बुधवार, 6 नवंबर 2024

‘मैं में हम—हम में मैं’: निजी का लोक, लोक का निजी

 

‘मैं में हम—हम में मैं’: निजी का लोक, लोक का निजी

( एक निजी व्याख्या )

 

कहा जाता है कि कवि/लेखक परकाया-प्रवेश करता है । लोक की बात को ‘अपना’ बनाता है, फिर उस ‘अपनी’ बात को लोक को लौटा देता है । जैसा लेखक करता है, पाठक भी दूसरी तरफ से वैसा ही करता है, बशर्ते रचना दमदार हो, -- पाठक कविता में प्रवेश कर जाता है, ‘अपना’ कुछ उस कविता में मिलाता है, और उस ‘अपने’ का विस्तार कर लोक में तब्दील हो जाता है ।

यह जो कविता है ‘मैं में हम—हम में मैं’  कितना अपना बना लेती है, कितनी अपनी है, क्या बताएँ ! जी हाँ, बताऊँ नहीं, बताएँ ! यदि आप बिहार या यू.पी से हैं, यदि आप पढ़ाई-लिखाई में ठीक रहे हों ( या न भी रहे हों) और यदि आप उस दौर के हैं जब यूपीएससी की तैयारी करना राष्ट्रीय धर्म से कम नहीं था, या अभी भी जिनके लिए एक नौकरी पा लेने का मतलब लाइफ सेट हो जाना है, यानी यदि आप हमारे जैसे हैं —तो यह हो ही नहीं सकता कि यह कविता आपको गिरफ्त में नहीं ले ।  

       “ कहता है – ‘हम आए हैं ।’

      हम यानी ‘मैं के साथ ढेर सारा ‘मैं’ !”

 बिहार में और यूपी के ज्यादातर हिस्सों में ‘हम’ का मतलब ‘मैं’ होता है । या फिर राजकुमार के फिल्मी डायलॉग में !

चौबीस पृष्‍ठों और छह खंडों में फैली हुई  कवि निशान्‍त की यह कविता ( जो 2012 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित संग्रह ‘जी हाँ, लिख रहा हूँ...’ से है ) हमारी कहानी है । हमारे जीवन का ‘खण्ड-काव्य’। हमारी यानी ‘मैं’ के साथ ढेर सारी ‘मैं’ की । हम जो बिहार जैसे पिछड़े राज्य के रहने वाले हैं ( संजीव सान्याल, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य, के हालिया शोध-पत्र के अनुसार भारत की जीडीपी में बिहार की हिस्सेदारी 2000-01 में मात्र 4.3% की है, जबकि इसमें झारखंड के आँकड़े भी शामिल हैं । बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का बमुश्किल 33% है )। ‘बीमारु (BIMARU)’ राज्यों के बारे में भला किसने नहीं सुना होगा !

सेशन के बार-बार पिछड़ने के बाद बी.ए., एम.ए. की डिग्री लेकर जीवन का जो ध्येय बचता है, वह है एक अदद नौकरी पा लेने का । सरकारी नौकरी । और यूपीएससी यानी कि आइएएस या आइपीएस नहीं हो अगर, तो फिर कहाँ से शुरुआत हो ! बताया था न, यह मान लिया गया है कि पढ़ाई-लिखाई में ठीक रहे हैं ‘हम’ –

       “ ‘चार स्वर्ण अक्षरों’ को रटता हुआ

       हाथों में ‘स्पाइरिल बाइंडिंग’ की कॉपी पकड़े

       आँखों में मसूरी के सपने पाले

       सीने में नीली बत्ती की ख्वाहिश दबाए”

 बत्ती लाल या पीली भी हुआ करती थी । मन ‘वैशाली’ कॉपी के पन्नों तक भी चला जाता है । पन्ने ऐसे हुआ करते थे कि स्याही से लिखो तो पीछे भी अक्षर उग आएँ ।

कविता की शुरु की पंक्तियों में ही एक नाम आता है–“ जैसे एक बलराम तिवारी हैं पटनावाले ।” बलराम तिवारी यानी यूपीएससी का हिन्‍दी ऑप्शनल । यानी ‘मेन्‍स’ तक तो आप पहुँच ही गए ! और पटना यानी ? ग़ालिब ने कहा है –

 “ कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं

  इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाय हाय”

 बस आप ऊपर कलकत्ता की जगह पटना कर दीजिए, बात मेरी हो जाएगी । हर किसी के लिए कोई न कोई शहर, कोई न कोई कस्बा या कोई न कोई गाँव ऐसा होता है जो अस्थि-मज्जा-रक्त बन कर वजूद का हिस्सा बन जाता है । कभी- कभी एक से ज्यादा शहर भी हो सकते हैं । ‘मगध एक्प्रेस’ और ‘श्रमजीवी एक्प्रेस’ कितने ही सपनों को पटना से दिल्ली लेकर आती थी ! दिल्ली में ‘नॉर्थ कैम्पस’ के आसपास का इलाका इन्हीं सपनों को पूरा करने के हौसले से स्पंदित है । इन इलाकों का सिरमौर – मुखर्जी नगर । मुखर्जी नगर, जहाँ –

                   “ समय दौड़ता है

                    चलता है  

                    बदलता है

                  और ‘कुछ’ भी बदलकर

                  ‘कुछ’ भी हो सकता है” ।

 मुखर्जी नगर में सबका स्वागत है । ‘हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं/ रंग रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं” गीत की तर्ज पर । वह जो पटना से चलकर मुखर्जी नगर पहुँचा है लड़का, वह एकदम ‘कच्चा माल’ (raw) है । अभी यू ट्यूब पर मनोज बाजपेयी की एक पुरानी टेली फिल्म दिखाई जा रही है ‘सुनो रे किस्सा’ । इसमें मनोज बाजपेयी को देखिए, उनके ‘लुक’ को देखिए, ‘कच्चा माल’ कहने से तात्पर्य वैसे ही लुक का है ।  

कविता में जैसे लड़कों की बातें हो रही हैं, वे हिंदी मीडियम वाले हैं । इनमें से कुछ लोगों को यह भी लगता है कि बस बोलने में मामला थोड़ा गड़बड़ है, लिखने में तो अंग्रेजी भी दुरुस्त है । बहरहाल, बिहार जैसे ‘उर्वर प्रदेश’ से आए लड़के का कवि होना अस्वाभाविक तो नहीं ही है। लेकिन बात यह है कि पैठने कौन दे ‘कविता की देहरी’ के अंदर ? ‘घर के मालिक’ तो जमे-जमाए कवि-आलोचकगण हैं – “होत न आज्ञा बिनु पैसारे” । किस-किस के पाँव पखारे जाएँ ? अभी तो कवि सिर्फ कवि ही है ( वह भी सिर्फ अपने मानते), उसपर बेरोजगार और कमजोर भी। कोई न निरबल सहाय ।

मुझ जैसे लोगों के लिए सिनेमा बहुत बड़ा आकर्षण है । बल भी, ‘एस्केप’ भी । सिनेमा हॉल, मल्टीप्लेक्स नहीं, हमारी चेतना का ही एक्स्टेंडेड भाग हैं । मुखर्जी नगर में बत्रा है । सुख-दुख का साथी । वहीं बत्रा पर ‘छोटू’ होता है । हमारे साथ-साथ ही बड़ा होता, लेकिन हमारे जैसों कितनों के आते-जाते हुए वह छोटू ही बना रहता । हमारे वजूद को टटोलता, हमारे दिलों को कई-कई बार टूटने से बचाता ।

हमने पचास पैसे की नहीं भी तो, दो रुपए की तो चाय जरूर पी है । और बत्रा ही क्यों, पटना के श्रीकृष्णा नगर में, स्टेट बैंक के सामने लगने वाले ठेले पर भी । मोटे-गोल बिस्कुट के साथ । हम तो अलग से पहचान में आने के लिए ही बने थे शायद –

       “ हम अलग से पहचान में आ जाते बत्रा पर

        हिन्‍दी के विस्थापन के इस युग में”

और बाद के वर्षों में जब यूपीएससी नहीं तो उसके नीचे, फिर उसके नीचे, फिर उसके भी नीचे यानी जहाँ कहीं भी संभव हो सके, एक नौकरी पकड़ कर पदों पर आरूढ़ और जीवन-पथ में रूढ़ हो चुके हमलोग, लाख मुलम्मों के बावाजूद, अंदर से वही बचते हैं , दो रुपए की चाय और मोटे-गोल बिस्कुट खाने वाले । हमारी जिंदगी में नौकरी ही जिंदगी का अक्ष हो जाती है ।हम उस मनपसंद नौकरी के इंतजार में खड़े छोटी-मोटी बातों पर भी खुश होते, औरों की सफलताओं के किस्से सुनते-सुनाते रहते हैं। ‘सीएसआर’ ( Competition Success Review) के मुखपृष्‍ठ पर अपने ही राज्य के किसी यूपीएससी टॉपर का चित्र देखकर, और अंदर उसका इंटरव्यू पढ़कर रोमांचित हो उठते हैं। मन ही मन कहते –“ नथिंग इज़ इम्पॉसिबल” !  

                                  ( 2 )


कवि निशान्‍त की यह कविता मेरी समझ से बेरोजगारों की साझा आत्मकथा है । कविता के आरंभ में ही वे जिस तरह ‘पना’ यानी पटना यानी कोई भी छोटी जगह और दिल्ली को जोड़ते हैं, वह युवा भारत की एक तस्वीर खींचने का उपक्रम है । और यह तस्वीर ‘बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर’ नहीं है । देश की आजादी के सतहत्तर साल बाद भी सभी के लिए एक समान मौके उपलब्ध नहीं हैं । आर्थिक विषमता की खाई बढ़ती ही जा रही है । यह ठीक है कि आय के स्तरों में सुधार हुआ है, लेकिन अंतर तो जस का तस बना हुआ है, बल्कि बढ़ा ही है । कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि कहता है – 

