बुधवार, 26 नवंबर 2025

‘असम्भव के विरुद्ध’: बह रहा है बीज रचना का

असम्भव के विरुद्ध: बह रहा है बीज रचना का

[ ‘असम्भव के विरुद्ध’, प्रकाश देवकुलिश, वाणी प्रकाशन, 2024 ]


         अपने नयी कविता की प्रकृतिशीर्षक निबन्‍ध में मुक्तिबोध ने लिखा है --  ध्यान रखने की बात है कि एक कला- सिद्धान्‍त के पीछे एक विशेष जीवन-दृष्‍टि होती है, उस जीवन-दृष्‍टि के पीछे एक जीवन-दर्शन होता है और उस जीवन-दर्शन के पीछे, आजकल के जमाने में एक राजनैतिक दृष्‍टि भी लगी रहती है ।  प्रकाश देवकुलिश के पहले कविता संग्रह असम्भव के विरुद्धपढ़ते हुए कवि की राजनैतिक दृष्‍टिसम्पन्नता के दर्शन बार-बार होते हैं । आज के समय में जब जीवन के हर क्षेत्र में राजनीति घुसी हुई है, यह सर्वथा स्वाभाविक ही है कि कवि राजनीति के कारण पैदा हुए सवालों से बार-बार जूझे । हालाँकि इस वजह से असम्भव के विरुद्धकी कविताओं को एकांगी या एकरस समझ लेना ज्यादती होगी । संग्रह की अड़सठ कविताओं से कवि ने ऐसा वितान ताना है जो बहुरंगी और बहुआयामी है । संग्रह की इसी खूबसूरती को इंगित करते हुए कवि अरूण कमल ने संग्रह के कवर पर दी गई संस्तुति में लिखा है – नितान्‍त निजी, ललित भावनाओं से लेकर बेहद बेधक राजनैतिक कविताओं तक जीवन के बहुत बड़े भाग को आयत्त करतीं ये कविताएँ समकालीन हिन्‍दी कविता को एक नया विन्‍यास देती हैं

 किसी कवि की वैचारिक और भावनात्मक बुनियाद या बुनावट कवि को उन विषयों की ओर ले जाती है जिन्हें वह अपनी कविताओं में उतारता है ।  कवि देवकुलिश की पक्षधरता किस तरफ है यह संग्रह की बहुत सी कविताओं में कामगरों, मजदूरों और किसानों की उपस्थिति से स्वत: स्पष्ट है । हर कविता संदर्भ-सापेक्ष होती है । कुछ कविताओं में संदर्भ स्पष्ट होते हैं, कुछ में अप्रकट । इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक गत दस-पन्‍द्रह वर्षों के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य की उपस्थिति को पहचान सकता है । उदाहरण के लिए रामशीर्षक कविता की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है –

                         उस राम को पाने कहाँ जाऊँ

                        किस मन्‍दिर –

                        निर्मित या निर्माणाधीन

                        किस मठ, किस पीठाधीश्‍वर के पास ?

                        किस कचहरी,किस न्यायमूर्ति के पास ?

 इसी कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस तरह से हैं –

                                     किन शालाओं, स्थापत्य कलाओं में,     

                                    किस भूमि पर,

                                    किस प्रांगण में ढूँढूँ तुम्हें

                                    हे अन्‍तर्वासी राम !

 कवि का ईश्‍वर रूढ़ियों, रिवाजों या दिखावों में बसने वाला ईश्‍वर नहीं है । संग्रह की एक अन्य कविता ईश्‍वरमें कवि ईश्‍वर का अर्थ समझने का आह्वान करता है । उसका कहना है कि ईश्‍वर जहाँ भी और जो भी है, अपने श्रेष्ठतम रूप में होता है । जरूरत है हमें सुन्‍दरम्,सत्यम्, शिवम् को समझने की ।

             संग्रह की कविताओं में मजदूर वर्ग, किसान, सत्ता, धर्म या पौराणिक सन्‍दर्भ, इतिहास के प्रसंग, प्रकृति, स्मृतियाँ आदि सब एक दूसरे से गुँथे हुए हैं । प्राय: हर कविता यथास्थिति को समझने, उसे बदलने एवम् गलत का प्रतिकार करने, लोगों को उनका उचित श्रेय देने, और एक बेहतर समय की कामना के लिए प्रस्तुत होती है ।

