रविवार, 30 अगस्त 2026

व्यक्ति- स्वतंत्रता के तीन स्टेज शैलेन्द्र के तीन गीत

 व्यक्ति- स्वतंत्रता के तीन स्टेज

शैलेन्द्र के तीन गीत 


तू प्यार का सागर है :

https://youtu.be/hbHUz29sVnw?si=94iQ8r_VW7NvfNMs

सच हुए सपने तेरे :

https://youtu.be/1-G5gNMeW0I?si=4iwaa8NppQ_sEmEH


आज फिर जीने की तमन्ना है :

https://youtu.be/lqBCgkBKlDc?si=0ghu7VV4LGzxrsBx


कई बार ऐसा लगता है कि एक ही समय पर कई अलग-अलग समय उपस्थित होते हैं । कि समय नहीं गुजरता, हम समयों से गुजर रहे होते हैं । उदाहरण के तौर पर कहें तो एक समय ऐसा हो सकता है जब आदमी जेनरल या स्लीपर बोगी में ही सफर कर सकता है । फिर ऐसा समय भी आता है जब एसी से नीचे बात नहीं बनती । जेनरल या स्लीपर बोगी में अभी यात्राएँ हो रही हैं । पहले से ज्यादा लोग सफर कर रहे हैं। यह एक समय है । वह आदमी इस समय से निकल कर आगे बढ़ चुका है।

     आज यानी 30 अगस्त को शैलेन्द्र का जन्म-दिवस है। आज उनके जन्म के एक सौ तीन वर्ष हुए । आदमी अपने जीवन में अलग-अलग अनुभवों, मुकामों से गुजरता है । इधर शैलेन्द्र के तीन गीतों पर ध्यान गया है। तीनों में नायिका प्रधान है। बल्कि यह नायक या नायिका का सवाल नहीं, यह व्यक्ति -मात्र की बात है । व्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है । तीनों गीतों में व्यक्ति-स्वतंत्रता के अलग-अलग समयों या अलग-अलग स्टेज को दिखाया गया है । एक ऐसा समय हो सकता है जब व्यक्ति पूरी तरह परिस्थितियों के वश में होता है । वह अपने हालात बदलना चाहता तो है, पर मुश्किलों में घिर कर रह जाता है । इस मन:स्थिति को दर्शाती हुई फिल्म ' सीमा ' के इस गीत का यह अंतरा देखिए -


                घायल मन का पागल पंछी उड़ने को बेकरार

                पंख हैं कोमल रात है धुंधली जाना है सागर पार

                अब तू ही इसे समझा राह भूले थे कहाँ से हम


फिर वह स्टेज आता है जब आदमी किसी से कुछ पा लेने पर ही खुश हो जाता है । पाने वाले की नहीं, देने वाले की मर्जी असली बात होती है । खुशियाँ अर्जित नहीं प्रदत्त होती हैं । फिर धीरे-धीरे आदमी उसी ढब में ढल जाता है। उसे वही जीवन-शैली भाने लगती है । ' काला बाजार ' के गीत ' सच हुए सपने तेरे ' की ये पंक्तियाँ ऐसी ही बात कह रही हैं --


                 मन की पायल छम छम बोले हर एक साँस तराना

                  धीरे धीरे सीख लिया अखियों ने मुसकाना

                  हो गये दूर अंधेरे झूम ले ओ मन मेरे


लेकिन आदमी एक दिन आखिर आजिज आ ही जाता है। वह अपने चारों ओर कसे हुए मकड़जाल को काट कर फेंक देता है। वह खुली हवा में साँस लेने लगता है । वह बीती बातों को भूल, आगे की ओर देखने लगता है। ' गाइड ' का ' आज फिर जीने की तमन्ना है ' भला कौन भूल सकता है --


                 कल के अंधेरों से निकल के

                 देखा है आँखें मलते मलते

                 फूल ही फूल ज़िंदगी बहार है

                 तय कर लिया


यही ' तय कर लेना ' तो आदमी को आदमी बनाता है । इस गीत की पहली ही पंक्ति है "काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" ।

       पहले गीत में जहाँ दु:ख, याचना और छटपटाहट के भाव हैं, वहीं दूसरा गीत अनायास मिली हुई खुशी से भरा हुआ है। यह खुशी किसी और के निर्णयों या कामों पर आश्रित है। तीसरा गीत उल्लास से भरा हुआ गीत है। यह गीत उन्मुक्तता का गीत है। व्यक्ति की परम अभिव्यक्ति संभवतः यही स्वतंत्रता है जो उसने अपने बलबूते अर्जित की है ।

         तीनों ही गीतों में संगीत एवं अभिनय ने रस-वृद्धि की है। पहले गीत के संगीतकार शंकर-जयकिशन और अभिनेता बलराज साहनी एवं नूतन हैं। दूसरे और तीसरे गीतों की टीम एक ही है - संगीतकार सचिन देव बर्मन,निर्देशक विजय आनंद तथा अभिनेता वहीदा रहमान और देव आनंद। मुझे ऐसा लगता है कि सचिन देव बर्मन के साथ काम करते वक्त शैलेन्द्र थोड़ा ज्यादा दार्शनिक हो जाते हैं, जो सचिन देव बर्मन के लिए लिखे उनके गीतों में झलकता भी है।

         ' सीमा ' 1955, ' काला बाजार ' 1960, और ' गाइड ' 1966 में रिलीज हुई थी। शैलेन्द्र द्वारा निर्मित ' तीसरी कसम ' भी 1966 में ही रिलीज हुई थी । 1966 में ही 14 दिसंबर को शैलेन्द्र इस दुनिया को छोड़ कर चले गए।


                  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें