शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती - ३

सिद्धप्रसिद्ध बुरलेल जी की पाती - ३


आदरणीय सम्पादक जी,

प्रणाम स्वीकारें ।


कहनाम यह है कि बहुत हिम्मत जुटा कर आपको लिखने का जतन कर पा रहे हैं। एक ऐसा लेखक जो डेढ़ सौ शब्द की एक टिप्पणी भी ढंग से नहीं लिख पाता, यदि सम्पादक जी को पत्र लिख बैठे तो क्या ही कहा जाए ! आप तो हमारा नाम भी नहीं सुने होंगे। कुछ कवि, लेखक, आलोचक, सम्पादक-सहायक सम्पादक आदि के हाथ-पैर जोड़ रहे हैं; किसी का दिल पसीज गया तो आप तक मेरा नाम भी पहुँचा देंगे वे । 

         आप पर जितना दबाव रहता है, आप जिस तनाव में रहते हैं, उसे दूसरा कोई भी व्यक्ति समझ नहीं सकता । उस पर आप हिन्दी के सम्पादक हैं । सारे के सारे सम्पादक अवैतनिक ! अब आदमी मठाधीशी भी न‌ करे तो‌ क्या करे‌ । खैर ।  हाल‌ तो यह है -- 'ठण्डा मतलब कोकाकोला' भले हो जाए, हिन्दी मतलब क्या, इसका सही अंदाजा तो लग ही नहीं पा रहा । पहला सवाल तो यह कि हिन्दी किसकी -- मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा जैसे कितने प्रश्न जाने कब से हवा में तैर रहे हैं । फिर यह सवाल कि लेखक कौन ? जिसको भी लिखना आए वह लेखक । जैसे, जो भी अपना नाम लिख सके वह साक्षर !! इतना लिखा जा रहा है कि अच्छा लेखन भूसे में सूई ढूँढ़ने जैसा होता जा रहा है। जब हमारे जैसा लेखक भी समझ लेता है कि 'उसका लेखन मेरे लेखन से बेहतर कैसे?' , फिर उसके बाद बचता ही क्या है ?  शायद इन्हीं कारणों से आपने सम्पादन की नैया भाग्य की पतवारों के भरोसे छोड़ दी है । वैसे भी समय कहाँ है आपके पास ? दुनिया भर के कितने तो काम होते हैं आपको। आपने 'रेफरल' सिस्टम को अपना लिया है । रेफरल यानी सिफारिश । किसी की सिफारिश के साथ रचना पहुँचे तो स्क्रूटनी के नियम शिथिल किए जा सकते हैं । अगर किसी की वजह से कोई तगड़ा विज्ञापन मिल रहा हो तो फिर बात ही क्या है ! विज्ञापन की आशा हो तो सम्बन्धित लेखक की पुस्तकों, साहित्य में उसके अवदान की प्रशंसात्मक समीक्षा छापने के उपाय स्वत: कर लिए जाते हैं ।

          हिन्दी आपकी अपनी ही भाषा है । आप जैसे चाहे इस्तेमाल करें । वर्तनी की टाँग तोड़ें, चाहे व्याकरण की बाँह मरोड़ें। हाँ, अँगरेजी या उर्दू के शब्द हों तो 'अतिथि देवो भव' करना पड़ता है । 

          आप या आपके लोग लेखकों को रचना की पावती की सूचना देना भी जरूरी नहीं समझते। वैसे ठीक ही है , लेखन की पहली शर्त ही है धीरज ।  फिर, आपको माल भी एकदम ताजा चाहिए। वह भी फ्री ऑफ कॉस्ट ! पहले कहीं छपी हुई चीज तो बिल्कुल ही नहीं । हाँ,  रेफरल सिस्टम से आया हुआ कुछ हो, या खुद रेफरी का ही कुछ हो, तब नियमों को शिथिल करने में कोई दोष नहीं लगता --  सब शुद्ध-सात्विक माना जाता है ।'मुफ्त की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते' कहावत को आपने झुठला दिया है । बदले में आप लेखक को वह चीज देते हैं, जो उसे अपने घर में भी शायद ही प्राप्त होती हो -- प्रतिष्ठा । आदमी जीता क्यों है, प्रतिष्ठा के लिए ! लेखक हो , तब तो एकदम पक्का । 

            आप अटल हैं ।आप अपनी धारणा के विपरीत नहीं जा सकते । लेखक को सेटल होना है, वह आपकी धारणा के विपरीत नहीं जा सकता। साहित्य की धारा धारणाओं के आधार पर बनती है । साहित्य बहती गंगा है, बशर्ते आपको धारा के साथ बहना आता हो । आप एक परम्परा का इसलिए विरोध कर सकते हैं कि आपको किसी दूसरी परम्परा की लीक पीटनी है । साहित्य क्या है --  कुछ बीज-शब्दों के इर्द-गिर्द  शब्दों का नृत्य ! आप लेखक बनाते हैं, लेखन को सींचकर उसे स्वयं पनपने नहीं देते -- अराजक बेलें सुन्दरता को ढॅंक ले सकती हैं । आपको साँचे में ढले लेखक पसन्द आते हैं । लेखक प्रिय हो, तो कुरुचि-सुरुचिपूर्ण जैसी भी हो, रचना श्लाघ्य हो जाती है । आप स्वयं अपने श्रीमुख से उसकी प्रशंसा करते थकते नहीं, अपने करकमलों से उसे शेयर करते ऊबते नहीं।

            आपने कठोरता को सत्य का पर्याय मान लिया है । जितनी ज्यादा कठोरता, उतनी ज्यादा सत्य की पक्षधरता । साहित्य, राजनीति, साहित्य की राजनीति, राजनीति का साहित्य -- मोटा-मोटी यही साहित्य है । इसके अलावा तो सब सिलेबस वाली पढ़ाई है ।  साहित्य दुःख भरा तालाब है, कष्टों का पहाड़ है, विरोध की रेल है । आपके जानते जीवन में जो भी सुन्दर है, स्वादु है, नफीस है -- सब विलासिता है, जो जीवन के लिए कतई आवश्यक नहीं । इसीलिए त्याज्य है । 

             इतना लिखते-लिखते हम समझ गए हैं कि इनमें से कोई भी बात आप पर लागू नहीं होती । ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कुण्ठित लेखक की आत्मा कलम पर सवार हो गई है। सम्पादक और लेखक के बीच तो प्रेम-सम्बन्ध होता है -- क्षणे तुष्टा, क्षणे रुष्टा ! छप गए तो प्यार, नहीं तो मार !


जो भी हो, धुआँ दिखे तो मानना चाहिए कि कहीं न कहीं आग भी लगी होगी...l 


बाकी सब कुशल-मंगल ।


शेष फिर ।


आपका अपना,

सिद्धप्रसिद्ध

उर्फ बुरलेल जी 


***
मैथिली में 'बुरलेल' आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो मूर्ख, नासमझ, बुद्धिहीन, या बेवकूफ हो। कभी-कभी इसे बहुत सीधे-साधे या मंदबुद्धि व्यक्ति के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है

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