साहित्य-वृत्त
[
साहित्य पर कुछ गैरशास्त्रीय टिप्पणियाँ ]
साहित्य
क्या, साहित्य क्यों ?
साहित्य
की शास्त्रीय परिभाषा जो भी हो, समझने के लिए हम कह सकते हैं
कि जिसे पढ़ने में मन लगे वह साहित्य है । मन लगाना पड़े, ऐसा
नहीं । इसीलिए पाठ्य पुस्तकें साहित्य नहीं कही जाएँगी ! ‘भाषा एवं साहित्य’ विषय की पढ़ाई में तो खैर साहित्य
की पढ़ाई होगी ही । जहाँ तक पढ़ने में मन लगने का सवाल है, वह
तो कई तरह के लेखन में लग सकता है । विभिन्न तरह के साहित्य के स्तरों पर बात की
जा सकती है । एक बात तो यह भी माननी चाहिए
कि जो पढ़ने वाले को रत्ती-भर भी बेहतर व्यक्ति बना सके वह अच्छा साहित्य है । यह
अच्छा बनाना, हो सकता है बहुत थोड़ी देर के लिए ही हो । यह
भी हो सकता है जब तक पढ़ रहे हैं, तभी तक असर हो ।
साहित्य
क्यों? इस प्रश्न पर दो तरह से विचार किया जा सकता है
। एक तो लेखक की ओर से और दूसरे, पाठक की ओर से। किसी लेखक को साहित्य रचने की जरूरत क्यों महसूस हुई होगी
? मूल रूप से अभिव्यक्ति की उत्कंठा , और
लोगों द्वारा उस अभिव्यक्ति को स्वीकारे और सराहे जाने की इच्छा के कारण ही लेखक
साहित्य रचने की प्रवृत्त होता है।
साहित्य
मनुष्य का सहचर भी है। एक पाठक इस बात को जरूर समझता है। साहित्य के मार्फत पाठक
अपनी भावनाओं, अपने दुख-सुख को साझा कर पाता है। कहते भी हैं कि
किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं !
साहित्य
का दरवाजा
दरवाजों
का उपयोग प्रवेश या निकास के लिए होता है । किसी-किसी स्थिति में किसी के मुँह पर
दरवाजा बंद भी कर दिया जाता है ! साहित्य एक ऐसा घर है जिसमें प्रवेश कर पाना ही
व्यक्ति को कुछ विशिष्ट बना देता है । हमारे आसपास की दुनिया में साहित्य के अनेक
दरवाजे बने हुए हैं। कौन-सा दरवाजा कब, कहाँ और कैसे
खुलेगा, किसी को इसका पता नहीं होता । किसी की नकल में,
किसी की प्रेरणा से, किसी के दबाव में -- बहुत
से कारण हैं जिनकी वजह से कोई पाठक पाठक बनने के रास्ते पर चलने लगता है । या कोई
लेखक लेखक बन जाता है ।
दरवाजा
कोई भी हो, उससे प्रवेश के बाद सामने साहित्य का विशाल मैदान/
प्रदेश सामने उपस्थित होता है । कोई धीरे- धीरे इस विशाल मैदान में विचरण करता है,
कोई थोड़ा तेजकदम चाल से।
पाठक
के लिए साहित्य के दरवाजे का खुलना आसान है । बतौर लेखक यह दरवाजा थोड़ी मुश्किल
से खुलता है । बल्कि दरवाजे का खुल जाना तो फिर भी आसान महसूस हो सकता है , दरवाजा खुलने के बाद पैठना आसान नहीं।
साहित्य
: कितना सच, कितना झूठ
साहित्य
में सच और झूठ का मिश्रण होता है । यदि सिर्फ सच ही सच लिख दिया जाए तो शायद उसमें
वह रस पैदा न हो पाए कि पाठकों/ श्रोताओं को बाँध सके । यदि साहित्य में सिर्फ झूठ
ही झूठ होना पकड़ा जाए तो साहित्य का आकर्षण ही न रहे ।
शायद
हम उतना ही सच चाहते हैं जो बर्दाश्त हो सके। उतना ही झूठ कि बात झूठ न लगे । उतना
ही सच कि बात अपने जीवन की भी, अपनी भी लगे । उतना ही झूठ कि
सिर्फ अपनी ही सच्चाई न लगे । उतना ही सच कि पढ़ने वाला अपना सच भी देख सके । उतना
ही झूठ कि पढ़ने वाला खुद की नजरों में ही न गिर जाए ।
साहित्य
सत्य की प्रतीति है। पूर्ण सत्य नहीं । साहित्य २२ कैरेट सच ही हो सकता है, २४ कैरेट नहीं ।
साहित्य
सच से मुख मोड़ने के लिए शरणस्थली नहीं, सच का सामना कर
पाने का उपाय है । गाढ़े सच में झूठ का थोड़ा पानी सच को गले उतरने लायक बना देता
