साहिर और शैलेन्द्र को एक श्रद्धांजलि
(१)
मन रे तू काहे न धीर धरे...
वो निर्मोही मोह न जाने
वो ना मोह करे..
इस जीवन में शाम-सहर की
भूख को किसने जीता ?
लाज-शरम को किसने माना,
उलटा-सीधा सोचा ?
ज़िन्दा बचे तो करे
मन रे...
इस दुनिया में ऐसी दुनिया
इतनी-इतनी दूरी ?
जीने का ही शौक बचे ना
जीना ज्यों मजबूरी !
आखिर कितना सहे
मन रे...
सुनते हैं वो सबका है और
सब हैं उसके बच्चे
ममता फिर क्यों आँखें मूॅंदे
देख के भी ना देखे
काहे ये भेद करे
मन रे...
धीमी-धीमी आँच में जैसे
सारा जीवन सुलगे
या तो मन को काठ करे वो
या यह जीवन बदले
कुछ भी तय तो करे
मन रे...
(२)
अपनी तो हर आह एक तूफान है
क्या करें वो जान कर अनजान है
अब भी बाकी भूख है और हर सू लाचारी
आँखों में हैं ख्वाहिशें और जेबें है खाली
तंग कितना आ चुका इन्सान है
क्या ही बचपन क्या जवानी इतनी चिंताएँ
हर घड़ी हर पल में जाने कितनी दुविधाएँ
आदमी होना नहीं आसान है
फूल-से बच्चों का मन जो देखो कुम्हलाए
सब तरक्की झूठ है हम कुछ ना कर पाए
देश है क्या और कहाँ भगवान है
सोच में डूबा हो बचपन सर झुकाए हो जवाँ
बन गया हो जैसे जीवन एक मुसलसल इम्तहाँ
देश की कैसी भला पहचान है

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