कुछ छंद में - १२,१३,१४
आत्मकेंद्रित इस दुनिया में
मन को और ठौर ले जाओ
अपना मन ही साथी केवल
मन को जाकर वहीं रमाओ
छंद-१२
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बज्जर मूरख से बचिए लोग
ज्यादा चतुराई भी है रोग
सीधे रस्ते बस चलते चलें
बाकी अब जिसके जैसे जोग
जनता प्रेम की भूखी है जी
काहे करते हैं बल-परयोग
देख-दाख लिया चाहे जितना
कुछ तो है कहें जिसे संजोग
तुम राजपथ वाले बन जाओ
मुझको रहने दो मेरे दोग
छंद-१३
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जब लोग बड़े हो जाते हैं
क्यों दिल छोटा हो जाता है
क्यों बात कसैली होती है
क्यों मन तितुआ हो जाता है
क्यों कुटिल हँसी हो जाती है
क्यों शरम-हया खो जाती है
नजरें दुश्मन हो जाती हैं
दिल जहर-भरा हो जाता है
अपने सारे पाप भूलकर
और पाप की छाप भूलकर
पाठ पढ़ाने लगते हैं , यह
हद से ज्यादा हो जाता है
जबतक हित है आदर भी है
लेकिन बाहर-बाहर ही है
अंदर कितनी मैल भरी है
जाहिर सारा हो जाता है
हैं बड़े लोग, दुनिया उनकी
हम ही ठहरे पागल सनकी
उनकी दुनिया, अपनी दुनिया
पथ अलग यहाँ हो जाता है
छंद-१४
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