टूटा है कौन
कितना ये आकलन कहाँ है*
ताहिर फ़राज़
चले गए । कितनी खामोशी से ! कुछ बरस पहले , लॉकडाउन के समय,
देवल आशीष को पहली बार यूट्यूब पर सुना । और मालूम हुआ कि वे पहले ही
निकल चुके थे अनंत यात्रा पर । दु:ख इसलिए भी गहरा हुआ कि देवल आशीष हमउम्र भी थे ।
इन दोनों को कितना ही जानता हूँ ! तो फिर यह टीस क्यों ? ताहिर फ़राज़ के तीन गीत या नज़्में उनसे परिचय का सबब हैं । देवल आशीष के पाँच-छह गीत । ताहिर फ़राज़ के निधन की खबर सुनकर देवल आशीष भी क्यों याद गए ?
कविता का काम क्या है ? जीवन को सुंदर बनाना , क्षण भर के लिए भी सही । कविता जीवन के रेगिस्तान में नख़लिस्तान है । जिस तरह से हमारे जीवन के आपसी और आत्मीय संबंध सूखते जा रहे हैं, कविता का काम बढ़ता जा रहा है । कविता जीवन के कंठ को तरल रखती है, जीवन का गान तभी संभव हो पाता है ।
ताहिर फ़राज़ को एक बार रू-ब-रू सुनने का मौका मिला, जब वे राँची आए थे । कुमार विश्वास का ही कार्यक्रम था शायद । जहाँ तक याद है, उन्होंने उस दिन अपने दो गीत ‘माई’ और ‘दिन वे भी क्या दिन थे’ सुनाए थे । ‘बहुत खूबसूरत हो तुम’ संभवत: बाद में यू ट्यूब पर सुना । जिन्होंने इन गीतों को सुना है, वे जानते हैं कि ऐसे ही खूसूरत लम्हे जीवन को जीने लायक बचाए रखते हैं । इस तीनों गीतों में कितनी नफ़ासत, कितनी मुलायमियत और कितनी शराफ़त है ! ‘बहुत खूबसूरत हो तुम’ एक विशुद्ध प्रेमगीत है । ताहिर फ़राज़ जब उसे गाते हैं, उनकी अदायगी इस गीत को कुछ दर्जा ऊँचा उठा देती है । इस गीत में दैहिकता मौजूद है, लेकिन जब एक अंतरे के अंत में वे कहते हैं कि “वो पाकीज़ा मूरत हो तुम” तो सारी दैहिकता तिरोहित हो जाती है । गीत की नरमी, उसकी पाकीज़गी आपके साथ रह जाती है । ‘माई’ को सुनते हुए भला किसका मन बच्चा नहीं बन जाएगा ! “हल्की सी दस्तक पर अपनी तुझे जागता हुआ मैं पाऊँ” यह पंक्ति किस तरह जोड़ लेती है अपने से ! इस भागदौड़ के जीवन में , इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा के समय में हममें इतना सुकून कहाँ बचा है कि पल भर सुस्ता सकें । हममें इतनी औपचारिकता भर गई है कि हम मशीन हो चले हैं। अब तो माँ भी अपने बच्चों से कुछ कहते हिचकती है । बच्चे तो खैर बड़े हो ही चुके हैं ! “फिर कोई शरारत हो मुझसे नाराज़ करूँ फिर तुझको” यह पंक्ति दरअसल जीवन को जीने की कुञ्जी है । हमारे अंदर एक निष्कलुष और बेफिक्र बच्चा छिपा हुआ है, हम ही उससे आँख नहीं मिला पा रहे । यह गीत इसलिए भी मन को छू जाता है क्योंकि इसमें जीवन के उन्मुक्त दिनों की झलक है । ताहिर फ़राज़ से परिचय का तीसरा आधार है उनका गीत ‘ दिन वे भी क्या थे’ है । यह गीत वह गीत है जो हम सबको याद दिलाता है कि हम भारतीय हैं । ‘ वी,द पीपल ऑफ़ इण्डिया’ आखिर यही तो है । आज हम अपना सतहत्तरवाँ गणतंत्र दिवस भी मना रहे हैं । संवेदनाओं को इस गीत में उन्होंने कितने हल्के हाथों से उन्होंने बरता है ! जैसे किसी शीशे के ‘शो-पीस’ को बहुत एहतियात के साथ बड़े हल्के हाथों पोछा जाए । हम सबकी यादों में हमारा मामूली-सा बिछौना और छत पर जाकर सोना है । शहर तो आधुनिक जीवन का पर्याय हैं । हम सब असल में गाँवों से निकल कर आए हुए लोग हैं । अभी हमारे ‘जीन्स’ में गाँव बचा हुआ है । कुछ पीढियों तक तो रहेगा ही अभी । इस आधुनिक जीवन के चक्कर में हम अपनी मिट्टी को भूलते जा रहे हैं । गाँव तो गाँव , शहर से मुहल्ले गायब हो रहे । एक फिल्म के गीत की पंक्ति है “ साँझ ढले, गगन तले, हम कितने एकाकी” । इसी एकाकीपन से लड़ रहा है यह गीत – “ किसी परी की कोई कहानी, किसी जिन्न का जादू-टोना” !
ताहिर फ़राज़
के इन गीतों को उन्हीं से सुनना, सुनने-देखने वालों के लिए तसल्लीबख़्श
है, कि अभी दुनिया खत्म नहीं हुई है । कुछ अच्छा अभी भी बचता
है ! गीतों को सुनते वक़्त हम यह महसूस करते हैं कि बात उनके दिल से निकल रही है और
हमारे दिल तक पहुँच कर अपना घर बना रही है । इन गीतों को उन्होंने जाने कितनी बार सुनाया होगा
। हर गीत में भी पंक्तियों को वे दुहराते हैं । अच्छी बातों का दुहराया जाना जरूरी
है । कहा तो यह भी जाता है कि झूठ भी सौ बार दुहराया जाए तो सच मान लिया जाता है ।
इन गीतों में तो एकदम सच्ची और पक्की बातें हैं ! दुहराए जाने से बातें स्मृतियों में
दर्ज भी होती चलती हैं । हर सुनने वाले के लिए ताहिर फ़राज़ की ये नज़्में उनकी ज़िंदगी
का हिस्सा बन चुकी हैं, बिला शक ! ताहिर फ़राज़ को बार-बार सुनना
अच्छा लगता है । “हम बच्चे ये सब करने के आदेश में रहते थे” – ये गीत पथ-प्रदर्शक ही
तो हैं , हम सब उस आदेश के मुंतज़िर हैं जो हमें, हम जैसे हैं, उससे थोड़ा बेहतर बना दे । ये तीनों गीत
यह भरोसा दिलाते हैं कि ऐसा होना संभव है ।
ताहिर फ़राज़ साहब के निधन का समाचार पढ़कर उनके गीत फिर से सुन रहा था, और अचानक देवल आशीष याद आ गए । अच्छे लोगों की स्मृतियाँ, अच्छे लोगों की स्मृतियों को खींच लाती है । देवल आशीष को सुनते हुए बारहा यह लगा है कि उनसे जो आत्मविश्वास की आभा-सी फूटती है, वह सुनने वाले के अंदर भी आत्मविश्वास का संचार कर देती है । देवल आशीष अपनी कविताओं को कितना तल्लीन होकर सुनाते थे ! उनके मुख की भाव-भंगिमा यह बताती है कि सुनाने वाला भी उस रस में डूबा हुआ है जिसमें श्रोता भी डूब-डूब जा रहे हैं । देवल आशीष की कविताओं में प्रयुक्त हिन्दी के शब्दों को सुनकर लगता है कि कितने शब्द हमारे अंदर भी बैठे हुए हैं । ऐसी कविताओं को सुनकर वे जाग उठते हैं । यही बात ताहिर फ़राज़ के गीतों को सुनकर भी लगता