यात्रा
एक सींक हाथ
एक सींक पाँव
एक ठोप धूप
एक ठोप छाँव
दरिया-शहर
बादल का गाँव
हम ही खेवैया
हम ही थे नाव
पानी जो हिला
नाव चल पड़ी
हम भी चल पड़े
पहुँचे एक ठाँव
फिर ठहर गए
कुछ बिसर गए
जो निकले थे हम
लेके अपने भाव
और डूबे हम
और और डूबे हम
बदलने लग पड़े
धीमे- धीमे अपने चाव
फिर दिन बहुत गए
ऐसे खो के जुत गए
फिर आँख जब खुली
तो खुली ही रह गई
फिसल रही थी उम्र
रेत की तरह
दरिया में नाव थी
डूबती हुई
नाव में थे हम
मारे हाथ-पाँव
एक ठाँव छोड़कर
जाने को और ठाँव...

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