             प्रकाश देवकुलिश की कविताओं को पढ़ने- समझने के लिए पाठक की ओर से भी थोड़ी तैयारी अपेक्षित है । इनकी कविताओं में आए कुछ नाम, कुछ घटनाएँ, कुछ तिथियाँ यदि पाठक की जानकारी में रहें तो पाठक पर कविताओं का प्रभाव निश्‍चित तौर पर ज्यादा होगा । मैं समझता हूँ, ये कविताएँ इतनी अपेक्षा रखती हैं कि यदि पाठक कविता में ऊपर बताई गई बातों से अनभिज्ञ हो, तो गूगल तो कर ही ले कम से कम । अज्ञेय ने कहा है --  आज कवि से ही अधिक माँग की जाती है । पाठक से नहीं कहा जाता है कि वह काव्य सुनने या पढ़ने का पात्र बने ।  इस बात को समझने के लिए दो कविताओं से कुछ पंक्तियाँ । पहले हम कहाँ कुछ बोलते हैंकी ये पंक्तियाँ –

                          लद गये दिन तुष्‍ट करने के

                        जैसे बड़े दिनों की चाह

                        हो रही हो पूरी

                        अफीम ली

                        सबने थोड़ी-थोड़ी

 अब लेनिनग्राद अब बदल जाएगा पीटर्सबर्ग मेंकी इन पंक्तियों को देखिए –

                         ओ साथी !

                        मनुष्य को आदत है

                        अफीम खाने की

                        धर्म अफीम नहीं था

                        तुम भी अफीम नहीं थे

                        पर उन्होंने विअसे ही खाया

                        धर्म को भी

                        फिर तुम्हें भी

                        और वैसे ही खाएँगे

                        तुम्हारे नकारे जाने को भी

 पाठक यदि इन दोनों कविताओं में आए अफीमशब्द के सन्‍दर्भों से अपरिचित हो, तो कविता से उत्पन्न होने वाले रस में कुछ कमी जरूर ही आ जाएगी । इन दोनों कविताओं में आए पद राम राम का क्रन्‍दन’ , ‘चाय पर चर्चा’ , ‘लेनिनग्राद’, ‘पीटर्सबर्गया उन्नीस सौ सत्रहभी अपने सन्‍दर्भों के कारण कुछ विशेष अर्थपूर्णहो जाते हैं ।

             अज्ञेय ने कहा है --  काव्य का विषय और काव्य की वस्तु अलग-अलग चीजें हैं ।... वह ( वस्तु) विषय के साथ कवि के रागात्मक सम्बन्‍ध का प्रतिबिम्ब होगी । इस मापदण्ड के अनुसार इस संग्रह की कविताओं में विषय के साथ कवि के रागात्मक सम्बन्‍ध को पाठक लगातार महसूस करता है । इस दृष्टि से संग्रह की तीन कविताएँ रधिया दाई’, ‘अनन्‍दी महतो की कुदालऔर काम से लौटतीं औरतेंकुछ खास ही बन पड़ी हैं । हर पाठक लिए अपनी रधिया दाई, अपने अनन्‍दी महतो और अपनी काम से लौटतीऔरतें उपस्थित हो जाती हैं । इन तीनों कविताओं के पात्र सारी परेशानियों के बावजूद अपनी स्थिति को लेकर दु:ख में डूबे हुए लोग नहीं हैं । वे अपने कर्म से प्रसन्न और सन्‍तुष्ट हैं । कविता का कमाल यह है कि पाठक ही, बकौल कैफ़ी आज़मी, सोचने लगता है कि “ यही दुनिया है तो फिर ऐसी  ये दुनिया क्यों है” ।

             संग्रह की कविताएँ आकार में लम्बी नहीं हैं । सिर्फ तीन कविताएँ तीन पृष्ठों तक गई हैं । बाकी सारी कविताएँ एक या दो पृष्ठों की हैं । कुछ कविताएँ तो दस-पन्‍द्रह पंक्तियों की हैं । आकार के लिहाज से संग्रह की सबसे छोटी कविता मात्र नौ पंक्तियों की है , जिसका शीर्षक है काँच टूटने की आवाज। कवि काफी लम्बे समय से कविताएँ लिख रहे हैं। सम्भव है उनके निरंतर रचनाकर्म ने उनकी अभिव्यक्ति को सघनता प्रदान की हो । कविता के आकार पर विचार करते हुए वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा है – क्या कविता की इकाई का छोटा होना एशियाई विशेषता है ? …यह मात्र शिल्प का मामला नहीं है । मुझे लगता है यह एक मूल्य दृष्टि का सवाल है । एक पूरी मानसिक संरचना का भी । कारण जो भी हो, प्रकाश देवकुलिश की छोटे आकार की कविताएँ भी अनुभूति की तीव्रता के लिहाज से निश्चय ही बड़ी कविताएँ हैं ।

           यों तो इस संग्रह की कविताएँ जमाने से दो-दो हाथ करती हुई-सी कविताएँ हैं, पर कुछ कविताएँ अलहदा रंग लिए हुए हैं  । पन्‍द्रह पंक्तियों की एक कविता है घोंसले में प्यार। बेटी पर लिखी हुई यह एक बहुत ही खूबसूरत कविता है । इसकी शुरुआती पंक्तियाँ देखिए –       

            जैसे बेली में होती है भीनी खुशबू

            चाँद में उजली नरमी

            बयार में नींद

            बौर में महँक

            छुईमुई में लाज

बेटी पर लिखी हुई ऐसी स्नेह-सिक्त पंक्तियाँ कम ही होंगी !

