शनिवार, 3 मई 2025

डॉन की मर्यादा [ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]

 

डॉन की मर्यादा

[ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]

                                                     

बुतरू                      - हमारे जीवन में असर का कितना महत्व है ?

भगत जी  - असर माने ?

बुतरू                      -  यानी कि प्रभाव , धाक । हमारा प्रभाव दूसरों पर पड़ना कितना जरूरी है ? 

भगत जी  - प्रभाव का तो ऐसा है कि अगर तुमने ऐसा कुछ किया कि औरों के लिए  प्रेरणा का कारण बने तो अपने आप तुम्हारा प्रभाव बढ़ने लगेगा ।

बुतरू                      - और अगर धाक जमा ली जाए तो प्रेरणा अपने आप जग जाएगीआजकल तो तरह- तरह के उसूलों की बात की जा रही है । हर जगह मैनेजमेंट के फंडे लगाए जा रहे हैं। उसी से सब ठीक करने की बात हो रही है ।

भगत जी  - देखो बाज़ार है तो उसूल हैं । बाज़ार के लिए उसूल हैंउसूलों का बाज़ार है । और सारे फंडे मालिक की सत्ता की स्थापना के लिए हैं । और मालिक का मालिक बाज़ार है ।

ऐसा करता हूँ एक कथा सुनाता हूँ – 

 

डॉन की मर्यादा

 

डॉन ने उसको गोली मार दी ।

खबर है , उसके जूते पसंद नहीं आए इसलिए ।

खबरें और भी हैं । खबरों का बाज़ार गर्म है ।

खबर है कि किसी को भी मारना थासो इसी को मार दिया । मकसद तो था सबों को चेता देना कि पूरे खेल का सूत्रधार कौन है !  और यह भी कि न चेते तो हश्र क्या होगा !

एक खबर यह भी आ रही है कि डॉन को उसके जूते की हील में कुछ खास जानकारियों वाले पुर्जे मिले जिन्हें वो दुश्मन खेमे को देने जा रहा था । दुश्मन खेमा उन्हीं पुर्जों के आधार पर बाज़ी मार लेता । मार्केट लीडर हो जाता । डॉन को यह जानकारी किसने दीयह एक राज़ है। यह भी कहा जा रहा है कि डॉन ने ही उसको खुफिया तरीके से काम करने की “मॉक ड्रिल” करने को कहा था और बाद में उसी आधार पर उसे सज़ा दे दी । आदेश मौखिक था , अनुपालन लिखित दस्तावेज के साथ हो रहा था । सबूत खिलाफ हो गए । जानलेवा । कहा यह भी जा रहा है कि डॉन ने ही पुर्जे प्लांटकरवाए थे ।

खबर यह भी है कि घर और दफ्तर दोनों को लेकर वह स्ट्रेस में था । डॉन के फोन घर तक आते थे ; घर के ताने दफ्तर तक । हार्ट फेल कर गया !

एक यह खबर थोड़ी दिलचस्प है । उसकी अंतरात्मा जाग गई थी । उसे ‘व्हिसल ब्लो’ करना था । उसे देश को बचाना था । उसे सत्य को बचाना थाजगाना था । इसीलिए वह गुप-चुप काम कर रहा था । अफसोसअंतरात्मा तो जाग गई , वो खुद सो गया ।

एक और दिलचस्प खबर है । बच्चों के कहे में आ गया था । बच्चों के मनोरंजन के लिए फैशनेबल जासूसी जूते बनवा लिए । और उसमें रख दिए थे कुछ पुर्जे जिन्हें खोजने पर मिलने वाला था ईनाम । पर कभी-कभी खिलौनों से भी लोग डर जाते हैं । शायद डॉन भी ।

खैर अभी तो उसे डॉन के कमरे से हटाए जाने का बदोबस्त हो रहा है । तफ्तीश जब होगी , तब होगी ।

