शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

मन न रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा


 

मन न रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा


मंच सजा हुआ था । लोग आसीन थे । मंच पर पीछे बड़ा-सा बैनर लगा था “ व्याख्यानमाला मन की – मन न रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा” । भगत जी माइक पर आ चुके थे । उन्होंने बोलना शुरू किया —

मन न रँगाए रँगाए जोगी कपड़ा , कबीर साहब के एक पद के टेक की यह पंक्ति हमलोगों ने जाने कितनी ही बार सुनी होगी । सुनकर हम कितनी ही बार मुदित हुए होंगे । कितनी ही बार भावविभोर । जबसे मुझे कहा गया कि इसी पंक्ति को आधार बना कर मुझे बोलना है, यह पंक्ति मेरे मन में चक्कर काट रही है ।

दिक्कत तो शुरू से ही शुरू है । मन को कोई कैसे रँगे ? मन किसने देखा है ? हिरामन ने पूछा था हीराबाई से - " मन समझती हैं आप "? नतीजा क्या हुआ? आप शायद हिरामन को नहीं जानते होंगे । बस यह मान लीजिए कि मेरी ही तरह एक पुराने जमाने का व्यक्ति जो जमाने से एडजस्ट करने की कोशिश में था, लेकिन जमाना जिसके साथ एडजस्ट नहीं कर पा रहा था । खैर । मन अगर कुछ है भी, तो आज के मशीनी, और अब तो एआई के युग में मन का क्या मोल ? अभी हाल ही में एक मित्र ने कर के दिखाया -- कुछ निर्देश दिए और पलक झपकते ही निर्देशानुसार एक नई  कविता मोबाइल के स्क्रीन पर लिखा गई । कवि-मन अब क्या करेंगे ? एआई तो वहाँ पहुँच रहा है, जहाँ कवि भी न पहुँचे !

रँगने की चीज तो कपड़ा ही है। ' कपड़ा ' को थोड़ा अर्थ - विस्तार दीजिए । कपड़ा, घर, गाड़ी, जीते, बैग आदि इत्यादि। कपड़े बदल कर देखिए, आपके तेवर भी बदल जाएँगे ।

आप बताइए कि जीवन के अलग-अलग मौकों, अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग यूनिफॉर्म, अलग परिधानों का आविष्कार क्यों किया गया होगा ? मुझे कई बार लगता है कि आपका बाहरी आवरण आपके भीतरी व्यक्तित्व को बदल देता है । जबकि बचपन से हम सुनते आए हैं कि भीतर जैसा बाहर वैसा , कि ' मन चंगा तो कठौती में गंगा '

अपने आसपास के जीवन में अपने गौर किया होगा कि अलग-अलग स्कूलों के लिए अलग-अलग रंग के स्कूल-ड्रेस हैं। ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी कि बच्चों के स्कूल ड्रेस अलग रंगों के किए जाने लगे । स्कूलों की 'क्लास' अलग जो करनी थी ! आप ड्रेस देखकर समझ जाते हैं कि महँगा ( अच्छा) स्कूल या सस्ता ( कमतर) स्कूल । आप सोच कर देखिए कि सस्ते से महँगे स्कूल में जाने का मौका मिलने पर पहली चीज क्या बदलती है बच्चे के लिए ? स्कूल ड्रेस ही तो । उस ड्रेस के पहनते ही बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ जाता है, वह बहुत-से बच्चों से ऊपर उठ चुका होता है ।

पुलिस या सेना की वर्दी पहनने के बाद क्या रगों में जोश नहीं दौड़ जाता ? एक लुंजपुंज मरियल-सा व्यक्ति भी जब पुलिस की वर्दी पहन, सोंटा लेकर निकलता है, बड़े-बड़े लोग भी संभल कर चलने लगते हैं !

कुछ दशक पहले , एक खास प्रदेश में, खादी का सफेद कलफ़दार कुर्ता-पाजामा और हाथ में रोल किया हुआ अखबार लेकर कोई ट्रेन में सवार होता था, तो टीटी उससे टिकट के बारे में पूछने की हिम्मत नहीं कर पाते थे । आदमी से ज्यादा उसका कपड़ा काम करता है !

कुछ ऐसा ही माजरा कभी बुलेट और बाद में स्कॉर्पियो में चलने वाले सज्जनों के साथ भी है । अभी भी बुलेट पर चलता हुआ खुद को व्यक्ति हीरो ही समझता है, ज़मीं से दो इंच ऊपर !!  

पेप्सी के बोतल का रंग, रेल के डब्बों का रंग , किसी कंपनी के लोगो का रंगरूप,किसी वेबसाइट का ले-आउट –  ऐसे कितने ही उदाहरण हैं रँगाए जोगी कपड़ाके । क्या पेप्सी का स्वाद बदल गया, क्या रेलवे का चरित्र बदल पाया, क्या वेब साइट का कंटेंट बेहतर हो जाता है, क्या कंपनी के उत्पाद पहले की तुलना में अच्छे हो जाते हैं ? शायद हाँ, ज्यादातर नहीं ।

दरअसल हमारे दिमाग में बैठ गया है कि जो दिखता है, वही बिकता है, और जो बिकता है वही बचता है । हम सब सर्वाइवल की जंग लड़ रहे हैं ।

आप यदि बताने जाएँगे कि लोगो नहीं काम को सुधारे जाने की जरूरत है, तो आपको ही सुधार दिया जाएगा ।  रँगे हुए सियारों पर पानी डालने का समय नहीं है यह । कम्बल ओढ़ कर घी पीने का है ।

जो भीतरी वस्तु है, जो 'कोर' है,उसकी तरफ देखने की किसी  को जरूरत महसूस नहीं होती । बल्कि शायद यह ज्यादा  सही है कि उस ओर देखने और उसे स्वीकार कर पाने का साहस किसी के पास नहीं । डायग्नोसिस पर ध्यान ही नहीं, दवा पर दवा बदली जा रही है ।

आपने भी शायद महसूस किया होगा कि कुर्सी यानी पद व्यक्ति को ऊँचा उठा देता है । कुर्सी पर बैठते ही विचार बदलने लगते हैं, पसंद बदलने लगती है, बोली बदलने लगती है -- कुछ जरूरत में, कुछ मद में और कुछ समय बाद लत में ।

तोबात यही है कि कपड़े रँगने पर ध्यान दीजिए । हो सकता है रंग रिस-रिस कर मन को भी रँग जाए !!

