कुछ कवियों द्वारा अपने कविता-पाठ में ग़,, , ख़ इतना अतिरिक्त जोर देकर उच्चारित किए जाते हैं कि सुनने वाले के गले में खराश आ जाए ! बचपन से यह सुनते आए कि हिन्‍दी तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज शब्दों से मिलकर बनी है । हिन्‍दी ने सबको आत्मसात किया है, क्या उर्दू और क्या अँग्रेजी । भाषा समावेशी और लचीली होकर ही दीर्घजीवी हो सकती है ।

            पत्रिका के पृष्ठ संख्या 18 पर ही, ‘यंग इण्डिया’ 27 अगस्त,  1925 के एक लेख को उद्धृत किया गया है । चूँकि इस उद्धरण में संदर्भ का उल्लेख नहीं किया गया है, बात का रुख कुछ और ही हो गया है । सन्‍दर्भ उड़ीसा के कटक में एक जनजातीय इलाके में शिक्षा के माध्यम का है । गाँधी जी ने लिखा है –

            These reflection arise, because I was called upon to solve, during my visit to Cuttack, a practical question. There is a tribe wedged between the Hindi speaking people in Behar and Uriya speaking people of Orissa. What was to be done for the education of its children? Were they be taught through Uriya or through Hindi ? Or were they to be taught through their own dialect and if they were, was the script to be Devanagari or a new invention?

 

इसी क्रम में गाँधी जी ने अविकसित भाषओं के बलिदान वाली बात लिखी है, जिसे लेख में उद्धृत किया गया है । इस मामले में गाँधी जी ने शिक्षा का माध्यम हिन्‍दी और लिपि देवनागरी रखने की सलाह दी है । संवेदनशील मामलों में हमें समग्रता में बात करनी चाहिए, अन्यथा बात के सनसनीखेज हो जाने का अंदेशा रहेगा ।

 

(2)

 

हिन्‍दी का सबसे मुखर और प्रखर विरोध तमिलनाडु में होता रहा है ।  अभिनेता कमल हासन ने एक इंटरव्यू में हिन्‍दी फिल्म पड़ोसनको लेकर एक वाकया सुनाया है । पड़ोसन’ 1968 में रिलीज हुई थी ।  उस समय तमिलनाडु में हिन्‍दी-विरोध चरम पर था । वे कई वर्षों से हिन्‍दी फिल्में नहीं देख रहे थे । फिल्म में अभिनेता महमूद ने एक तमिल किरदार को निभाया था । कमल हासन पड़ोसनकी भर्त्सना करने के इरादे से फिल्म देखने गए । लेकिन वे जब वे फिल्म देखकर बाहर निकले तो वे प्रशंसक बन चुके थे । बाद में उन्होंने कई हिन्‍दी फिल्मों में अभिनय भी किया ।

            प्रसिद्ध समाचारपत्र द हिन्‍दूने अगस्त 2025 में एक खबर प्रकाशित की थी जिसमें यह बताया गया है कि तमिलनाडु के श्रम-विभाग में रजिस्टर्ड प्रवासी मजदूरों की करीब 12.17 लाख है । अधिकांश मजदूर उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड एवं प. बंगाल से हैं । बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड से गए प्रवासी मजदूरों के हिन्‍दीभाषी होने की संभावना ज्यादा है । ऐसे में यह कहा जा सकता है कि दक्षिण में हिन्‍दी-विरोध के इतर कारण ही रहे हैं । यह भी कि हिन्‍दी को बढ़ावा देने वाले शायद असली मुद्‍दे को समझ या पकड़ नहीं पा रहे हैं ।

 

