सोमवार, 24 नवंबर 2025

‘काली मठ’: विमुक्‍ता भव


 




काली मठ: विमुक्‍ता भव

[ ‘काली मठ’, लेखक: स्मिता वाजपेयी, अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज, 2023]




    फेसबुक पर पोस्ट के रूप में शुरू हुई किताब प्रकाशक की पहल से किताब का रूप ले लेती है । किताब ऐसी कि जो हाथ में ली जाए तो बिना खत्म किए रखते न बने । खत्म कर देने के बाद, बार-बार उठाई जाए ।

     यह सही है कि काली मठ उत्तराखण्ड का एक प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंदिर है, जिसकी यथास्थान चर्चा इस पुस्तक में की गई है । लेकिन यह किताब मुख्य रूप से लेखिका के मन में चलने वाली यात्रा की किताब है । भूमिका में ही एक शब्द उपस्थित होता है – अहैतुकी कृपा । इस किताब के लिए मानो यह सिग्नेचर ट्यून’-सा शब्द है । दरअसल जब आप जीवन के शुक्ल पक्ष की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं तो बार-बार आप अपने आप पर हुई कृपा के लिए कृतज्ञता का अनुभव करते हैं । तर्क से उच्चतर भाव का स्थान ! यह किताब भी उसी कृतज्ञता का प्रतिफलन है । किताब के ग्यारहवें पृष्‍ठ पर एक शब्द आता है –उत्फुल्लता। इसके पहले भूमिका में एकांत’  शब्द उपस्थित होता है । इन शब्दों को आप किताब का बीज-शब्द मान सकते हैं । नब्बे पृष्‍ठों में फैला यह संस्मरण आकार के लाघव के लिए नहीं अनुभव के विस्तार के लिए विशेष है ।

     क्या है इस काली मठमें ? यदि आप तथ्यात्मक ब्यौरों के लिए इसे पढ़ना चाहते हैं तो आप निराश हो सकते हैं । उसके लिए आप पर्यटन विभाग की कोई पुस्तिका पढ़ लीजिए । “ क्योंकि हम सब मनुष्य हैं ! हम सब एक जैसे ही तो हैं ! हमारे सुख-दुख एक जैसे हैं ! समझना कोई मुश्‍किल नहीं।” – किताब के शुरू होते ही यह वाक्य आपको बाँध लेता है । जिस वसुधैव कुटुम्बकमको हम परंपरा से मानते आ रहे हैं, उससे जोड़ता है यह कथन । अन्ना करेनिनाउपन्यास की पहली पंक्ति है – “ सभी खुशहाल परिवार एक जैसे होते हैं; हर दुखी परिवार अपने-अपने तरीके से दुखी होता है ।” बच्चन की भी पंक्तियाँ कुछ ऐसी  हैं –

             “दिवस में तो सभी का एक जग है

            रात में हर एक की दुनिया अलग है”

     इन दोनों बातों के उलट लेखिका कह रही है कि हमारे सुख-दुख एक जैसे हैं । किताब जुड़ने की बातें कर रही है, खानों में बँटने की नहीं । पाठक अनायास जुड़ाव महसूस करने लगता है । जब लेखिका की उपर्युक्त पंक्तियों को पाठक पढ़ रहा होता है तो बैकग्राउण्ड में जैसे जगजीत सिंह की आवाज भी सुनाई दे रही होती है – दुख ने दुख से बात की... । और लीजिए, कुछ पंक्तियों के बाद गीत की इस पंक्ति को आप किताब में पढ़ते हैं ! लेखक जब पाठक-सा सोचने लगे, या सोच रहा हो, तो पाठक उसके लिखे की गिरफ्त से बचेगा कहाँ !

