शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

साहित्य वृत्त १ : साहित्य के चीयर लीडर


          साहित्य वृत्त : १

साहित्य के चीयर लीडर

 

वह साहित्य का चीयर लीडर है । यहाँ साहित्य का तात्पर्य हिन्‍दी साहित्य से है । वैसे, कोई भी साहित्य या जीवन का कोई भी क्षेत्र पुराने दिनों के क्रिकेट के टेस्ट मैच सा नहीं बचा है । हर जगह टी-ट्‍वेंटी का बोलबाला है ।

 आपको बताऊँ, साहित्य चीयर लीडरों के कंधों पर ही बैठा हुआ है इन दिनों !

 शहर में कोई भी गोष्ठी हो, सभा हो, सम्मेलन हो, पुस्तक विमोचन हो, व्याख्यान हो, सम्मान समारोह हो – छोटा या बड़ा जैसा भी आयोजन हो, वह ढूँढ़- ढूँढ़ कर उपस्थित हो जाता है । मंचस्थ साहित्यकारों को तालियों के नैतिक समर्थन की बहुत जरूरत होती है । कवि अपने श्रोताओं की व्यवस्था स्वयं करे ! वह यानी कि चीयरलीडर कार्यक्रम समाप्त होने के बाद साहित्यकारों से मिल-मिलकर आशीर्वाद प्राप्त करता है । यदि साहित्यकार आशीर्वाद देनेवाले उम्र के न हुए, तो नमस्कार, प्रणाम से गुजारा कर लेता है , दंतुरित मुस्कान के साथ ! हर साहित्यकार को बाकमाल और लाजवाब होने की बधाई देता है । उनके व्याख्यानों, भाषणों, कविता पाठों आदि को रिकॉर्ड करने और फिर उन्हें सही नम्बरों तक फॉरवार्ड करना उसका नित्यकर्म है । इसी बहाने वह लेखकों के नम्बर प्राप्त कर लेता है । सुप्रभात,शुभ प्रभात, शुभकामना संदेश भेजना शुरू कर देता है । क्या पता कभी सम्पर्क सध ही जाए !

 बार-बार आते-जाते, आशीर्वाद पाते-पवाते कुछ लोगों की मुस्कान परिचित होने लगती है । फिर उनसे निकटता बढ़ाने का उपक्रम शुरू होता है । निकटता बढ़ाने का सबसे कारगर तरीका है परनिन्‍दा – लेखकों के सामने किसी और लेखक की शिकायत, उसकी बुराई करना – क्या लेखन और क्या व्यवहार , इस परनिन्‍दा के लपेटे में सब आ जाता है । वह यह भली-भाँति समझता है कि यह सारा कार्य-व्यवहार इतने जेनुइन तरीके से होना चाहिए कि सुनने वाले को उसके सद्‍चरित्र होने पर भरोसा हो जाए । इस तरह की शिकायतों को परोसने के बाद वह और भी जेनुइन तरीके से उनकी प्रशंसा करता है । इसी तरह की प्रशंसा को मुक्त कंठ से की गई प्रशंसा कहा जाता है ।

 इस तरह जब थोड़ी जान-पहचान बढ़ जाती है, तो वह उनके यानी लब्धप्रतिष्ठित समझे जाने वाले साहित्यकारों के अन्य कार्यों के लिए भी खुद को प्रस्तुत करने लगता है । किसी को कहीं पहुँचा देना है, किसी को कहीं से ले आना है आदि- इत्यादि ।  कभी-कभार वह एकांत में भी मौका निकाल कर उनकी प्रशंसा कर देता है । एकांत में की गई प्रशंसा विशेष महत्त्व रखती है । इस प्रकार वह श्रेष्ठ जनों की प्रशंसा और विश्‍वास दोनों का ही पात्र बन जाता है ।

 यदि पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम हो, तो पुस्तक खरीद कर लेखक के ऑटोग्राफ लेना नहीं भूलता । किसी भी कार्यक्रम में लेखकों, आयोजकों के कार्यक्रम -स्थल छोड़ने के बाद ही वह कार्यक्रम-स्थल से टलता है । वह साहित्य का सच्चा टहलुआ है।

 कुछ लेखक, जो बड़े हो चुके हैं या  जिनके बड़ा हो जाने की संभावना दिख रही होती है , उनकी किताबें खरीद कर उनमें से कुछ अच्छी पंक्तियाँ चुनता है । पत्र-पत्रिकाओं में छपी खबरों/ समीक्षाओं से और गूगल की मदद से किताब के विषय में कुछ अच्छी-अच्छी बातें जमा कर एसएमएस, व्हाट्‍स एप, ईमेल आदि सभी उपलब्ध साधनों के द्वारा लेखक को प्रेषित कर देता है । प्रशंसा की गैस जब गुब्बारे में भरी जाए तो वह फूलेगा ही और उड़ेगा ही । वह यह बात समझता है । वह मानता है कि उड़ने का अधिकार हर व्यक्ति को होना चाहिए ।

 वह बड़े लेखकों की ज्यादा तारीफ करता है , छोटे लेखकों की थोड़ी कम । अगर बड़े लेखक ने भूमिका लिख दी है, तो बड़े लेखक की तेरह पृष्ठों की भूमिका असल किताब के एक सौ तीस पन्नों पर भारी पड़ जाती है । वह भूमिका की तारीफ के बहाने किताब की भी थोड़ी-बहुत तारीफ कर देता है । यदि लेखक थोड़ा ज्यादा ही बड़ा हुआ , फिर तो फ्लैप पर लिखा एक अनुच्छेद भी हीरे जैसा चमकदार हो जाता है ।  चीयर लीडर यह जानता है कि 'बड़ा है तो बेहतर है' और 'चमकदार है तो ईमानदार है' ।  

 साहित्य के क्षेत्र में प्रोत्साहन और प्रशंसा ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी जरूरत नए से नए और परिपक्व से परिपक्व, हर तरह के साहित्यकारों को होती है और यह जरूरत  बार-बार पड़ती रहती है । यह जरूरत सदा बनी रहने वाली होती है । वह इस नब्ज को पकड़ चुका है ।

 वह ढेर सारी पत्रिकाएँ खरीदता है । किताबें भी कम नहीं खरीदता । वह जानता है कि किताबें उसे उपहार स्वरूप मिलने से तो रहीं ! हो सकता है कुछ लेखक उसे कुछ जानने भी लगे हों, लेकिन मानने का तो सवाल ही नहीं होता । लेखक किताब तो उसी को सौंप सकते हैं जिसे वे किताबों के लिए सुपात्र मानें, भले ही पीठ फिरते ही वे सुपात्र किताब किसी और की ओर सरका दें ।

 वह पुस्तक मेलों में भी जाता रहता है । कभी-कभी तो दूसरे शहर में लगे पुस्तक मेलों में भी । किताबें तो  खरीदता ही है, श्रेष्ठ साहित्यकारों के चरणवंदन कर पुण्य भी खूब कमा आता है ।

 साहित्य के ये चीयर लीडर आते कहाँ से हैं, और काहे आते हैं ? बस थोड़ा ध्यान से अपने आसपास देखने की जरूरत है ।

 किसी दिन कोई कह रहा था – पुराना चीयर लीडर कवि हो जाता है ।

 किसी ने टोका – कवि क्यों, कथाकार क्यों नहीं ?

 जवाब मिला – कविता ऑफ स्पिन गेंदबाजी है । इसे कोई भी कर सकता है ।

 विक्रम संवत् २०८२, मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा

तदनुसार ई.स. 2025, 21 नवम्बर, शुक्रवार 


 

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