            हिन्‍दी के शीर्ष लेखकों के नाम यदि याद करें, तो हम यह पाएँगे कि लगभग सभी लेखकों ने  अपनी घरेलू या मातृभाषा से उठकर हिन्‍दी के उत्थान के लिए अथक प्रयास किए । 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 121 भाषा/ भाषा-समूह और 270 मातृभाषाएँ हैं । हिन्‍दी भाषा-समूह में मैथली के अलग हो जाने के बाद 56 भाषाएँ/मातृभाषाएँ हैं। संख्या और भौगोलिक विस्तार के अनुसार हिन्‍दी भारत की सबसे बड़ी भाषा है । हो सकता है इसी व्यापकता के कारण हिन्‍दी ईर्ष्या-द्वेष का शिकार होती हो । लेकिन उससे भी बड़ा कारण संभवत: हिन्‍दी-भाषियों की अकड़ या थोड़ा अहंकार भी है । हिन्‍दी भी शायद अँग्रेजीजैसा स्टेटसप्राप्त करना चाहती है । उस स्टेटस को पाने के लिए प्रयास क्या हुए ? प्रेमचन्‍द ने इसी ओर इंगित करते हुए कहा है --  लेकिन प्रश्‍न उठता है कि राष्ट्रभाषा कहाँ तक हमारी जरूरतें पूरी कर सकती है ? उपन्यास, कहाँनियाँ, यात्रावृत्तांत, समाचार-पत्रों के लेख , आलोचना अगर बहुत गूढ़ न हो, यह सब तो राष्‍ट्रभाषा में अभ्यास कर लेने से लिखे जा सकते हैं; लेकिन साहित्य में केवल इतने ही विषय तो नहीं हैं । दर्शन और विज्ञान की अनंत शाखाएँ भी तो हैं, जिनको आप राष्ट्रभाषा में नहीं ला सकते । इसी क्रम में वे आगे कहते हैं – यह सभी का कर्तव्य है कि हम राष्ट्रभाषा को उसी तरह सर्वाङ्गपूर्ण बनावें, जैसी अन्य राष्ट्रों की सम्पन्न भाषाएँ हैं । और यहीं पर भारत मात खा जाता है । महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों  के हिन्‍दी-विभागों में जरा जाकर देखिए । वही कथा-कहानी, कविता-गीत औंटे-फेंटे जा रहे हैं । नवाचार के नाम पर विराट शून्य ! हिन्‍दी का मतलब खाली हिन्‍दी । खाली का मतलब सिर्फ भी, और खाली का मतलब खाली तो है ही । दूसरे विषयों, दूसरी डिसिप्लीनसे भला क्या काम ? हमारी चिंता यहाँ होनी चाहिए । हिन्‍दी ज्ञान-विज्ञान की भाषा बने, काम-काज की भाषा बने , राज की भाषा बनकर राज करने से क्या फायदा ? गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा की पाँच कसौटियाँ बताई हैं –

1.       सरकारी कर्मचारियों के लिए वह सीखने में आसान होनी चाहिए ।

2.       उस भाषा में भारत का आपसी धार्मिक, व्यापारिक और राजनीतिक कामकाज देश भर में संभव होना चाहिए ।

3.       वह भारत के अधिकांश निवासियों की बोली होनी चाहिए ।

4.       सारे देश के लिए उसका सीखना सरल होना चाहिए ।

5.       इस प्रश्‍न पर विचार करते समय क्षणिक या अस्थायी परिस्थितियों पर जोर नहीं देना चाहिए ।

 

गाँधी जी यह मानते थे कि इन पाँच शर्तों को पूरा करने में हिन्‍दी की बराबरी करनेवाली और कोई भाषा नहीं है । विचार करने पर आप भी इससे सहमत होंगे ।

कोई भी भाषा अपनी उपयोगिता के आधार पर ही बढ़ती-पिछड़ती है । दुनिया भर में अँग्रेजी का महत्त्व उसकी उपयोगिता के कारण ही तो है । हिन्‍दी में भी वह शक्‍ति है, लेकिन हम हिन्‍दुस्तानी ही उसकी ताकत को कम आँकते हैं । और तो और , उसकी ताकत को बढ़ाने के लिए किसी कोशिश या वर्जिश से कतराते भी हैं । हिन्‍दी को हम बस कथा-कहानी-कविता की भाषा बना कर ही छोड़ेंगे ।

 

(3)

 

            पहले की शिक्षा नीतियों में वर्णित त्रि-भाषाफॉर्मूला और 2020 की एन ई पी में मातृ/क्षेत्रीय भाषा पर दिया गया जोर, मंशा के स्तर पर तो ठीक है, कार्यान्वयन के स्तर पर सफल होना कठिन । बोलने-चालने या समझने-समझाने के लिए भी, अपनी भाषा में बात होना श्रेयस्कर है । लेकिन जहाँ पारिभाषिक या तकनीकी शब्दावली/ भाषा की जरूरत हो, वहाँ एक स्टैण्डर्डभाषा की जरूरत पड़ती है । ज्ञान-विज्ञान के सारे विषय ही वैश्विक पहुँच के लिहाज से टू-वेहैं। ऐसे में उचित सम्प्रेषण के लिए भाषा पर निर्भरता होगी ही । आजादी के बाद से हमने अपनी भाषा में ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों को तैयार करने में ज्यादा ध्यान नहीं दिया है ।  और अब रातोरात सबकुछ बदल तो नहीं सकता । हमने इतने दिनों से शिक्षण के माध्यम के रूप में अँग्रेजी को अतिशय महत्त्व दिया हुआ है । यह ठीक है कि हिन्‍दी या राज्य की भाषाओं में पढ़-लिख कर भी लोग सफल हो रहे हैं, पर उसमें अभी लंबा रास्ता तय करना है । हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हम अँग्रेजी को एकदम ही दरकिनार नहीं कर सकते । एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में उसका महत्त्व बना रहेगा । एक तो वैसे ही भाषा से क्या बैर, और फिर अँग्रेजी को भी हमने इण्डियनभी तो बना ही लिया है । संविधान सभा की भाषा-संबंधी बहस के दौरान नेहरू जी ने अँग्रेजी के संबंध में कहा था –

                         How far it (Hindi) will push out the use of the English language I do not know; but even if it pushes our English completely from our normal work, nevertheless English will remain important for us in our world contacts and in the international sphere.