है ।
साहित्य
के दिग्दर्शक
बहुत
प्राचीन काल में, जब पहलेपहल साहित्य रचा गया होगा, तब निश्चित तौर पर उसके कोई नियम, कोई नीति -
निर्देशक तत्त्व नहीं रहे होंगे । वह तो लंबे समय तक और विपुल मात्रा में साहित्य
रचे जाने के बाद नियम, नीति, मानदंड
आदि विकसित हुए होंगे ।
जीवन
के हर क्षेत्र में कुछ लोग होते हैं जो बाकियों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं ।
साहित्य के क्षेत्र में भी रोल मॉडल होते हैं। कुछ लोग ऐसे भी उभर कर सामने आते
हैं जो लोगों को बताने लगते हैं कि वे क्या लिखें और क्या पढ़ें । इन्हें हम
दिग्दर्शक कह सकते हैं । दिग्दर्शक अपने अध्ययन,अनुभव,
प्रतिभा और दृष्टि के कारण अपनी पोजिशन बना पाते हैं। दिग्दर्शक
लेखकों और पाठकों की रुचियों को प्रभावित करते हैं, उन्हें
एक आकार देने की स्थिति में होते हैं । हर छोटी-बड़ी जगह पर ऐसे व्यक्ति पहचाने जा
सकते हैं, जो साहित्य के दिग्दर्शक की भूमिका में होते हैं ।
दिग्दर्शकों की संख्या एकाधिक हो सकती है, बल्कि होती है ।
साहित्य
का परदा
परदे को
लेकर कितनी ही अभिव्यक्तियाँ हैं -- आँखों पर परदा पड़ा होना, परदे के पीछे के खेल, परदा गिर जाना, परदा डालना, बेपर्दा होना या करना । साहित्य के
संबंध में भी ये सारे मुहावरे लागू किए जा सकते हैं ।
साहित्य
को यदि एक मकान माना जाए तो इसके दरवाजों-खिड़कियों पर कई तरह के परदों की कल्पना
कर सकते हैं । इन परदों की वजह से मकान की खूबसूरती और प्रतिष्ठा बनी रहती है ।
कभी-कभी तेज हवा या बवंडर में परदे अपने स्थानों से हट जाया करते हैं और सच्चाई
अपने नग्न रूप में दिख जाती है । ऐसे में कइयों के मोह भंग होते हैं, कई मूर्तियाँ खंडित हो जाती हैं। परदे व्यवस्थित किए जाते हैं, परदे बदले जाते हैं, फिर नया चक्र शुरू होता है,
नई खूबसूरती गढ़ी जाती है, नए आदर्श स्थापित
किए जाते हैं ।
साहित्य
के प्रशंसक और चीयर लीडर
क्रिकेट
के उदाहरण से समझें तो साहित्य के क्षेत्र में भी प्रशंसक और चीयर लीडर, दोनों ही पाए जाते हैं ।
क्रिकेट
में चीयर लीडर 'टी ट्वेंटी' प्रारूप की देन हैं । खेल अपने 'तुरन्ता' रूप में है , इतना कि
' वन डे ' भी लंबा लगने लगा है । खेल
के स्टेडियम में मैच के दौरान बड़ी संख्या में प्रशंसक रहते हैं । खिलाड़ियों और
प्रशंसकों का मनोबल बढ़ाने के लिए चीयर लीडर होते हैं । प्रशंसक अपना पैसा और समय
लगाकर मैच देखने आते हैं । चीयर लीडर के लिए मैच एक अनुबंध की तरह है । चीयर लीडर
की सेवाएँ बिक्री के लिए उपलब्ध होती हैं, और दाम चुकाए जाने
पर खरीदार को प्राप्त हो जाती हैं ।
साहित्य
में भी प्रशंसक और चीयर लीडर होते हैं । इस चीयर लीडर को पहचानना थोड़ा मुश्किल
जरूर है । ऐसा इसलिए कि श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए चीयर लीडर एक सच्चे प्रशंसक
के रूप में दिखाए-बताए जाते हैं । सच्चाई यह है कि सही दाम चुकाए जाने पर चीयर
लीडर सिर्फ चीयर करना जानते हैं । साहित्य उनके सरोकार की चीज नहीं होती। यदि होती
भी हो, तो वे उस सरोकार का दाम वसूल कर रहे होते हैं ।
दाम कैश या काइंड किसी भी रूप में चुकाया जा सकता है ।
साहित्य
में न्योता-पुराई
हमारे
सामाजिक जीवन में न्योता-पुराई एक सहज स्वीकार्य और अपेक्षित व्यवहार है । अपने
किसी आयोजन में मैंने आपको बुलाया, फिर अपने किसी
आयोजन में आपने मुझे । मैंने यथाशक्ति ‘पत्रं पुष्पं’ अर्पित किए । आपने भी ।
साहित्य
में यह न्योता-पुराई आयोजनों में भागीदारी और परस्पर प्रशंसा के रूप में
विद्यमान है । इसमें ‘प्रॉक्सी’ भी चल सकती है । यानी किसी एक ने किसी
दूसरे के यहाँ न्योता-पुराई की । उस दूसरे ने पहले को जानने वाले किसी तीसरे के
यहाँ कर दी । साहित्य का संसार इतना बड़ा है कि कोई पीछे ही पड़ जाए, तभी ऐसे अन्योनाश्रय संबंधों को देख और पकड़ सकेगा ।
कभी
कभी यह न्योता-पुराई ' डार्क ' भी हो सकती है । तब
इसमें प्रशंसा की जगह बुराइयों को खोद खोद कर निकालने के समीकरण बनाए जाने लगते
हैं ।
साहित्य
: लेखक, संपादक, पाठक, आलोचक
किसी
रचना के जीवन में विभिन्न व्यक्ति आते हैं । उनके आने का क्रम इसी प्रकार है --
लेखक, संपादक, पाठक और आलोचक ।
पाठक और आलोचक के क्रम आपस में जरूर बदल सकते हैं ।
लेखक
ने कोई रचना रच ली । इसका एक फल तो यह है कि वह स्वांतःसुखाय होगी — "निज
कवित्त केहि लाग न नीका"। लेकिन इतने से काम तो चलेगा नहीं । रचना का प्रसार
भी उतना ही जरूरी है । इस प्रसार के लिए संपादक अगली कड़ी है । रचना का प्रकाशन या
तो पत्रिका में होगा, या फिर पुस्तकाकर । दोनों ही सूरतों में रचना
संपादक की नजरों से गुजरेगी । आजकल तो सोशल मीडिया का जमाना है । रचनाएँ सीधे भी पाठक
तक पहुँचाईं जा सकती हैं । बहरहाल, संपादक की नजरों से गुजर
कर ही रचना दुरुस्त होती है । कोई भी संपादक पत्रिका या प्रकाशन संस्थान की
नीतियों को ध्यान में रखते हुए रचनाओं का आकलन करता है । कोई भी प्रकाशक अपने
व्यावसायिक पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर सकता । अतः संपादक को यह भी ध्यान रखना होता
है कि रचना व्यावसायिक रूप से सफल हो सकती है या नहीं । संपादक का एक काम यह भी
होता है कि जरूरत होने पर रचनाओं को थोड़ा इस तरह कसा जाए कि वह निखर उठे । जरा-सी
हेर-फेर से कई बार रचनाएँ चमक उठती हैं । जिस तरह खुद के लिखे हुए की प्रूफ रीडिंग
करना बहुत कठिन है, खुद के लिखे का संपादन भी कठिन है । अपनी
रचना के प्रति लेखक का मोह स्वाभाविक है। संपादक जब किसी रचना को प्रकाशन के लिए
चुन रहा होता है, तो वह एक जोखिम भी उठा रहा होता है । रचना
कितनी सफल या असफल होगी इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता ।
अर्थशास्त्र में जोखिम उठाने के पुरस्कार को ही लाभ कहते हैं । प्रकाशन में भी जोखिम
है, और उसी हिसाब से लाभ या हानि ।
प्रकाशन
के बाद रचना पाठक के द्वारा पढ़े जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है । रचना के असली
भाग्यविधाता पाठक ही हैं । रचना को जीवित पाठक ही रख सकते हैं । आलोचक भी किसी
रचना के जीवन के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं । आलोचक किसी रचना की महत्ता को
सिद्ध या स्थापित कर सकते हैं । लेकिन ऐसा कर के वे किसी पाठक को मजबूर नहीं कर
सकते उस रचना को पढ़ने और सराहने के लिए ।
आलोचक
का काम एक बड़े परिप्रेक्ष्य में रचना का अवलोकन और आकलन करना है । आलोचक में नीर-क्षीर
विवेक का होना अपेक्षित है । आलोचक का दृष्टिसंपन्न होना भी आवश्यक है । आलोचक का
ही उत्तरदायित्व है कि वह किसी रचना या रचनाकार का साहित्य में उचित स्थान तय करे
। ऐसा करने के क्रम में वह पाठकों की रुचियों का भी परिष्कार करता चलता है ।
आलोचना के काम में भी जोखिम है । आलोचक ने जिस रचना पर अपना जो मंतव्य दिया है, वह गलत भी साबित हो सकता है । ऐसी स्थिति में आलोचक की रेपुटेशन खतरे में