डॉन ने वहाँ खड़े लोगों को देखा । गौर से देखा । फिर समझाते हुए कहा कि जान जाने का दुख तो है पर जान के जाने से समय नहीं रुकता , संस्था नहीं बैठती , व्यवस्था नहीं बदलती । सोकागज़ाती कार्यवाही दुरूस्त की जाए । “एण्ड बिज़नेस ऐज़ यूज़ुअल” ।


बुतरू       - क्या डॉन को कुछ महसूस नहीं होतावो भी तो इंसान है ।

 भगत जी  - तुमने शायद गौर नहीं किया , व्यवस्था नहीं बदलती । व्यवस्था है कुर्सी । दिलजान और मिजाज कुर्सी के होते हैं । डॉन तो पद्‍वी है। मर्जी तो कुर्सी की चलनी है । अगर खुद की चलने लगे तो डॉन भी ‘वो’ हो जाए ।

 बुतरू       - लेकिन इस पूरे मामले में सच क्या था ?

 भगत जी  - वो तो अब किसी को पता नहीं चल पाएगा । वैसे भी सच कैसाकहाँ और कितना निकलता है उस पर निर्भर करता है बहुत कुछ । फिर सबको अपनी  खाल भी बचानी होती हैजान तो बहुत आगे की चीज़ है । इसीलिए जो हुआ  सो हुआ । भूल जाओ । भूलो न भी तो ज़िक्र न करोकम-से-कम खुलेआम ।

 बुतरू       - ओ...। पर फिर आगे क्या हुआ ?

 भगत जी  - हुआ क्या । डॉन ने टाई की गाँठ ठीक की । हैंगर से कोट उठाया और निकल  गया एक बहुत ज़रूरी मीटिंग के लिए ।

 किस्सा खतम ।


नीलकंठ की दुविधा [ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]

 

नीलकंठ की दुविधा 

[ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]

 

बुतरू                      भगत जी , आस्था क्या है और यह मनुष्य के लिए क्यों जरूरी है ?

भगत जी  - आस्था यानी विश्‍वास , भरोसा । आस्था बची रहे तो मनुष्य आशावान बना      रहता है ।

बुतरू                      - और आशावान बने रहना जीवन के लिए नितांत आवश्यक है ?

भगत जी  - ठीक ।

बुतरू                      - तभी इतने सारे देवी देवता हैं ।

भगत जी  - लेकिन तब भी तो आशा का घोर अभाव है ।

बुतरू                      - सो तो है । लेकिन फिर भी तो हम लगे रहते हैं वंदन-पूजन में । अवतारों को मानते हैं । अवतार का इंतजार करते हैं। कोई मिले तो उसी में सारी आस्था उड़ेल दें और निश्‍चिंत हो जाएँ ।

भगत जी  - लगता है तुममें कुछ संशय है । संशय भरोसे को डिगा देता है भाई । यहाँ तक कि अवतारों का भी ।

बुतरू                      - कैसे ?

भगत जी  - चलो एक कथा सुनाता हूँ –

 

 

नीलकंठ की दुविधा

 

बहुत समय की बात है ।

चारों तरफ अविश्‍वास का माहौल था । सारी की सारी व्यवस्था चरमराती हुई दिख रही थी ।

जैसे किसी चौकी के चारों पाए तो हिल रहे ही हों मच्- मच्साथ में पटरियाँ भी खट्‍-खट्‍ बज रही हों ।

लोगों का काम कहीं बनता नहीं था । किसी से बनता नहीं था । यहाँ तक कि कुछ ले-दे कर भी नहीं बनता था । तब लोगों को लगने लगा कि अब रसातल आ गया है । अब अवतार का आविर्भाव होगा ही होगा । लोगों ने बहुत सारे अवतारों के बारे में सुना था । धीरे- धीरे यह धारणा घर करती जा रही थी कि कोई नीलकंठ ही तार सकता है । गरल को गले से उतार करपचा कर । गरल माने गंदी मानसिकता । गलीज़ । और उसके बाद सुधा बरसा दे । शीतलमद्धम ,संकटहरण ।

इस तरह की उम्मीदें लहरों की तरह आती हैं,कभी एकदम ऊपरकभी एकदम नीचे । तब ऐसे ही क्रम में कई- कई जगहों से नीलकंठ के अवतरित होने की खबरें पुष्‍ट होतीं और उतनी ही ही तेज़ी से खण्डित भी । तरह-तरह के नीलकंठ घोषित होते । उनके चमत्कार उछल कर सामने आते । लेकिन धीरे- धीरे उनके स्वार्थ का रंग उनके कंठ के रंग को हर लेता । एक बार ऐसे ही एक नीलकंठ का हल्ला उठा । खबर फैलाई गई कि व्यवस्था भ्रष्‍ट हो कर सड़ चुकी है ।व्यवस्था को बदलना होगा । जनता तो बेचारी , महिमा की मारी होती है । बिछ गई सिद्धांतों की कालीन पर । नीलकंठ ने घोषणा की - भ्रष्‍ट व्यवस्था-रूपी गरल को वे व्यवस्था के अंदर घुस कर पियेंगे और जनता का कल्याण कर के ही दम लेंगे । लेकिन भाई साहब निकले कालिदासउसी डाल को काट बैठे जिस पर टिके थे । जिस पर उम्मीदों के फल-फूल थे । जिसपर जनता भी आस लगाए बैठी थी । और उन नीलकंठ को बिना बोले ही शास्त्रार्थ में विजयी होने का कोई अवसर नहीं मिला । जनता के हाथ फिर लड्‍डू यानी कि जीरो ।

 ऐसे ही बहुत बरस बीते । जनता ऊभ-चूभ करती रही ।

लेकिन जनता होती है भीषण आशावादी । वह मानती है कि एकदम नीचे पहुँच कर ही फिर ऊपर उठा जाता है । सघनतम तम के बाद ही सवेरे की शुरुआत होती है । नीचे से नीचे पहुँचने के बाद सिवा उठने के कोई विकल्प नहीं रहता है ।

ऐसे ही दिनों में एक बार फिर से नीलकंठ के आगमन की सुगबुगाहट हुई । जनता जब सर्वाधिक त्रस्त और पस्त होती है उसी समय उसके सर्वाधिक आस्तिकआस्थावान हो जाने की भी संभावना रहती है । इस बार व्यवस्था के अंदर जाने की बजाय वैकल्पिक व्यवस्था की आशा परोसी गई । जनता ने ज़ोरों की भूख के समय गरम-गरम खाने की तरह उसका स्वागत किया ।

नीलकंठ यानी अपने समय का हीरो । हीरो यानी बलिष्‍ठ हो। कर्मठ हो। सुदर्शन हो । वाक्पटु हो । वो था । किसी ने कहा है – “कितने दिनों के प्यासे होंगे , यारों सोचो तो / शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है” । बस क्या था किसी ने बताया , मान लिया । किसी ने दिखायादेख लिया । किसी ने सुझाया ,समझ लिया । नीलकंठ आ गए । जैसे भीड़ में किसी एक ने भी ताली बजा दी तो फिर ताली गड़गड़ा जाती है , वैसे ही किसी एक के सिर नवाने की देर है ,भक्ति तो पैदा हो ही जाती है ।

एक बात का और ध्यान रखा गया । हीरो नाटकीयता रहित हो तो हीरो नहीं होता । “लार्जर दैन लाईफ़” तो होना ही चाहिए । डॉयलॉग मारने आना चाहिए ।

तो नीलकंठ उभरे और उभर कर छा गए । जनता नतमस्तक । जनता उम्मीद में कि अबकी नहीं तो कभी नहीं । उम्मीदोंआशाओं ने दसों दिशाओं को चमका दिया ।

नीलकंठ अचंभित । आशातीत सफलता , बल्कि आकस्मिक सफलता । यह पता ही नहीं चल रहा था कि यह त्रस्त होने की स्थिति से भागने का परिणाम था या आशाओं का खिंचाव । असल में त्रस्त होकर आदमी जितनी ज़ोर से भागता है , आशाओं के पीछे उतने वेग से नहीं दौड़ लगाता । पलायन शायद आदमी का स्वाभाविक गुण है ।

