क्या अच्छा
नहीं है अच्छा आदमी होना ?
“
कठिनाइयाँ तो घर में उठानी ही पड़ेंगी । आदमी अपने को साध ही लेता है । मकान अभी बदला
नहीं है पर छोटे मकान में जाऊँगा । एक सब्जी कम कर दी गयी है, दूध भी, कपड़ा भी थोड़ा हाथ से धोने लगे हैं ,राम जी की मोटर इस्तेमाल करता हूँ । पेट्रोल अपना दूँगा । और भी बातें सम्भल
कर करनी पड़ेंगी ।”* अगर मैं पूछूँ
कि यह कथन किस व्यक्ति का हो सकता है, जो भारत का प्रधानमंत्री
भी रहा, तो सबसे पहला नाम जो ध्यान में आएगा वह ‘लाल बहादुर शास्त्री’ ही होगा । ये बातें उन्होंने अपने
प्राइवेट सेक्रेट्री रहे भूतपूर्व वरिष्ठ आइएएस स्व. राजेश्वर प्रसाद को एक पत्र में
लिखी थीं । राजेश्वर प्रसाद ने साथ वर्षों तक लाल बहादुर शास्त्री के साथ काम किया
था । उसी दौरान के अनुभवों पर उनकी किताब है ‘Days with Lal Bahadur Shastri : Glimpses from the
last seven years’ । यह पत्र उसी किताब का हिस्सा है । आज किसी मंत्री
के मुख से ये बातें अविश्वसनीय लगती हैं ।
शास्त्री
जी की मृत्यु के बाद, उसी वर्ष उनके परिवार के सदस्यों को पन्द्रह अगस्त
को ‘लाल किले’ नहीं बुलाया गया । शास्त्री
जी के नाम पर ‘लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय मेमोरियल ट्रस्ट’,
जिसमें भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ही अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
होते, के बनाने की बात उठी, तो उसे ठंढे
बस्ते में डाल दिया गया ।
किताब
में लेखक ने एक वाकये की चर्चा की है । जब शास्त्री जी गृह मंत्री थे, उनके ऑफिस का डेस्क कुछ ऐसा था कि उनके पास किसी दूसरी कुर्सी को लगाने की
जगह नहीं बचती थी । शास्त्री जी के लिए यह असहज करने वला अनुभव था । अंतत: उन्होंने
लेखक के साथ खड़े होकर ही फाइलें क्लियर कीं । ऐसे ही एक बार पिछली रात को शास्त्री
जी ने लेखक को काम के लिए देर तक रोक लिया था । अगली सुबह कुछ जरूरी बात करनी थी तो
शास्त्री जी सुबह-सुबह लेखक के आवास पर ही पहुँच गए ।
मंत्री, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री हो जाने के बाद भी आदमी अपनी सादगी और शराफत बरकरार
रख सकता है, यह तो शास्त्री जी ने सिद्ध कर दिया । लेकिन उनका
इतना अच्छा होना उन्हीं की पार्टी या सरकार के लिए किसी काम का रहा ? प्रधानमंत्री बनने के बाद जब यह चर्चा चल रही थी कि प्रधानमंत्री के ऑफिशियल
रेसिडेंस के रूप में ‘तीन मूर्ति भवन’ को
बनाए रखा जाए, उन पर आंतरिक भावनात्मक दबाव डालकर ‘ तीन मूर्ति भवन’ को मेमोरियल बनवा दिया गया ।
हम, भारत के लोग, जरूर उन्हें एक महान व्यक्ति, नेता और अपने सफलतम प्रधानमंत्री के रूप में याद करते हैं।
शास्त्री
जी के विषय में लेखक के संस्मरण पढ़ते हुए कई बार अपने खोखले अहं पर शर्मिंदा हुआ ।
कई बार यह खयाल आया कि जब इतने बड़े व्यक्ति का व्यवहार इतना सरल हो सकता है तो लोग
जो छोटे-मोटे पद पर भी जाते ही आग बरसाने लगते हैं, उन्हें तो
कुछ शरम करनी ही चाहिए ।
***
जाने क्यों याद आ रहा है फिल्म ‘छोटी-सी बात’ में अमोल पालेकर का कैरेक्टर ‘अरुण’ और फिल्म ‘कथा’ में नसीरुद्दीन शाह का कैरेक्टर ‘राजाराम’ । सादादिल होना, काम के प्रति ईमानदार होना, वफादार होना— क्या इन बातों का कोई अर्थ भी है ? या सिर्फ फिल्मों-कहानियों में ही इनकी जरूरत बची रह गई है । जो व्यक्ति सबके लिए पूरे तन-मन-धन से काम में लगा रहे, उसे कोई गंभीरता से भी न ले ! बस शाबाशी के दो शब्द, कभी-कभार संवेदना के दो बोल, इतने से ही खरीद किया जाता है अच्छा आदमी !
***
किसी भी क्षेत्र के सफल और पीछे छूट गए व्यक्तियों को देखता हूँ । प्रतिभावान् होना, योग्य होना, सज्जन होना – आगे बढ़ने के लिए इन बातों का संभवत: कोई महत्त्व नहीं रह गया है । जो सफल है वही सही है । जो सही है,वह सफल भी हो, जरूरी नहीं । आज शास्त्री जी पर लिखी किताब पढ़ते समय भी ये बातें ध्यान में आ रही थीं । उनके जमाने में तो फिर भी उनकी कद्र की गई । आज के समय में भी क्या यह संभव हो पाता ?
इसी
किताब( Days with Lal Bahadur Shastri)
को पढ़ते हुए यह भी समझ आया कि लोग आपको याद करते हैं तो इसलिए कि आप
आदमी अच्छे हैं, न कि पद और पद्वियों के कारण । कभी एक सीनियर ने समझाया
था – “Promotion is all incidental”; वैसे ही आप आदमी कैसे बचते हैं , काम यही आता है । बाकी चीजें incidental ही होती हैं
– क्या पद, क्या पैसा, क्या शानो-शौकत,
क्या ऐशो-आराम !
***
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्स र नहीं इंसाँ होना
की मिरे
क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशेमाँ का पशेमाँ होना
ज़ूद-पशेमाँ
– अपनी भूल पर बहुत जल्द पशेमाँ होने ((पछ्ताने) वाला
***
आसाँ नहीं
है आदमी अच्छा होना...!

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