रहती है । लेकिन अगर उसने रचना या रचनाकार की सही पहचान की है, तो रचना के सफल होने पर आलोचकीय दृष्टि की सफलता भी चर्चा में आ जाती है।
संपादक
और आलोचक किसी रचना को दो दिशाओं से देखते हैं । जहाँ संपादक का काम किसी रचना को
पठनीय बनाने का है, वहीं आलोचक का काम यह बताने का कि कोई रचना पठनीय
है या नहीं । यदि पठनीय है तो क्यों है, पठनीय नहीं है, तो क्यों नहीं है ?
अंत
में, यह भी कि किसी रचना के विषय में हम कितने समय,
कितने कालखंड तक आकलन का हिसाब रख सकते हैं? हर
रचना अपने साथ अपनी जीवनरेखा भी लेकर आती है ।
साहित्य
का बाजार, बाजार का साहित्य
जैसे इस
दुनिया में हर वस्तु का बाजार है, साहित्य का भी अपना बाजार है
। मुद्रा या पैसा ही हर उत्पाद के हस्तांतरण का मूल आधार है। इस बात को इस तरह भी
कह सकते हैं कि जिस भी वस्तु को हम पैसे देकर प्राप्त कर सकते हैं, वह एक उत्पाद है । इस तरह साहित्य
भी एक उत्पाद है । साहित्य का उत्पाद होना
कतई बुरा नहीं है । यदि ऐसा न हो, तो साहित्य बहुत सारे
लोगों तक पहुँच भी नहीं पाएगा । यह बाजार हर तरह के साहित्य के लिए मौजूद है ।
अलबत्ता,बाजार की सफलता साहित्य की अमरता का आधार नहीं होती
। इन दिनों 'बेस्ट सेलर' किताबों की
सूची प्रकाशित होती रहती है। इस सूची में स्थान
पाना किताबों के कालजयी होने की गारंटी तो नहीं है । हाँ, ये
सूचियाँ एक प्रवृत्ति, एक चलन या फैशन की ओर इशारा करती हैं
। सम्भवतः यहीं से बाजार का साहित्य रचे जाने की शुरुआत होती है । बाजार का
साहित्य, यानी बाजार की माँग के अनुसार साहित्य का उत्पादन ।
हालाँकि इस चलन में भी कुछ अच्छा साहित्य रचा ही जा सकता है । साहित्य की माँग और
साहित्य की आपूर्ति दोनों ही शक्तियाँ साहित्य के रचे ( साहित्य के उत्पादन) और
पढ़े जाने ( साहित्य के आस्वादन) को प्रभावित करती हैं । ‘बाजार
का साहित्य’ के साथ बिक्री का आरोपित दबाव चलता है । इस कारण
फिर तरह-तरह के हथकंडे भी जगह बनाने लगते हैं । साहित्य के बाजार को ऑर्गेनिक और
बाजार के साहित्य को उर्वरक-आधारित कहा जा सकता है ।
साहित्य
के रक्षक और संरक्षक
कई बार
ऐसा लगता है कि आनेवाले समय में साहित्य की जरूरत ही नहीं रह जाएगी । और बार-बार
यह शंका निर्मूल भी सिद्ध होती रही है । साहित्य की जरूरत हमेशा बनी रही है । समय
के साथ-साथ साहित्य ने अपना चोला जरूर बदला है । मौखिक से लिखित और अब लिखित से
डिजिटल, साहित्य ने माध्यम-भर बदला है ।
जहाँ
तक साहित्य की रक्षा का सवाल है, तो मूल रूप से लेखक और पाठक
ही साहित्य की रक्षा करते आए हैं। इसमें संपादक और आलोचक को भी जोड़ा जा सकता है,
लेकिन उसमें बहुत से 'अगर-मगर' जुड़ जाने की संभावना होती है।
रक्षक
साहित्य से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं । इनके अलावा कुछ लोग साहित्य के संरक्षक (
custodian) के रूप में भी काम करते हैं । इनका काम
साहित्य को सुरक्षित रखना और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते रहना है । बहुत
सारे पुस्तकालयों, ‘सभाओं’, ‘सम्मेलनों’,
संस्थानों आदि को हम साहित्य के संरक्षक कह सकते हैं । संरक्षक
स्वयं साहित्य नहीं रचते, या जरूरी नहीं कि वे स्वयं पाठक भी
हों, पर वे साहित्य को सुरक्षित रख सबके लिए उपलब्ध करवाते
रहते हैं ।
साहित्य
: साधना या कौशल ?
