शुक्रवार, 27 मार्च 2026

कोयल बोली...

 

कोयल बोली...

 

  (१)

 

इस कदर खींचती है

कोयल की बोली हुजूर

आदमी

कभी कोयल

रहा होगा

ज़ुरूर ।  

 

    (२)

 

अलस्सुबह
कोयल ने गाया है
कू उ उ कू उ उ
हस्बे मामूल
याद दिलाया है
तू उ उ तू उ उ

 

राजा वसंत की
मुनादी है
प्रकृति पर
हो रहा है
रंग-रोगन नया

 

मन-मीन 
तड़फड़ाया है !

 

   (३)

 

एक कोयल ने
बचा रखी है उम्मीद --
कूऽऽऽ  कूऽऽऽ  कूऽऽऽ...  

वरना
क्या मैं
और
क्या तू...

 

    (४)

 

क्यूँउ , क्यूँउ, क्यूँउ

पूछती है कोयल

तकरीबन

रोज

इसी वक्‍त

 

जो पूछना था

मुझे खुद से

कि

करना था

जो

किया था तय

 

कोयल

तो बस

याद ही दिला सकती है !

 

     (५)

 

नल खुला छोड़ा

बत्ती जली छोड़ी

खाना

बनाया न खाया

न की

साफ-सफाई ही

 

दिल्लगी नहीं

दिल-लगी है

 

सुबह-सुबह

आज

कोयल भी कह गई है

 

      (६)

 

लॉकडाउन में कोयल

     [१]

 

कोयल कूकी

भरी दुपहरी

भरी दुपहरी

कोयल कूकी

 

नित-नित कूकी

जित-तित कूकी

डाल -डाल पर

बैठी, कूकी

 

और हवा भी

हल्की-हल्की

बैठी खो के

सारी खुनकी

 

थके-थके-से

कुछ कुत्ते भी

सोए भी हैं

और जगे भी

 

दुखी-दुखी-सी

दबी-मरी-सी

बिल्ली घूमे

है चुपचुप-सी

 

बात नहीं है

ये सुख-सुख की

भली नहीं है

इतनी चुप्पी

 

घर में घुरघुर

कितना आतुर

अकबक जैसे

खा के घुड़की

 

चार तरफ से

आँखें मूँदी

लड़ते-मरते

लूटा-लूटी

 

नित-नित कूकी

जित-तित कूकी

भरी दुपहरी

कोयल कूकी

हम चूके हैं

दुनिया चूकी

 

      [२]

 

कुत्ते की आँखें पनियाईं

थकी कबूतर की पाँखें

पस्त कूक कोयल की

         रह-रह टोक रही हैं

 

कुछ तो सबकुछ बोलें बातें

कुछ बातें कुछ ना बोलें

चित पर होती घातें

        रह-रह भोंक रही हैं

 

आँख-कान को मूँद-मूँद कर

कूद-कूद के झूठ-मूठ

अफवाहें सच्चाई

        रह-रह रोक रही हैं

 

  (७)

 

कोयल

तुम क्यों गाती हो ?

 

यह समय

नारों का है

प्रतिरोध का है

विचार का है

गाने से भला क्या होगा ?

 

कूकने

और भौंकने में

फर्क महसूस

नहीं करते हैं लोग

 

जरूरत ही नहीं

 

और कभी

पक्ष लेने की बात आई

तो

भौंकना ही

जीत जाएगा , देखना

 

तुम ही कहो

गाना कहाँ जरूरी है ?

 

सुनो

कभी

एकदम

सुबह-सवेरे

सुना मेरा गान ?

क्या

मन हुआ नहीं शांत

जरा भी

 

सारी भागदौड़

थम नहीं गई

जरा देर को

 

ये जो

दिन भर

झूठ के झमेले में

पड़े रहते हो

क्या पाओगे उससे ?

जाने

कहाँ-कहाँ के

जोड़-तोड़ में फँसे हो

उससे क्या होगा ?

 

जिस आदमी को

भूक-भौंक के

तुमने कुत्ता बना दिया है

उसी को

बचा ले जाने की

कवायद है

मेरा गान

 

जिस दिन

मेरा गान भी

कर्कश हो गया

समझ लो

प्रलय आ जाएगी

 

अरे,

सुधर जाओ

संभल जाओ

 

सुबह-सवेरे

मेरा गान सुनो

शीतल मंद पवन को

साँसों में भरो

नीम की पत्तियों पर

धूप को फिसलते देखो

 

मन की

कोमलता को

हो सके

बचा लो !  

 

 

 

 

 

 


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