'थ्री इडियट्स' फिल्म आपने शायद देखी हो । उस फिल्म की दो बातें यहाँ ध्यान देने योग्य हैं । एक तो यह कि स्कूल हो कि कोई पार्टी कपड़े होने चाहिए मौके के मुताबिक । दूसरी यह, कि कुछ लोगों के लिए चीजों का महत्त्व उनके दाम से तय होता है । आपका भी किसी ऐसे बीमा एजेंट से पाला पड़ा होगा जो पॉलिसी की खासियत के बजाय उसके दाम को बता कर आपको कन्‍विंस करना चाहता है कि यह पचास हजार की है, तो यह पॉलिसी दो लाख की है । आपकी जेब के अनुसार आपको बड़ा बनाते हुए !  हम भी शायद यही मानते हैं -- सस्ता साबुन, महँगा साबुन, सस्ता स्कूल, महँगा स्कूल, सस्ती गाड़ी, महँगी गाड़ी -- गुण के ग्राहक नहीं, हम अपने स्टेटस के खरीदार हैं !

एक बात बताऊँ आपको, एक चीज होती है पेसमेकर । दिल की बीमारी के इलाज में काम आती है । अपनी बीमा-सुविधा के अंतर्गत सरकार ने जो उसका मूल्य तय कर रखा है, उससे छह-सात गुना ज्यादा मूल्य पर वही पेसमेकर 'अच्छे' प्राइवेट अस्पतालों में बिकता है ।

दर्शक-दीर्घा की तीसरी पंक्ति में बैठे बुतरू ने टोकते हुए कहा -- आप पर्सनल हो रहे हैं सर !  आपको इलाज में दिक्कत आई होगी, सबके साथ तो नहीं हो सकता न ।

भगत जी ने जवाब दिया - मेरा पर्सनल क्या इस सभा के सोशल से अलग है ? अच्छा, तो किसी बैंक के ऐप, किसी किताब के पृष्ठों की संख्या और उसकी कीमत, किसी नेता-अभिनेता के खोखले वक्तव्यों पर बात करूँ ? किसी खास रंग के झंडे को उठाने के कारण व्यक्ति को किसी खास कैटेगरी में नहीं डाल देते हम ? वह व्यक्ति क्या उस खास कैटेगरी का प्रतिनिधित्व नहीं करने लगता खुद भी ? किसी कविता का मात्र पाठ कर देने से क्या हम आइडेंटिफाई नहीं कर लिए जाते ? "किसको फुर्सत है जो पूछे दीवाने का हाल"?

बुतरू - क्या आपको नहीं लगता कि आपकी बातों से रंगों यानी विविधता की मुखालफत की बू आ रही है ?

भीड़ में से किसी ने टोका - बू तो आपकी ज़बान से भी आ रही है ।

भगत जी जोर से हँस पड़े । हँसते हुए उन्होंने कहा -- भाइयों , हम सबकी कमलिया 'सूरदास की काली कमलियाचढ़ौ न दूजो रँग ' वाली हो गई है । और हम सब सूरदास भए हैं, आँखों वाले सूरदास !

सभा में हँसी की लहर दौड़ गई ।

भगत जी ने राहत की साँस ली और सभा से प्रस्थान किया ।

***

रात में एक शानदार कैफे में कॉफी पीते हुए भगत जी ने पूछा - तुमने थोड़ा पहले नहीं टोक दिया ?

बुतरू - आसपास भुनभुनाहट सुनाई पड़ रही थी कि ये जो अलग-अलग रंग के पास देकर, यहाँ भी भेदभाव किया है आयोजकों ने, वह क्यों पैसे ही लेने थे, तो खुलकर लेते ।

भगत जी - वह तो अच्छा हुआ उस आदमी ने कुछ ऐसा कह दिया कि सूरदास वाली पंक्ति कहने का मौका आ गया ।

बुतरू - आप सचमुच यह मानते हैं कि मन कुछ नहीं होता, उसे रँगा नहीं जा सकता ?

भगत जी - भाई, मन तो सबका रँगा हुआ है । रंग चढ़ता-उतरता रहता है । लेकिन अब हर चीज बस ' स्किन डीप ' होकर रह गई है । और दूसरी तरफ यह भी हो गया है कि हमारी चमड़ी इतनी मोटी हो गई है, कि कुछ भी हो जाए, कुछ असर नहीं होता ।

बुतरू - फिर ?

भगत जी - फिर क्या ? "मेरा पैगाम मुहब्बत है, जहाँ तक पहुँचे"।

बुतरू के चेहरे पर असमंजस के भाव आए-गए । उसने चुपचाप कॉफी पीते रहने में ही भलाई समझी ।

भगत जी ने ताड़ते हुए कहा - जिगर मुरादाबादी के शेर की लाइन है । पूरा शेर सुनो --

     उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

      मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे


                                                ***

 

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