साहित्य
को हमने ऊँची पद्वी दे रखी है । साहित्य हमारे लिए साधना के समान है । जीवन के
बहुत से उच्चतर कार्यों में साहित्य-साधना भी एक है — यह धारणा बहुत हद तक सही भी है । साहित्य आदमी के मन को छूता है और उसे सूखने से
बचाता है । इस लिहाज से साहित्य साधना तो है ही । किसी के मन को छू जाने वाली बात
कहने के लिए रचनाकार को साधना तो करनी ही पड़ेगी । साधना साध लेने का ही तो नाम है
।
आज
के समय में एक ही साथ बहुत से लेखक सृजनरत हैं ।
समय की छन्नी से छनकर कितने बचेंगे, इसका सही अंदाजा
नहीं लगाया जा सकता । कुछ लेखकों ने साहित्य को एक कौशल की तरह सीख लिया है । कौशल
में हाथ की सफाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती है । ऐसे लेखक लिख तो रहे हैं, पर क्या वे रच भी रहे हैं ? ऐसे लेखन में आपके ध्यान,
आपके चित्त का काम उतना नहीं रह जाता । कविता में छंद से विमुखता का
एक कारण शायद छंद को एक कौशल के रूप में साध लिया जाना भी रहा ।
कभी-कभी
साहित्य को अपना हित साधने के औजार के रूप में साध लिया जाता है । प्रशंसा रामबाण
होती है, साहित्य वह रामबाण बन जाता है । कभी-कभी यह बाण
उल्टा भी चलता है, यानी ध्वंसकारी भी हो जाता है । ध्वंसकारी
न भी हो , तो चुगलखोरी में तो रत हो ही जाता है । ऐसे में हम
कह सकते हैं कि साहित्य में राजनीति का प्रवेश हो गया है ।
लोकभारती
बृहत् प्रामाणिक हिंदी कोश में राजनीति के तीन अर्थ दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं -- १. राज्य की वह नीति जिसके अनुसार प्रजा का शासन और
पालन तथा दूसरे राज्यों से व्यवहार होता है ।
२.किसी दल द्वारा सत्ता प्राप्ति या सत्ता बनाए रखने के उद्देश्य से अपनाई
हुई पद्धति जो राष्ट्रहित की दृष्टि से अनुकूल न हो । ३. कुटिल नीति ( व्यंग्य) ।
साहित्य
पर राजनीति के उपर्युक्त तीनों अर्थ लागू होते हैं ।
साहित्य
को क्या महान बनाता है ?
यह
कहा जा सकता है कि किसी भी तर्क से किसी रचना को महान बताए जाने के मूल आधारों के
तौर पर रचना के 'कंटेंट' और उसके 'इंटेंट' को ही रखा जा सकता है । लोगों के तर्कों के
रंग जरूर अलग-अलग हो सकते हैं ।
'कंटेंट' से हमें रचनाकार की तैयारी और 'इंटेंट' से उसकी निश्छलता का अर्थ लेना चाहिए । यही
वे अवयव हैं जो किसी रचना को बचाए रख सकते हैं ।
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