घर की बातें
घर
घर हर लेता है
सब पीड़ा, दुख-तकलीफ;
जहाँ रहते हैं
पिता,माँ
दीवारें तक बन
जाती हैं
सुरक्षा कवच
और लड़े-थके, अस्त-पस्त मन
पहुँच कर हो
जाते हैं महफूज,
निश्चिंत
नींद
खुद-ब-खुद समय पर खुलती है
हवा महसूस
होती है ताजा-ताजा
धूप भी लगती
है खूब उजली,
गरमाहट से
भरपूर, पुर-सुकून
और चाँद, रात में बरसाता है नेह
घर, घर होता है भाई
वो जहाँ आपका
बचपन भटकता है
वो जहाँ कोई
सिर पर हाथ रखता है।
घर की याद
यूँ फ्लैट भी घर है,लेकिन एक कमरा
थोड़ा ज़्यादा
घर-घर लगता है
कमरे में है
पलंग का एक जोड़ा
जिस पर बिछे
हैं गद्दे, मोटे-मोटे
जिनमें भरी
हुई है रूई ठसाठस
जिसके जरिए
कभी याद आ जाती है धुनिया की
और धुनकी के
टंकार की
एक तरफ रखे
हैं लोहे के दो बक्से
एक के ऊपर एक
जिनको ढँक
दिया गया है एक पुरानी-सी चादर से
उसी पलंग पर
बैठे
दिख जाती है
कभी,बाहर खिड़की से,
सामने की
दीवार पर उतरती हुई
शाम की
पीली-पीली धूप
और मन पहुँच
जाता है बरसों पीछे खेल के मैदान में
डूबते सूरज से
समय का अंदाजा लगाते
कमरे में ही
है एक पुरानी तस्वीर,
स्टील के
फ्रेम में ब्लैक एण्ड व्हाइट
मैं बैठा हूँ
पिता की गोद में,
और माँ भी है, भैया भी, बहन भी
इसी तस्वीर ने
वजन बढ़ा दिया है कमरे का
घर-गाँव जो
होता है
वो तो पिता का
होता है।
कसक
सिन्दूरी बिन्दी-सा सूरज
टिका है फुनगी पर नीम की
दो छोरों से होती है
कोयलों की बातचीत
अलग-अलग चिड़ियों का
फैलता है मिश्रित संगीत
हवा में घुल जाता है
मन
भावातीत
आ गई है याद
गाँव की
घर की
उस दुआर की
जो अब नहीं रहेगा !
ताकीद
घर पर भी रहा करो कभी
पता तो चले
कहाँ क्या जरूरत है
माना, दुनिया सराय है
पर ऐसी भी क्या जल्दी है
कहाँ की भागदौड़ है ?
काहे की हाय-हाय
है !
ग्लानि
कहते हैं तीनों गाँवों में
सबसे अच्छा था
दुआर
चढ़ती सीढ़ियाँ और
फिर
उतरती
अंदर की ओर
दरवाजे के ठीक
ऊपर
घड़ी बड़ी-सी
रखी हुई कुछ कुर्सियाँ
काठ की,कभी-कभी
एक चौकी भी
एक तस्वीर बाबा
और छोटे बाबा
की
सीढ़ियों पर
बैठे
एक तस्वीर
बाबा-मामा की
एक तस्वीर पापा
की
उनके बचपन के
दिनों की
कुछ वैसी ही
गुस्से वाली , मेरी भी
किसी दूसरी
जगह
और अब फिर
उसी गुस्से
वाली तस्वीरें
बेटों की
हाल की एक
सेल्फी
चाचा के साथ
घर के दुआर पर
आप घर में
नहीं रहते हैं
घर
आप में रहता
है
अब जब
घर नहीं रहेगा
लगता है, मैं
किसी को
बचा नहीं पाया !
खुद भी कहाँ बचा मैं
कौन बच सका है
बोलो तो इस जहाँ में
सब मन का मामला है
मिट्टी है कैसी मन की...
पुनर्नवा
बागीचे में घर के
फूल बेगनबेलिया का
खिला...
खिलता हुआ वहीं
मन मिला
घर तो समझते हैं न ?!
वो नहीं
जिसे आपने बनाया है
बल्कि वो
जिसने
आपको बनाया है !!
जहाँ लौट कर
मन जाता है बार-बार !!
स्थायी पता
पोस्ट जमालपुर
जिला मुंगेर
आठ
एक
एक
दो
एक
चार
जीवन का कितना भी
हो जाए फैलाव
कितना भी विस्तार ....
वो कुएँ का पानी
आबो-हवा,पूरब रुख का दुआर
साथ-साथ चलता है
चेतन-अवचेतन में
झलक जाता है मुझमें
रंग-रूप,चाल-ढाल
आचार-विचार-व्यवहार
मेरे पुरखों का
यदा-कदा
रहूँ कहीं भी
जबकि,अब कहीं का भी नहीं
पूछे जाने पर कहीं
“कहाँ के हो?”
उत्तर एक यही –
ग्राम वलिपुर
पोस्ट जमालपुर
जिला मुंगेर !
जीवन-सफर
सारा सफर
जिन्दगी का
घर पहुँचने तक
का है
घर कहाँ है !
घर कहाँ है !!
घर कहाँ है
!!!

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