                    

            दूसारी बात यह कि बात सिर्फ हिन्‍दी के उन्नयन की नहीं हो सकती । हमें सारी भारतीय भाषाओं के विषय में सोचना होगा । कम-से-कम सारी मुख्य भाषाओं के विषय में । हिन्‍दी चूँकि सबसे ज्यादा फैली हुई भाषा है, उसका उत्तरदायित्व ज्यादा है । हिन्‍दी-क्षेत्र के लोगों को अन्य भाषओं के सीखने के प्रति ज्यादा उत्साह दिखाना होगा । यूपीएससी-परीक्षा से चुने गए अधिकारियों  को अपने गृह-राज्यों के बाहर भी पोस्टिंग मिलती है । अपने काडरमें जाकर वे वहाँ की भाषा सीखते ही हैं । ऊपर तमिलनाडु में प्रवासी मजदूरों की चर्चा हुई है । वे मजदूर भी वहाँ जाकर, वहाँ की भाषा सीखते ही हैं । मुझे लगता है यदि किसी को यह अहसास न हो कि कोई भाषा उस पर जबर्दस्ती थोपी जा रही है, तो किसी भाषा से किसी को कोई दिक्कत नहीं होती ।

            उर्दू साहित्य, खासकर शेरो-शायरी, के देवनागरी में उपलब्ध हो जाने से उसकी पहुँच और लोकप्रियता कितनी बढ़ी है, यह किसी से छुपा नहीं है । हालाँकि, हिन्‍दी फिल्मों में गुलज़ार साहब जैसे लोग भी हैं जिनकी लिपि उर्दू है, लेकिन वे हैं हिन्‍दी के भी । पुराने लोगों में तो कितने ही ऐसे रहे हैं । आजकल एक चलन चल गया है , रोमन लिपि में हिन्‍दी लिखने का । हिन्‍दी फिल्मों के लोगों के बारे में तो सुननेको मिलता ही है कि उनका सारा काम-धाम रोमन लिपि में होता है । व्हाट्स अप और सोशल मीडिया ने भी इस चलन को बढ़ावा दिया है । यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि भाषा पर हुई बहस के दौरान संविधान सभा में भी हिन्‍दी के लिए रोमन लिपि अपनाने का प्रस्ताव भी रखा गया था ।

            सतहत्तर वर्षों में गंगाजी में बहुत पानी बह चुका है । आदमी को आगे देखने और आगे बढ़ने वाला होना चाहिए। इन वर्षों में भाषाओं ने अपना रूप और स्थान कमोबेश तय कर ही लिया है । हमारे सामने चुनौतियाँ अनेक हैं । एआई के आने के बाद भाषा पर उसके सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही प्रभाव होंगे । हमें उसके बारे में सोचना चाहिए । बदलती हुई दुनिया में अपने को रेलेवेंटबनाए रखने के लिए हमें क्या करना है, इस पर विचार होना चाहिए । भारत की कितनी ही भाषाएँ संकटग्रस्तभाषाओं की सूची में आ चुकी हैं । क्या हम तकनीक का सहारा ले कर उनका संरक्षण कर सकते हैं? क्या सामाजिक स्तर पर इसके लिए प्रयास किए जा सकते हैं ? किसी भी निर्णय के पीछे देश, काल और समाजकी परिस्थितियाँ और शक्तियाँ काम करती हैं । पुराने समय में क्या हुआ, हमारे पुरखों ने क्या सोचा और क्यों सोचा, इन सब बातों पर समय बर्बाद करने से बेहतर है कि हम वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचें । संविधान-सभा  में कितनी भी चर्चा हुई हो, उस समय के प्रमुख व्यक्तियों की जो भी राय रही हो, भाषा की असली परीक्षा उसका इस्तेमाल करनेवालों के हाथों ही होती है । अर्थशास्त्र की एक परिभाषा के अनुसार दिए गए संसाधनों का इष्‍टतम/ सर्वोत्तम उपयोग कर अधिकतम दक्षता प्राप्त करनाही इसके केंद्र में है । यह बात भाषा के पहलू पर भी लागू की जा सकती है । वरना दिल दुखाने के लिए हमारे पास और भी  बहुत-से उपाय हैं। दो तो स्मृति-दिवसही हैं !

 

सन्‍दर्भ :

 

1.        https://www.constitutionofindia.net/debates/13-sep-1949/

2.        https://archive.org/details/HindSwaraj.YoungIndia.Portal.vol7/page/n296/mode/1up पृष्ठ 296

3.        कुछ विचार, प्रेमचन्‍द, लोकभारती प्रकाशन, 2018

4.        गांधी का हिंदी संघर्ष, संपादन, गिरीश्‍वर मिश्र एवं डी.एन.प्रसाद, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, 2020

5.         

 सबलोगपत्रिका का जुलाई,2026 अंक यहाँ प्राप्त किया जा सकता है –

            https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?Shortcode=HNuV6r8n

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