[ जीवन खेल , कवि प्रेम रंजन अनिमेष, प्रभाकर प्रकाशन ]
जीवन खेल
: उजले मन की उजली कविताएँ
नब्बे के दशक में कविता
की पिच पर उभरे और अब तक डट कर जमे लोकप्रिय एवं शब्दसिद्ध कवि प्रेम रंजन अनिमेष
का नया संग्रह है ‘जीवन खेल , खेल के बहाने जीवन की कुछ कवितायें’
। समर्पण-पृष्ठ के पहले के पृष्ठ पर दी गईं पंक्तियाँ इस प्रकार हैं
–
खेल खेल में
जीवन कितना
जीवन में भी
कितना खेल...
ये पंक्तियाँ किताब के
मिजाज का पता देती हैं । प्रेम रंजन अनिमेष के अब तक प्रकाशित हुए काव्य-संग्रहों
के आधार पर यदि उनकी कविताओं को एक भले व्यक्ति की भली कविताएँ कहा जाए तो यह सही
ही होगा । इस संग्रह की कविताएँ भी
क्रिकेट के खेल को आधार बना कर जीवन को संबोधित भली कविताएँ कही जा सकती हैं ।
वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने अपनी पुस्तक ‘एक कवि की नोटबुक’ में लिखा है – कुछ कवि होते हैं जो मुग्ध होते हैं । उनकी निगाह
हमेशा जीवन के कुछ उजले पक्षों और उजली चीजों की ओर ही उठती है। प्रेम
रंजन अनिमेष के इस संग्रह ‘जीवन खेल’ को
पढ़ते हुए भी पाठक को कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है । क्रिकेट के विभिन्न
पक्षों को लेकर जीवन से साम्य बैठाती हुई कविताएँ पाठक के मन को एक मुलायमियत से
भर देती हैं । आज के परिदृश्य में कविताओं में नर्म और उज्ज्वल कविताओं की संभावना
ही कम बन पाती है । ऐसे में ‘जीवन खेल’ की कविताओं से गुजरना सुखकर है । राजेश जोशी ने लिखा है -- कभी-कभी तो मुझे यह भी लगता है कि मनुष्य के
दुखों और यातनाओं से एक औसत प्रभाव पैदा करने वाली कविता बनाना कुछ हद तक आसान है
लेकिन जीवन और सृष्टि में जो सुन्दर है
उसे दर्ज करते हुए पूरे मन से उसे, उसके
उल्लास और उत्सव को दर्ज कराते हुए एक अच्छी कविता रच पाना ज्यादा मुशकिल काम है ।
... ऐसी कविता अपने पाठक से एक हद तक सब्जेक्टिव होने की माँग करती है...शायद । प्रेम रंजन अनिमेष का काव्य कर्म
इसी ‘ज्यादा मुश्किल काम’ को आसान
बनाने की कवायद है । ‘जीवन खेल’ की
कविताओं से गुजरते हुए भी पाठक इसी बात की पुष्टि पाता है ।
जैसा कि संग्रह के मुखपृष्ठ पर उल्लेख
भी है कि संग्रह की कविताएँ ‘ खेल के बहाने जीवन की कुछ कवितायें’ हैं, कविताओं में कवि का जीवन दर्शन गुँथा हुआ है ।
संग्रह की तीसरी कविता ‘खेल भावना’ की ये पंक्तियाँ देखिए –
बस यह एह्तियात रहे
किसी
के हृदय
किसी
की भावना से
न
खेला जाये
ऐसे
खेलने से तो बेहतर
खेलना
न आये...
