गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं

 जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं


दृश्य एक 

भारतीय रेल का निम्न मध्यवर्गीय एसी थ्री का डिब्बा । एक मम्मा अपने पाँच-छह साल के बच्चे के साथ है । बच्चा पट्-पट् बोल रहा है। उसके पास पत्थर के कुछ टुकड़े हैं । बच्चा उनसे खेल रहा है। बच्चे के हाथ से दो-तीन पत्थर फर्श पर गिर जाते हैं। मम्मा अंग्रेजी में कुछ समझाती है । सामने बैठे एक अंकल जी शराफत की तत्परता में एक पत्थर उठाकर बर्थ पर रख देते हैं, बच्चे के पास । मम्मा पेपर नैपकिन निकाल कर पत्थर के टुकड़ों को पोंछ रही है।

अंकल जी मन-ही-मन अपने कृत्य पर लजा गए हैं । हिरामन होता तो चौथी कसम खा लेता...। वेताल होता तो विक्रम से पूछता " बताओ अंकल जी का लजाना सही है या नहीं...।"


दृश्य दो 

हड्डी के डॉक्टर के सामने पिता-पुत्र बैठे हैं। पुत्र पंद्रह बरस का है। पुत्र को कमर-दर्द की शिकायत हो गई है। बच्चों का ऐसी पीड़ा - तकलीफ, चोट आदि से सामना होते ही रहता है। पिता जी भी यह जानते हैं । पिता की ममता उन्हें डॉक्टर के पास लेती आई है। अर्थव्यवस्था में दो-चार हजार का योगदान देकर ही मानेंगे । डॉक्टर युवा हैं । लेटरहेड पर आधा दर्जन डिग्रियाँ लिखी हुई हैं । ज्यादा है तो बेहतर है ! डॉक्टर के पास सारे इंतजाम हैं । खून- जाँच, एक्स-रे, फीजियोथेरेपी और दवाखाना । 

पिता - पुत्र परिक्रमा पूरी कर, फिर से डॉक्टर के पास हैं । डॉक्टर पुत्र से पूछ रहा है कि फीजियो से आराम हुआ है कि नहीं । बच्चा समझ नहीं पा रहा है कि फायदा हुआ कहाँ है । पिता सिर्फ इतना कन्फर्म करना चाह रहा है कि कुछ सीरियस तो नहीं । कुछ वैसा हो तो किसी बड़े डॉक्टर के पास जाएगा। बेटा इतना जानना चाह रहा है कि दो-तीन स्कूल नहीं जाए तो उसके स्पोर्ट्स के ट्रायल पर असर तो नहीं पड़ेगा ? 'चैट जीपीटी' ने उसे वही बताया था जो अभी डॉक्टर बता रहे हैं। उसे दवा नहीं खानी है। पिता ने फिर भी एहतियातन दो-तीन की दवाएँ खरीद ली हैं ।

सब अपनी-अपनी जगह पर सही हैं । शायद संतुष्ट भी । इस दृश्य में एक ' डायनामिक इक्विलिब्रियम ' है। जीवन अपनी गति से चल रहा है। 


दृश्य तीन

गली में एक साथ कई घर निर्माणाधीन हैं। महीनों से यह स्थिति बनी हुई है -- गिट्टी, बालू, ईंटें ; धूल, पानी, किच्-किच् । चार-पहिए तो छोड़िए, दो-पहियों के लिए भी रास्ता नहीं है। लोग चुप हैं। कल होकर उनको भी जरूरत पड़ सकती है। फिर, समरथ को कहाँ दोष ? वैसे भी, जो सबकी जिम्मेदारी होती है, वह किसी की जिम्मेदारी नहीं होती। सड़क तो सार्वजानिक है ही । सबकी है, इसीलिए किसी की नहीं । यदि सबको तकलीफ हो रही हो तो फिर किसी को तकलीफ नहीं होती ! 

