शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

जड़ता के विरुद्ध


 

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1. सुनो ! 2. उफान 3. सिद्धांततः 4. रोजनामचा 5. लाचारगी 6. इंतजार 7. कुछ सवाल 8. हाय दुनिया 9. साहब के जलवे 10. बड़े साहब 

11. साहबी बातें 12. सलाह 13. वाह मुँगेरीलाल 14. कोल्ड ब्लडेड 15. चेतावनी 16. आखिरी शब 17. अंतर्द्वंद्व


जड़ता के विरुद्ध

  

  सुनो !

ज़िंदा रहा तो ठीक है

जो मर गया तो ठीक है

कैसे कहूँ कि ठीक है

क्योंकर कहूँ कि ठीक है

मेरे सिवा सब ठीक है

मेरे बिना सब ठीक है

जितना है जो है ठीक है

जैसा है जो है ठीक है

जानकर क्या ठीक है

कहते हो क्यों कि ठीक है

बेशरमी है कि ठीक है

मजबूरी है कि ठीक है

दूसरों की मार्फत करते हो सब, क्या ठीक है

अपना जिम्मा टाल कर बैठे हो सब, क्या ठीक है

बस दबाना काटना आता है तुमको, ठीक है

बस खुद ही का सोचना आता है तुमको, ठीक है

जब नींव ही हिल जाएगी सोचोगे फिर क्या ठीक है

सिर धुनो, पछताओगे, सोचोगे फिर क्या ठीक है    

 

उफान

जी चाहता है

तोड़ दूँ

जी चाहता है

फोड़ दूँ

सब झूठ का साजो-सामान ।

 

बासी हवा,

बोझिल माहौल

खोल दूँ सब खिड़कियाँ

जंग लगे सब तोड़ दूँ

ताले-जाले

जी चाहता है।

 

झुकी रीढ़ को तान दूँ

थोड़ी आग खून में डाल दूँ

सज्दे को तोड़ें ज़रा

ज़रा आँखों में आँखें डाल दूँ

जी चाहता है।

 

कर-बद्ध विनय किसके लिए

हर हाँ में हाँ किसके लिए

ये एकतरफा लाजो-लिहाज

अब छोड़ दूँ सब छोड़ दूँ

जी चाहता है।

 

जोशे-जुनूं को छोड़ दूँ

दिल के सुकूं को छोड़ दूँ

अपने दिल को तोड़ दूँ

उसके सिर को फोड़ दूँ

जी चाहता है।

 

कितना सोचूँ, किससे पूहूँ

किसको बोलूँ, किसको लिक्खूँ

अब कर जाऊँ, बस कर गुजरूँ

जी चाहता है।    

 

सिद्धांततः

राजा माने कानून

कानून माने हुक्म

हुक्म माने....

उठ तो उठ बैठ तो बैठ

 

नौकर माने वफादारी

वफादारी माने जी-हुजूरी

जी-हुजूरी माने...

उठ तो उठ बैठ तो बैठ।    

 

रोजनामचा

    (1)

बुलाया गया

बिठाया गया

सुनाया गया

बताया गया

जताया गया

डराया गया

दबाया गया

भगाया गया

कराया गया...

एक और दिन ज़ाया गया।

   (2)

बुलाया, तो

चला गया

बिठाया, तो

बैठ गया

सुनाया, तो

सुना दिया

बताया, तो

बता दिया

जताया, तो

जता दिया

डराया, तो

डरा दिया

दबाया, तो

दबा दिया

न भगा पाया कोई

न कुछ करा पाया...

और दिन यूँ भी जाया गया।    

 

लाचारगी

जो

बस का नहीं

वह भी

करने पर

आमादा हूँ

इन दिनों

बाकी सब कम

नौकर कुछ ज़ियादा हूँ !    

 

इंतजार

आँकड़े, तथ्य, साक्ष्य

प्रस्तुत किए

जिनसे बढ़ता था

अपना कद

 

आँखों के कोनों से

महसूस किया

असहज होते हुए कुछ चेहरे

और बिना परवाह इसके

कि व्यक्ति, समय व स्थान-सापेक्ष हैं सब

कि होती हैं कुछ छवियाँ

धूल-धूसरित इस उपक्रम में

अभीष्ट तो विजय ही रहा

विजय ही रखा

कैसे भी

किसी पर भी !

 

सब देख, सुन, समझ के भी

मिथ्या आडंबर में रत हूँ

मैं हाकिम के सामने

बिलकुल ही नत हूँ

 

नहीं होना था

पर हूँ

 

न अपनी खाल मोटी होती है

न उनकी बातों की नोक

भोथर

और एक बेवजह की

लाजो-लिहाज है

एक बेवजह की अधीरता

कि बस चलाए रखती है

जलाए रखती है

 

कभी-कभी

यूँ लगता भी है

हाथ खंजर हो जोए

नज़रें शमशीर

और चीर दिए जाएँ

मुखौटे-दर-मुखौटे

कदमों की थाप से

तोड़ दिए जाएँ

वो बाट-बटखरे

जिनसे तुलता है आदमी

रोज़ के रोज़

 

देखना है

किस हद तक

झुकना होता है

जिसके बाद

लपलपा कर

वापस तन जाता है आदमी

और तनते-तनते

करता है चोट

मारक !    

 

कुछ सवाल

जो अड़ नहीं सकता है

जो लड़ नहीं सकता है

उसका क्या ?

 

जो चर नहीं सकता है

जो हर नहीं सकता है

उसका क्या ?

 

जो ढल नहीं सकता है

जो छल नहीं सकता है

उसका क्या ?

 

जो बढ़ नहीं सकता है

जो चढ़ नहीं सकता है

उसका क्या ?    

 

    हाय दुनिया !

हाय दुनिया, हाय दुनिया !

हाय दुनिया ,हाय हाय दुनिया !

 

हैं हम पिंजड़े की मुनिया

हमको नचावै है दुनिया

हाय दुनिया, हाय दुनिया

हाय दुनिया,हाय हाय दुनिया

 

झूठ फ़रेब और मक्कारी

क्या-क्या न सिखावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

खुद अपना कोई ठीक नहीं

और हमको बतावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

झूठा हमको बतला कर

खुद साधु कहावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

खून-पसीना क्या जाने

बस पैसा बहावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

बस अपने को ही देखने को

क्या-क्या न दिखावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

हम उसको जितना याद करें

हमें उतना भुलावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

हम चाहें जब आजादी

तब पगहा बँधावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

रोज कहें हम चल ही चले

बस रोज़ बुलावै है दुनिया

हाय दुनिया...

 

ये ताना-बाना छोड़ भी दें

पर हमको रिझावै है दुनिया

हाय दुनिया...    

 

   साहब के जलवे  

अपने तईं

गुफ़्तगू के

हमने

मौक़े नहीं गँवाए हैं

साहब हैं

कि चुप-चुपाए हैं

साहब मुँह फुलाए हैं

 

जान साँसत में

जान आफ़त में

फूल आँखों के मुरझाए हैं

 

'बेल' जैसे गरज रहा है

मानो जैसे बरज रहा है - खबरदार !

मन सब के भुरभुराए हैं

 

दैव-कृपा जैसे

छँट गए बादल

निकल गई धूप

साहब फिर मुस्कुराए हैं !

 

सहज हुई हवा

भार हटा सीने से माहौल के

चुस्कियों में चाय की

बातों ने गुल खिलाए हैं    

 

   बड़े साहब

बड़े साहब

पहले नहीं बताते हैं

बड़े साहब

कह के नहीं आते हैं

बड़े साहब

ज्यादा नहीं समझाते हैं

बड़े साहब

अंगरेजी बतियाते हैं

 

सब ज़बानी करवाते हैं बड़े साहब

मुफ्त खटवाते हैं बड़े साहब

बिन बात गुस्साते हैं बड़े साहब

बहुत भाव खाते हैं बड़े साहब

 

कितना चिल्लाते हैं बड़े साहब

कितना झल्लाते हैं बड़े साहब

क्या रंग दिखाते हैं बड़े साहब

कितना जताते हैं बड़े साहब

 

बड़े साहब

तोहफा ले-ले जाते हैं

बड़े साहब

झुकते चले जाते हैं

बड़े साहब

तलवे भी चाट आते हैं

बड़े साहब

बढ़ते ही बढ़ते जाते हैं !

 

सिर्फ अपना गाना गाते हैं

अपने पर इतराते हैं

अपने सच से कतराते हैं

बड़े साहब

बिन पंख उड़ते जाते हैं

खूब भड़भड़ाते हैं बड़े साहब

खूब !    

 

      साहबी बातें

देवें मूँछ पर ताव साहब

रख दें सर पर पाँव साहब

 

आँखों से धमकाते हैं

बातों से हड़काते हैं

जब बुला लें तल्खी से

काँपें थरथर पाँव, साहब

 

हम नैया , पतवार साहब

अपने तो करतार साहब

वो हैं कि बेड़ा पार है अपना

वरना है डगमग नाव, साहब

 

वो राज़ी, ख़ुशी है अपनी

जो बची-खुची, है अपनी

उनसे उड़े , मुँह के बल गिरे

मारें ऐसा दाँव साहब

 

नरम-गरम, गरम-नरम

मर्ज़ी उनकी,उनका करम

खुद ही जेठ की तपती धूप

खुद ही शीतल छाँव साहब

 

जो कथनी वही करनी हो

यही बात अगर करनी हो

तो जाओ ढूँढ़ो ठौर नया

कतई नहीं वो ठाँव साहब

 

दाँत निपोरो सबसे पहले                

हाथों को जोड़ो सबसे पहले

उठते जाओ, झुकते जाओ             

ज़रूरी हैं ये बदलाव, साहब

 

धोखा देना सीखो खुद को

हर कीमत पे दीखो खुद को

साहब बनने को सबसे पहले

बदलो खुद के चाव साहब

 

साहब यानी मुँह पे चिप्पी

और कहीं बिन बात के घुड़की

नज़र हो जिसकी मंज़िल पर बस

बाकी सब पड़ाव, साहब

 

तुम सोचो तो किसकी खातिर

जी-जान लगा रखा है आखिर

अहमक लोग यही कहते हैं

बस हैं करते काँव-काँव, साहब    

 

  सलाह

सरने कहा है

सही ही होगा

मानो, करो भाई

करो, मेरी मानो !

 

घास हरी है

दुनिया चरी है

जानो, चरो भाई

चरो, मेरी मानो !

 

मर्ज़ी देखो

तब अर्ज़ी डालो

वरना

ठानो, मरो भाई

मरो, मत मानो !

 

देखो,सुनो,न समझो कुछ

बुद्धि अपनी

ताक पर धरो भाई

धरो, मेरी मानो !

 

हों खाली हों

जेबें अपनी

फूली-फूली

जेबें उनकी

उनको और भरो भाई

भरो, मेरी मानो !

 

हाथ जोड़ो

पैर पड़ो

मस्का मारो

कर जी -हुजूरी

उनके अहसानों तरो भाई

तरो, मेरी मानो !    

 

      वाह मुँगेरीलाल !

सपने देखे और मुस्काए

अपने आप ही खुश हो जाए

                        वाह मुँगेरीलाल !

सर झुका के सुन के आए

वापस आकर बुदबुदाए

                        वाह मुँगेरीलाल !

 

करने में सोचे आगा-पीछा

चूक गए पर फिर पछताए

                        वाह मुँगेरीलाल !

 

ज़ाहिर सब की हाँ में हाँ

बैठ अकेले भुनभुनाए

                        वाह मुँगेरीलाल !