     क्या है लेखिका की यह यात्रा ? और क्यों है ? यह एकांत की तलाश है या अकेलेपन से पलायन! या यह एक स्त्री होने के दुख से निजात पाने का अहैतुक हेतु है ? क्या है कि एक विदेशी महिला रात की निर्जनता में एक अनजान स्त्री का साथ पा कर रोने लग पड़ती है? क्या है कि “औरत हमेशा अकेली ही रहती है अम्माँ” यह सुनकर एक बूढ़ी अम्माँ सई कहती हो एकदमदुहराती रह जाती है ? और क्या यह दुख सिर्फ एक स्त्री का है ? हर व्यक्‍ति जो अपने सत्य की खोज में लगा है, क्या ये अनुभव उसके नहीं हैं ? जो भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रा की खोज में है, उसका बंधनों के प्रति विद्रोह सहज स्वाभाविक है । लेखिका कहती है कि “एकांत हमेशा नायकों के लिए रखा गया और नायिकाएँ बेचारी अगर पहाड़ों पर गईं भी तो वह किसी सेनेटोरियम में गईं मरने के लिए” । लेखिका के लिए यही नायकों वाला एकांत चिर-प्रतीक्षित सुन्‍दर सुखद एकांत है । एक स्तर पर यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ आवाज है, तो वहीं एक व्यक्ति के स्तर पर उस स्वतंत्रता की अभिलाषा, जो मनुष्य को मनुष्य से अलग न समझती हो । लेखिका जब खुद से ही यह प्रश्न करती है कि “ इंडियन वूमेन गायत्री मंत्र की तरह शापित तो नहीं है?”, तो वह सिर्फ अपनी ही बात नहीं कर रही, सिर्फ भारतीय स्त्रियों की बात नहीं कर रही, उसके जेहन में संसार की हर वह स्त्री है जिसके मन में उन्मुक्तता के लिए छटपटाहट है । स्त्री-शक्ति के बंधन-मुक्त होने में ही कल्‍याण है । कथा है कि गायत्री मंत्र का सदैव सदुपयोग ही हो, इसलिए उसे शापों के बंधन से बाँध दिया गया । शाप के विमोचन के बाद ही गायत्री मंत्र की शक्ति असरकारिणी होगी । स्त्रियों के लिए इसी रूपक का उपयोग लेखिका ने किया है । स्त्रियों के लिए शाप कौन से हैं? और उनसे मुक्ति कैसे संभव है ? यह प्रश्न हम सबके लिए विचारणीय है । लेखिका का बार-बार नदी के समीप जाना । मन में विचारों के बवंडर का उठना । और वही अहौतुक संयोग कि लेखिका सरस्वती नदी के समीप है । उसके मन में गायत्री शाप विमोचन मंत्र उच्चरित हो रहा है—

                         “ अहो देवि महादेवि संध्ये सरस्वती

                         ....

                        वि...मु...क्ता...भ...व!!”

 उसे मुक्ति चाहिए । ध्यान दीजिए, यह मुक्ति व्यक्ति-विशेष की नहीं है, हर उस व्यक्ति की है, जिसे अपने जीवन-उद्देश्य की खोज है, जिसे व्यर्थ के बंधनों की जकड़न को तोड़ फेंकना है ।  

     इस किताब के लेखक का स्त्री होना नि:संदेह किताब को एक स्त्री-दृष्‍टिसे लैस करता है । यह संयोग भी हो सकता और इस स्त्री-दृष्‍टिका नतीजा भी कि इस किताब में आने वाले ज्यादातर चरित्र स्त्री-पात्र ही हैं । लेखिका और उन पात्रों का बहुत सहजता से घुलमिल जाना भी संभवत: इसी कारण है । लेखिका से मिलने वाली विदेशी स्त्रियाँ उसे स्ट्रांग वुमन समझती हैं, तो स्थानीय स्त्रियाँ लेखिका को राइटर जानकर आदर के भाव से देखती हैं । लेकिन लेखिका तो एकांत की तलाश में है ! जगह-जगह पर लेखिका ने आपने पाण्डित्य का प्रदर्शन भी किया है, बिना रौब गाँठे। बालक पण्डित से सवाल-जवाब हो, मंदिर में दिखने वाले चाँदी के मंत्र का उल्लेख हो, बांग्ला साहित्यकारों का उल्लेख हो या फिर गायत्री मंत्र के शापित होने का ही उल्लेख । और फिर बिना चर्चा किए गायत्री मंत्र की शाप-मुक्ति के विमोचन मंत्र का उद्धरण ! पाठक के मन पर छवि बनती चली जाती है, कि वाग्विलासिता नहीं अर्थभारिता है इस कहानी में ! यह एक स्त्री की अभ्यस्त आँखें ही हैं जो यह नोट कर लेती हैं कि सब्जी सूखी और सड़ी है, कि चूल्हे को छोड़कर बाकी घर पुराना और काला है । लेखिका की सूक्ष्म निरीक्षण-दृष्‍टि का पता भी पाठकों को लगातार मिलता जाता है , जैसे-जैसे वह किताब के पन्नों पर आगे बढ़ता है ।