कुड़कुड़ मत करिए । बचकर निकलिए। खून अपना है, मत जलाइए। ज्यादा दिक्कत हो रही हो तो वैश्विक चिताओं के विषय में सोचिए । 


दृश्य चार 

बड़ा तरक्कीपसंद लोकतांत्रिक परिवार है। कहने, करने की आजादी । बच्चे जो चाहें करें । लेकिन थोड़ा पूछ कर । आज्ञा लेकर । उन्हें क्या चाहिए बता दें । कहाँ से लेना है, माता - पिता बताएँगे । बच्चे सोलह - पार हैं । बच्चे तो छोड़िए, बच्चों की मम्मी भी कुछ काम करना चाहती है, कुछ अर्थोंपार्जन करना चाहती हैं । हाँ, तो करें न ! कला,साहित्य और समाजसेवा जैसे कितने ही ' मीनिंगफुल ' काम तो हैं । और पैसे की कोई कमी है क्या? फिर क्यों उसके पीछे भागना । असल चीज तो है आत्मिक संतुष्टि , उसे प्राप्त करें ।


दृश्य पाँच 

भ्रष्टाचार समस्या नहीं, जीवन-शैली बन चुका है।

ऑडिट करने ' सरों ' , ' मैडमों ' की टीम आई हुई है । मेवे - मिठाई अब गिने तक नहीं जाते । होटल, गाड़ी,खाना, गिफ्ट -- ये ही घेराबंदी हैं । अब आयताकार रखिए कि वर्गाकार ! 

हर तरह की ग्रीसिंग के लिए पैसे से काम लिया जा रहा है । कॉलेज के छात्र तक नहीं छोड़े जा रहे । एक-एक फॉर्म, एक-एक दस्तखत के दाम वसूले जा रहे हैं । उन्हें ' असली ' जिंदगी के लिए तैयार किया जा रहा है, जो क्लासरूम के बाहर इंतजार कर रही है ! 

क्लासरूमों में भी फकैती ही हो रही है। 


दृश्य छह 

दोस्तों के एक व्हाट्सएप ग्रुप में चर्चा गरम है। ज़ेरे बहस है मुद्दआ - ग्रुप में रह कर भी दोस्त चुपचाप हैं। गर्मजोशी दिखाने की चीज होती है। ग्रुप में आकाशवाणी हुई है । किसी ने घोषणा की है कि वह शहर आ रहा है । भेंट-मुलाकात होगी । समवेत स्वरों में घोषणा का स्वागत हुआ है।

कुछ दिनों बाद वह शहर में है। दिन गुजर नहीं पा रहा, शाम बीत नहीं पा रही, रात कट नहीं पा रही । दोस्त सब बिला गए हैं । स्वागत के स्वर जाने कहाँ डूब गए हैं । जिंदगी ' वर्चुअल ' हो चुकी है ! 


दृश्य सात 

विवाहोत्सव का वैभव देखते ही बनता है ! जिसके जैसे भाग, जिसकी जितनी औकात ! 

पहली बार देखने को मिल रहा है कि खाने के स्टॉल पर खाना लेने में कोई रोक-टोक नहीं है। जितनी बार, जितनी मर्जी -- प्लेट आपकी, आपका पेट ! 

सजावट ऐसी कि अपना गिफ्ट निकालते झिझक होने लगे । चेहरे पर मुस्कुराहट आए तो , लेकिन सारी चमक गायब हो जाए। किसी ने एक प्लेट का जो दाम बताया है, वह किसी की एक महीने की तनख्वाह हो सकता है ।  

आदमी कितनी छोटी चीज है ! शौक कितनी बड़ी !!

कुछ ही समय पहले परिवार दहेज-उत्पीड़न के केस से बचने के लिए नत-विनत, दर-ब-दर था । अब ' सेफ जोन ' में है। जो बीत जाती है, सो बात चली जाती है।


शो मस्ट गो ऑन ! 




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