स्पृहा-गीत
[ दूसरा
पक्ष : बद्री नारयण की कविता ‘माँ का गीत’
सही,गलत या अच्छा, बुरा ठहराने को नहीं, सिर्फ एक दूसरा पक्ष ]
अच्छा हुआ, आप स्वनामधन्य हुए
नहीं तो,होना
पड़ता कुछ और
जो, हो सकता है, होता
बहुत मामूली
और बड़ा गैरजरूरी भी !
मसलन कुछ चेतन कश्यप जैसा !!
मंच पर नहीं मिलती कुर्सी
बैठना पड़ता नीचे ही
करना पड़ता इंतजार भी
किसी मौके का,किसी की कृपा का
कि हो सके दो शब्द दो बात,
कोई छोटा-सा काम
कुछ ईनामो-इकराम
जिसका मौका
मिलता, कभी नहीं भी मिलता
आदमी बड़ा है
तय होता यह जिन बातों से –
किस साधन से आए
कहाँ ठहरे, कहाँ खाए
कहाँ किया रसपान –
उनमें समाई के
मुन्तजिर ही रह गए होते शायद...
जान भी पड़ जाती साँसत में –
किसी की बेतुकी बात पर
बजाएँ कि न बजाएँ ताली
सरे-आम किसी का लेके नाम
ऊटपटाँग कहते जाएँ खाली...
जस का तस मान लेना हर बात को
सब कर के दरकिनार,
विचार
क्या हो पाता संभव ?
हर बार ??
दोस्तो,
इससे पहले कि कोई गफलत हो
यह जान लें आप
स्वनामधन्य जी और चेतन कश्यप
जातिवाचक और भाववाचक संज्ञाएँ हैं
इस कथा में !!

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