है, कि बस यही बात तो हमें भी कहनी है ! हर अच्छी कविता कवि की बात तो कहती ही है, हर पाठक/श्रोता की बात भी कहती है । खूबी तो यही है । खूबसूरती तो यही है । जितना ही देवल आशीष के वीडियो देखता हूँ, उतना ही उनकी अनुपस्थिति खलने लगती है । यह लगभग निश्चित ही है कि वे रहते भी तो उनसे जीवन में कभी भी मिलने का संयोग नहीं ही होता । लेकिन फिर भी उनके नहीं रहने से एक कसक-सी बन गई है । अब ताहिर फ़राज़ साहब के जाने से भी यही हाल है । वे भी अचानक चले गए हैं । यह ठीक है कि उन दोनों की रचनाएँ हमारे साथ हैं, लेकिन आदमी शायद किसी मौजूदगी से मजबूती पाता है, खासकर उसकी मौजूदगी से जिसकी बातें अपनी-सी लगती हैं ।
आदमी नश्वर है , इसमें तो कोई दो मत है ही नहीं । लेकिन यह जो एक-एक कर के हर चीज के छूटते जानेवाली बात है, वही कष्ट देती है । इस बात के लिए मन को मनाना कि अब जो है, जो बचा है, वही सत्य है, वही ठीक है, इतना आसान भी नहीं है। हम अपने खालीपन को भूले हुए भले रह सकते हैं, उसे दूर नहीं कर सकते । एक टीस उभरती है, और पूरे जीवन का खालीपन सामने खड़ा हो जाता है ।
कविता का काम है जीवन के सौंदर्य से साक्षात्कार कराना । जीवन के हर पक्ष में सुंदर है । इस सत्य का आभास हो जाना ही शायद बुद्धत्व की प्राप्ति हो ! सत्यम् शिवम् सुन्दरम् ! कविता या कला या साहित्य के कोई भी अंग अमिय-बिन्दु के समान होते हैं । ये बूँद भर भी हों, तो भी जीवन में स्फूर्ति भर सकते हैं । जीवन को उत्साह से , जिजीविषा से भर सकते हैं । देवल आशीष की पंक्ति “ कान्हा को कान्हा बना गई राधा तो राधा को राधा बना गया कान्हा” कवि और पाठक के संबंधों पर भी बखूबी लागू होती है । ताहिर फ़राज़ और देवल आशीष जितना हमें बनाते हैं, हम भी उनको थोड़ा-बहुत तो बनाते ही हैं । और यही बात हमारे इस दु:ख को थोड़ा और बढ़ा देती है कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं ; हम सब पर अपने-अपने तरीके से इस खबर खबर का असर होगा – “टूटा है कौन कितना ये आकलन कहाँ है” । लेकिन टूटा तो है !
ताहिर फ़राज़ के तीनों गीतों और देवल आशीष के कुछ गीतों के यूट्यूब- लिंक नीचे दिए गए हैं, यदि आप सुनना चाहें –
बहुत खूबसूरत
हो तुम :
https://youtu.be/2xjBPs0Vl2c?si=AfeLBsyM1T3bUEGW
दिन वो भी क्या थे –
https://youtu.be/uZW1LZFA6nI?si=iMNyzsfPe_R13rM0
माई
https://youtu.be/8dKkG4bibNw?si=1LQzyvKLKfM1FZFh
टूटा है कौन ये आकलन कहाँ है
https://youtu.be/a6NLurgsRoc?si=kLvwHYiZ82VJ4B40
गीत गुलज़ार ( कुछ गीत )
https://youtu.be/p9HfpUjZldM?si=4dMhApBoH7V3a_Mv
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*देवल आशीष
के एक गीत की पंक्ति


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