खैर ।

अब नीलकंठ आ चुके थे । उन्होंने छोटी-छोटी बातों का खयाल रखना भी शुरु किया । मनभावन संवाद करने-कहने शुरु किए । लगा कोई घर का ही आदमी बात कर रहा है । लेकिन ज्यों-ज्यों दिन बीतते थे , नीलकंठ को जिम्मेदारियों की विशालता और फैलाव का आभास होता जा रहा था । लेकिन एक होते हैं नीलकंठएक होते हैं उनके निर्माता-निर्देशक । जैसा दिखाया , दिखना है । जैसा पढ़ाया , कहना है ।

जनता तो जनता होती है । उसका काम जानने का नहीं मानने का होता है । और मन को मनाने का , मारने का ।

नीलकंठ जो बताते रहेजनता मानती रही । नीलकंठ के चेहरे से करुणा टपकती रही , बातों से चिंता झरती रही । जनता पलती रही । नीलकंठ को पता चल गया थासॉफ़्टी के ऊपर की सिर्फ चेरी बदल दीजिए सॉफ़्टी नई लगेगी । आइसक्रीम और उसका बिस्किट-कोन भले ही वही रहे । देखना बस इतना भर था कि चेरी किस साईज़ और कलर की लगाना है ! नीलकंठ उसी में निमग्न रहते । परम्यूटेशन- कॉम्बिनेशन में व्यस्त रहते । उलझे रहते । कैसी चेरी रखूँ , कोन छोटा कर दूँबड़ा कर दूँ । इधर का हिस्सा उधर कर दूँइस तरह से कि कतई पक्षपात न लगे।

जनता भी विस्मित । कभी- कभी अपनी भूल और दशा पर सिर्फ विस्मित ही हुआ जा सकता है । बार- बार अंतत: एक ही परिणाम , एक जैसी ही निराशा से थक चुकी थी जनता । बल्कि इस पूरे नीलकंठ के व्यापार से ही ऊब चुकी थी । परंतु ....। आवलंबन के लिए कुछ तो चाहिए ना ? स्वालंवी भी तभी हों जब कोई अवलंब हो !

तो एक नीलकंठ तो चाहिए ही ।

लेकिन नीलकंठ भी भरोसे के नहीं रहे ।

दरअसल समस्याओं का समुद्र बहुत गहरा हो तो अतल गहराइयों को हिलाने के लिए बहुत दम चाहिए । और ऊपर के पानी को हिलाने से चेहरा बदल सकता है चरित्र नहीं । वैसे भी देश “ पर उपदेश कुशल बहुतेरे” वाला देश है । जनता उँगली तो दिखा सकती है , लेकिन हाथ बँटाने में कष्‍ट है ।

जनता चाहती है जुआ हमेशा दूसरों के कंधों पर ही रहे । सो एक बलिष्ठ कंधा ढूँढते रहती है। और नीलकंठ उभरते रहते हैं ।

तो जनता फिर भरोसे का नीलकंठ ढूँढ रही थी । इसको कि उसको । अभी कि बाद में । कुछ दिनों के लिए किसी को पद सौंपा जाए । जनता यानी जो अपना हित जरूर जानती हो और उसे साधती हो । जो हित के अर्थ ही नहीं जनते वो तो दायरे से बाहर ही रहेंगे , उनकी पहुँच से चीजें बाहर ही रहेंगी ।

इधर जो नीलकंठ बनेंउनको भी ध्यान रखना होता था कि संतुलन ऐसा बनाया जाए कि हितों की बात तो हो लेकिन ज्यादा दूर तक पहुंचाने की कोशिश न हो । गगनभेदी घोषणाएँ तो होंधरातल पर के काम में बहुत फर्क न पड़े ।...

 समय की नदी बहती जाती थी । है । रहेगी ।

 

बुतरू   - इसमें दुविधा तो किसी की नहीं लग रही ?

 भगत जी – तुम शायद ‘एक्टिविस्ट’ की भाँति सोच रहे हो !!


