शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

अथ कविकथा

 

अथ कविकथा

 

कवि के गुण, कविता के गुर

        (1)

किसी कवि या कलाकार से

मिलने के पहले

यह तय कर लें

कहीं ढूँढ़ने तो नहीं जा रहे

उसकी कविता या कला को

उसके भाव और व्यवहार में

 

कविता या कला के क्षण

बहुत थोड़े ही होते हैं

बाकी समय तो आदमी

पूरा व्यवहारिक होता है

झूठ- मूठ का हँसता है

झूठ- मूठ का रोता है  !     

 

          (2)

आपने सुनाई कविताएँ

सुनी- सुनाई

 

इतने पैसे और इन सुविधाओं में

संभव है

इतनी ही समाई

 

        (3)

घोर असाहित्यिक सभा में

आप आए सब जानते हुए

 

आपने चाहा--

जब मंच पर आएँ

आप कुछ सुनाएँ

लोग छोड़कर सारी बातें

अपनी प्लेटें,बाकी काम

बस देकर पूरा ध्यान

सुनें आपको

 

आप कवि हैं

आप कुछ भी सोच सकते हैं   !

 

       (4)

कवि में कब अफसर दिख जाए

कब अफसर कवि हो जाए

कहना कठिन है

 

पहले भी था

समय

अब और भी मलिन है  !

 

       (5)

कौन किसको नाध रहा है

कौन क्या कुछ साध रहा है

कुछ भी करना, पाना सम्मान

कवि, सावधान  !

 

     (6)

आपने कहीं

सफ़ारिश की

कि वो भला इन्सान

कवि भी है महान

 

आप

आप ही बन गए महान  !

हींग लगे न फिटकरी ...

     (7)

कवि की

कविताएँ पढ़ीं

चकित हुआ

 

कवि का

व्यवहार देखा

चकित हुआ

 

चकित

होने-होने में

कितना फ़र्क है

कितना ज़्यादा  !

 

हे कविश्रेष्‍ठ !

हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे  !!

 

भाषा पर अधिकार

बहुत अच्छा

कवि का व्यवहार

बहुत अच्छा

कवि ने जो किया सेवा-सत्कार

बहुत अच्छा

दिया उसने जो भेंट-उपहार

बहुत अच्छा

सब लेन-देन, सौदा-सुलुफ

विशुद्ध व्यापार

बहुत अच्छा

 

सारे अच्छे बाह्य तत्वों से ही गोया

उसकी कविता सधी है

उसके दुआरे पर गैया नहीं,

कविता बँधी है,

कवि के लिए तो

चारा यही है

 

कवि- आलोचक- प्रकाशक- संपादक

जिसके चरणों में लोट रहे

 

हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे  !!     

            

कवि की नैतिकता

कवि का शृंगार

कभी करघनी

कभी गले का हार

कवि व्यक्ति विशिष्ट

विशिष्ट

उसका शिष्टाचार

 

फूलती-फलती है कविता

कवि निरामिष 

करता है फलाहार

 

साहित्य के सिलबट्टे

लेखन की भाँग को

अपने हाथों से जी

जैसे तुम घोंट रहे

जैसी भी हवा हो चाहे

तुमको ही वोट रहे

नाम हो तुम्हारा, और

डंके की चोट रहे


हे कविश्रेष्ठ तुम्हारी जय रहे  !!    

 

     कविता की क्लास

हरेक  माल   सात  सौ  पचास

वे  कवि   बनाते   खासमखास

 

कवि बनो, छपाओबँटवाओ

कुछ  वे  निकाल  देंगे  भड़ास

 

कवि  हैं  उनका  नाम  बहुत है

यूँही    नहीं    करते    सम्भाष

 

दाम चुका कवि को सुन  लीजे

वरना   कौन   डाले   है   घास

 

उनसे  क्या  ही   करें   उम्मीद

वे  तो  खुद   हैं    पानीफ़राश

 

कहें बड़े कवि जो  सुधा वचन

वही  छोटन  का    वाग्विलास

 

खदबद-खदबद कवि करते हैं

उनपर  कोई    डाले   प्रकाश

 

उगे    हैं     जैसे     कुकुरमुत्ते

जैसे  बाद  बरखा   के   कास

 

दिल्ली   दूर  ही   रहे   अच्छा

अगर  हो  संगदिलों  का वास        

 

कवि की क्लास

आपने सिखाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम


पैसा देते छप जाते

कहीं ना कहीं खप जाते

पैकेज में कमी थी जो

आपने पुराया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

स्वयंसिद्ध स्व-अभिप्रमाणित

जाने कितने फिरते हैं

एक कहो सौ गिरते हैं

आपने उठाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम

 

नाम क्या, नई धारा है !

साहित्य को सँवारा है !

कितना भाईचारा है !

आपने निभाया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

अगली पंक्ति  बैठ बड़े

पिछलों को तो भाव न दें

पीछे नीचे वालों को

हल्के सहलाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम

 

कितना अच्छा, निविदा हो!

सबको कितनी सुविधा हो!

संपादकों ने नहीं तो

मुफ्त सर खुजाया मैडम

कवि हमें बनाया मैडम

 

किसकी सुनता कौन यहाँ

किसको चुनता कौन यहाँ

सब ही उम्मीदवार हैं

अभी समझ आया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

पहुँच पैरवी जो लाए

वह तो जग पर छा जाए

वरना पिछली बेंच बैठ

रहे बौखलाया मैडम

आपने बचाया मैडम

 

माना कि अंगूर खट्टे

हम  सारे  खाते बट्टे

हम नाकारा नाकाबिल

है मन बौराया मैडम

हमें कवि बनाया मैडम  !!

 

अग्रज सारे दिग्गज हैं

बाकी  सारे पदरज हैं

कुछ भी कर अग्रज होऊँ

कवि यही मनाया मैडम

आपने सिखाया मैडम

 

कौन कब ठगाया मैडम

कौन बरगलाया मैडम

चिकनी-चुपड़ी बातों का

छुरा कौन चलाया मैडम

जग झूठा जग चालबाज

आपको फँसाया मैडम  !!             

 

अथ कविकथा

सारे काम-धाम वही

सारी बात-वात वही

मदिरा का पान वही

राजनीति-ज्ञान वही

कहने को सारगर्भित

दरअसल पतित-गर्हित

लोभी, लंपट,कपटी

करते छीना-झपटी

पर,सबसे अलग दिखने को

आगे सबसे बढ़ने को

देखिए कि उनका

कवि का मुखौटा है !

 

पूर्णकालिक धंधे के

पीछे-पीछे चलती है

गले का हार बनने को

माथे पे चढ़ने को

हर घड़ी मचलती है

रोज ही फिसलती है

ऐसे में कहिए तो

कविता जँचती कैसे

कविता बचती कैसे

खुद बुरी नजर वालों के

हाथों में आजकल

कविता का कजरौटा है !

 

सूखी रोटी की महिमा

निर्धनता की गरिमा

कितना बखाने हैं

कितने सयाने हैं !

कोई भला क्या जाने

जो ही सुने वही माने

जनता की आँखों पर

महिमा की पट्टी है

कविता तो इन दिनों,बस

पढ़ा रही पट्टी है

इधर टिफिन में कवियों की

भरा घी का परौठा है !

 

कवि ही तो है पाठक

और कवि आलोचक

आयोजक भी कवि

कवि ही तो प्रायोजक

कविता के खाँचे हैं

कविता का चूल्हा है

कविता की निमकी है

कविता का ठेकुआ है

या जैसे फँसाने को

दवा-मिला आँटा है

या कविता चूहा है

और कवि बिलौटा है !                 

 


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