शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

‘शोले’ असफल हो गई !


                               ( चित्र इंटरनेट से साभार )


शोलेअसफल हो गई !  


          सुनते हैं 1975 में जब शोले रिलीज़ हुई थी, तो पहले सप्ताह में उसके फ्लॉपहो जाने का अंदेशा हो गया था । लेकिन उसके बाद फिल्म ने जो रफ्तार पकड़ी, बस सारे कीर्तिमान छोटे पड़ गए । शोले तब तो असफल नहीं हुई, रिलीज़ के पचास वर्षों बाद उसके असफल हो जाने के कारण सामने आ गए हैं । कोई फिल्म किस रूप में याद की जाती है, वही उसके सफल या असफल होने का सबसे बड़ा आधार होता है । एक लोकप्रिय राष्ट्रीय पत्रिका के एक प्रबुद्ध साहित्यकार लेखक के शोलेके  प्रति उद्‍गार देखने के बाद शोलेके सफल होने पर शक पैदा हो जाता है । लेखक के उद्‍गारों को देखिए –

मैंने धर्मेन्‍द्र को ठेलकर गिरा दिया था, अब बन्‍दूक चलाना मैं सिखा रहा था । मेरी हथेलियों ने बसन्‍ती के गदराये बदन का स्पर्श पाया था । इस एहसास के लिए न जाने कितनी बार शोलेदेखी ।

जया भादुड़ी के प्रति भी यही सद्‍भाव है । लेखक के विचार देखिए –

 जया मुझे अच्छी लगी थीं शोरमें । यह बात मैंने अपने मित्र से शेयर की थी । उन्हें मेरी पसन्‍द पर हैरत हुई इसलिए कि जया मांसल नहीं थीं । मेरे वे समझदार मित्र तब तीस के भी नहीं थे । उनके ऐसा कहने से मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ । मुझे अपनी नासमझी पर शर्म आयी थी ।

पचास साल बाद जया बच्चन का सार्वजनिक जीवन में कैसा व्यवहार है, उसका शोले से क्या संबंध ? 

इतना ही नहीं, रेखा, जो इस फिल्म में थीं भी नहीं, वे भी लपेटे में आ गईं –

पोस्टर और प्रचार ने रेखा को जिस तरह देखने की उम्मीद जगायी थी, वह पूरी नहीं हुई थी । कई वर्षों बाद अपन ने भी यह फिल्म देखी थी इसी उम्मीद में ।

यह शोलेकी घोर असफलता ही कही जाएगी कि सड़सठ साल के एक व्यक्ति को जब शोलेयाद आ रही है तो किस रूप में !

            जब दावे बड़े किए जाने हों, तो आधार पुख्ता होने चाहिए । कई बार हमें लगता है कि चीजें या घटनाएँ किसी खास तरह से ही होनीं चाहिए और हम अपनी धारणाओं को तथ्यों पर आरोपित कर के अपने को सही सिद्ध करने लग जाते हैं । कुछ ऐसा इस लेख में भी किया गया है । यह शायद एक कम्पल्सिव बिहेवियर’ होता है । धर्मात्माफिरोज़ खान की फिल्म है, उसे रमेश सिप्पी की फिल्म बताने से क्या फायदा हुआ ? 1973 में प्रदर्शित हो चुकी ज़ंजीर’ (11-05-1973) 1975 में शोलेके अतिरिक्त आने वाली फिल्मों में शामिल कर दी गई । यह तो एकदम बेसिकजानकारी है किसी भी सिनेप्रेमी के लिए कि ज़ंजीर’ ‘शोलेसे दो साल पहले आ चुकी थी । इतना ही नहीं, अपना नज़रिया सिद्ध करना है तो नमक हराम’ (23-11-1973) और अभिमान’ (27-07-1973) को ज़ंजीरके पहले रिलीज़ होने वाली फिल्में बता दिया गया । गूगलइतनी जानकारी तो दे ही देता है । हाँ, लेखक के पास अन्य विश्वस्त सूत्रों से कुछ और जानकारी हो तो अलग बात है ।

ऐसी ही बात शोलेके बाद आने वाली डाकूवाली फिल्मों में डाकुओं की पोशाक पर कही गई है । उदाहरण के लिए बैंडिट क्वीन’, ‘पान सिंह तोमरऔर सोन चिरैयाजैसी फिल्मों के नाम गिनाए गए हैं । बैंडिट क्वीनऔर पान सिंह तोमरजीवनी-आधारित फिल्में हैं, ‘सोन चिरैयाभी संभवत: असली डाकुओं के जीवन पर आधारित है । क्या लेखक यह बताना चाहते हैं कि इन असल ज़िंदगी के पात्रों ने शोलेदेखकर पोशाकों की प्रेरणा ली, या फिर इन फिल्मों के निर्देशकों ने धोती-कुर्ता और साड़ी की जगह शोलेके प्रभाव में उनकी पोशाकें बदल दीं ।