राजा की सवारी [ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]

 

राजा की सवारी

[ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ] 

भगत जी – राजा कौन होता है ?

बुतरू – जो राज करेसबसे बड़ा आदमी ।

भगत जी – राजा की पहचान क्या है ?

बुतरू – राजा की पहचान अपने-आप नहीं होती हैउसके साथ चलने वाले लोगों के क्रिया-कलाप यह तय कर देते हैं कि वो राजा है ।

भगत जी – बहुत अच्छे । राजा का व्यवहार कैसा होना चाहिए ?

बुतरू – जो सभी की भलाई करने वाला हो ।

भगत जी – भलाई किसे कहते हैं ?

बुतरू चुप ।

भगत जी – अच्छा , राजा को क्या ज़ाहिर होने देना चाहिए और क्या नहीं ?

बुतरू – महाराज आप ही बताएँ।

भगत जी – अच्छा सुनो,  एक कथा सुनाता हूँ :-

 

 

राजा की सवारी

 

एक बार की बात है । सूबों में यह खबर फैल गई थी कि राजा दौरे पर आने वाले हैं । यह सूचना आधिकारिक नहीं थीलीक कर दी गई थी । लीक हुई खबर का फायदा है कि सबको सावधान भी कर दिया कि होशियार ! और यह भी कि चूँकि आधिकारिक तौर पर नहीं बताया गया हैतो सारी व्यवस्था को सामान्य परिस्थितियों में किया जाने वाला व्यापार-व्यवहार मान लेने में राजा को दुविधा नहीं होती है । बल्कि सुविधा होती है ।

तो राजा आ रहे हैंयह सबको अनाधिकारिक रूप से पता हो गया । मुख्य मार्गों और उप- मार्गों की मरम्मत होने लगी । इस तरह की मरम्मत की यह खासियत होती है कि मरम्मत इतनी ही की जाती है कि दो-चार महीने में फिर किसी का दौरा हो तो फिर से मरम्मत की गुंजाइश बनी रहे । रोज़गार की उपलब्धता भी तो शासन की जिम्मेवारी है । कार्यालयों की इमारतों की पुताई होने लगी ।पर्दे बदलाने लगे। गमलेऔर गमलों में फूल-पौधे दिखने लगे ।

सूबों के मुख्यालयों से कुछ अधिकारीगण उन रास्तों पर दौरे की एक ‘ड्रिल’ के लिए निकल पड़े। उनका काम मुखबीरों की तरह सूचनाएँ इकठ्ठी कर के सूबों के प्रमुखों तक पहुँचाना था । और इन सब बातों की नोटिंग करते जाना था कि राजा रुकेंगे कहाँखाएँगे क्यापिएँगे क्यामिलेंगे किससेआदि-इत्यादि ।

अच्छाजब राजा आने वाले हैं तो कुछ न कुछ तो खास होना ही चाहिए । कोई न कोई तो अनुगृहीत होना ही चाहिए । और राजा तो राजधानी से आ रहे हैं। बड़े शहर के बड़े आदमी । ऐसे लोग अगर किसी सुदूरछोटी-सी जगह पर किसी छोटे आदमी को उपकृत करें तो बड़ा पुण्य होता है । “लिटरली एण्ड फिगरेटिवली बोथ” !

तो तय हुआ कि एक छोटे से कार्यालय का उद्‍घाटन राजा के करकमलों से कराया जाएगा । छोटी चीज़ों को सुंदर बनाने-दिखाने में आसानी होती है । रंग-रोगनटेबुल-कुर्सीपर्दे-वर्देआदि-इत्यादि सब टॉप क्लास ! फीता काटने के लिए चाँदी की कैंची और कैंची रखने के लिए चाँदी की तश्तरी । और यह उद्‍घाटन के समय बता दिया जाएगा कि तश्तरी और कैंची तो दुबारा उपयोग में लाई नहीं जा सकती , सो राजा उसका भी भार उठा ले जाएँगे । इसमें चूक न होराजा के वाहन में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करना पी.ए की ड्‍यूटी होती है ।