         संग्रह की दो-तीन कविताओं में माँ की उपस्थिति है । अर्थ अयोध्या काशी कैलाश काशीर्षक कविता में द्वंद है कवि की तीर्थों/धामों की यात्रा के प्रति अनिच्छा और माँ की अस्था के बीच । साधनों के अभाव में माँ की पुण्य धामों को देखने की इच्छा पूरी नहीं हो पाती । और माँ की अनुपस्थिति कवि के मन में उन यात्राओं की निस्सारता, निरर्थकता  और भी तीव्र और दृढ़ हो जाती है । कविता की इन पंक्तियों में कवि का दर्द, उसका अफसोस देखिए –

                          समय के साथ

                        धुँधली न होकर साफ होती जाती है

                        उसकी स्मृति

                        और

                        निरर्थक होता जाता है और भी –

                        अर्थ – चारो धाम का                 

                        अयोध्या, काशी, कैलाश का ।

  ऐसा ही दुख, ऐसा ही अफसोस, थोड़े अलग संदर्भों में युवा कवि राही डूमरचीर की एक कविता की पंक्तियों में भी उतरता है –

                        आज इसी शहर के

                        स्टेशन से

                        विदा ली तुमने आखिरी बार

                        अब क्या ही जाऊँगा

                        धनबाद

 यह निर्जनता और निर्विकल्पता कवि के साथ- साथ पाठक को भी घेर लेती है ।

             प्रकाश देवकुलिश की बहुत-सी कविताएँ ऐसे विषयों को केन्‍द्र में रखकर लिखी गई हैं, समाचारों में जिन पर चर्चा होती रही है । उन्हें चाहें तो पॉपुलर मूडके विषय कह सकते हैं ।  कुम्हार भाई’ , ‘ढोर की तरह वे’, ‘धन्यवाद भूल गया हूँआदि कविताओं के विषय खबरों में बने रह चुके विषय हैं । पाठकों को इन कविताओं में खबरों की पुनरावृत्ति होती हुई लग सकती है । इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कुछ बातों का दुहराया जाना भी जरूरी है , जब तक कि स्थितियाँ सुधर न जाएँ ।

             संग्रह की एक कविता कहना खरी-खरीविषय के अनूठेपन की वजह से खास है ।  हमारे यहाँ की परिपाटी है कि दिवंगत लोगों के प्रति सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें ही कही जाती हैं । कवि इस परिपाटी को बदल देना चाहता है । वह कहता है –

                         दे रहा हूँ जिम्मेवारी तुम्हें

                        जो चला गया उस पर क्या कहेंकी लीक तोड़ने की

                        कहना खरी-खरी

इतना खरा कौन होता है आजकल ?

             संग्रह की दो प्रेम कविताएँ विशेष रूप से पढ़ी जानी चाहिए  -- अच्छा है कि सच कहेंऔर हवा वहीं ठहरी है । प्रेम एक ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं पड़ता । कवि भी कहता है—

                          तुम्हें, मुझे

                        और दुनिया के तमाम लोगों को

                        प्यार करना चाहिए ।

  प्रकाश देवकुलिश एक सजग और सहृदय कवि हैं , इस बात की गवाह  सम्भव के विरुद्धकी कविताएँ हैं ।  कवि नजर हर तरफ है । कवि हर बात पर विचार कर रहा है । मुक्तिबोध ने कहा है --  आज ऐसे कवि-चरित्र की आवश्यकता है, जो मानवीय वास्तविकता का बौद्धिक और हार्दिक आकलन करते हुए सामान्य जनों के गुणों और उनके संघर्षों से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करे, उनके संचित जीवन-विवेक को स्वयं ग्रहण करे तथा उसे और अधिक निखारकर कलात्मक रूप में उन्हीं की चीज को उन्हें लौटा दे ।  असम्भव के विरुद्धकी कविताओं को पढ़कर पाठक यह मानेगा कि मुक्तिबोध का यह कथन कवि प्रकाश देवकुलिश के लिए ही है ।

             कवि और उसकी कविता को उसकी ही पंक्तियाँ परिभाषित कर रही हैं –

                          हुनर के हाथ में

                        घुले श्रम से

                        बह रहा है बीज रचना का । 

 

 

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