इन पंक्तियों से कवि की
जीवन-दृष्टि भी हमारे सामने खुलती है । हमलोगों ने कार्बन फुटप्रिंट की बात सुनी
है । कवि जीवन में भावनाओं के मामले में भी ऐसी ही धारणा रखता प्रतीत होता है ।
दूसरों का इतना खयाल कि अपनी भावनाओं का कोई नकारात्मक असर नहीं होने देना चाहता ।
मानो वह उतने ही हल्के कदमों से चलना चाहता है जैसे किसी ताजा पोछे गए कमरे में
घुसते ही कोई संभल कर चले । कविता में गुँथी हुई कवि की जीवन-दृष्टि पाठकों के लिए
भी मार्गदर्शन का काम करती है। प्रेमचंद ने अपने निबन्ध ‘साहित्य
का उद्देश्य’ में
लिखा है – साहित्य की बहुत सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की
आलोचना’ है । यह ‘जीवन की आलोचना’ ही तो जीवन-दृष्टि है । आलोचना का
गुणधर्म है नीर-क्षीर विवेक । कवि अनिमेष का यह नीर-क्षीर विवेक संग्रह की कविताओं
में बार-बार प्रकट होता है । अपने उसी निबन्ध में प्रेमचंद लिखते हैं –
नीति-शास्त्र और साहित्य-शास्त्र का लक्ष्य एक ही है – केवल उपदेश की विधि में
अंतर है । ‘जीवन खेल’ की
कविताओं को पढ़ते हुए यह अहसास पुष्ट होता है ।
इस संग्रह की कविताओं में कवि प्रेम
रंजन अनिमेष क्रिकेट को देख रहे हैं, और खेल के साथ-साथ जीवन को भी
दार्शनिक की नजर से देख रहे हैं । जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति का
आदर्श व्यवहार कैसा होना चाहिए, इस ओर इंगित करती हैं ‘जीवन खेल’ की कविताएँ । ‘दृश्यपटल’
कविता की इन पंक्तियों को देखिए –
यह
भूला हुआ
कि है हाथ
में ढाल
रोकना भी है
बचाना
और करना
प्रतिकार
जवाबी
प्रहार...
ये पंक्तियाँ क्रिकेट
के खेल में उत्पन्न हुई स्थितियों का वर्णन तो हैं ही, जीवन
में उपस्थित होने वाले कई ऐसे मौकों के लिए सीख भी हैं जब हम अपनी सामर्थ्य को भूल
परिस्थियों के सामने घुटने टेक देते हैं । हम यह भूल जाते हैं कि सिर्फ हमलावर होना ही
उपाय नहीं, उत्तर नहीं किसी अन्याय या अप्रीतिकर बातों का।
अपनी जमीन पर खड़े रहते हुए अपने को बचाए रखना भी है जवाबी प्रहार ।
कवि की दृष्टि पूरे वैश्विक परिदृश्य
पर है । कविताओं को सिर्फ क्रिकेट वाली कविताएँ समझ कर पढ़ने से बारीकी से कही गई
बातें पकड़ में नहीं भी आ सकती हैं । बल्लेबाज के बल्ले से लगकर ऊपर उठी हुई गेंद कैच
होने के बजाय ऐसी जगह पर गिरती है जहाँ कोई फील्डर नहीं । इस आशय की कविता जहाँ
कोई नहीं की इन पक्तियों को देखिए –
गिरें कभी
तो गिरें
कोई जहाँ नहीं
वरना देखते देखते
इतने तो आत्मघात के
सामान जुटा
लिये गये
कहीं भूल बड़ी न
हो जाये
कि पृथ्वी ही
अपनी
बन जाये
जगह ऐसी
जहाँ कोई
नहीं...!