राजा आएँगे तो उनका भ्रमण किस वाहन से होगा ? सूबे के प्रमुख परेशान ।प्रमुख परेशान तो मातहत हल्कान ! सूबे के भ्रमण से सूबे के प्रमुख की साख का भी पता चलना था ।एक चहेते मातहत ने - जो अगर आप खुद नहीं हों तो जिसे आप चापलूस कहेंगे - उसने सुझाव दिया कि सात घोड़ों का रथ तैयार किया जाए । घोड़े काबुल से मंगाए जाएँ ।

किसी ने आपत्ति की – खर्च ज्यादा होगा । अनावश्यक । सूबे में उपलब्ध घोड़े भी उत्तम क्वालिटी के हैं ।

चहेते ने कहा – राजा आ रहे हैं भाई । यह हमारे लिए गर्व की बात होनी चाहिए , और साफ दिखनी भी चाहिए । फिर बगल वाले सूबे के भ्रमण के समय एक घोड़ा बाहर से आया था । हमको तो उससे बेहतर करना ही करना है ।

सूबे का प्रमुख जो अपने चहेते की तरह ही राजा के चहेतों की सूची में आना चहता थाभला कैसे न समझता , कैसे न मानता !

उधर जो राजा के सचिवगण थे उनको भी कुछ फिक्र करनी थी । बताने को राजा कीसमझने को खुद की । उन्होंने खबर भेजवाई – राजा सिर्फ और सिर्फ गंगोत्री का जल ग्रहण करते हैं।  किसी ने कहा -इस मैदानी जगह पर गंगोत्री का पानी – असंभवप्राय । पर चहेते साहब तो तैयार बैठे थे । कहा – असंभव कुछ नहीं होता है भाई । गंगोत्री का जल ही तो चाहिए न । अरे एक पलटन आगे बढ़ेगी पानी के परात-मर्तबान ले कर । और पानी गंगोत्री का है तो खराब भी नहीं होगा ।राजा साहब की आदतें आवश्यकता होती हैं । और इशारे आदेश । तो गंगोत्री का पानी फाइनल ।

स्वागत के लिए फूल आदि का इंतज़ाम तो खैर बिना किसी के बोले ही होता है । सूबे की खास कला का प्रदर्शन भी बेहद जरूरी होता है । कलाओं का पता लगाया गयाकलाकारों को ढूँढा गया । पुख्ता व्यवस्था की गई कि उद्‍घाटन के दिन सभी उपस्थित रहें । कला प्रदर्शन के साथ स्वागतार्थ । तश्तरी- कैंची पेश करने के लिए कार्यालय से कन्याराशि कर्मचारी को खोजा गया । ऐसा मानना है कि कन्या लक्ष्मी का रूप होती हैलक्ष्मी शुभ करती हैं । वैसे कोई चाहे तो उनमें मेनका भी ढूँढ ले सकता है, ये और बात है । खैर,  ताकीद की गई कि पारंपरिक पोशाक में स्वागत करना है । परंपरा अनुशासन दर्शाती है जिससे प्रतिष्ठा बनी-बची रहती है ।

 ऐसे ही करते-कराते नियत दिन और समय आ पहुँचा ।

 सूबे के सबसे बड़ेउनसे छोटेफिर उनसे छोटे ...करते-करते सबसे छोटे अधिकारी भी पूरी सज-धज के साथ उपस्थित । मुख्यालय से उद‍घाटन वाले कार्यालय के लिए राजा के आगमन की सूचना देने के लिए यह व्यवस्था की गई थी कि हर पाँच मिनट पर एक घुड़सवार अद्यतन सूचना ले कर कार्यालय की ओर रवाना होगा । कबूतरों का भरोसा नहीं रहा है , पहुँचे न पहुँचे। राजा का समय बेशकीमती होता है । इंतज़ाम ऐसा रखना है कि सवारी पहुंचे नहीं कि कलाकारों की प्रदर्शनी शुरु हो जाए । प्रदर्शनी थमे नहीं कि तश्तरी-कैंची पेश हो जाए । कैंची पेश हो नहीं कि उद्‍घाटन संपन्न हो जाए । फिर राजा के आशीर्वचन। और फिर वापसी ।