     लेखिका ने किताब के शुरू में ही लिखा है अहैतुकी कृपा । इस बात को इस तरह भी समझ सकते हैं कि बहुत सारी जगहों पर लेखिका के साथ जो घटित हो रहा है, उसे किसी कार्य-कारण संबंध में बाँध पाना संभव नहीं दिखता । जब तर्क बातों की जड़ तक न पहुँचा सकें, तो शायद भावनाएँ वहाँ तक पहुँचा देती हैं । इस किताब में इसके दो उदाहरण सबसे प्रबल हैं । एक तो पाठक को थोड़ा विचलित भी कर जाता है, वह है बिना किसी प्रत्यक्ष स्रोत के चिता की चिरायंध गंध का अनुभव ।  दूसरा, लेखिका के साथ भैरू का होना और अंतिम दिन बिना किसी सूचना के गायब हो जाना ।

     कहते हैं कविता का स्वभाव बिम्बात्मक होना है । और यदि गद्य वैसा हो तो ? जिन्होंने इस किताब को पढ़ा है, वे इस किताब की काव्यात्मकता पर विस्मित हुए बिना नहीं रह सकते । उदाहरण के तौर पर कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं :-

             “ अंधकार..पूरा परिसर !! पूरा कालीमठ !! सारे पहाड़, नदी सब एकदम काले !!”

             “ मुस्कुराते होठों के पास अनदेखे स्पर्श की लकीर झिलमिला रही थी ।”

             “ बरामदे में आओ तो नदी बहती दिखाई दे रही थी,कमरे में जाओ तब बहती सुनाई दे रही थी ।”

             “ समय का कोई अस्तित्व नहीं है । जो है उसे काल कहते हैं और यह अविभाज्य है!”

             “ वह जैसे रुई-सी उड़ती हुई, नदी-सी उछलती हुई, थिरकती हुई, हवा-सी बहती हुई लौटी।”

     कितने सारे बिम्ब अंकित हो जाते हैं मन पर ! नदी, खास तौर पर रात की नदी के बहाव का वर्णन,नदी के पत्थर को प्रेतशिला कहना, पुल पर बँधी घंटियों का और उन्हें भरी बारिश में बजाने का वर्णन, सीढ़ियों पर हफ्फ-हफ्फकरते चढ़ने का वर्णन । लेखिका ने देखा, मह्सूसा और उसे चित्रित किया – सब उसी शिद्दत के साथ ! लेखिका के लेखन में यही शिद्दत है जो एक कशिश पैदा करती है , वरना लिखने को तो लोग मनों नहीं टनों लिख रहे हैं !

     दो-एक जगहों पर लेखिका ने अपने ही बारे में लिखते समय इस तरह वर्णन किया है, मानो किसी और के विषय में बता रही हो। इसे चाहे तो द्रष्टा-भाव कह लें । ऐसा करने से वह दृश्य और भी ज्यादा प्रभावोत्पादक हो उठा है ।

     किताब का अंदाज़े-बयाँ इतना अच्छा है कि पाठक इस नॉन फिक्शनमें फिक्शनका आनंद ले सकता है । देखा जाए तो है यह एक कहानी ही, जिसके पात्र और स्थान वास्तविक हैं, बस यही तो !

 इस किताब के खत्म होने के बाद जो केंद्रीय अनुभूति रह जाती है पाठक के साथ, उसे लेखिका ने किताब में लिख ही दिया है –

             “ वह शांति ढूँढ़ रही है ।

-    और तुम ?

-    खुद को !”