इन पंक्तियों का इशारा
क्या युद्ध में उलझे हुए देशों की तरफ नहीं ? इसमें कवि कि सदिच्छा भी शामिल है कि ऐसा कुछ
घटित हो भी तो गिरें कोई जहाँ नहीं । कवि अनिमेष की कविताओं में
अपने परिवेश या घटनाओं के प्रति आलोचना सधे-संयत शब्दों में ही आती है । इस कारण उनकी कविताओं में ताप की कमी महसूस की
जा सकती है । ऊपर राजेश जोशी के हवाले से ‘मुग्ध कवियों’
की बात की गई है । उसी क्रम में राजेश जोशी आगे लिखते हैं -- इस तरह के कवियों की कविता में आलोचनात्मक तेवर
कम होता है या एक तरह से उससे कतराने की कोशिश इनमें दिख सकती है । उनकी कविता में
कहीं-कहीं गुस्सा दिख सकता है। यह गुस्सा वस्तुत: सुन्दर को नष्ट किए जाने से उपजी
पीड़ा है । हिन्दी कविता में इस मुग्ध भाव को कभी ठीक-ठाक व्याख्यायित नहीं किया
गया । प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं पर भी ये बातें लागू की जा सकती हैं ।
यह मामला संभवत: व्यक्ति प्रेम रंजन अनिमेष या इन जैसे अन्य कवियों के सरल-मृदुल स्वभाव
या विशेष सहज मनोवृत्ति का है ।
प्रेम रंजन अनिमेष के लेखन की एक
शक्ति इसकी प्रवाहपूर्ण और त्रुटिरहित भाषा है । भाषा पर उनका अधिकार उन्हें
शब्द-क्रीड़ा करने की स्वतंत्रता और सलाहियत प्रदान करता है । उदाहरण के तौर पर कुछ
पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं –
पानी की घूँट
अटूट...
अथवा
न्याय यथोचित
किंचित कदाचित
अथवा
आभार
हर बार
हाहाकार, प्रतिकार,अनिवार
शब्दों के प्रयोग पर
उनकी पकड़ कविता को एक ऐसी लयात्मकता प्रदान करती है जिसके कारण कई कविताएँ छंदरहित
होने के बावजूद गेय प्रतीत होती हैं । पाठक अगर कविताओं का सस्वर पाठ करेंगे तो
कविताओं की इस खूबी को लक्षित कर पाएँगे ।
किसी अच्छे कवि की कोई अच्छी कविता
अपने अंदर जीवन की कई घटनाओं से सादृश्य समेटे रहती है । ‘जीवन
खेल’ की एक कविता है ‘एक लंबी पारी’
। जाहिरा तौर पर यह कविता हाल ही में संपन्न हुए महिला क्रिकेट के
वर्ल्ड कप से पहले की लिखी हुई कविता है , लेकिन इस कविता को
पढ़ते हुए सेमीफाइनल में जेमिमा रॉड्रिग्स द्वारा खेली गई पारी की बार-बार याद आती
है ।
प्रेम रंजन अनिमेष का कवि-मन
कविता-शृंखलाओं को रचने में रमता है, जिनमें एक ही विषय पर वे
अलग-अलग ढंग से विचार करते हुए दिखते हैं । ‘जीवन खेल’
की कविताएँ भी अलग-अलग समयों पर क्रिकेट की किसी घटना से प्रभावित
होकर लिखी गई हैं । संग्रह की अधिकांश कविताएँ आकार में छोटी हैं । इन कविताओं को
प्रगीतात्मक कहा जा सकता है । चूँकि इन कविताओं में अलग-अलग कोणों से क्रिकेट को
देखते हुए कवि के मन में उत्पन्न भावों का प्रकटीकरण हुआ, इन
कविताओं में कोई एक कथा-सूत्र पकड़ में नहीं आता । कहने का अर्थ यह कि संग्रह में
प्रबंध काव्य की तरह कथा प्रवाह नहीं है, जबकि एक ही विषय के
इर्दगिर्द इतनी संख्या में लिखी गई कविताओं में यह संभव हो सकता था । संभव है कवि
अनिमेष भविष्य में कोई ऐसा संग्रह लेकर आएँ । ‘जीवन खेल’
और उनके अन्य संग्रहों की कविताओं को देख कर पाठक यह सहज ही समझ