किसी जिज्ञासु के मन में यह प्रश्‍न आ सकता है कि क्षण भर के आयोजन के लिए सहस्त्र- लक्ष खर्चने की क्या आवश्यकता थीऔर राजा की इतनी ही इच्छा थी तो बिना ताम-झाम के भी तो निभ सकता था । उनको यह पता नहीं कि राजा अकेले कुछ नहीं होता । राजा व्यक्‍ति  नहीं , व्यवस्था होता है । व्यवस्था के जड़त्व और संवेग का अपना ही हिसाब-किताब होता है । तो बात यह थी कि राजा को आना था ।व्यवस्था यह है कि व्यवस्था चाक-चौबंद होनी है ।

राजा पधारे । कला का आस्वादन किया । तश्तरी- कैंची से उद्‍घाटन किया । बाद में तश्तरी-कैंची राजा की सवारी में पहुँच गईं । राजा ने आशीर्वचन कहे ।

 

इन सब के बीच मंच के सामने भीड़ में पीछे दो जन यह बात कर रहे थे –

यारजिले का हाकिम नहीं आया ?

आया तो । इन राजा ने प्रतीक्षा नहीं की । कार्यक्रम कर लिया ।

ऐसी भी क्या जल्दी थी ?

राजा हैउनका समय बहुमूल्य होता है ।

राजा हैं तो जिले का हाकिम पहले से क्यों नहीं पहुंचा ?

पीछे से किसी ने टिप्पणी की – अरे भाई , राजा इस कार्यालय के लिए हैं ! इनके सबसे बड़े से बड़े हाकिम हैं ।

तो फिर राजा कैसे हुए ?

ताँगे के घोड़े को कोचवान ही राजा लगता है !!

इसी बीच राजा ने हाकिम के तेवर भाँप , पूरे उद्‍घाटन का रि-प्ले कर दिया हाकिम के कर-कमलों से अपने कर-कमलों को जोड़ कर ।

राजा राजा बन ही चुका था । हाकिम भी हाकिम रह गया ।

मातहतों का धर्म निभ गया ।

व्यवस्था की साख रह गई ।

विन-विन सिचुएशन फॉर ऑल’ !

 

बुतरू – यह तो इंडिया दैट इज़ भारत ही है न ?

 भगत जी – अब यह तो तुम जानो ।


आत्म-ग्लानि की खुराक [ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]



आत्म-ग्लानि की खुराक

[ भगत – बुतरू संवाद.1.0 ]

भगत जी – आदर्श व्यवहार किसे कहते हैं ?

बुतरू – जब कोई बात सही-सही, नियमों के अनुसार और स्वेच्छा से की जाए तो उसे आदर्श व्यवहार कहते हैं ।

भगत जी – फिर क्या है जो आदर्श नहीं है?

बुतरू – जो सही हो उसे न करना, नियमों का पालन न करना और इच्छा के विरुद्ध करना ।

भगत जी ‌- और अगर सब सही की परिभाषा के अंतर्गत हो, बने हुए नियमों के अनुसार हो, स्वेच्छा से हो तो ?

बुतरू – आप ही प्रकाश डालें महाराज ।

भगत जी – अच्छा , भ्रष्टाचार क्या है ?

बुतरू – भ्रष्ट आचरण ; लोक मर्यादा के विपरीत काम ।

भगत जी – यह तय कैसे हो कि आचरण भ्रष्ट है ?

बुतरू – इससे करने वाले का प्रत्यक्ष स्वार्थ सिद्ध होता हुआ दिखे ।

भगत जी – और अगर ऐसा न हो तो !