 

जानते-बूझते धोखे खाए

सबकी खातिर जान लगाए

                        वाह मुँगेरीलाल !

 

माफ़ दूसरों की गल्तियाँ

अपनी सब गलती गिनवाए

                        वाह मुँगेरीलाल !

 

वैसे भी फ़ितरतन भला है

दोस्त-दुश्मन समझ न आए

                        वाह मुँगेरीलाल !

 

भोला है,भोंदू,उदासीन या सिद्ध

सम पर ही परन निभाए

                        वाह मुँगेरीलाल !    

 

      कोल्ड ब्लडेड

मारती है दुनिया

अपने ठंढेपन से

ठंढे अपनेपन से

 

अपने सीधेपन से

मर जाते हैं हम

रोज़ एक मौत  !!      

 

चेतावनी

ओ ऊँचे ओहदे वाले बाबू 

ओ बिन पेंदी के लोटे बाबू

ऐसे कैसे रह लेते हो 

जाने कैसे सह लेते हो 

कभी तो कर लो बात काम की 

कब तक खाओगे हराम की 

कुछ सोचो, कुछ शरम करो तो 

अपना जो हो धरम, करो तो 

याचक की नहीं, दाता की सुन लो 

चुनो तो सही, कुछ भी चुन लो 

क्यों व्यर्थ गँवाते हो अवसर 

जीवित हो, नहीं हो पत्थर 

'गर पत्थर हो तो खासकर 

बैठो मत फिर नई घास पर 

मत डालो भार कमानी पर

गर्म खून, जवानी पर 

जब भार हिलेगा, सोचो फिर

जब जोर चलेगा, सोचो फिर ?

हुँकार उठेगा, सोचो फिर

प्रतिकार मिलेगा, सोचो फिर ?

जाओ दिशा-ज्ञान ले कर आओ 

मन कर्म-प्रधान ले कर आओ

वरना फिर जब तोड़ बंध 

ऊर्जा बहेगी दिशा-अंध 

फिर नाद प्रलय का गूंजेगा 

उपाय नहीं कुछ सूझेगा 

तब काम न कोई आएगा 

तब सोचो कौन बचाएगा 

तब कैसे हाथ फैलाओगे 

तुम क्या मुँह ले कर आओगे ?!    

 

      आखिरी शब

कोई शब तो आखरी शब होगी

लेकिन वो जाने कब होगी

जब चैन पड़ेगा आकाओं को

जब हवस मिटेगी आकाओं की

 

जब छीना-झपटी रोकेंगे

जब नियम-वियम को टोकेंगे

जब हम खुल के जी पाएँगे

जब धौंस छँटेगी आकाओं की

 

जब जी-हुजूरी छोड़ेंगे

जब सुख की रोटी तोड़ेंगे

जब अपने मालिक हो जाएँगे

जब गरज हटेगी आकाओं की

 

अपने मुँह में बोली आएगी

जब आँख खोली जाएगी

वो कहने के पहले सोचेंगे

जब सनक मिटेगी आकाओं की                    

 

       अंतर्द्वंद्व

इस चमक-दमक के क्या कहने

इस जोर-धमक के क्या कहने

लोगों के रेले पर रेले

दौलत बिल्कुल खुल कर खेले

 

किस किस को नहीं न्योत दिया

सारा दम-खम यहीं जोत दिया

सब आएँ, देखें,शीश नवाएँ

जब लौट के जाएँ, यश गाएँ

 

इस भीड़-भाड़ में निपट अकेला

एक मन तीता और कसैला --

सुंदरता इतनी कुरूप !

ऐसा वैभव का वीभत्स रूप !!

 

नाली के पानी-सा पैसा

बहता लगता है कैसा !

 

सदियों से चलता आता है

जो बड़ा है, वो दिखलाता है

 

बुजुर्गवार से बच्चों तक

सब के सब

नुमाइश पर लगे हैं

लिपे-पुते हैं , सजे-धजे हैं

सारी नर्गिसें ,

सारे दीदावर

आज यहीं मिल-मिला लेंगे गोया

 

ऑर्केस्ट्रा

नए-पुराने , संजीदा- फड़कते

गाने हवा में तिरा रहा है

और

एक मन है कि पिरा रहा है !

 

दुख इतना न कर

सुन दुखिया,

सबने

अपना हिस्सा ही जिया

कोई सुधा-नहाया

कोई गरल पिया

 

मत हो ऐसे

अवरुद्ध-कंठ

नहीं राम कोई

कृष्ण, नहीं नीलकंठ

 

सब अपना भर तो भोगेंगे

तिस पर, जी-जान लगा कर जोगेंगे

 

देखो

नियति का जोर

हो प्रत्यक्ष-दर्शी

तुम भाव-विभोर

क्या हुआ

जो टीसे पोर-पोर

 

ये अनगिनत चेहरे

अनगिनत नमस्कार

उपहारों के ढेर

लिफाफों का अंबार !

देखो,

जाओ, नाम दर्ज कराओ

शरीफ आदमी हो

फर्ज निभाओ

 

ये सारी शानो-शौकत

जो कोने-कोने में बिखरी पड़ी है

ये पैसा किसका है, और कैसा है

ये किसको पड़ी है !

 

क्या झंडा लेकर आए हो ?

क्या डंडा लेकर आए हो ?

देखो, तुम किस वाद के हो

देख-समझ प्रतिवाद करो

 

किसी वाद से कुछ नहीं होता  है

निर्बल के

प्रतिवाद से कुछ नहीं होता है

यहाँ

सहिष्णु कहते हैं सहने को

और शराफत, चुप रहने को

 

ये जो

काली एप्रन पहने   

घूम रही है बाई

जिसने अभी

जूठी प्लेटें हैं उठाई

यही तो

खूबसूरती है भाई

इस माहौल की

पूरे सेट-अप की –

नीम-रोशन !

रोशनी इतनी ही

जो सुरूर पैदा करे

खूबसूरती से

आँखों को भर दे !

जो प्लेटें

उठातीं हैं पुलाव

उनके नीचे की

भूख छुपा दे

काम करने वालों के

सर को झुका दे

नीम-रोशन है माहौल

रोशन है पुलाव,

रोशन है बनाव !

कसा हुआ है शिष्‍ट व्यवहार

 

ये जो

हाथ बाँधे, कोने में खड़े हो

मन ही मन इतना जो लड़े हो

इतना जो खून जलाए हो

कुछ रत्ती भर भी कर पाए हो ?

 

शर्तें तुम तय नहीं करते हो

माना कि जय नहीं करते हो

उनके हाथों में डोर है सब

सत्ता जिनकी ओर है जब

 

 

बड़ी गाड़ियाँ, बड़े साहब, बड़े लोग

जिसने ऐसा पैदा किया है संयोग

ये उसकी ताकत की झाँकी है

तुमने शायद कम आँकी है

 

फिर,

यही तुमने क्या था नहीं किया

वैभव का रस था नहीं पिया ?

इतिहास

समय दोहराता ही है

मन

दोषी ठहराता ही है !

 

जो गिरता है,

गिरता ही जाए

है यही उचित,

है यही न्याय ??

 

इन

सारे सैकड़ों- हजारों

लोगों से पूछे, कोई  

उनको दिखाए

उनको बताए

नेपथ्य के अंधेरे का अर्थ

सारी लक-दक के

पीछे का सच

अरे,

गलतियों की पुनरावृत्ति

इतिहास है क्या ?

                                                                                            

अंदर ही अंदर

जो उबल रहा है नसों में

उस गुस्से का

फटना ज़रूरी है

यह अति

जो अति से भी ज्यादा है

उसका

घटना जरूरी है

बहुत जरूरी है !!                             

 


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