      “ रोज एक सूरज उगता और अस्त हो जाता

        रोजाना वह कुछ न कुछ बदल जाता

        रोजाना हमारा बत्रा कुछ नया हो जाता

              ----

        ‘हम’ सर उठाए

        बत्रा पर इन्‍तजार कर रहे हैं उसका

        वह पाँच मिनट में

        आ ही जाएगा बत्रा पर

        अपना बैग उठाए ।”

 बैकग्राउण्ड में जैसे मुकेश की आवाज में साहिर के शब्द गुनगुनाए जाते हैं –

              “पतला है हाल अपना लेकिन लहू है गाढ़ा

              फौलाद से बना है हर नैजवां हमारा

              मिलजुल के इस वतन को ऐसा बनाएँगे हम

              हैरत से मुँह तकेगा सारा जहाँ हमारा”

 निशान्‍त की यह लंबी कविता, संघर्षों, विषमताओं, विसंगतियों से दो-चार होते हुए, अंत में आकर इसी पॉजिटिव नोट पर खत्म होती हुई लगती है । कवि को वस्तु स्थिति का पूरा-पूरा अंदाजा है, लेकिन वह निराश, हताश होने की बजाय आगे बढ़ने पर ध्यान देता है ।

     निशान्‍त की यह कविता खींचती क्यों है? इसलिए कि यह बहुत करीब की, बल्कि अपनी ही व्यथा-कथा-सी है । इस देश में जहाँ बेरोजगारी अभी भी एक बहुत बड़ी समस्या है, हजारों-लाखों लोगों के सामने सबसे बड़ा काम, ‘काम’ ढूँढ़ने का ही है । यह बस ऐसे ही नहीं है कि विद्यार्थी छोटी-छोटी जगहों से निकल कर दिल्ली या दिल्ली-जैसी बड़ी जगहों पर जा रहे हैं । इसके अलावा बिहार जैसे राज्य से कितने लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं, यह आँकड़ा ही उन परिवारों की विषम परिस्थितियों का बयान कर देगा । कवि को हिन्‍दी-भाषी विद्यार्थियों के भविष्य की खास चिंता है । वह समझता है कि जीवन में सहज रह पाना आसान नहीं है । आज के जमाने में तरक्की के लिए अंग्रेजी और पावर प्वाइंट, इन दोनों चीजों की प्रदर्शन-योग्य सिद्धि एक तरह से अनिवार्य है । हिन्‍दी पट्टी वाले छात्र पढ़ाई पूरी कर लेने को ही योग्यता मान बैठते हैं । और पढ़ाई भी कमोवेश डिग्री प्राप्त कर लेने की औपचारिकता भर हो कर रह गई है । डिग्री प्राप्त कर लेने के बाद का रास्ता अमूमन वैसा ही होता है जैसा कवि ने दिखाया है –

             “ हम ‘प्री’, ‘मेन्‍स’, ‘यू.पी.एस.सी.’ से होते हुए

            जे.आर.एफ., नेट, एम.फिल्., पी-एच.डी. से निकलकर

            नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी से होकर

            राखी सावंत पर ही आकर रुकते

            और कहते—“ यार, मजा तो अशोक वाजपेयी बनने में है

            या नामवर सिंह या फिर राखी सावंत ।”

 हमने ऐसी धारणा बना रखी है कि पद ही जीवन की गति निर्धारित करता है । आदमी होना किसी पद, किसी ऊँचाई पर पहुँच पाने के बाद ही सफल है । ध्यान दें तो ‘अशोक वाजपेयी’, नामवर सिंह’ या ‘राखी सावंत’ नाम, जो ऊपर उद्धृत किए गए हैं, वे व्यक्तित्व, चरित्र या प्रतिभा से ज्यादा एक पद, एक आसान के द्योतक हैं । हमने साधारण होने को कोई महत्त्व ही नहीं दिया है । समाज के तौर पर हमारी सारी ऊर्जा ही ‘मिसप्लेस्ड’ है । बार-बार ऐसी रिपोर्टें पढ़ने को मिलती हैं कि ग्रेजुएट हो चुके युवाओं में काम देने योग्य ( एम्प्लॉयबल) लोगों का प्रतिशत बहुत ही कम है , यहाँ तक कि इंजीनियरिंग जैसी तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों में भी । समाज के तौर पर हम समझ ही नहीं सके कि डिग्री का मतलब योग्यता नहीं होता, और सिर्फ उँची नौकरी ही सम्मान के काबिल नहीं होती । इस माइंडसेट में युवा आबादी के सामने विकल्प ही नहीं बचते ज्यादा, सिवा एक अंधी दौड़ में शामिल हो जाने के । ‘संतोषी सदा सुखी’ सरीखी कहावतें सिर्फ कथा-कहानियों के लिए ही बची हैं । लोगों में अपने को स्वीकार कर लेने का साहस ही नहीं बचा है । सब किसी के जैसा बन जाना चाहते हैं,’कुछ’ हो जाना, ‘कुछ’ करके दिखाना चाहते हैं । पिछले साल एक फिल्म आई थी, ‘ट्वेल्थ फेल’ । ऐसी फिल्में भी नौकरी और प्रतियोगिता परीक्षाओं को अनावश्यक रूप से ग्लैमराइज़ करती हैं । यूपीएससी की परीक्षा में असफल हो जाने के बाद वहीं मुखर्जी नगर में चाय की दुकान खोल लेने वाले पात्र ‘गौरी भइया’ को गढ़ा जाता है । हीरो के संघर्ष को ‘ज़ूम’ कर के दिखाया जाता है, एक्स्ट्रीम क्लोज-अप, मैग्नीफाइड । सच्चाई की चाशनी में डुबा कर झूठ को, और यदि झूठ न भी कहें तो सच के अतिरेक को हमारे सामने परोस दिया जाता है । ‘लार्जर दैन लाइफ’ बन जाना ही साध्य है । सीधे-सादे, शरीफ आदमी, जो सबका भला चाहे, जिसके मन में छल-प्रपंच नहीं हो, ऐसे व्यक्ति को समाज अपना हीरो मानता ही नहीं । हिंदी फिल्मों से उदाहरण लें तो ‘कल्लू’ को ‘कल्लू’ से ‘कालिया’ बनने का सफर तय करना पड़ता है । तभी लोग उसकी बात सुनते हैं, उसकी बातों को भाव देते हैं ।

  क्या हम सच का सामना नहीं कर सकते ? इस कविता के पास इसका जवाब है । कविता में आया ‘छोटू’ का पात्र सच के करीब है, फिल्म का ‘गौरी भइया’ नहीं । कविता समझती है कि “ नौकरी, अधिकारी की अच्छी है/ या फिर मास्टरी की” । कविता समझती है, और समझाती है –

             “ विकल्पहीन संस्कृति के दौर में बस बचे हुए हैं थोड़े-से विकल्प

            विकल्पों के अन्‍त में

            ‘हम’ को ‘मैं’ दिखता था

            ‘मैं’ को एक नौकरी दिखती थी

            समाज में ‘क्रान्‍ति’ एक ‘शब्द’ की अहमियत लिये

            पत्र-पत्रिकाओं में बेरोजगारी के साथ निश्‍चिंतता से टहल रहा था

            ....

            एक विचारक ने घोषणा की –“ और अन्‍त में बचे रहेंगे शब्द ”

                        शब्द खुश हुआ और जाकर ‘नौकरी’ की गोद में बैठ गया ।”   

 एक बेरोजगार युवा के लिए नौकरी की तलाश एक ऐसा युद्ध है जिसमें न फैसला होना है, न युद्ध- विराम । एक-एक करके उसकी आशाएँ, हौसला, उसके आदर्श, उसके विचार – सब फेल होते चले जाते हैं । ‘लाल सलाम’, ‘हल्ला बोल’, संघर्ष और हिम्मत बढ़ाने वाले जुमले सब फीके पड़ते जाते हैं । “ जीवन भारी पड़ जाता है ‘हम’ पे ।” और फिर जीवन समझौतावादी हो जाता है । युवा सपनों का, युवाओं के सपनों का धराशायी हो जाना, भला किस तरह ठीक है ? लेकिन ऐसा होता है –

            “ और बत्रा से उठकर

            मुखर्जीनगर से  निकलकर

            राजधानी को पीछे छोड़कर

            पृथ्वी पर पैदल चलने लगते हैं ‘हम’

            अब धीरे-धीरे ”

हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जब मनुष्य के बारे में कही गई बात कि “ मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है” झूठी पड़ती जा रही है । और यह कोरोना वाली ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ नहीं है । यह आत्मकेंद्रित, वर्ग-भेद की बहुत बारीक परतों में बँटते जा रहे समाज की बात है । यह उस समाज की बात है जो मानने लगा है –“ देना तो बहुत बाद की क्रिया है ।” बल्कि यह कि देना तो सबसे बाद की क्रिया है, या ऐसी कोई क्रिया है ही नहीं अब । यह कृतघ्न होते जा रहे समाज की बात है – “ स्मृतिहीन संस्कृति उपज है हमारे समय की ।”

पूँजीपति ही नया राजा है । और राजा का बेटा ही राजा होता है । यह आज के समय का सबसे बड़ा चक्र है, (दु:)चक्र। महारानी के सामने राजकुमार ही प्रस्ताव रखने का पात्र है । पूँजी का अर्थ है खरीद-फरोख्त –

             “ चारों तरफ बाजार ही बाजार है

            कोई खरीद रहा है, कोई बेच रहा है

            दिमाग से लेकर ईमान तक

            उसी में धर्म की ध्वजा है

            साम्प्रदायिकता की आवाज है

            जाति की राजनीति है

            और सबसे ज़्यादा हमारा ‘मैं’ है”

     पूँजी के प्रभाव से बच पाना अब इस दुनिया में संभव नहीं दिखता । दवा से लेकर दारू, शिक्षा से लेकर भिक्षा, क्या है जो पूँजी पर आश्रित नहीं ? और यहीं से शुरू होता है आत्मसंघर्ष । एक विचारशील व्यक्ति सारी असमानताओं को देखता-समझता है, उनके खिलाफ विद्रोह भी करता है लेकिन अंतत: उसी के जाल में फँस भी जाता है । जीवन की आधारभूत सुविधाएँ उसे भी चाहिए। यह अलग बात है कि उन आधारभूत सुविधाओं के अंतर्गत आने वाली वस्तुओं की सूची क्रमश: लंबी ही होती चली जाती है ।

             “ अपने ही सच के घर के भार से

            भारी पड़ जाता है एक दर्शन

            “जीवन इसी तरह चलता है,

            तुम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते” ।”

 

कवि हमारे सामने अपनी बात रखता है –

             “ सच क्या इतना तीखा है कि

            उससे नहीं बनाई जा सकती जीवन की चपाती

            या यथार्थ इतना नसतोडू है कि ‘हम’

            भागते-फिरते रहते हैं अमेरिकी लोक में”

 यह कवि का आत्म-ज्ञान है । यही पाठक का भी अत्म-ज्ञान है । कोई भी अत्मसंघर्ष जब ‘आत्म’ के दायरे से बाहर निकल आता है, जब वह अपने लोक के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करने लगता है,तभी हम उसकी व्याप्ति को व्यापक और गहरी कह सकते हैं । इस कविता में कवि तो उपस्थित है ही, पाठक भी स्वयं को उतना ही उपस्थित पाता है, कम से कम मैं तो ऐसा ही पाता हूँ । ‘लोक’ क्या है, कई सारे लोगों के ‘निजी’ का समूह । कवि का ‘निजी’ जब विस्तार पाता है, जब लोगों की भावनाओं के साथ घुलता है तो वह बढ़कर लोक का अपना भाव हो जाता है, लोक का ‘निजी’। मेरा विश्‍वास है कि इस कविता को पढ़ते-पढ़ते पाठक के पास जो कुछ उसका निजी है, कविता में घुलने-मिलने लगता है । पाठक का भाव कवि के भाव से मिलकर लोक का भाव बन जाता है । इस कविता में जो निजी है वही लोक का भी है, जो लोक का है वही सबका निजी भी है । कविता और कवि की सफलता इसी में है ।

           

रविवार, 6 अक्टूबर 2024

यात्रा

           यात्रा



एक सींक हाथ

एक सींक पाँव

एक ठोप धूप

एक ठोप छाँव

दरिया-शहर

बादल का गाँव

हम ही खेवैया

हम ही थे नाव

पानी जो हिला

नाव चल पड़ी

हम भी चल पड़े

पहुँचे एक ठाँव

फिर ठहर गए

कुछ बिसर गए

जो निकले थे हम

लेके अपने भाव

और डूबे हम

और और डूबे हम

बदलने लग पड़े

धीमे- धीमे अपने चाव

फिर दिन बहुत गए

ऐसे खो के जुत गए

फिर आँख जब खुली

तो खुली ही रह गई

फिसल रही थी उम्र

रेत की तरह

दरिया में नाव थी

डूबती हुई

नाव में थे हम

मारे हाथ-पाँव

एक ठाँव छोड़कर

जाने को और ठाँव... 



शुक्रवार, 21 जून 2024

मौसम-ए-अफ़सुर्दगी ने ढंक रखा है मेरा वजूद

 

                                     


शिवना प्रकाशन, 2019


मौसम-ए-अफ़सुर्दगी ने ढंक रखा है मेरा वजूद

 

 

कितना कुछ है पढ़ने को, और आदमी कितना कम पढ़ पाता है ।  ठीक ही कहा गया है कि किताबें चुन लेती हैं अपना पाठक । अपनी अज्ञानता में ही सही, जिस कवि की आपने पहले से कोई कविता नहीं पढ़ी हो, जिस कवि के बारे में चर्चा नहीं सुनी हो, उस कवि का कविता-संग्रह खरीदना कुछ तो खास होगा । दिनकर जी ने कोई सत्तर बरस पहले कहा था कि “ कविताएँ तो हर महीने , मनों क्या, टनों छपा करती हैं, और अक्सर, उनमें भाव भी अच्छे-अच्छे होते हैं, किन्‍तु अभिव्यक्ति की सफाई का निर्वाह बहुत कम कविताओं में होता है।” एक दिन किताब की दुकान पर किताबों को उलटते-पलटते एक किताब हाथ में आ गई – ‘ ख़ुद से गुज़रते हुए’ । कवयित्री का नाम – संगीता कुजारा टाक । पहले तो संग्रह के शीर्षक ने ही ध्यान आकर्षित किया । फिर किताब के पन्ने पलटने लगा, और खड़े-खड़े ही कुछ कविताएँ पढ़ गया । यदि यह कहूँ कि कविताओं ने खुद को पढ़वा लिया तो ज़रा भी गलत नहीं होगा । अभिव्यक्ति की सफाई असर करती ही है। और किताब खरीद ली गई। किताबों की दुकानों पर जाते रहने का यह फायदा है कि छुपे हुए, अनदेखे नगीने भी हाथ लग जाते हैं ।

 संग्रह में एक सौ तीन कविताएँ हैं । अपनी बात में अमृता प्रीतम का आभार प्रकट करते हुए संगीता जी ने लिखा है “अमृता प्रीतम का, जिनको पढ़कर मेरी नज़्मों को ज़िंदगी देखने समझने का नज़रिया मिला, और मेरी लेखनी को नया अध्याय ।” अपनी एक कविता भी उन्होंने ‘अमृता प्रीतम’ शीर्षक से लिखी है जिसमें वे आह्वान करती हैं अमृता प्रीतम से अपनी नज़्म में उतरने का ।  ‘शुभाशंसा’ में वरिष्ठ साहित्यकार अशोक प्रियदर्शी ने कुछ इस तरह पुष्टि की है, उन्होंने लिखा है “ इनमें आपको साहिर की जादूगरी का भी आस्वाद मिलेगा और अमृता प्रीतम के प्यार की गर्मजोशी  भी ।”  

 इस संग्रह की कविताओं को चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है । पहली श्रेणी, जिसमें सबसे ज्यादा संख्या में कविताएँ हैं, प्रेम कविताओं की है । इसके बाद सबसे ज्यादा संख्या वैसी कविताओं की है जिसके केंद्र में स्त्री है, इसकी स्वतंत्रता है, उसके विचार हैं । चाहे तो इन कविताओं को ‘स्त्री विमर्श’ की कविताएँ भी कहा जा सकता है । संख्या के हिसाब से, इनके बाद वैसी कविताएँ हैं जिनमें आसपास का यथार्थ चित्रित हुआ है । संग्रह की कुछ कविताएँ कविता/ कविता-लेखन को केंद्र में रखकर भी लिखी गई हैं । अंतिम श्रेणी विविध/ अन्य विषयों पर लिखी गई कविताओं की है ।

 

लगता है कवयित्री का मूल भाव/स्वभाव उदासी है । संग्रह की कविताएँ इसी ओर इंगित करती हैं । उदासी की एक अंतर्धारा इन कविताओं में देखी जा सकती है । खास तौर पर इस संग्रह की प्रेम कविताओं में । संग्रह की प्रेम कविताएँ उर्दू नज़्मों के लहज़े को पकड़ कर चलती हैं । और इन कविताओं को आप अमृता प्रीतम, साहिर, गुलज़ार, और फैज़ के मुहल्ले के आसपास से गुज़रता हुआ महसूस करते हैं । अच्छी बात यह है कि कविताएँ कहीं से भी किसी की नकल नहीं लगती हैं । उनकी छाया भले ही दिखती है, जैसे अभिषेक बच्चन के अभिनय में अमिताभ बच्चन के अभिनय की झलक ! बानगी के तौर पर एक कविता ‘डिमेन्‍शिया’ की कुछ पंक्तियाँ देखें –

 “ मनोचिकित्सकअ

पना प्रिस्क्रिप्शन लिख रहा था

 और तुम्हारा हिज्र... अपना तिलिस्म...”

 ‘मोहब्बत; शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ इस तरह हैं –

        “ अभी तू मेरी बात न समझ

        तो यह और बात है

        वर्ना मोहब्बत

        क्या कोई

        और चीज हुआ करती है ?”

 

संगीता कुजारा टाक जब प्रेम से इतर एक स्त्री, एक स्वतंत्र स्त्री के तौर पर अपनी बात करती हैं तो वहाँ उनकी आवाज़ कुछ अलग ही निखार लेने लगती है । उनके यहाँ स्त्री अपनी स्थिति से भली-भाँति परिचित है । बड़े आत्मविश्वास के साथ वस्तुस्थिति को बयान करती ‘उधार’ शीर्षक कविता की इन पंक्तियों को देखें –

 

      “ सबने लिया है कुछ न कुछ

        उधार मुझसे...

 

        एक औरत से !”

 

क्या यह पंक्तियाँ ख्यात कवि अरुण कमल की इन प्रसिद्ध पंक्तियों का प्रतिपक्ष नहीं हैं, प्रतिकार नहीं हैं ? जिनमें वे इस तरह कहते हैं  –

      “ अपना क्या है इस जीवन में

        सब तो लिया उधार

        सारा लोहा उन लोगों का

        अपनी केवल धार ।”

 बकौल संगीता कुजारा टाक, औरत उधार दे रही है यानी कि सारा लोहा उसके ही पास है !

 संग्रह की एक और कविता है ‘आदत’ ।  इसमें किस सहजता और आत्मविश्वास से स्त्री कहती है –

       “ खैर छोड़ो, मैं भी तो मैं हूँ

        अरमानों का कत्ल करना

        मेरी आदत है...”

 

कभी-कभी संगीता जी कविताओं को पाठक के चेहरे के इतने करीब ले आती हैं कि कविता की तल्खी कसने लगती है, पाठक को स्तब्ध कर देती है । ‘हैसियत’ शीर्षक कविता कि ये पंक्तियाँ कुछ ऐसी ही हैं –

 

      “ धोबी का कुत्ता, घर का न घाट का

        अब सुनने में आया है, 

        धोबी ने कुतिया पाल ली है ”

 

संग्रह की कुछ कविताएँ हमारे आसपास के यथार्थ को उजागर करती हैं । इनमें कुछ कविताएँ पर्यावरण के प्रति हमारे निष्ठुर व्यहवहार को दर्शाती हैं । ऐसी ही एक कविता है ‘पर्यावरण’, जिसमें कवयित्री ने एक पेड़ के जीवन की त्रासदी को कविता के अंतिम पंक्तियों में बयान किया है –

 

      “ अब उनके एक हाथ में आरी है

        दूसरे हाथ में मेरा बदन ”

 

यह तो हम देख ही रहे हैं कि सामज से आपसी प्रेम उठता जा रहा है। सामाजिक तानाबाना जो हमारी ताकत है, छिन्न-भिन्न होता जा रहा है । तभी तो कवि-मन बोल उठता है –

 

      “ कितना दुखदाई है

       कि प्रार्थना में उठे हाथ

       एक दूसरे की

       सलामती के लिए नहीं

 

       कितना दुखदाई है न !

       उफ्फ !!! ”  

 

अन्य कविताओं में एक कविता है ‘तारा मेरी दोस्त’, जो संभवत: अपनी दोस्त की मृत्यु पर लिखी हुई कविता है । मन की व्यथा और बेबसी को दर्शाती हुई इन पंक्तियाँ में प्रयुक्त बिंब देखे जाने योग्य हैं –

 

      “ हवाओं ने अपनी गति रोक ली है

        पानी बहने से मना कर रहा है

        पहाड़ चरमरा कर टूट रहे हैं

        पेड़ों की कूबड़ निकल आई है”

 

इस संग्रह से गुज़रते हुए ऐसा लग सकता है कि कवि-मन में बहुत दिनों से जमा हुई बातें थीं जिन्हें इस संग्रह के द्वारा निकलने का मौका मिला है । यह सही है कि एकबारगी कविताएँ उर्दू नज़्मों के प्रभाव में लगती हैं । लेकिन अब बहुत दिनों का जमा पानी निकल गया है, अब जो कविताएँ आएँगी वो निश्चय ही अलग और कवयित्री के अपने मिजाज को प्रकट करने वाली होंगी। इस संग्रह में ही इसकी शुरुआत हो चुकी है । संग्रह की बहुत-सी कविताएँ ऐसी हैं जिनमें संगीता जी का अपना विशिष्ट स्वर सुना जा सकता है । संग्रह की ऐसी कुछ कविताओं के शीर्षक इस प्रकार हैं – मोक्ष, महत्व, स्वीकृति, समतुल्य, विज्ञापन, प्रेम, आजकल, किंकर्तव्यविमूढ़, पर्यावरण, मानसिक पर्यावरण, काम, अलग होने के बाद, आश्रित, गवाह और दरारें । इन कविताओं में कवयित्री की अपनी निजी भाषा लक्षित की जा सकती है । उदाहरण के तौर पर ‘मोक्ष’ कविता की पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं –

                                          

      “ और तो कोई बात नहीं थी

 

        बात बस इतनी थी

        कि मिलना चाहती थी खुद से

       

       कई सालों बाद देखी

 अपनी छवि

 इतनी साफ, इतनी गहरी

 

आज नदी का पानी स्वच्छ पारदर्शी था ”   

 

 इस लेख का शीर्षक भी संग्रह की एक कविता से लिया गया है । आने वाले संग्रह इस ‘मौसम -ए- अफ़सुर्दगी’ को कवयित्री के वजूद से हटा देंगे ऐसी ही आशा है । संग्रह में उर्दू के शब्द बार- बार आते हैं, जिनका अर्थ समझने में आम पाठक को  मुश्किल हो सकती है, मसलन अफ़सुर्दगी। ऐसे शब्दों के अर्थ फुटनोट में दिए जा सकते थे। 

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

समस्तीपुर, मेरे दोस्त !


 

समस्तीपुर, मेरे दोस्त ! 


कितनी अजब बात है

सदर बाजार, जमालपुर की

एक गली में

छनते हुए गर्म-गर्म

सिंघाड़ों के इंतजार में

खड़े चेहरों को देखकर

समस्तीपुर याद आ गया

समस्तीपुर

अपना समस्तीपुर  ! 


एक चेहरा जो अपना हुआ करता था

वो जो मैं था भी, और नहीं भी था

वो जो किसी एक का, और जो सबका था 

तुममें और हममें तब फर्क कहाँ था  ! 


इतने सालों बाद आज

दिख गया अचानक अनायास

इंतजार कर रहे उन चेहरों के बीच

एक चेहरा जो मैं भी था, जो तुम भी थे

सदर बाजार, जमालपुर की गली में

जहाँ छन रहे थे गरमा गरम सिंघाड़े


क्या था उस चेहरे में आखिर? 

किसी के द्वारा पहचान लिए जाने का तोष

किसी को पहचान लेने का संतोष

निष्कपट, निश्छल जीवन

अहंकार से खाली मन

ना नौकरी की चिंता, न रोटी की फिकर

न मिलने की उत्कंठा, न बिछड़ने का डर

सबकुछ सहज, सरल, सरलतर... 

निरंतर


कुछ था कि छाप रह गई  ! 

छाप रह ही जाती है जब कुछ हो... 

किसी ने किसी को बाँधा नहीं

ना कोई बँधा ही किसी पाश में


मन की तरलता 

इक सहज सरलता 

तर कर जाती है

जीवन तर जाया करते हैं

घर कर जाया करते हैं

नर्मो-नाज़ुक जज़्बात

कोई नज़र, कोई हँसी, कोई बात...! 


    (2) 


इन बीच के बरसों में

गया कुछेक बार मैं

समस्तीपुर 

एक बार गया अपने बेटों के साथ भी

और अपने स्कूल 

सेंट मेरीज़ तक गया, 

यों भी सेंट मेरीज़ और समस्तीपुर पर्यायवाची हैं

बहुत से अर्थों में अपने लिए, 

वहाँ उस स्टेज पर, क्लास रूम के सामने 

बेटे खड़े हुए, जो थे लगभग उसी उम्र के

जिस उम्र का मैं तब था 

स्टेज ने शायद बेटों को पहचाना

क्लास रूम उनको देख मुस्कुराए—

इतने बरस लगाए ! 

गूँगा अब क्या स्वाद बताए !! 


क्यों गया बेटों के साथ ? 

अपने बचपन में बेटों को ले जाना था

उनके बचपन में अपने बचपन को उतारना था 

याकि करनी थी उम्र लंबी अपने बचपन की, जीवन की ?

बिना कहे हम अपने बच्चों में 

अपना जीवन रिवाइंड करते चलते हैं,

रिवाइज़ करते चलते हैं 

और सुधार लेते हैं चुपचाप कुछ अपनी गल्तियाँ भी 

बिना कहे किसी से 


अब पूछते हैं हाल 

सिर्फ एक दूसरे का ही नहीं

जानना चाहते हैं हालचाल बच्चों का भी 

तभी

“तमाम उम्र का हिसाब माँगती है जिंदगी” 

हम ढूँढ़ते हैं हिसाब बीत गई उम्रों का 



     (3)   


फिर रास्ते अलग हुए

एक अंतराल आ गया 

फर्क कहाँ हुआ पैदा

फर्क फर्क भी था कहाँ

जीवन-पथ समतल कहाँ

समरस कहाँ जीवन-सफ़र

कौन चला किस सिम्त को

क्या मंज़िल किसकी चाह बनी

अब पता-मुकाम किसका है क्या

किसकी क्या है गति भयी

नहीं एकरेखीय जीवन-गति, जो हो यदि

तो जीवन नहीं       

                  

कुछ यार हमारे चले गए

गए समय से पहले बहुत--

जीवन अपनी चालें चलता है

खारिज-दाखिल करता है

यादों का काँटा चुभता है 

हर बात पे याद कराता है

सबका नंबर आता है... 


इतना लेकिन याद रहे

नश्वर, क्षणभंगुर जीवन है

और रहे यह बात याद -

क्षण-क्षण, कण-कण में जीवन है 


     (4) 


सुख क्या है -- मृगतृष्णा है

दूर खिसकते चलता है

जितनी मुट्ठी बँधती है

वह उतना ही फिसलता है

उलझन-उलझन गाँठें हैं

गाँठों से भरा हुआ मन है

जितना ही जोर लगाते हैं

गाँठें उतना कस जाती हैं

धीरज से, हल्के हाथों से

गाँठें सब खुल सकती हैं 

मन खुलता है

मन मिलता है

खिलता है मन ऐसे ही 


आओ मिल के ढूँढें, मन

अपना बीता हुआ बचपन

ना कोई शिकायत होती थी, जब

ना कोई आहत होता था

सब छोड़ के अपना छोटापन

और भूल के सारा बड़ा-बड़प्पन

पल जीवन के मधुबन कर लें

चकचक मन-दरपन कर लें

बोझ ना बनें यादें

इतना तो पक्का मन कर लें


उम्र का फासला तय करके

जो जहाँ पर हैं खड़े

और जिधर जो हैं देखते

सामूहिक यह दुआ करें

कहीं कभी जो यदि मिलें

बिन छल कपट, बिन भय संशय

खुले हृदय से मिले-जुलें

खुशी से भले छलकें आँखें

देखें कि चोट न कोई पहुँचे 

दर्द से आँख न रोयी कोई 


"बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ

 कुछ  न  समझे  ख़ुदा  करे  कोई"


जो बीत गया

जो मिला नहीं

जो कर न सके

जो हुआ नहीं

मन क्या था

क्या कर बैठे... 

जो जितना है वो कम भी नहीं

'गर अपनी मर्जी कुछ और रही, और रब की कुछ और रही

क्या करना अफसोस  ! 

आखिर क्यों करना अफसोस  ! 

समझो मेरे दोस्त  ! 

समझो मेरी दोस्त ! 


समस्तीपुर, मेरे दोस्त...! 


समस्तीपुर की याद आ गई है

समस्तीपुर की याद आती रहे

बचती रहे जीवन में मासूमियत थोड़ी  !!   


। । । । । 


पोस्ट स्क्रिप्ट : आशंका


अच्छा है अब हम न ही मिलें


मुझसे मिलकर

तुम निराश न हो जाओ


तुमसे मिलकर

मैं खो न बैठूँ

तुम्हारी याद को भी  !