बुतरू— मैं समर्पण करता हूँ, आप ही बताएँ ।

भगत जी – अच्छायह कथा सुनो पहले  :-

 

आत्म-ग्लानि की ख़ुराक

 

एक समय एक देश में ।

             वो उपस्थित हुआ था अपनी आत्म-ग्लानि की खुराक लेने । मस्तक नत । नत मस्तक यानी विनम्रता । और फिर निरीहता के रास्ते आत्म-ग्लानि तक। आत्म-ग्लानि की खुराक हर व्यक्‍ति के लिए अनिवार्य कर दी गई थीजैसे पोलियो की खुराक । एक बार खुराक ले लेने के बाद कुछ समय तक आदमी बिल्कुल लीक पर चलता हैअसेम्बली लाईन की तरह । और भय का साया ओढ़े रहता है, जो कि शासन के निरंकुश बने रहने के लिए मुफ़ीद है । शासन का निरंकुश होना ज़रूरी होता है । नियमों का निर्धारण एवं उनका त्रुटि-रहित अनुपालन शासन की रीढ़ को मजबूत रखता है । यह बात दीगर है कि उससे भले कितनों की रीढ़ झुक जाएटूट जाए । टूटी रीढ़ों का अपने आप में भले ही महत्व न होसमग्र रूप में ऐसी ही रीढ़ें शासन को मजबूती प्रदान करती हैं ।

इस बार खुराक लेने में उसे थोड़ी देर हो गई थी । उसकी रीढ़ थोड़ी सीधी होने लगी थी । उसे लीक के बाहर भी दिखने लगा था । उसे पर्दे के पीछे की बातें और दस्तखत के आगे के परिणाम समझ आने लगे थे । वो तो संयोगवश खुराक देने वाले को उसके चाल-चलन पर संदेह हुआ और उसने खुराक देने के लिए उसे बुला लिया । डिस्पेंसरी में बैठे‌- बैठे अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए वह कुछ अनर्गल एकालाप करने लग पड़ा था :-

  “बताइए साहब ! यह भी कोई बात हुई । कहते हैंझुके रहो । क्यों भाईहम सब अपनी-अपनी क्षमता और अवसर के हिसाब से काम करते हैं तो फिर क्या झुकना और क्यों ? कहते हैं शिष्टाचार बरतोहाल पूछो,दुआ-सलाम करते रहो । और एकतरफा करते रहो । कहते हैं सही बात भी मौका देख करमिजाज भाँप कर सामने रखो ।कहते हैं आम जन की चीजें खासमखास लोगों तक पहुँच कर कृतकार्य होतीं हैं । कहते हैं सदाचार हाकिमों को प्रसन्न करने के लिए किया गया व्यवहार-व्यापार है|

 डिस्पेंसरी के लोगों को कुछ भय हुआ । उन्होंने आपस में मशविरा किया और उसको खुराक लाईन तोड़ कर पहले दे दी गई ।

जब वो खुराक ले कर ‘कूलिंग पीरियड’ के बाद निकला तो वो एकदम सामान्य खुराकज़दा आदमी था और उसके विचार ‘कस्टमाइज़्ड’ हो चुके थे :-

  “झुके रहना ही तो असली फितरत है । झुके अगर नहीं रहोगे तो बड़ा कौन हैकैसे पता चलेगा ? बड़ा लगने देना बहुत बड़ी बात है । दुआ-सलाम नहीं करोगे तो आशीर्वाद कैसे मिलेगाकृपापात्र कैसे बनोगे ? और सच क्या है – विशेष परिस्थिति मेंविशेष लोगों द्वाराकार्य-विशेष के लिए प्रस्तुत तथ्य-विशेष ; और इसके लिए मिजाज भाँपा नहीं तो ‘विशेष’ क्या बचा ? और खासमखास क्या होता है ? अरे जो प्रस्तुत किया जा रहा है उसको चख कर देखेगा तो कोई ! शबरी को भूल गएसदाचार क्या हैआदर्श परिस्थितियों में आदर्श जन द्वारा किया गया आदर्श व्यवहार । और सबसे बड़ा आदर्श – हाकिम !”

 बुतरू – अच्छा , यह तो बताएँ कि यह देश कौन और यह समय कबका है?

 भगत जी – यह तो तुम बताओ !