कुछ छंद में : ९ व १०
पैरवी
बिगड़े कई काम बनाती है पैरवी
छूटे हुए काम कराती है पैरवी
दिखे नहीं, उसको दिखाती है पैरवी
जाने हुए को कि जनाती है पैरवी
झुके हुए सर को उठाती है पैरवी
तनती हुई चाल चलाती है पैरवी
जाके किसी माथ बिठाती है पैरवी
खूबियाँ भी खूब गिनाती है पैरवी
नाम से ही नाम मिलाती है पैरवी
और सारे काम भुलाती है पैरवी
कि लाड़ में भी मुँह फुलाती है पैरवी
फिर लड़ि-हँसि हँसि-लड़ि मनाती है पैरवी
दुनिया देखिए कि चलाती है पैरवी
कि कितने मनोरथ फलाती है पैरवी
पाँव वहीं कस के हलाती है पैरवी
मन्नतों-सी चाह मनाती है पैरवी
छंद-९
खबर
है ?
पंथियों ने पंथ देखा
और बातें पंथ की कीं
कुछ रास्ता आए निकल
परवाह वही कहीं नहीं
और कुछ जो संघ में थे
उन सभी के सर चढ़े थे
झुका रहा जो बचा रहा
चरण गहे बस उठे वही
जन बहुत थे आवाज गुम
कुछ ही ‘हम’ थे बाकी ‘तुम’
टिपकारी थी ऊपर से
और भीतर से फाँक थी
जो कि चिल्लाते रहे वे
नाम लिखवाते रहे वे
सूचियों में नाम खुद का
आगे बढ़ते रहे वही
भाई थे, कहीं दास थे
जो कहीं नहीं, उदास थे
पक्षधर या पक्षपाती
गरज किसे पड़ी किसे थी
बस अँधेरे से अँधेरे
बढ़ रहे हैं रोज फेरे
सब खड़े हैं राह घेरे
है सुन रहा कोई नहीं
अब ये सुनें या वे सुनें
अब राह ऐसी ही चुनें
जो खरा है वो खरा है
झूठा सिक्का चले नहीं
छंद-१०
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