सकता है कि कवि अनिमेष की कविताओं में विषयों की विविधता है, और यह भी कि कवि किसी भी विषय को काव्य-वस्तु बनाने की दक्षता रखता है । उनकी
कविताओं में विषय इस सहजता से काव्य-वस्तु में परिणत हो जाते हैं कि जरा देर को भी
कविता के विषयों के असामान्य या अनोखे होने पर ध्यान नहीं जाता । उनकी सरल सहज
भाषा पाठक को बाँध लेती है और अपने साथ लिए चलती है ।
क्रिकेट के खेल जैसे विषय पर कविताएँ
लिखने में कविताओं में इतिवृत्तात्मकता आना स्वाभाविक है । जब खेल की बारीकियों को
भी कविता में ढालना हो तो उनके वर्णन से बचा नहीं जा सकता है । अच्छी बात यह है कि
यह इतिवृत्तात्मकता खलती नहीं है, पाठक को बोर नहीं करती है ।
संग्रह की अधिकांश कविताएँ बल्लेबाज
और बल्लेबाजी को केंद्र में रखती हैं । यह कवि की अपनी रुचि के कारण होगा । दूसरी
एक बात यह भी है कि इन कविताओं में आनेवाला बल्लेबाज एक पुरुष बल्लेबाज है । संग्रह
की कविता ‘नाजुक जगह वाली चोट’ की अंतिम पंक्तियाँ विशुद्ध पुरुष नजरिए की चुगली कर जाती हैं ।
संग्रह की एक कविता ‘साये’
अपनी रोचकता के कारण विशेष है । इस कविता में ‘परछाईं’ शब्द की आवृत्ति कविता को रोचकता को कई गुणा
बढ़ा देती हैं । इसके साथ ही कवि ने इस कविता में भी जीवन-दर्शन को बखूबी पिरोया है
। इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं –
जब सारे साये मिल जायेंगे
पक्ष विपक्ष गेंद बल्ले
के
खेल आज का
पूरा होगा
हो जायेगा सम्पन्न...
भारतीय महिला क्रिकेट
टीम द्वारा विश्व कप जीतने के परिप्रेक्ष्य में संग्रह की कविता ‘विजया
एकादशी’ कुछ और ही विशेष हो उठी है । इस पूरे संग्रह में,
और यदि मुझे ठीक स्मरण है, तो अनिमेष जी के
सम्पूर्ण काव्य में व्यक्तियों का नाम सिर्फ इसी कविता में लिया गया है । यह कवि
के हृदय में स्त्रियों के प्रति सम्मान की गवाही है । यह कविता उजले पक्षों की बात
करती है, लेकिन
चुपके से ‘निर्भया’ का नाम भी ले लेती
है , पर उसे अभय बनाने की आकांक्षा के साथ ! जीवन के उजले
पक्षों पर निरंतर नजर बनाए रखना प्रेम रंजन अनिमेष के लेखन की बड़ी विशेषता है । इस
कविता की अंतिम पंक्तियाँ देखिए –
नवनारी
नवशक्ति
उदय हो...
क्या आपको किसी पुरखे कवि की ये पंक्तियाँ याद आ
रही हैं ?—
नव गति, नव लय,
ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव
जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव
स्वर दे!
वर दे, वीणावादिनि
वर दे।
कवि अनिमेष के चर्चित
संग्रह ‘संक्रमण काल’ की अंतिम कविता का शीर्षक है ‘पुनरारंभ’ जिसकी अंतिम पंक्ति है -- जग जीवन जय हे । ‘जीवन
खेल’ की अंतिम कविता है ‘पुनर्नवा’
। इसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं –
अभी कोई बच्चा
डंडा लेकर आयेगा
और हाँकेगा
उसे
खेल शुरू
होता है
यहीं से...
‘पुनरारंभ’ और
‘पुनर्नवा’ जैसी कविताओं से संग्रहों
का समाप्त होना महज संयोग नहीं है । यह प्रेम रंजन अनिमेष के उजले मन और उसकी उजली
कविताओं का द्योतक है । ऐसी कविताएँ निश्चय ही स्वागत एवं संरक्षण के योग्य हैं ।

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