            गब्बर सिंह परिस्थितिजन्य डकैत नहीं है । ...पहले फिल्मों में डाकू बनने की कहानी होती थी।... शोलेइस पारम्परिक झमेले में नहीं पड़ती। अगर आपने शोलेके लेखक जावेद अख्तर साहब के इंटरव्यू देखें हों, तो आपको पता होगा कि जावेद साहब ने शोले के किरदारों के विषय में ये सब बताया हुआ है । उन्होंने तो यह भी कहा है कि “ जय और वीरु का कोई बैकग्राउंड नहीं दिखाया गया है, ऐसा किसी फिल्म में पहली बार हुआ “ ।  

            लेखक लेख में, बीच-बीच में बौद्धिकता का वजन भी डालते रहते हैं । वे कहते हैं कि गब्बर ने स्टेटके दोनों हाथ काट दिये हैं । ... यह यह वक्त था जब निजी फायदे के लिए स्टेटके पर काटने का चलन जोर पकड़ रहा था । आज तो चरम पर है। व्यवस्था विवश है । लेख के अंतिम हिस्से में वे कहते हैं  इन्‍दिरा गाँधी और संजय गाँधी को तो लोगों ने सबक सिखा दिया,लेकिन वही लोग गब्बर को सर पर बिठा कर नाच रहे थे । क्या आज नहीं नाच रहे हैं लोग गब्बर को सर पर उठा कर? …. कौन जानता था कि फेंकू सूरमा भोपाली का नया अवतार पैदा हो जाएगा । कौन जानता था कि फिल्मी गब्बर सिंह विश्व पटल पर टैरिफ सिंह बनकर जन्म लेगा?  फिल्म के आकलन को, या फिल्म के प्रभाव को ये बातें कितना स्पष्ट करती हैं ? ‘शोलेइमरजेंसी लागू होने के करीब दो महीने बाद रिलीज़ हुई थी । तो क्या संजय गाँधी ने जानते-बूझते स्टेटके हाथ काट देने वाले गब्बर के चरित्र को लोगों के सामने आने दिया कि पचास कोस दूरभी उनका (संजय गाँधी का) नाम सुनकर बच्चे डर जाएँ ? कई बार हम हर बात में अर्थ/सत्य का इतना ज्यादा अन्‍वेषण करने लगते हैं कि सत्य का आविष्कार कर लेते हैं, अपनी सहूलियत के हिसाब से । ऐसी ही एक बात बच्चों के बीच चाचा नेहरू और गब्बर की लोकप्रियता की तुलना की है । बिस्कुट के रैपर पर गब्बर की तस्वीर का आना इस बात का सूचक नहीं है कि गब्बर बच्चों का आदर्श हो गया है । यह दर्शाता है कि बच्चे इतने तेज हो गए हैं कि गब्बर उनके लिए फिल्म या कॉमिक्स का एक पात्र भर है । बच्चे जानते हैं कि गब्बर नकली है, और मनोरंजन का साधन ।

            लेखक का आकलन है कि ऐसा पहली बार हुआ कि एक खलनायक ने खलनायक जैसा प्रभाव नहीं छोड़ा । यह एक संकेत है कि केवल फिल्म में ही नहीं समाज और राजनीति में भी खलनायक नायक की जगह ले रहा था। लेखक फिल्मों पर गंभीर नजर रखते हैं , उन्हें जरूर पता होगा कि अपने समय में देव आनंद ने एंटी हीरोकी भूमिकाओं में लोकप्रियता हासिल की थी । प्राण, शत्रुघ्न सिन्‍हा और विनोद खन्ना के द्वारा निभाए गए खल-पात्र भी हीरो से ज्यादा तालियाँ बटोरते थे । असल में दर्शकों की अक्ल पर भरोसा किया जाना चाहिए । फिल्मों के सारे प्रभाव के बावजूद दर्शक रीलऔर रियलके अन्‍तर को जानता है । अब तो छोटे -छोटे बच्चे भी फिल्मों में इस्तेमाल किए गए वीएफएक्स को आसानी से पकड़ लेते हैं ।

            शोलेमें दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह की शक्लो-सूरत वाले पात्र को मसखरे के रूप में  दिखा कर क्या कोई सकारात्मक संदेश नहीं दिया गया ? जय और वीरु ने दोस्ती को एक नए रूप में क्या परिभाषित नहीं किया ? आज से पचास साल पहले गाँव की एक लड़की ताँगा चलाए, क्या यह हैरानी की बात नहीं है ? बात वही है कि हमारा दिमाग जहाँ अटका है, हम वही देखना-सुनना चाहते हैं ।

             फिल्में एक कहानी कहती हैं, और आमतौर पर बड़े सरल तरीके से समस्याओं का हल पेश कर देती हैं । ज़िंदगी इतनी सरल नहीं होती, हम सब जानते हैं । फिर भी फिल्म देखते हैं । चलो, हम न लड़ सके, फिल्म के हीरो-हीरोइन तो लड़ते और जीतते हैं । कोई तो ऐसा क्षण है जहाँ जीत होती हुई दिख जाती है ।  

             हम भले ही निशांतयापारजैसी फिल्मों को सराहें गुनगुनाएँगे तो हम माय हार्ट इज़ बीटिंगही !!


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें