गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

स्मृतिर गन्‍धो, गन्‍धेर स्मृति


 

स्मृतिर गन्‍धो, गन्‍धेर स्मृति

 

आप कहेंगे कि स्मृति की भी कोई गन्‍ध होती है ? गन्‍ध की स्मृति तो होती है न ?

कुछ साल पहले तक बाजार में एक साबुन मिला करता था – स्वस्तिक शिकाकाई । फिर वह बाजार से गायब हो गया । कोई बरस-दो बरस पहले एक साबुन खरीद कर लाया—गोदरेज शिकाकाई । रैपर हटाने के बाद वही चिर-परिचित खुशबू मिली । नाम बदल चुका था, पर साबुन वही ! साबुन का रंग भी वही लाल । आप बाहर से किसी कमरे में आएँ, तो उस कमरे की गन्‍ध आपका स्वागत करती है । गूगल पर खोजने के बाद पता चला कि २०१० में गोदरेज ने स्वस्तिक शिकाकाई बनाने वाली कम्पनी का अधिग्रहण कर लिया था । १४-१५ वर्षों के बाद भी उस साबुन की सुगन्‍ध जस-की-तस सुरक्षित थी मेरे अन्‍दर । यह एक गन्‍ध की स्मृति थी, या यह स्मृति-गन्‍ध थी जिसने सँजो रखा था सबकुछ?

मनुष्य स्मृतियों का कोषागार ही तो है । हमारी पाँच इन्‍द्रियाँ स्मृतियों के पाँच द्वार हैं । दृश्य, आस्वाद, श्रवण, घ्राण और स्पर्श । मनुष्य-देह भी है क्या –“ छिति जल पावक गगन समीरा ।” वेदान्‍त कहता है पंचकोश । यानी गुड़िया के भीतर गुड़िया – अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश , विज्ञानमय कोश और अन्‍तत: आनन्‍दमय कोश ।  मनुष्य औरों की स्मृतियों में बस जाना चाहता है –“ मर के भी किसी को याद आएँगे” । अमर हो जाना आदमी की दिली ख्वाहिश है ।

बाकी चारों इन्‍द्रियों की स्मृतियाँ मुख्यत: वस्तुविशेष की स्मृतियाँ हैं । गन्‍ध, वस्तुविशेष से सम्बद्ध होते हुए भी भावविशेष की स्मृति बनाता है । हालाँकि हर स्मृति भावविशेष की आगोश में ही ले कर जाती है । रात की रानी, बेली के फूल, बोरोलिन, पॉण्ड्‍स, बोरोप्लस, इत्र में भींगा फाहा, यहाँ तक कि पसीने में भीगी शर्ट – ये सब किसी खास जगह या वस्तु से ज्यादा उस मन:स्थिति में हमें लेकर जाती हैं, जो वर्षों की दूरी के बावजूद तरोताजा महसूस कराती हैं । घर के पास के चौक पर स्थित मंदिर के सामने से गुजरते हुए अक्सर एक बड़ी मीठी गन्‍ध मिलती है । यह गन्‍ध बीते हुए दिनों में ले जाती है । कब की और कहाँ की, यह याद नहीं आता । वह गन्‍ध भी पहचान में नहीं आई । बाद में एक दिन चन्‍दन के एक टुकड़े से जाना कि इतनी मीठी गन्‍ध चन्‍दन की ही है ! जो गुजर चुका है, स्मृतियाँ उसी की तो बनती हैं । गुजर चुकना पूर्णता का द्योतक है । भले ही काम पूरा न हुआ हो, तो भी, उस स्थिति से निकल आना भी पूर्ण होने और अपने बचे होने का अहसास है ।

बच्चा अपनी माँ को गन्‍ध से पहचानता है । जब आँखें ठीक-ठीक देख भी न पाती हों, जब स्पर्श सम्भव न हो तब भी बच्चा माँ की ओर मुड़ जाता है । बरसों पहले पी गई लस्सी की याद आते ही उसमें डाले गए ‘एसेंस’ की गन्‍ध महसूस होने लगती है । किसी मॉल की बात उठते ही वहाँ की तैरती हुई खुशबू आसपास फैलती-सी लगने लगती है । गर्म कपड़ों के साथ फेनाइल की गोली की गन्‍ध, अस्पताल के साथ फेनाइल के पोछे की गन्‍ध तो कभी किसी व्यक्ति की याद आते ही उसके कुर्ते पर लगे इत्र की सुगन्‍ध । मन यहाँ से वहाँ !

मनुष्य के स्मृति-कोषागार में जाने कितनी ही चीजें रखी हुई हैं, कितनी ही बातें दर्ज हैं । हर स्मृति अपने साथ एक अनुभूति लेकर आती है । कुछ स्मृतियों की एक गन्‍ध होती है । यह गन्‍ध आपको महफ़ूज़ ‘फील’ कराती है । किसी केक की खुशबू, किसी कॉफी की भाप की गन्‍ध, किसी के पास से गुजर जाने की भीनी-भीनी उपस्थिति, हवन की समिधा की सुगन्‍ध, भूख जगाती पिघलते घी की गन्‍ध, दाल या दूध के बर्तन के ‘लग’ जाने ( जरा-सा जल जाने ) की गन्‍ध – कितनी चीजें आपके इर्दगिर्द मौजूद हो जाती हैं !  कई बार गन्‍ध अपने साथ स्वाद भी लेकर आ जाती है । गन्‍ध स्मृतियों का वाहक है और गन्‍ध स्मृतियों का जातक भी है । गन्‍ध से स्मृति-रेख खिंचती चलती हैं । फिर कुछ समय बाद जब हम सन्‍दर्भ-विशेष या गन्‍ध के कारकों से दूर हो जाते हैं, हमारी स्मृति उन भावों को बचा रखती है । यही स्मृतियाँ हमारा ‘बैटरी-बैकअप’ होती हैं । गन्‍ध से स्मृति, स्मृति से गन्‍ध । गन्‍ध की स्मृति, स्मृति की गन्‍ध ।  एक ‘वर्चुअस साइकिल’। मुझे तो लगता है कि सबसे ज्यादा व्यापने वाली स्मृति गन्‍ध ही है –  अन्नमय कोश से लेकर आनन्‍दमय कोश तक, हर जगह ।  स्मृतियाँ प्रेम की पोषक हैं । प्रेम जीवन का पोषक ।

“साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी” ! यह समय, यह युग हमें एकाकी बना रहा है, हम इस समय को । मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है, तुम्हारे पास मेरे लिए । हाल तो यह हो गया है कि हमारे पास खुद के लिए भी समय नहीं है । मालती के फूलों की भीनी सुगन्‍ध हम पकड़ नहीं पाते, ‘रात की रानी’ पीछे छोड़ आते हैं, बारिश में धुलते हुए पत्तों तक पहुँच नहीं पाते, सौंफ के शर्बत की याद भी नहीं आती, इलायची डालकर चाय नहीं खौलाते – इन स्मृति-गन्‍धों में घड़ी भर डूबना भी सम्भव नहीं हो पा रहा । बस, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ ...!

हम किसी चीज के लिए व्याकुल नहीं होते । नहीं, हम सही चीज के लिए व्याकुल नहीं होते । ‘श्री श्री रामकृष्ण कथामृत’ में लिखा है “ व्याकुलता के बाद ही ईश्वर दर्शन” । “ मन की तो बात है । मन से ही बद्ध, मन से ही मुक्त ।”  मन स्मृति-भण्डार है । स्मृति मन का उपचार, प्रेम आधार ।

कोई जरूरी नहीं कि किताबों में लिखे अनुसार ही बात हो तभी बात बने । कोयले के चूल्हे से उठता धुआँ हो सकता है आज स्वीकार्य न भी हो, लेकिन उसमें समाई हुई स्मृतियों से जिस आत्मीयता और सुकून का संचार होता है, उसको क्या कहेंगे ? प्रेम में थोड़ा भरोसा, थोड़ी श्रद्धा तो रखनी पड़ती है ।

गरमी की रातों में, चाँदनी रातों में, बेली के फूलों की खुशबू की बात है— क्या हुआ जो शरद-रात है !

 

“प्रेमेर खेला के बुझते पारे ?”

[ प्रेम का खेल कौन समझ सकता है ?]  

 

 


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