     एकांत, मानवीयता, अज्ञात की खोज, संबंधों की उष्णताखोजने की ही तो यह यात्रा है लेखिका की । और एक तरफ वह जहाँ व्याकुल है अपने स्वर्गिक एकांतको ढूँढ़ने और पाने के लिए, वह बुद्धि को ताक पर भी नहीं धर देती । उसके मन में ढेरों प्रश्न, प्रतिप्रश्न हैं जिन्हें पूछ्ने में वह हिचकती नहीं । बालक पुजारी के संग लेखिका के वार्तालाप में पाठक इसका अनुभव अच्छे से करता है ।   

      इस किताब के संस्मरण तिथिवार सजाए नहीं लगते हैं । बल्कि यों कहें कि लहरों की तरह यादें दिल से टकराती हैं। यही इस किताब की खूबसूरती भी है । बाँधे रखती है पाठक को । एक और खूबसूरती है इसके लहजे का अनौपचारिक होना । ये संस्मरण फेसबुक पोस्ट के रूप में पहलेपहल सामने आए थे । कुछ अनौपचारिकता तो उस कारण भी है । कुछ लेखक की शैलीगत विशेषता । किताब में थोड़ा ही आगे बढ़ने पर पाठक पाता है कि तिथियाँ गौण हो गई हैं । यहाँ तक कि लेखिका की उपस्थिति भी पार्श्‍व में चली जाती है । बस एक अनुभूति बचती है, जो जीव-मात्र की है, उसी की यात्रा बचती है । वह जीव पाठक भी है, लेखक भी है, और भैरूभी है !  पढ़ते वक्त पाठक यह महसूस कर लेता है कि लेखिका आग्रही नहीं है कि उसकी बातों को अक्षरश: स्वीकार कर लिया जाए । वह स्वयं भी अक्षरश: स्वीकार नहीं कर लेती बातों को । बालक पुजारी को महज इसलिए बात करने से मना कर दिया जाता है कि फोन से उस समय एकांत भंग हो रहा है लेखिका का । किताब में शब्द, प्रसंग , संदर्भ सभी सहज गति से चले आते हैं । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है “साहित्य में सहज होना ( मैं सरल नहीं कहता ) भी मौलिकता का श्रेष्‍ठ प्रमाण है ।” यह किताब इस मानदण्ड के करीब पहुँचती हुई है । लेखिका की अभिव्यक्ति की सहजता उसके लेखन को पाठकों के लिए संप्रेषणीय और प्रिय बनाने की क्षमता रखती है ।

     किताब के शुरू में काली मठ का परिचय दिया गया है । मैं समझता हूँ यह यात्रा और उसके संस्मरण बाह्य रूप से शक्ति के दर्शन और अनुभव से ज्यादा भीतर की शक्ति के दर्शन और उसे अनुभव करने से संबंधित हैं । ये संस्मरण अंतर्यात्रा के संस्मरण हैं । भौतिक संसार इस पुस्तक में उपस्थित है किन्‍तु वह आंतरिक संसार की पुष्‍टि के लिए ज्यादा है ।

     प्रकाशक की पहल से ही ये संस्मरण पुस्तकाकार प्रकाशित हो पाए, इसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं । लेकिन किताब को बेहतर बनाने की गुंजाइश रहती है । संपादन और प्रूफ का काम शायद बहुत ध्यानपूर्वक नहीं किया गया है । हिन्‍दी पढ़ते रहने वालों के लिए कुछ भूलें तुरंत पकड़ में आने और खटकने वाली हैं । आजकल यह चलन भी हो गया है कि जितना लेखक देख सके उतने भर की ही जिम्मेदारी है । इस स्थिति से बचा जा सकता था । कुल 102 पृष्‍ठों की किताब का मूल्य दो सौ रुपए रखा जाना भी थोड़ा ज्यादा है । किसी भी लेखन को श्रेष्ठ बनाने में कंटेंट और इन्‍टेंटदोनों का हाथ होता है । इसीलिए एक प्रॉडक्टके रूप में कुछ कमियाँ रह जाने के बावजूद यह किताब अपने कंटेंटऔर इन्‍टेंटके कारण अच्छी बन पड़ी है ।  

     काली मठ से लौटते समय पहाडों के सौन्‍दर्य से अभिभूत होती हुई लेखिका खतरनाक मोड़ों से गुजरते हुए अनुभव करती है “ सौन्‍दर्य को देखना महसूसना भी जीवट का काम है ।” मैं इस बात  को इस तरह कहना चाहूँगा “ जीवन के सौन्‍दर्य को देखना महसूसना भी जीवट का काम है !” हमारी सारी यात्राएँ , बाहरी या भीतरी, इसी सौन्‍दर्य के साक्षात्कार के लिए हैं ।

सारा शाप-विमोचन, सारी मुक्ति इसी में है –

 विमुक्‍ता भव !


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें